खोया पानी / भाग 10 / मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी / तुफ़ैल चतुर्वेदी

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सागर जलौनवी

रात के बारह बजे थे, चारों ओर श्रोताओं का तूती बोल रहा था। मुशायरे के शोर से सहम कर गांव की सरहद पर गीदड़ों ने बोलना बंद कर दिया था। एक स्थानीय शायर खुद को हर शेर पर हूट करवा कर सर झुकाये जा रहा था कि एक साहब चांदनी पर चलते हुए मुशायरे के अध्यक्ष तक पहुंचे, दायें हाथ से आदाब किया और बायें हाथ से अपनी मटन-चाप मूंछ जो खिचड़ी हो चली थी, पर ताव देते रहे। उन्होंने प्रार्थना की कि मैं एक गरीब परदेसी हूं, मुझे भी शेर पढ़ने की इजाजत दी जाये। उन्होंने खबरदार किया कि अगर पढ़वाने में देर की गयी तो उनका दर्जा खुद-ब-खुद ऊंचा होता चला जायेगा और वो उस्तादों से पहलू मारने लगेंगे। उन्हें इजाजत दे दी गयी। उन्होंने खड़े हो कर दर्शकों को दायें, बायें और सामने घूम कर तीन-बार आदाब किया। उनकी क्रीम रंग की अचकन इतनी लंबी थी कि भरोसे से नहीं कहा जा सकता था कि उन्होंने पाजामा पहन रक्खा है या नहीं। काले मखमल की टोपी को जो भीड़-भड़क्के में सीधी हो गयी थी, उन्होंने उतार कर फूंक मारी और अधिक टेढ़े एंगिल से सर पर जमाया।

मुशायरे के दौरान यह साहब छटी लाइन में बैठे अजीब अंदाज से 'ऐ सुब्हानल्ला-सुब्हानअल्ला' कह कर दाद दे रहे थे। जब सब ताली बजाना बंद कर देते तो यह शुरू हो जाते और इस अंदाज में बजाते जैसे रोटी पका रहे हैं। फर्शी आदाब करने के बाद वो अपनी डायरी लाने के लिए अचकन इस तरह ऊपर उठाये अपनी जगह पर वापस गये जैसे कुछ औरतें भरी बरसात और चुभती नजरों की सहती-सहती बौछारों में, सिर्फ इतने गहरे पानी से बचने के लिए जिसमें चींटी भी न डूब सके, अपने पांयचे दो-दो बालिश्त ऊपर उठाये चलती हैं और देखने वाले कदम-कदम पे दुआ करते हैं कि 'इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे'।

अपनी जगह से उन्होंने अपनी डायरी उठायी, जो दरअस्ल स्कूल का एक पुराना हाजिरी रजिस्टर था जिसमें इम्तिहान की पुरानी कापियों के खाली पन्नों पर लिखी हुई गजलें रखी थीं। उसे सीने से लगाये वो साहब वापस मुशायरे के अध्यक्ष के पास पहुंचे। हूटिंग किसी तरह बंद होने का नाम ही नहीं लेती थी। ऐसी हूटिंग नहीं देखी कि शायर के आने से पहले और शायर के जाने के बाद भी जोरों से जारी रहे। अपनी जेबी घड़ी एक बार बैठने से पहले और बैठने के बाद ध्यान से देखी। फिर उसे डमरू की तरह हिलाया और कान लगा कर देखा कि अब भी बंद है या धक्कमपेल से चल पड़ी है। जब फुरसत पायी तो श्रोताओं से बोले, 'हजरात! आपके चीखने से मेरे तो गले में खराश पड़ गयी है।'

इन साहब ने अध्यक्ष और श्रोताओं से कहा कि वे एक खास कारण से गैर-तरही गजल पढ़ने की इजाजत चाहते हैं, मगर कारण नहीं बताना चाहते। इस पर श्रोताओं ने शोर मचाया। हल्ला जियादा मचा तो उन साहब ने अपनी अचकन के बटन खोलते हुए गैर-तरही गजल पढ़ने का यह कारण बताया कि जो मिसरा 'तरह' दिया गया है उसमें 'सकता' (छंद दोष) पड़ता है, 'मरज' शब्द को 'फर्ज' के ढंग पर बांधा गया है। श्रोताओं की आखिरी पंक्ति से एक दाढ़ी वाले बुजुर्ग ने उठ कर न सिर्फ सहमति व्यक्त की बल्कि ये चिनगारी भी छोड़ी कि अलिफ (आ की ध्वनि को अ बांधना) भी गिरता है।

यह सुनना था कि शायरों पर अलिफ ऐसे गिरा जैसे फालिज गिरता है। सकते में आ गये। श्रोताओं ने आसमान, मिसरा-तरह और शायरों को अपने सींगों पर उठा लिया। एक हुल्लड़ मचा हुआ था। जौहर इलाहाबादी कुछ कहना चाहते थे मगर अब शायरों के कहने की बारी खत्म हो चुकी थी। फब्तियों, ठट्ठों और गालियों के सिवा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। ऐसा स्थिति थी कि अगर उस समय जमीन फट जाती तो बिशारत स्वयं को, मय कानपुर के शायरों और मौलवी मज्जन को गावतकिये समेत उसमें समा जाने के लिए खुशी से ऑफर कर देते।

उस एतराज करने वाले शायर ने अपना उपनाम सागर जलौनवी बताया।


मुशायरा कैसे लूटा गया

लोग बड़ी देर से उकताये बैठे थे। सागर जलौनवी के धमाकेदार एतराज से ऊंघते मुशायरे में जान ही नहीं, तूफान आ गया। दो गैस की लालटेनों का तेल पंद्रह मिनट पहले खत्म हो चुका था। कुछ में वक्त पर हवा नहीं भरी गयी। वो फुस्स हो कर बुझ गयीं। सागर जलौनवी के एतराज के बाद किसी शरारती ने बाकी लालटेनों को झड़झड़ाया, जिससे उनके मेंटल झड़ गये और अंधेरा हो गया। अब मारपीट शुरू हुई, लेकिन ऐसा घुप्प अंधेरा था कि हाथ को शायर सुझाई नहीं दे रहा था इसलिए बेकसूर श्रोता पिट रहे थे। इतने में किसी ने आवाज लगाई, भाइयो! हटो! भागो! बचो! रंडियों वाले हकीम साहब की भैंस रस्सी तुड़ा गयी है। यह सुनते ही घमासान की भगदड़ पड़ी। अंधेरी रात में काली भैंस तो किसी को दिखायी नहीं दी लेकिन लाठियों से लैस मगर घबराये हुए देहातियों ने एक दूसरे को, भैंस समझ कर खूब धुनाई की। लेकिन आज तक यह समझ न आया कि चुराने वालों ने ऐसे घुप अंधेरे में नये जूते कैसे पहचान लिए और जूते की क्या, हर चीज जो चुरायी जा सकती थी चुरा ली गयी। पानों की चांदी की थाली, दर्जनों अंगोछे, सागर जलौनवी की दुगनी साइज की अचकन, जिसके नीचे कुरता या बनियान नहीं था। एक जाजम, तमाम चांदनियां, यतीमखाने के चंदे की संदूकची, उसका फौलादी ताला, यतीमखाने का काला बैनर, मुशायरे के अध्यक्ष का गाव-तकिया और आंखों पर लगा चश्मा, एक पटवारी के गले में लटकी हुई दांत कुरेदनी और कान का मैल निकालने की डोई, ख्वाजा कमरुद्दीन की जेब में पड़े आठ रुपये, इत्र में बसा रेशमी रूमाल और पड़ौसी की बीबी के नाम महकता खत (यही एक चीज थी जो दूसरे दिन बरामद हुई और इसकी नक्ल घर-घर बंटी), हद ये कि कोई बदतमीज उनकी टांगों में फंसे चूड़ीदार का रेशमी नाड़ा एक ही झटके में खींचकर ले गया। एक शख्स बुझा हुआ हंडा सर पर उठा के ले गया। माना कि अंधेरे में किसी ने सर पर ले जाते हुए तो नहीं देखा, मगर हंडा ले जाने का सिर्फ यही एक तरीका था। बीमार मुर्गियों के केवल कुछ पर पड़े रह गये। सागर जलौनवी का बयान था कि एक बदमाश ने उसकी मूंछ तक उखाड़ कर ले जाने की कोशिश की जिसे उसने यथा-समय अपनी चीख से नाकाम कर दिया। यानी इस बात की चिंता किये बिना कि उपयोगी है या नहीं, जिसका जिस चीज पर हाथ पड़ा उसे उठा कर, उतार कर, नोच कर, फाड़ कर, उखाड़ कर ले गया। हद यह कि तहसीलदार के पेशकार मुंशी बनवारी लाल माथुर के इस्तेमाल में आते डेंचर्स भी। केवल एक चीज ऐसी थी जिसे किसी ने हाथ नहीं लगाया। शायर अपनी डायरियां जिस जगह छोड़ कर भागे थे वो दूसरे दिन तक वहीं पड़ी रहीं।

बाहर से आये देहातियों ने यह समझकर कि शायद यह भी मुशायरे का हिस्सा है, मार-पीट और लूट-खसोट में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और बाद को बहुत दिन तक हर आये-गये से बड़े चाव से पूछते रहे कि अगला मुशायरा कब होगा।


कई पुश्तों की नालायकी का निचोड़

शायर जो भूचाल लाया बल्कि जिसने मुशायरा अपनी मूंछों पर उठा लिया, बिशारत का खानसामा निकला। पुरानी टोपी और उतरन की अचकन का तोहफा उसे पिछली ईद पर मिला था। राह चलतों को पकड़-पकड़ के अपना कलाम फरमाता। सुनने वाला दाद देता तो उसे खींच कर लिपटा लेता, और दाद न देता तो खुद आगे बढ़कर उससे लिपट जाता। अपने कलाम के दैवीय होने में उसे कोई शक न था। शक औरों को भी नहीं था क्योंकि केवल अक्ल या खाली-खूली इल्म के जोर से कोई शख्स ऐसे खराब शेर नहीं कह सकता। दो पंक्तियों में इतनी सारी गलतियां और झोल आसानी से सुमो देना दैवीय मदद के बगैर मुमकिन न था। काव्य चिंतन में अक्सर ये भी हुआ कि अभी पंक्ति पे ठीक से दूसरी पंक्ति भी नहीं लगी थी कि हंडिया धुआं देने लगी। सालन के भुट्टे लग गये। पांचवीं क्लास तक पढ़ाई की थी, जो उसकी निजी जुरूरत और बर्दाश्त से कहीं जियादा थी। वो अपनी संक्षिप्त-सी अंग्रेजी और ताजा शेर को रोक नहीं सकता था। अगर आप उससे दस मिनट भी बात करें तो उसे अंग्रेजी के जितने भी लफ्ज आते थे वो सब आप पर दाग देता। अपने को सागर साहब कहलवाता लेकिन घर में जब खानसामा का काम अंजाम दे रहा होता तो अपने नाम अब्दुल कय्यूम से पुकारा जाना पसंद करता। सागर कह के बुलायें तो बहुत बुरा मानता। कहता था, नौकरी में हाथ बेचा है, उपनाम नहीं बेचा। खानसामागिरी में भी शायराना तूल देने से बाज न आता। खुद को वाजिद अली शाह, अवध के नवाब का खानदानी खानसामा बताता था। कहता था, कि मैं फारसी में लिखी डेढ़ सौ साल पुरानी डायरी देख-देख कर खाना पकाता हूं। उसके हाथ का अस्वादिष्ट खाना दरअस्ल कई पुश्तों की जमा की गयी नालायकी का निचोड़ होता था।


मगर इसमें पड़ती है मेहनत जियादा

उसका दावा था कि मैं एक सौ एक किस्म के पुलाव पका सकता हूं और ऐसा गलत भी न था। बिशारत हर इतवार को पुलाव पकवाते थे। साल भर में कम से कम बावन बार जुरूर पकवाया होगा। हर बार एक अलग तरीके से खराब करता था। सिर्फ वो खाने ठीक पकाता था जिनको और खराब करना मामूली काबलियत रखने वाले आदमी के बस का काम नहीं। उदाहरण के तौर पर खिचड़ी, आलू का भुरता, लगी हुई खीर, रात भर की पकी देग, खिचड़ा, अरहर की दाल और मुतनजन जिसमें मीठे चावलों के साथ गोश्त और नींबू की खटाई डाली जाती है। फूहड़ औरतों की तरह खाने की तमाम खराबियों को मिर्च से और शायरी की खराबियों को तरन्नुम से दूर कर देता था। मीठा बिल्कुल नहीं पका सकता था, इसलिए कि इसमें मिर्च डालने का रिवाज नहीं। अक्सर चांदनी रातों में जियोग्राफी टीचर को उसी के बैंजो पर अपनी गजलें गा के सुनाता, जिन्हें सुनकर वो अपनी महबूबा को, जिसकी शादी मुरादाबाद में एक पीतल के पीकदान बनाने वाले से हो गयी थी, याद कर-कर के षणज में रोता था। गाने की जिस धुन का सागर ने बिना किसी प्यास के आविष्कार किया था उससे गिरने में बहुत मदद मिलती थी।

बिशारत ने एक दिन छेड़ा कि भई, तुम ऐसी मुश्किल जमीनों में ऐसे अच्छे शेर निकालते हो, फिर खानसामागिरी क्यों करते हो? कहने लगा आपने मेरे दिल की बात पूछ ली। अच्छा खाना पकाने के बाद जो रूह को खुशी मिलती है वो शेर के बाद नहीं मिलती। किस वास्ते कि खाना पकाने में वज्न का कहीं जियादा खयाल रखना पड़ता है। खाने वाले जिसे बुरा कह दे उसे बुरा मानना पड़ता है। खाना पकाने में मेहनत भी जियादा पड़ती है। इसीलिए तो आज तक किसी शायर ने बावर्ची का पेशा नहीं पकड़ा।

शायरी को सागर जलौनवी ने कभी जरिया-ए-इज्जत नहीं समझा, जिसका एक कारण ये था कि शायरी के कारण अक्सर उसकी बेइज्जती होती रहती थी। खाना पकाने में जितना दिमागदार था, शेर कहने में उतनी ही उदारता से काम लेता था। अक्सर बड़े खुले दिल से स्वीकार करता था कि 'गालिब' उर्दू में मुझसे बेहतर कह लेता था। 'मीर' को मुझसे कहीं जियादा तन्ख्वाह और दाद मिली। उदारता से इतना मानने के बाद ये जुरूर कहता, हुजूर वो जमाने और थे। उस्ताद सिर्फ शेर कहते और शार्गिदों की गजलें बनाते थे, कोई उनसे चपाती नहीं बनवाता था।


ये कौन हजरते -' आतिश ' का हमजबां निकला

इसमें कोई शक नहीं कि कई-कई शेर बड़े दमपुख्त निकलते थे। कुछ शेर तो वाकई ऐसे थे कि 'मीर' और 'आतिश' भी उन पर गर्व करते, जिसका एक कारण ये था कि ये उन्हीं के थे। खुद को एक विद्यार्थी और अपनी शायरी को दैवी अवतरण बताता था। चुनांचे एक अरसे तक तो उसके भक्त और शिष्यगण इसी खुशगुमानी में रहे कि चोरी नहीं अवतरण में साम्य हो गया है। रुदौली में अपनी ताजा गजल पढ़ रहा था कि किसी गुस्ताख ने भरे मुशायरे में टोक दिया कि ये तो नासिख का है। चोरी है चोरी! जरा जो घबराया हो। उल्टा मुस्कुराया, कहने लगा बिल्कुल गलत! आतिश का है।

फिर अपनी डायरी मुशायरे के अध्यक्ष की नाक के नीचे बढ़ाते हुए बोला 'हुजूर! देख लें, ये शेर डायरी में Inverted Commas में लिखा है और आगे आतिश का नाम भी लिख दिया है।' मुशायरे के अध्यक्ष ने इसकी पुष्टि की और एतराज करने वाला अपना-सा मुंह ले के रह गया।

सागर अपने छोड़े हुए वतन जालौन के कारण प्यार में छोटा सागर (जाम) कहलाता था, मगर वो खुद अपना रिश्ता शायरी के लखनऊ स्कूल से जोड़ता था और जबान के मामले में दिल्ली वालों और पंजाब वालों से बला का पक्षपात करता था, चुनांचे केवल लखनऊ के शायरों के कलाम से चोरी करता था।


तिरे कूचे से हम निकले

हंगामे के बाद किसी को मेहमान शायरों का होश न था। जिसके, जहां सींग समाये वहीं चला गया और जो खुद इस लायक न था उसे दूसरे अपने सींगों पर उठा ले गये। कुछ रात की हड़बोंग की शर्मिंदगी, कुछ रुपया न होने के कारण अव्यवस्था, बिशारत इस लायक न रहे कि शायरों को मुंह दिखा सकें। मौली मज्जन के दिये दस रुपये कभी के चटनी हो चुके थे बल्कि वो अपनी जेब के बहत्तर रुपये खर्च कर चुके थे और अब इतनी क्षमता न थी कि शायरों को वापसी का टिकिट दिलवा सकें। मुंह पर अंगोछा डाल कर छुपते-छुपाते धार्मिक-शिक्षा टीचर के खाली घर में गये। वेलेजली उनके साथ लगा था। ताला तोड़ कर घर में घुसे और दिन भर मुंह छुपाये पड़े रहे। तीसरे पहर वेलेजली को जंजीर उतार कर बाहर कर दिया कि बेटा जा, आज खुद ही घूम आ। बिफरे हुए कानपुर के शायरों का झुंड उनकी तलाश में घर-घर झांकता फिरा, आखिर थक हार-कर पैदल स्टेशन के लिए रवाना हुआ। सौ-दौ सौ कदम चले होंगे कि लोग साथ आते गये और बाकायदा जुलूस बन गया। कस्बे के तमाम अधनंगे बच्चे, एक पूरा नंगा पागल, म्यूनिस्पिल बोर्ड की हद में काटने वाले तमाम कुत्ते उन्हें स्टेशन छोड़ने गये। जुलूस के आखिर में एक साधू भभूत रमाये, भंग पिये और तीन कटखनी बत्तखें भी अकड़े हुई फौजियों की Ceremonial चाल यानी अपनी ही चाल--- Goose Step--- में चलती हुई साथ थीं। रास्ते में घरों में आटा गूंधती, सानी बनाती, रोते हुए बच्चे का मुंह दूध के ग्लैंड से बंद करती और लिपाई-पुताई करती औरतें अपना-अपना काम छोड़कर, सने हुए हाथों के तोते से बनाये जुलूस देखने खड़ी हो गयीं। एक बंदर वाला भी अपने बंदर और बंदरिया की रस्सी पकड़े ये तमाशा देखने खड़ा हो गया। बंदर और लड़के बार-बार तरह-तरह के मुंह बनाकर एक दूसरे पर खोंखियाते हुए लपकते थे। ये कहना मुश्किल था कि कौन किसकी नकल उतार रहा है।

आते वक्त जिन शायरों ने इस बात पर नाक-भौं चढ़ायी थी कि बैलगाड़ी में लाद कर लाया गया, अब इस बात से नाराज थे कि पैदल खदेड़े गये। चलती ट्रेन में चढ़ते वक्त हैरत कानपुरी एक कुली से ये कह गये कि उस कमीन (बिशारत) से कह देना, जरा धीरजगंज से बाहर निकले, तुझसे कानपुर में निबट लेंगे। सब शायरों ने अपनी जेब से वापसी के टिकिट खरीदे, सिवाय उस शायर के जो अपने साथ पांच मिसरे उठाने वाला लाया था। ये साहब अपने मिसरा उठाने वालों समेत आधे रास्ते में ही बिना टिकिट सफर करने के जुर्म में उतार लिए गये। प्लेटफार्म पर कुछ दर्दमंद मुसलमानों ने चंदा करके टिकिटचेकर को रिश्वत दी तब कहीं जा के छुटे। टिकिटचेकर मुसलमान था वरना कोई और होता तो छहों के हथकड़ी डलवा देता।


बात एक रात की

सिर्फ बेइज्जत हुए शायर नहीं, कानपुर की सारी शायर बिरादरी बिशारत के खून की प्यासी थी। उन शायरों ने बिशारत के खिलाफ इतना प्रोपेगंडा किया कि कुछ गद्य लेखक भी इनको कच्चा चबा जाने के लिए तैयार बैठे थे। कानपुर में हर जगह इस मुशायरे के चर्चे थे। धीरजगंज जाने वाले शायरों ने अपनी जिल्लत और परेशानी की दास्तानें बढ़ा-चढ़ाकर बयान कीं। वो अगर सच नहीं भी थीं तो सुनने वाले दिल से चाहते थे कि खुदा करे! सच हों कि वो इसी लायक थे। लोग कुरेद-कुरेद के विस्तार से सुनते थे। एक शिकायत हो तो बयान करें अब खाने को ही लीजिये, हर शायर को शिकायत थी कि रात का खाना हमें दिन-दहाड़े चार बजे उसी किसान के यहां खिलवाया गया जिसके यहां सुलवाया गया। जाहिर है किसान ने अलग किस्म का खाना खिलाया, चुनांचे जितनी किस्म के खाने थे उतनी ही किस्म की पेट की बीमारियों में शायरों ने खुद को उलझा पाया। हैरत कानपुरी ने शिकायत की कि मैंने नहाने के लिए गर्म पानी मांगा तो चौधराइन ने घूंघट उठा के मुझे सबसे पास के कुएं का रास्ता बता दिया। और ये भरोसा दिलाया कि उसमें से गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म पानी निकलता है। चौधरी ने तो नहाने का कारण भी जानना चाहा (ये उस जमाने का बहुत आम और भौंडा मजाक था) और जब मैंने नहाये बगैर अचकन पहन ली और मुशायरे में जाने लगा तो चौधरी ने मेरी गोद में दो महीने का नंग-धड़ंग बेटा दे कर जबरदस्ती पुष्टि करनी चाही कि नवजात अपने बाप पर पड़ा है। मेरा क्या जाता था मैंने कह दिया हां और बड़े प्यार से बच्चे के सर पे हाथ फेरा जिससे बेचैन होके उसने मेरी अचकन पे पेशाब कर दिया। उसी अचकन को पहने-पहने मैंने लोकल शायरों को गले लगाया।

फिर कहा कि बंदा आबरू हथेली पे रखे एक बजे मुशायरे से लौटा, तीन बजे तक चारपायी के ऊपर खटमल और नीचे चूहे कुलेलें करते रहे। तीन बजते ही घर में 'सुब्ह हो गयी-सुब्ह हो गयी' का शोर मच गया। और ये शिकायत तो सबने की कि सुब्ह चार बजे हमें झिंझोड़-झिंझोड़ कर उठाया और एक-एक लोटा हाथ में पकड़ा के झड़बेरी की झाड़ियों के पीछे भेज दिया गया। हैरत कानपुरी ने प्रोटेस्ट किया तो उन्हें नवजात के पोतड़े के नीचे से एक चादर घसीट के पकड़ा दी गयी कि ऐसा ही है तो ये ओढ़ लेना। शायरों का दावा था कि उस दिन हमने गांव के मुर्गों को कच्ची नींद उठाकर अजानें दिलवा दीं।

कुछ ने शिकायत की हमें 'ठोस' नाश्ता नहीं दिया गया। निहार मुंह फुट भर लंबे ग्लास में छाछ पिलाकर विदा कर दिया। एक साहब कहने लगे कि उनकी खाट के पाये से बंधी हुई एक बकरी सारी रात मींगनी करती रही। मुंह अंधेरे उसी का दूध दुह के उन्हें पेश कर दिया गया। उनका खयाल था कि ये सुलूक तो कोई बकरी भी बर्दाश्त नहीं कर सकती। खरोश शाहजहांपुरी ने कहा कि उनके सिरहाने रात के ढाई बजे से चक्की चलनी शुरू हो गयी। चक्की पीसने वाली दोनों लड़कियां हंस-हंस के जो गीत गा रही थीं वो देवर-भावज और नंदोई-सलहज की छेड़-छाड़ से संबंधित था, जिससे उनकी नींद और नीयत में खलल पड़ा। एजाज अमरोही ने कहा कि भांति-भांति के परिंदों ने सुब्ह चार बजे से ही शोर मचाना शुरू कर दिया। ऐसे में कोई में शरीफ आदमी सो ही नहीं सकता। मजजूब मथरावी को शिकायत थी कि उन्हें कच्चे सहन में जामुन के पेड़ तले मच्छरों की छांव में सुलाया गया। पुरवा के हर चैन देने वाले झोंके के साथ रात भर उनके सर पर जामुनें टपकती रहीं। सुब्ह उठकर उन्होंने शिकायत की तो मकान मालिक के मैट्रिक फेल लौंडे ने कहा, गलत! जामुनें नहीं, फलेंदे थे। मैंने खुद लखनऊ वालों को फलेंदे कहते सुना है। मजजूब मथरावी के बयान के मुताबिक उनकी चारपायी के पास खूंटे से बंधी हुई भैंस रात-भर डकराती रही। तड़के एक बच्चा दिया जो सीधा उनकी छाती पे आ गिरता, अगर वो कमाल की फुरती से बीच में ही कैच न कर लेते। शैदा जारचवी ने अपनी बेइज्जती में भी अनूठेपन और गर्व का पहलू निकाल लिया। उन्होंने दावा किया कि जैसी बेमिसाल बेइज्जती उनकी हुई वैसी तो एशिया भर में कभी किसी शायर की नहीं हुई। राअना सीतापुरी सुम काकोरवी ने शगूफा छोड़ा जिस घर में मुझे सुलाया गया बल्कि रात-भर जगाया गया, उसमें एक जिद्दी बच्चा सारी रात मां के दूध और उसका बाप चर्चा के पहले विषय के लिए मचलता रहा। अखगर कानपुरी जांनशीन मायल देहलवी बोले कि उनका किसान मेजबान हर आध घंटे बाद उठ-उठकर उनसे पूछता रहा कि 'जनाबे-आली कोई तकलीफ तो नहीं, नींद तो ठीक आ रही है ना?' गरज कि जितने मुंह उनसे दुगनी तिगुनी शिकायतें। हर शायर इस तरह शिकायत कर रहा था जैसे कि उसके साथ किसी व्यवस्थित षड्यंत्र के तहत निजी जुल्म हुआ है। हालांकि हुआ-हवाया कुछ नहीं। हुआ सिर्फ ये कि उन शहरी शायरों ने देहात की जिंदगी को पहली बार... और वो भी चंद घंटों के लिए... जरा करीब से देख लिया और बिलबिला उठे। उन पर पहली बार खुला कि शहर से सिर्फ चंद मील की ओट में इंसान कैसे जीते हैं और अब उनकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि यही कुछ है तो किसलिए जीते हैं।


सकते निकलवा लो

कुछ दिन बाद ये भी सुनने में आया कि जिन तरही पढ़ने वालों की बेइज्जती हुई थी उन्होंने तय किया कि आइंदा जब तक किसी उस्ताद के दीवान में खुद अपनी आंख से मिसरा-ए-तरह न देख लें, हरगिज-हरगिज उस जमीन में शेर नहीं निकालेंगे। उनमें से दो शायरों ने सागर जलौनवी से गजलें बनवानी शुरू कर दीं। इधर उस्ताद अखगर कानपुरी-जानशीन माइल देहलवी की दुकान खूब चमकी। उनके पास रोजाना दर्जनों शार्गिद आने लगे कि उन्होंने गजल में करेक्शन की एक खास विधा में स्पेशलाइज कर लिया था। वो सिर्फ सकते निकालते थे और इस तरह निकालते थे जैसे पहलवान लात मारकर कमर की चिक निकाल देते हैं या जिस तरह बारिश में भीगने से बान की अकड़ी हुई चारपाई पर मुहल्ले भर के लौंडों को कुदवा कर उसकी कान निकाल ली जाती है। इस तरह कान तो निकल जाती है, लेकिन लौंडों को परायी चारपायी पर कूदने का चस्का पड़ जाता है।


माई डियर मौलवी मज्जन

दिन तो जैसे-तैसे काटा लेकिन शाम पड़ते ही बिशारत एक करीबी गांव सटक गये। वहां अपने एक परिचित के यहां (जिसने कुछ महीने पहले एक यतीम तलाश करने में मदद दी थी) अंडरग्राउंड हो गये। अभी जूतों के फीते ठीक से खोले भी नहीं थे कि हर जानने वाले को अलग-अलग लोगों के जरिये, अपने गोपनीय भूमिगत स्थान की जानकारी भिजवायी। उन्होंने धीरजगंज में सवा साल रो-रो कर गुजारा था। देहात में वक्त भी बैलगाड़ी में बैठ जाता है। उन्हें अपनी सहनशक्ति पर आश्यर्च हुआ। नौकरी के सब रास्ते बंद नजर आयें तो असहनीय भी सहन हो जाता है। उत्तरी भारत में कोई स्कूल ऐसा नहीं बचा जिसका नाम उन्हें पता हो और उन्होंने वहां दरख्वास्त न भेजी हो। आसाम के एक मुस्लिम स्कूल में उन्हें जिम्नास्टिक मास्टर तक की नौकरी न मिली। चार-पांच जगह अपने खर्च पर जा कर इंटरव्यू में नाकाम हो चुके थे। हर असफलता के बाद उन्हें समाज में एक नयी खराबी नजर आती थी, जिसे सिर्फ रक्त-क्रांति से ही दूर किया जा सकता था। लेकिन जब कुछ दिन एक दोस्त की मेहरबानी से संडीला के हाईस्कूल में एप्वाइंटमेंट लेटर मिला तो अनायास मुस्कुराने लगे। दिल ने अनायास कहा कि मियां -

ऐसा कहां खराब जहाने-खराब है

दस-बारह बार खत पढ़ने और हर बार नयी खुशी अनुभव करने के बाद उन्होंने चार लाइन वाले कागज पर इस्तीफा लिख कर मौली मज्जन को भिजवा दिया। एक ही झटके में बेड़ी उतार फेंकी। इस्तीफा लिखते हुए वो आजादी के भक-से उड़ा देने वाले नशे में डूब गये अतः इस्तीफे की फ की टांग इ के पेट में घुस गयी। बी.ए. का रिजल्ट आने के बाद वो अंग्रेजी में अपने हस्ताक्षर की जलेबी-सी बनाने लगे थे। आज वो जलेबी, इमरती बन गयी। मौलवी मज्जन को चिट्ठी का विषय पढ़ने की थोड़ी भी जुरूरत नहीं थी कि चिट्ठी के हर स्वर से विद्रोह, हर व्यंजन से उद्दंडता और एक-एक लाइन से इस्तीफा टपक रहा था। बिशारत ने लिफाफे को हैरत और नफरत में थूक मिलाकर ऐसे चिपकाया जैसे मौलवी मज्जन के मुंह पर थूक रहे हों। दस्तखत करने के बाद सरकारी होल्डर के दो टुकड़े कर दिये। अपने अन्नदाता मौलवी सय्यद मुहम्मद मुजफ्फर को हुजूर फैज गंजूर लिखने की बजाय माई डियर मौलवी मज्जन लिखा तो वो कांटा जो सवा साल में उनके तलवे को छेदता हुआ तालू तक पहुंच चुका था, एक झटके से निकल गया। उन्हें इस बात पर हैरत थी कि वो सवा साल ऐसे फटीचर आदमी से इस तरह अपनी औकात खराब करवा रहे थे। उन्हें हो क्या गया था। मौलवी मज्जन को भी शायद इसका अहसास था। इसलिए कि जब बिशारत उन्हें खुदा के हवाले करने गये, मतलब ये कि खुदा हाफिज कहने गये तो उन्होंने हाथ तो मिलाया आंखें न मिला सके, जबकि बिशारत का ये हाल था कि 'आदाब अर्ज' भी इस तरह कहा कि लहजे में हजार गालियों का गुबार भरा था।

बिशारत ने बहुत सोचा। नाजो को तोहफे में देने के लिए उनके पास कुछ भी तो न था। जब कुछ समझ में न आया तो विदा के समय अपनी सोने की अंगूठी उतार कर उसे दे दी। उसने कहा, अल्लाह मैं इसका क्या करूंगी? फिर वो अपनी कोठरी में गयी और कुछ मिनट बाद वापस आई। उसने अंगूठी में अपने घुंघराले बालों की एक लट बांध कर उन्हें लौटा दी। वो दबी सिसकियों में रो रही थी।


तुम तो इतने भी नहीं जितना है कद तलवार का

संडीला हाईस्कूल में और तो सब कुछ ठीक था, लेकिन मैट्रिक में तीन चार प्रॉब्लम, लड़के उनसे भी उनमें तीन चार बरस बड़े निकले। ये लड़के जो हर क्लास में दो-दो तीन-तीन साल दम लेते हुए मैट्रिक तक पहुंचे थे, अपनी उम्र से इतना शर्मिंदा नहीं थे जितने कि खुद बिशारत। जैसे ही वो गोला जो इस क्लास में पांव रखते ही उनके हलक में फंस जाता था, घुला और स्कूल में उनके पैर जमे, उन्होंने अपने एक दोस्त से जो लखनऊ से ताजा-ताजा एलएल.बी. करके आया था, मौलवी मुजफ्फर को एक कानूनी नोटिस भिजवाया कि मेरे मुअक्किल की दस महीने की चढ़ी हुई तन्ख्वाह मनीआर्डर से भिजवा दीजिये वरना आपके खिलाफ कानूनी कारवाई की जायेगी।

इसके जवाब में दो हफ्ते बाद मौलवी मुजफ्फर की तरफ से उनके वकील का रजिस्टर्ड नोटिस आया कि मुशायरे के सिलसिले में जो रकम आपको समय-समय पर दी गयी, उसका हिसाब दिये बगैर आप फरार हो गये। आप इन पैसों में से अपने पैसे काट के बाकी मेरे मुअक्किल को भेज दीजिए। मुशायरे के खर्चों का विवरण अस्ल रसीद के साथ वापसी डाक से भेजें। शायरों को जो पेमेंट, भत्ता और सफर खर्च दिया गया उनकी रसीदें भी संलग्न करें और इसका कारण भी बतायें कि क्यों न आपके खिलाफ कानूनी कारवाई की जाये। इसके अतिरिक्त ये कि शायरों के स्वागत के समय आपने यतीमखाने के बैंड से अपनी एक गजल बजवायी, जिसके एक से जियादा शेर अश्लील थे और ये कि वज्न से गिरे हुए मिसरा-तरह देने से स्कूल की और धीरजगंज के लोगों की जो मानहानि हुई है और उनको जो नुकसान पहुंचा है उसका हर्जाना वुसूल करने का हक यतीमखाना कमेटी सुरक्षित रखती है। नोटिस में ये धमकी भी दी गयी थी कि अगर रकम वापस न की गयी तो गबन के केस के पूरे विवरण से संडीला स्कूल की व्यवस्थापक कमेटी और गवर्नमेंट के शिक्षा विभाग को सूचित कर दिया जायेगा।

नोटिस से तीन दिन पहले मौली मज्जन ने एक टीचर की जबानी बिशारत को कहला भेजा कि बरखुरदार! तुम अभी बच्चे हो। गुरु घंटाल से काहे को उलझते हो। अभी तो तुम्हारे गोलियां और गिल्ली डंडा खेलने और हमारी गोद में बैठकर ईदी मांगने के दिन हैं। अगर टक्कर ली तो परखचे उड़ा दूंगा।


आदमी का काटा कुत्ता

बिशारत का रहा सहा बचाव का लड़खड़ाता किला ढाने के लिए नोटिस के आखिरी पैराग्राफ में एक टाइमबम रख दिया। लिखा था कि जहां आपने शिक्षा विभाग को अपने नोटिस की नक्ल भेजी, वहां उसकी जानकारी में ये बात भी लानी चाहिए थी कि आपने अपने कुत्ते का नाम ब्रिटिश सरकार के गवर्नर जनरल को जलील करने की नीयत से लार्ड वेलेजली रखा। आपको बार-बार वार्निंग दी गयी मगर आप शासन के खिलाफ एक लैंडी कुत्ते के जरिये नफरत और बगावत को हवा देने पे तुले रहे। जिसकी गवाही देने को कस्बे का बच्चा-बच्चा तैयार है। आप अंग्रेज दुश्मनी के जुनून में अपने को गर्व से टीपू कहलवाते थे।

बिशारत सकते में आ गये। या अल्लाह क्या होगा। वो देर तक उदास और चिंतित बैठे रहे। वेलेजली उनके पैरों पर अपना सर रखे, आंखें मूंदे पड़ा था। थोड़ी-थोड़ी देर में आंखें खोल के उन्हें देख लेता था। उनका जी जरा हल्का हुआ तो वो देर तक उस पर हाथ फेरते रहे, प्यार से जियादा कृतज्ञ भाव से। उसके बदन का कोई हिस्सा ऐसा नहीं था जहां पत्थर की चोट का निशान न हो।

मौली मज्जन ने इस नोटिस की कॉपी सूचना देने के लिए उन तमाम शायरों को भेजी जो यादगार मुशायरे में आये थे। तीन-चार को छोड़ के सबके सब बिशारत के पीछे पड़ गये कि लाओ हमारे हिस्से की रकम। एक बुरा हाल शायर तो कोसनों पर उतर आया। कहने लगा, जो दूसरे शायर भाइयों के गले पर छुरी फेर के मुआवजा हड़प कर जाये, अल्लाह करे उसकी कब्र में कीड़े और शेर में सकते पड़ें। अब वो किस-किस को समझाने जाते कि मुशायरे की मद में उन्हें कुल दस रुपये दिये गये। एक दिलजले ने तो हद कर दी। इसी जमीन में उनकी हिजो (खिल्ली उड़ाने वाली शायरी) कहकर उनके भूतपूर्व खानसामा सागर जलौनवी के पास सुधारने के लिए भेजी, जो उस नमकहलाल ने ये कहके लौटा दी कि हम अवध के नवाब, जाने-आलम वाजिद अली शाह पिया, के खानदानी खानसामा हैं। हमारा उसूल है कि एक बार जिसका नमक खा लिया, उसके खिलाफ हमारी जबान और कलम से एक शब्द भी नहीं निकल सकता। चाहे वो कितना भी बड़ा गबन क्यों न कर ले।

तपिश डिबाइवी ने उड़ा दिया कि बिशारत के वालिद ने उसी पैसे से नया हार्मोनियम खरीदा है जिसकी आवाज दूसरे मुहल्ले तक सुनाई देती है।

इस साज के पर्दे में गबन बोल रहा है

बिशारत के उस्ताद जौहर इलाहाबादी ने खुल कर अमानत में खयानत का इल्जाम तो नहीं लगाया लेकिन उन्हें एक घंटे तक ईमानदारी पर लैक्चर देते रहे।


नसीहत में फजीहत

सच पूछिए तो उन्हें ईमानदारी का पहला पाठ जौहर इलाहाबादी ने ही पढ़ाया था। हमारा इशारा मौलवी मुहम्मद इस्माईल मेरठी की नज्म 'ईमानदार लड़का' की तरफ है। ये नज्म दरअस्ल एक ईमानदार लड़के की स्तुति है जो हमें भी पढ़ायी गयी थी। उसका किस्सा ये है कि उस लड़के ने पड़ौसी के खाली घर में ताजा-ताजा बेर डलिया में रखे देखे। खाने को बेतहाशा जी चाहा। लेकिन बड़ों की नसीहत और ईमानदारी की सोच बेर चुरा कर खाने की इच्छा पर हावी रही। बहादुर लड़के ने बेरों को छुआ तक नहीं। नज्म का समापन इस शेर पर होता है।

वाह-वा, शाबाश लड़के वाह-वा

तू जवां मर्दों से बाजी ले गया

हाय कैसे अच्छे जमाने और कैसे भले लोग थे कि चोरी और बुरी नीयत की मिसाल देने के लिए बेरों से अधिक कीमती, स्वादिष्ट चीज की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। खटमिट्ठे बेरों से अधिक बड़ी और बुरी Temptation हमारी दुखियारी नस्ल के लड़कों को उस काल में उपलब्ध न थी। एक दिन बैठे-बैठे हमें यूं ही ध्यान आया कि अगर अब हमें नयी पौध के लड़कों को नेकचलनी का उपदेश देना हो तो चोरी और बुरी नीयत का कौन-सा उदाहरण देंगे जिससे बात उनके दिल में उतर जाये। लीजिये एक मार्डन उदाहरण जिस पर हम ये कहानी खत्म करते हैं।


उदाहरण

ईमानदार लड़के ने अलमारी में ब्लू फिल्म और Cannabis के सिगरेट रखे देखे वो उन्हें अच्छी तरह पहचानता था। इसलिए कि कई बार ग्रामर स्कूल में अपनी क्लास के लड़कों के बस्तों में देख चुका था। उनके मजे का उसे खूब अंदाजा था, मगर वो इस वक्त अपने डैडी की नसीहत के नशे में था। इसलिए सूंघ कर छोड़ दिये।

स्पष्टीकरण

वास्तविकता में इसके तीन कारण थे। पहला, उसके डैडी की नसीहत थी कि कभी चोरी न करना। दूसरा, डैडी ने ये भी नसीहत की थी कि बेटा गंदी चीजों के पास न जाना। नजर हमेशा नीची रखना। सबसे बावला नशा आंख का नशा होता है और सबसे गंदा गुनाह आंख का गुनाह होता है चूंकि इसमें बुजदिली और नामर्दी भी शामिल होती है। कभी कोई बुरा विचार दिल में आ भी जाये तो फौरन अपने किसी बड़े या खानदान के किसी बुजुर्ग की सूरत को आंखों में बांध लेना। चुनांचे ईमानदार लड़के की आंखों के सामने इस वक्त अपने डैडी की सूरत थी और तीसरा कारण ये कि दोनों वर्जित चीजें उसके डैडी की अलमारी में रखी थीं।

वाह-वा, शाबाश लड़के वाह-वा!

तू बुजुर्गों से भी बाजी ले गया