खोया पानी / भाग 22 / मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी / तुफ़ैल चतुर्वेदी

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मैं खुद आई नहीं लाई गयी हूं

बिशारत इस गुमान में थे कि उन्होंने सस्ते दामों कार खरीदी है जबकि हकीकत यह थी कि उन्होंने अपने खोखे घाटे से बेचे थे, लेकिन खुशफहमी और धोखे से दिल खुश हो जाये तो क्या हर्ज है। मिर्जा इसी बात को अपने बुकराती अंदाज में इस प्रकार कहते हैं कि हमने बावन गज गहरे ऐसे अंधे कुएं भी देखे हैं जो समझते हैं कि वो खुद को औंधा दें यानी सर के बल उल्टे खड़े हो जायें तो बावन गज की मीनार बन जायेंगे। बहरहाल, बिशारत ने Beige रंग की कार खरीद ली। वो अत्यंत विनम्र स्वभाव वाले व्यक्ति हैं, इसलिए दोस्तों से यह तो नहीं कहा कि हम भी कार वाले हो गये। अल्बत्ता अब एक-एक से कहते फिर रहे हैं कि आपने 'बेइज रंग' देखा है। हर व्यक्ति न में गर्दन हिलाता। फर्माते 'साहब, अंग्रेज ने अजीब रंग ईजाद किया है। उर्दू में तो इसका कोई नाम भी नहीं। नमूना पेश करूंगा।'

कार खरीदते ही वो बेहद सोशल हो गये और ऐसे लोगों के घर भी बेइज रंग का नमूना दिखाने के लिए ले जाने लगे जिनसे वो ईद बकरईद पर भी मिलने को तैयार न थे, जो मित्र यह अजूबा देखने उनके घर आते, उन्हें मिठाई खाये बिना नहीं जाने देते थे। इसी मुबारक, सलामत में एक महीना बीत गया। एक दिन एक दोस्त के यहां कार की मुंह दिखाई करवाने जा रहे थे कि वो आधे रास्ते में हचकोले खाने लगी फिर उस पर काली खांसी का दौरा पड़ा। दम घुटने की वज्ह से धड़कन कभी हल्की-हल्की सुनायी देती, कभी एकदम गायब, सोचा शायद बहाना किये पड़ी है। अचानक संभाला लिया, हेड लाइट में एक पल के लिए रोशनी आई, हार्न ने कुछ बोलना चाहा मगर कमजोरी आड़े आई। कुछ क्षणों के उपरांत धकड़-पकड़ धक-धक धूं करके जहां खड़ी थी वहीं अंजर-पंजर बिखेर के ढेर हो गयी। radiator के एक सिरे से भाप और दूसरे से तलल-तलल पानी निकलने लगा। गधा गाड़ी से खिंचवा के घर लाये मिस्त्री को घर बुला कर दिखाया उसने बोनट खोलते ही तीन बार दायें हाथ से अपना माथा पीटा। बिशारत ने पूछा खैर तो है? बोला बहुत देर कर दी, इसमें तो कुछ रहा नहीं, सब पुर्जे जवाब दे चुके हैं। आपको मुझे छः महीने पहले बुलाना चाहिये था। बिशारत ने जवाब दिया कि बुलाता कहां से, खरीदे हुए कुल एक महीना हुआ है। बोला तो फिर खरीदते समय पूछा होता। आदमी सुराही भी खरीदता है तो पहले टन-टन बजा कर देख लेता है यह तो कार है आप जियादा खर्च नहीं करना चाहते तो मैं फिलहाल काम चलाऊ मरम्मत कर देता हूं। बुजुर्ग कह गये हैं कि आंखों, गोड़ों में पानी उतर आये तो माजून और चंपी मालिश कारगर नहीं होती फिर तो लाठी बैसाखी चाहिये या जवान जोरू। बिशारत को उसकी यह बेतकल्लुफी बहुत बुरी लगी, मगर गर्जमंद सिर्फ आइने को मुंह चिढ़ा सकता है।

इसके बाद कार लगातार खराब रहने लगी। कोई पुर्जा ठीक नहीं लगता था सिर्फ rear view mirror यानी पीछे आने वाला ट्रेफिक दिखाने वाला आईना सही काम कर रहा था। कई बार कार की रफ्तार गधा-गाड़ी से भी अधिक सुस्त हो जाती जिसकी वज्ह यह थी कि वो इसी में बांध, खींच कर लाई जाती थी।

मैं खुद आई नहीं, लाई गयी हूं

कार स्टार्ट करने से पहले वो गधा-गाड़ी का किराया और बांधने के लिए रस्सी इत्यादि अवश्य रख लेते थे। इस मशीनी जनाजे को गलियों में खींचने की प्रक्रिया, जिसे वो tow करना कहते थे, इस हद तक दोहराया गया कि घर में किसी नेफे में कमरबंद और चारपायी में अदवान न रही। चारपायी पर सोने वाले रात भर करवट-करवट झूला झूलने लगे। नौबत यहां तक पहुंची कि एक दिन बनारस खां चौकीदार की बकरी की जंजीर खोल लाये, मिर्जा कहते ही रह गये कि जो जंजीर बालिश्त भर की बकरी को काबू में न रख सकी, तीन बार 'हरी' हो चुकी है, वो तुम्हारी कार को क्या खाक बांध के रखेगी।


हरफन (मस्त) मौला: अलादीन बेचिराग

ड्राइवर की समस्या अपने-आप इस प्रकार हल हो गयी कि मिर्जा वहीदुज्जमां बेग उर्फ खलीफा ने, जो कुछ अर्सा पहले उनका तांगा चला चुका था, स्वयं को इस सेवा पर नियुक्त कर लिया। तन्ख्वाह अलबत्ता दुगनी मांगी, कारण यह बताया कि पहले आधी तन्ख्वाह पर इसलिए काम करता था कि घोड़े का दाना-चारा खुद बाजार से लाता था। पहले-पहल कार देखी तो बहुत खुश हुआ। इसलिए कि इसकी लंबाई घोड़े से तीन हाथ जियादा थी। दूसरे इस पर सुब्ह-शाम खरेरा करने का झंझट नहीं था। पुश्तैनी पेशा हज्जामी था, लेकिन वो हरफनमौला नहीं हरफन-मस्त-मौला था। दुनिया का कोई काम ऐसा नहीं था जो उसने न किया हो और बिगाड़ा न हो। कहता था कि जिस जमाने में वो बर्मा फ्रंट पर जापनियों को पराजित कर रहा था तो उनके सर कुचलने से जो समय बचता, जो कि बहुत कम बचता था, उसमें फौजी ड्राइविंग किया करता था। उसकी सवारियों ने कभी उसकी ड्राइविंग पर नाक भौंह नहीं चढ़ाई। बड़े-से-बड़ा एक्सीडेंट भी हुआ तो कभी किसी सवारी की मृत्यु नहीं हुई, जिसकी वज्ह यह थी कि वो गोरों की मुर्दागाड़ी चलाता था। जो शेखी भरी कहानियां वो सुनाता था उनसे जाहिर होता था कि रेजिमेंट के मरने वालों को उनकी कब्र तक पहुंचाने का और जो फिलहाल नहीं मरे थे, उनकी हजामत का कर्तव्य उसने अपनी जान पर खेल-खेल कर अंजाम दिया। इस बहादुरी के बदले में एक कांसे का मेडल मिला था जो 1947 के हंगामों में एक सरदार जी ने किरपाण दिखा कर छीन लिया।

ऐसे अभिमान-भरे गुब्बारों में सूई चुभोना बिल्कुल जुरूरी नहीं, हां! इतनी पुष्टि हम भी कर सकते हैं कि जब से उसने सुना कि बिशारत कार खरीदने वाले हैं, उसने गुल बादशाह खान ट्रक ड्राइवर से कार चलाना सीख लिया। लेकिन यह ऐसा ही था जैसे कोई व्यक्ति लुहार की शागिर्दी करके सुनार का काम शुरू कर दे। ड्राइविंग टेस्ट उस जमाने में एक एंग्लो-इंडियन सार्जेंट लिया करता था। जिसके सारे परिवार के बाल वो पांच-छः साल से काट रहा था। खलीफा का कहना था कि सार्जेंट ने कोर्ट के पास वाले मैदान में मेरा टेस्ट लिया। टेस्ट क्या था सिर्फ रस्मी खानापूरी कहिये। बोला ^^Well! Caliph! कार से इंग्लिश का figure of 8 बना कर दिखाओ। खाली उस ऐरिया में जहां हम यह लाल झंडी लिए खरा है। इस लाइन को क्रास नईं करना। 8 एक दम रिवर्स में बनाना मांगटा।' यह सुनते ही मैं भौचक्का रह गया। रिवर्स मैंने सीखा ही नहीं था। गुल बादशाह खान से मैंने एक बार कहा था कि उस्ताद मुझे रिवर्स में भी चलाना सिखा दो तो वो कहने लगा 'यह मेरे उस्ताद ने नहीं सिखाया, न कभी इसकी जुरूरत पड़ी। मेरा उस्ताद चिनार गुल खान बोलता था कि शेर, हवाई जहाज, गोली, ट्रक और पठान रिवर्स गियर में चल ही नहीं सकते।'

'मैंने अपने दिल में कहा कि चुकंदर की दुम! मैं अंग्रेजी का 8 अंक बना सकता तो तेरे जैसे भालू की हजामत काये को करता, गवर्नर की चंपी-मालिश करता। क्या बताऊं इस गुनहगार ने कैसे-कैसे पापड़ बेले हैं...

'तो जनाबे-आली! सार्जेंट ने अपने बूट से जमीन पर 8 बना कर दिखाया। मैं बेफिजूल डर गया था। अब पता लगा कि साईसी में जिसे अटेरन कहते हैं, उसे अंग्रेजी में 'फिगर आफ 8' कहते हैं। जंगली घोड़े को साधने और उसकी सारी मस्ती निकालने के लिए उसे तेजी से दो घड़ी फिरत चक्कर देने को अटेरन कहते हैं। तो ड्राइविंग टेस्ट का यह मकसद है। पर मैं कुछ नहीं बोला, बस जल तू जलाल तू कह के रिवर्स में 8 के बजाय कसे हुए कमरबंद की सी गिरह बनाने लगा कि एकाएक पीछे से सार्जेंट के चीखने चिल्लाने की आवाजें आयीं। 'स्टाप! स्टाप! यू इंडियन!' वो अपनी जान बचाने के लिए कार के बंपर पे लाल झंडी समेत चढ़ गया था। कमरबंद की गिरह में लिपटते-लिपटते यानी कार के नीचे आते-आते बचा। मैंने कहा, 'सर दोबारा टेस्ट के लिए आ जाऊं?' मगर उसने दोबारा टेस्ट लेना मुनासिब न समझा। दूसरे दिन आपके गुलाम को लाइसेंस मिल गया।

'आपकी जूतियों के सदके हर कला में निपुण हूं। मुझे क्या नहीं आता। जर्राही (शल्य चिकित्सा) भी की है। एक आपरेशन बिगड़ गया तो कान पकड़े। हुआ यूं कि मेरा दोस्त अल्लन अपने मामूं की बेटी पर दिलो-जान से फिदा था पर वो किसी तरह शादी पर तैयार नहीं होती थी। न जाने क्यों अल्लन को यह वहम हो गया कि उसकी बायीं टांग पर जो मस्सा है, उसकी वज्ह से शादी नहीं हो रही। मैंने वो मस्सा काट दिया जो नासूर बन गया। वो लंगड़ा हो गया। वो दिन है और आज का दिन, मैंने सर्जरी नहीं की। वो लड़की आखिरकार मेरी बीबी बनी। मेरी दायीं टांग पे मस्सा है।'


माहौल पर लाहौल और मार्कोनी की कब्र पर ...

कार अनेक अंदरूनी तथा बाहरी गुप्त-प्रकट रोगों से पीड़ित थी। एक पुर्जे की मरम्मत करवाते तो दूसरा जवाब दे देता। जितना पेट्रोल जलता, उतना ही मोबिल-ऑइल और इन दोनों से दुगना उनका अपना खून जलता। आज क्लच-प्लेट जल गयी तो कल डाइनेमो बैठ गया और परसों गियर-बाक्स बदलवा कर लाये तो ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई सीट के नीचे कुदाल चला रहा है। खलीफा ने रोग का निदान किया साहब! अब यूनिवर्सल अड़ी कर रहा है, फिर ब्रेक गड़बड़ करने लगे। मिस्त्री ने कहा, माडल बहुत पुराना है, पुर्जे बनने बंद हो गये। आप कहते हैं तो मरम्मत कर दूंगा, मगर मरम्मत के बाद ब्रेक या तो हमेशा लगा रहेगा या खुला रहेगा। सोच कर दोनों में से चूज कर लीजिये। दो सप्ताह पश्चात खलीफा ने सूचना दी कि कार के Shock Observers समाप्त हो गये। वो Shock Absorbers को Shock Observers कहता था और सच तो यह है कि अब वो शॉक रोकने के योग्य नहीं रहे थे। अनुभवी बड़े-बूढ़ों की भांति हो गये थे जो किसी अंधेरे कोने या सीढ़ियों के नीचे वाली तिकोनी में पड़े-पड़े सिर्फ सिर्फ सिर्फ Observe कर सकते हैं, जो नालायक दिखायें सो लाचार देखना। यह मंजिल आत्मज्ञान की है, जब इंसान अपनी आंख से बेहूदा-से-बेहूदा हरकत और करतूत देख कर न दुःखी हो, न क्रोध में आये और न माहौल पर लाहौल पढ़े (लानत भेजे) तो इसके दो कारण हो सकते हैं। पहले हम दूसरा कारण बतायेंगे - वो यह कि वह बुजुर्ग अनुभवी, पारखी, गंभीर और क्षमाशील हो गया है और पहला कारण यह कि हरकत उसकी अपनी ही है।

एक दिन ग्यारह बजे रात को कहीं से वापसी में कब्रिस्तान के सामने से गुजर रहे थे कि अचानक हार्न की आवाज में कंपन पैदा हुआ, घुंघरू-सा बोलने लगा, स्वयं उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया कि हेड लाइट की रोशनी जा चुकी थी। खलीफा ने कहा, 'जनाबे-आली! बैटरी जवाब दे रही है' उन्हें आश्चर्य हुआ, क्योंकि वो रोज अपनी लकड़ी की दुकान पर पहुंचते ही बैटरी को कार से निकाल कर आरा मशीन में जोड़ देते थे ताकि आठ घंटे तक चार्ज होती रहे। शाम को घर पहुंचते ही उसे निकालकर अपने रेडियो से जोड़ देते जो सिर्फ कार बैटरी से चलता था। फिर रात को बारह-एक बजे जब रेडियो प्रोग्राम समाप्त हो जाते तो उसे रेडियो से अलग करके वापस कार में लगा देते। इस तरह बैटरी आठ-आठ घंटे की-तीन शिफ्टों में तीन अलग-अलग चीजों से जुड़ी रहती थी। जवाब न देती तो क्या करती, बिल्कुल कन्फ्यूज हो जाती थी। हमने खुद देखा कि उनके रेडियो से तय कार्यक्रम की बजाय अक्सर आरा मशीन की आवाजें प्रसारित होती रहती थीं जिन्हें वो पक्का राग समझ कर एक अर्से तक सर धुना किये। इसी प्रकार कार के इंजन से मोटर की खराबी की रेडियाई आवाजें आने लगी थीं। अजीब घपला था, रात को पिछले पहर के सन्नाटे में जब अचानक अजीब-अजीब आवाजें आने लगतीं तो घर वाले यह नहीं बता सकते थे कि वो रेडियो की हैं या कार की, या आरा मशीन में कव्वाल फंस गया है। उन बेचारों की मजबूरी क्षमा-योग्य थी, इसलिए कि इन आवाजों का स्रोत दरअस्ल वो गला था जिससे बिशारत खर्राटे ले रहे होते थे। एक और मुसीबत यह कि जब तक रेडियो स्टेशन बंद न हो जाता, तीन चार पड़ोसी उनकी छाती पर सवार कार्यक्रम सुनते रहते। बिशारत इस दुःखदायी अविष्कार से सख्त नफरत करने लगे थे। संभवतः ऐसी ही परिस्थितियों और ऐसे ही ब्लैक मूड में अंग्रेजी कवि फिलिप लोर्केन ने कहा था कि मार्कोनी की कब्र पर पब्लिक टॉयलट बना देना चाहिये।


सौदावी (वात-संबंधी विकार) और सूबाई (प्रांतीय) स्वभाव के चार पहिये

कुछ रोज से जब गर्मी ने तेजी पकड़ी तो चारों पहियों का स्वभाव सौदावी और सूबाई हो गया। मतलब यह कि चारों पहिये चार अलग दिशाओं में जाना चाहते और स्टेयरिंग व्हील पहियों की इच्छानुसार घूमने लगता था। खलीफा से पूछा 'अब यह क्या हो रहा है?' उसने बताया 'हुजूर! इसे वॉबलिंग (wobbling) कहते हैं।' उन्होंने इत्मीनान का लंबा सांस लिया, रोग का नाम मालूम हो जाये तो तकलीफ तो दूर नहीं होती, उलझन दूर हो जाती है। जरा बाद यह सोच कर मुस्कुरा दिये कि कार यह चाल चले तो woobling राजहंस चले तो waddling, नागिन चले तो wriggling और नारी चले तो wiggling

यह किनारा चला कि नाव चली

वाह क्या बात ध्यान में आई

इस बार वो खुद भी वर्कशाप गये। मिस्त्री ने कहा 'जंग से साइलेंसर भी झड़ने वाला है' उसने सलाह दी कि 'अगले महीने जब नया हार्न फिट करायें तो साइलेंसर भी बदलवा लें, इस समय तो यह अच्छा-खासा हार्न का काम दे रहा है,' बिशारत ने झुंझला कर पूछा 'इसका कोई पुर्जा काम भी कर रहा है या नहीं?' मिस्त्री पहले तो सोच में पड़ गया, फिर जवाब दिया कि mileometer दुगनी रफ्तार से काम कर रहा है! दरअस्ल अब कार की कार्यक्षमता बल्कि कार्य-अक्षमता Murphy's law (Any thing that can go wrong will go wrong) के ठीक अनुसार हो गयी थी। इस सूरत में सरकार तो चल सकती है, कार नहीं चल सकती।


ऊंट तराना

लगातार मरम्मत के बावजूद ब्रेक दुरुस्त न हुए, लेकिन अब इनकी कमी महसूस नहीं होती थी, इसलिए कि इनके इस्तेमाल की नौबत नहीं आती थी, जिस जगह ब्रेक लगाना हो कार उससे एक मील पहले ही रुक जाती थी। बिशारत ने तो जब से ड्राइविंग सीखनी शुरू की, वो बिजली के खंबों से ब्रेक का काम ले रहे थे। खंबों के इस्तेमाल पर इनका कई कुत्तों से झगड़ा भी हुआ, मगर अब कुछ कुत्तों ने चमकती व्हील कैप से खंबे का काम लेना शुरू कर दिया था। वो अपने-आप को गर्दन मोड़-मोड़ कर व्हील-कैप में देखते भी जाते थे। हाल ही में बिशारत ने यह भी नोटिस किया कि कार कुछ अधिक ही संवेदनशील हो गयी है, सड़क क्रास करने वाले की गाली से भी रुकने लगी है। अगर गाली अंग्रेजी में हो वो आहिस्ता-आहिस्ता खुश खिरामी (अच्छी रफ्तार) से सुबुक खिरामी (तेजी की रफ्तार) और मस्त खिरामी (मजे की रफ्तार) फिर आहिस्ता खिरामी (हल्की रफ्तार) और अंत में मखिरामी (ना चलना) की मंजिलों से गुजर कर अब निरी नमकहरामी पर उतर आती थी। उसकी चाल अब उन अड़ियल ऊंटों से मिलने लगी जिसका चित्रण किपलिंग ने ऊंटों के Marching Song में किया है, जिसकी तान इस पर टूटती हैः

Can't! Don't! Shan't! won't!

निःसंदेह यह तान इस योग्य है कि तीसरी दुनिया के देश जो किसी प्रकार आगे नहीं बढ़ना चाहते, इसे अपना राष्ट्र-गान बना लें।