गुनाहों का देवता / खंड 3 / पृष्ठ 6 / धर्मवीर भारती

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चन्दर हँस पड़ा, कम-से-कम गाली की नवीनता पर। दूसरी बात; गाड़ी उस समय ब्रजक्षेत्र में थी, वहाँ यह अवधी का सफल वक्ता कौन है! उसने घूमकर देखा। एक बुढ़िया थी, सिर मुड़ाये। उसने कहीं देखा है इसे!

“कहाँ जाओगी, माई?”

“कानपुर जाबै।”

“लेकिन यह गाड़ी तो दिल्ली जाएगी?”

“तुहूँ बोल्यो टुप्प से! हम ऐसे धमकावे में नै आइत। ई कानपुर जइहै!” उसने हाथ नचाकर चन्दर से कहा। और फिर जाने क्यों रुक गयी और चन्दर की ओर देखने लगी। फिर बोली, “अरे चन्दर बेटवा, कहाँ से आवत हौ तू!”

“ओह! बुआजी हैं। सिर मुड़ा लिया तो पहचान में ही नहीं आतीं!” चन्दर ने फौरन उठकर पाँव छुए। बुआजी वृन्दावन से आ रही थीं। वह बैठ गयीं, बोलीं, “ऊ नटिनियाँ मर गयी कि अबहिन है?”

“कौन?”

“ओही बिनती!”

“मरेगी क्यों?”

“भइया! सुकुल तो हमार कुल डुबोय दिहिन। लेकिन जैसे ऊ हमरी बिटिया के मड़वा तरे से उठाय लिहिन वैसे भगवान चाही तो उनहू का लड़की से समझी!”

चन्दर कुछ नहीं बोला। थोड़ी देर बाद खुद बड़बड़ाती हुई बुआजी बोलीं, “अब हमें का करै को है। हम सब मोह-माया त्याग दिया। लेकिन हमरे त्याग में कुच्छौ समरथ है तो सुकुल को बदला मिलिहै!”

कानपुर की गाड़ी आयी तो चन्दर खुद उन्हें बिठाल आया। विचित्र थीं बुआजी, बेचारी कभी समझ ही नहीं पायीं कि बिनती को उठाकर डॉक्टर साहब ने उपकार किया या अपकार और मजा तो यह है कि एक ही वाक्य के पूर्वार्द्ध में मायामोह से विरक्ति की घोषणा और उत्तरार्द्ध में दुर्वासा का शाप...हिन्दुस्तान के सिवा ऐसे नमूने कहीं भी मिलने मुश्किल हैं। इतने में चन्दर की गाड़ी ने सीटी दी। वह भागा। बुआजी ने चन्दर का खयाल छोड़कर अपने बगल के मुसाफिर से लड़ना शुरू कर दिया।

वह दिल्ली पहुँचा। दो-तीन साल पहले भी वह दिल्ली आया था लेकिन अब दिल्ली स्टेशन की चहल-पहल ही दूसरी थी। गाड़ी घंटा-भर लेट थी। नौ बज चुके थे। अगर मोटर न मिली तो भी इतनी मशहूर सड़क पर डॉक्टर साहब का बँगला था कि चन्दर को विशेष दिक्कत न होती। लेकिन ज्यों ही वह प्लेटफॉर्म से बाहर निकला तो उसने देखा कि जहाँ मरकरी की बड़ी सर्चलाइट लगी है, ठीक उसी के नीचे सलेटी रंग की शानदार कार खड़ी थी जिसके आगे-पीछे क्राउन लगा था और सामने तिरंगा, आगे लाल वर्दी पहने एक खानसामा बैठा है। और पीछे एक सिख ड्राइवर खड़ा है। चन्दर का सूट चाहे जितना अच्छा हो लेकिन इस शान के लायक तो नहीं ही था। फिर भी वह बड़े रोब से गया और ड्राइवर से बोला, “यह किसकी मोटर है?”

“सर्कारी गड्डी हैज्जी।” सिख ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।

“क्या यह डॉक्टर शुक्ला ने भेजी है?”

“जी हाँ, हुजूर!” एकदम उसका स्वर बदल गया-”आप ही उनके लड़के हैं-चन्दर बहादुर साहब?” उसने उतरकर सलाम किया। दरवाजा खोला, चन्दर बैठ गया। कुली को एक अटैची के लिए एक अठन्नी दी। मोटर उड़ चली।

चन्दर बहुत उदार विचारों का था लेकिन आज तक वह डॉक्टर साहब की उन्नीसवीं सदी वाली पुरानी कार पर ही चढ़ा था। इस राजमुकुट और राष्ट्रीय ध्वज से सुशोभित मोटर पर खानसामे के साथ चढऩे का उसका पहला ही मौका था। उसे लगा जैसे इस समय तिरंगे का गौरव और महान ब्रिटिश साम्राज्य के इस क्राउन का शासनदम्भ उसके मन को उड़ाये लिये जा रहा है। चन्दर तनकर बैठा लेकिन थोड़ी देर बाद स्वयं उसे अपने मन पर हँसी आ गयी। फिर वह सोचने लगा कि जिन लोगों के हाथ में आज शासन-सत्ता है; मोटरों और खानसामों ने उनके हृदयों को इस तरह बदल दिया है। वे भी तो बेचारे आदमी हैं, इतने दिनों से प्रभुता के प्यासे। बेकार हम लोग उन्हें गाली देते हैं। फिर चन्दर उन लोगों का खयाल करके हँस पड़ा।

दिल्ली में इलाहाबाद की अपेक्षा कम गरमी थी। कार एक बँगले के अन्दर मुड़ी और पोर्टिको में रुक गयी। बँगला नये सादे अमेरिकन ढंग का बना हुआ था। खानसामे ने उतरकर दरवाजा खोला। चन्दर उतर पड़ा। ड्राइवर ने हॉर्न दिया। दरवाजा खुला और बिनती निकली। उसका मुँह सूखा हुआ था, बाल अस्त-व्यस्त थे और आँखें जैसे रो-रोकर सूज गयी थीं। चन्दर का दिल धक्-से हो गया, राह-भर के सुनहरे सपने टूट गये।

“क्या बात है, बिनती? अच्छी तो हो?” चन्दर ने पूछा।

“आओ, चन्दर?” बिनती ने कहा और अन्दर जाते ही दरवाजा बन्द कर दिया और चन्दर की बाँह पकडक़र सिसक-सिसककर रो पड़ी। चन्दर घबरा गया। “क्या बात है? बताओ न! डॉक्टर साहब कहाँ हैं?”

“अन्दर हैं।”

“तब क्या हुआ? तुम इतनी दु:खी क्यों हो?” चन्दर ने बिनती के सिर पर हाथ रखकर पूछा...उसे लगा जैसे इस समस्त वातावरण पर किसी बड़े भयानक मृत्यु-दूत के पंखों की काली छाया है...”क्या बात है? बताती क्यों नहीं?”

बिनती बड़ी मुश्किल से बोली, “दीदी...सुधा दीदी...”

चन्दर को लगा जैसे उस पर बिजली टूट पड़ी-”क्या हुआ सुधा को?” बिनती कुछ नहीं बोली, उसे ऊपर ले गयी और कमरे के पास जाकर बोली, “उसी में हैं दीदी!”

कमरे के अन्दर की रोशनी उदास, फीकी और बीमार थी। एक नर्स सफेद पोशाक पहने पलँग के सिरहाने खड़ी थी, और कुर्सी पर सिर झुकाये डॉक्टर साहब बैठे थे। पलँग पर चादर ओढ़े सुधा पड़ी थी। नर्स सामने थी, अत: सुधा का चेहरा नहीं दिखाई पड़ रहा था। चन्दर के भीतर पाँव रखते ही नर्स ने आँख के इशारे से कहा, “बाहर जाइए।” चन्दर ठिठककर खड़ा हो गया, डॉक्टर साहब ने देखा और वे भी उठकर चले आये।

“क्या हुआ सुधा को?” चन्दर ने बहुत व्याकुल, बहुत कातर स्वर में पूछा। डॉक्टर साहब कुछ नहीं बोले। चुपचाप चन्दर के कन्धे पर हाथ रखे हुए अपने कमरे में आये और बहुत भारी स्वर में बोले, “हमारी बिटिया गयी, चन्दर!” और आँसू छलक आये।

“क्या हुआ उसे?” चन्दर ने फिर उतने ही दु:खी स्वर में पूछा।

डॉक्टर साहब क्षण-भर पथराई आँखों से चन्दर की ओर देखते रहे, फिर सिर झुकाकर बोले, “एबॉर्शन!” थोड़ी देर बाद सिर उठाकर व्याकुल की तरह चन्दन का कन्धा पकडक़र बोले, “चन्दर, किसी तरह बचाओ सुधा को, क्या करें कुछ समझ में नहीं आता...अब बचेगी नहीं...परसों से होश नहीं आया। जाओ कपड़े बदलो, खाना खा लो, रात-भर जागरण होगा...”

लेकिन चन्दर उठा नहीं, कुर्सी पर सिर झुकाये बैठा रहा।

सहसा नर्स आकर बोली, “ब्लीडिंग फिर शुरू हो गयी और नाड़ी डूब रही है। डॉक्टर को बुलाइए...फौरन!” और वह लौट गयी।

डॉक्टर साहब उठ खड़े हुए। उनकी आँखों में बड़ी निराशा थी। बड़ी उदासी से बोले, “जा रहा हूँ, चन्दर! अभी आता हूँ!” चन्दर ने देखा, कार बड़ी तेजी से जा रही है। बिनती आकर बोली, “खाना खा लो, चन्दर!” चन्दर ने सुना ही नहीं।

“यह क्या हुआ, बिनती!” उसने घबराई आवाज में पूछा।

“कुछ समझ में नहीं आता, उस दिन सुबह जीजाजी गये। दोपहर में पापा ऑफिस गये थे। मैं सो रही थी, सहसा जीजी चीखी। मैं जागी तो देखा दीदी बेहोश पड़ी हैं। मैंने जल्दी से फोन किया। पापा आये, डॉक्टर आये। उसके बाद से पापा और नर्स के अलावा किसी को नहीं जाने देते दीदी के पास। मुझे भी नहीं।”

और बिनती रो पड़ी। चन्दर कुछ नहीं बोला। चुपचाप पत्थर की मूर्ति-सा कुर्सी पर बैठा रहा। खिडक़ी से बाहर की ओर देख रहा था।

थोड़ी देर में डॉक्टर साहब वापस आये। उनके साथ तीन डॉक्टर थे और एक नर्स। डॉक्टरों ने करीब दस मिनट देखा, फिर अलग कमरे में जाकर सलाह करने लगे। जब लौटे तो डॉक्टर साहब ने बहुत विह्वïल होकर कहा, “क्या उम्मीद है?”

“घबराइए मत, घबराइए मत-अब तो जब तक अन्दरूनी सब साफ नहीं हो जाएगा तब तक खून जाएगा। नब्ज के लिए और होश के लिए एक इंजेक्शन देते हैं-अभी।”

इंजेक्शन देने के बाद डॉक्टर चले गये। पापा वहीं जाकर बैठ गये। बिनती और चन्दर चुपचाप बैठे रहे। करीब पाँच मिनट के बाद सुधा ने भयंकर स्वर में कराहना शुरू किया। उन कराहों में जैसे उनका कलेजा उलटा आता हो। डॉक्टर साहब उठकर यहाँ चले आये और चन्दर से बोले, “वेहीमेंट ब्लीडिंग...” और कुर्सी पर सिर झुकाकर बैठ गये। बगल के कमरे से सुधा की दर्दनाक कराहें उठती थीं और सन्नाटे में छटपटाने लगती थीं। अगर आपने किसी जिन्दा मुर्गी के पंख और पूँछ नोचे जाते हुए देखा हो तभी आप उसका अनुमान कर सकते हैं; उस भयानकता का, जो उन कराहों में थी। थोड़ी देर बाद कराहें बन्द हो गयीं, फिर सहसा इस बुरी तरह से सुधा चीखी जैसे गाय डकार रही हो। पापा उठकर भागे-वह भयंकर चीख उठी और सन्नाटे में मँडराने लगी-बिनती रो रही थी-चन्दर का चेहरा पीला पड़ गया था और पसीने से तर हो गया था वह।

पापा लौटकर आये, “हम लोग देख सकते हैं?” चन्दर ने पूछा।

“अभी नहीं-अब ब्लीडिंग खत्म है।...नर्स अभी कपड़े बदल दे तो चलेंगे।”

थोड़ी देर में तीनों गये और जाकर खड़े हो गये। अब चन्दर ने सुधा को देखा। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था। जैसे जाड़े के दिनों में थोड़ी देर पानी में रहने के बाद उँगलियों का रंग रक्तहीन श्वेत हो जाता है। गालों की हड्डिïयाँ निकल आयी थीं और होठ काले पड़ गये थे। पलकों के चारों ओर कालापन गहरा गया था और आँखें जैसे बाहर निकली पड़ती थीं। खून इतना अधिक गया था कि लगता था बदन पर चमड़े की एक हल्की झिल्ली मढ़ दी गयी हो। यहाँ तक कि भीतर की हड्डी के उतार-चढ़ाव तक स्पष्ट दिख रहे थे। चन्दर ने डरते-डरते माथे पर हाथ रखा। सुधा के होठों में कुछ हरकत हुई, उसने मुँह खोल दिया और आँखें बन्द किये हुए ही उसने करवट बदली, फिर कराही और सिर से पैर तक उसका बदन काँप उठा। नर्स ने नाड़ी देखी और कहा, अब ठीक है। कमजोरी बहुत है। थोड़ी देर बाद पसीना निकलना शुरू हुआ। पसीना पोंछते-पोंछते एक बज गया। बिनती बोली डॉक्टर साहब से-”मामाजी, अब आप सो जाइए। चन्दर देख लेंगे आज। नर्स है ही।”

डॉक्टर साहब की आँखें लाल हो रही थीं। सबके कहने पर वह अपनी सीट पर लेट रहे। नर्स बोली, “मैं बाहर आराम कुर्सी पर थोड़ा बैठ लूँ। कोई जरूरत हो तो बुला लेना।” चन्दर जाकर सुधा के सिरहाने बैठ गया। बिनती बोली, “तुम थके हुए आये हो। चलो तुम भी सो रहो। मैं देख रही हूँ!”

चन्दर ने कुछ जवाब नहीं दिया। चुपचाप बैठा रहा। बिनती ने सभी खिड़कियाँ खोल दीं और चन्दर के पास ही बैठ गयी। सुधा सो रही थी चुपचाप। थोड़ी देर बाद बिनती उठी, घड़ी देखी, मुँह खोलकर दवा दी। सहसा डॉक्टर साहब घबराये हुए-से आये-”क्या बात है, सुधा क्यों चीखी!”

“कुछ नहीं, सुधा तो सो रही है चुपचाप!” बिनती बोली।

“अच्छा, मुझे नींद में लगा कि वह चीखी है।” फिर वह खड़े-खड़े सुधा का माथा सहलाते रहे और फिर लौट गये। नर्स अन्दर थी। बिनती चन्दर को बाहर ले आयी और बोली, “देखो, तुम कल जीजाजी को एक तार दे देना!”

“लेकिन अब वह होंगे कहाँ?”

“विजगापट्टम या कोलम्बो में जहाजी कम्पनी के पते से दिलवा देना तार।”

दोनों फिर जाकर सुधा के पास बैठ गये। नर्स बाहर सो रही थी। साढ़े तीन बज गये थे। ठंडी हवा चल रही थी। बिनती चन्दर के कन्धे पर सिर रखकर सो गयी। सहसा सुधा के होठ हिले और उसने कुछ अस्फुट स्वर में कहा। चन्दर ने सुधा के माथे पर हाथ रखा। माथा सहसा जलने लगा था; चन्दर घबरा उठा। उसने नर्स को जगाया। नर्स ने बगल में थर्मामीटर लगाया। तापक्रम एक सौ पाँच था। सारा बदन जल रहा था और रह-रहकर वह काँप उठती थी। चन्दर ने फिर घबराकर नर्स की ओर देखा। “घबराइए मत! डॉक्टर अभी आएगा।” लेकिन थोड़ी देर में हालत और बिगड़ गयी। और फिर उसी तरह दर्दनाक कराहें सुबह की हवा में सिर पटकने लगीं। नर्स ने इन लोगों को बाहर भेज दिया और बदन अँगोछने लगी।

थोड़ी देर में सुधा ने चीखकर पुकारा-”पापा...” इतनी भयानक आवाज थी कि जैसे सुधा को नरक के दूत पकड़े ले जा रहे हों। पापा गये। सुधा का चेहरा लाल था और वह हाथ पटक रही थी।...पापा को देखते ही बोली, “पापा...चन्दर को इलाहाबाद से बुलवा दो।”

“चन्दर आ गया बेटा, अभी बुलाते हैं।” ज्यों ही पापा ने माथे पर हाथ रखा कि सुधा चीख उठी-”तुम पापा नहीं हो...कौन हो तुम?...दूर हटो, छुओ मत...अरे बिनती...”

डॉक्टर शुक्ला ने नर्स की ओर देखा। नर्स बोली-

सुधा ने फिर करवट बदली और नर्स को देखकर बोली, “कौन गेसू...आओ बैठो। चन्दर नहा रहा है। अभी बुलाती हूँ। अरे चन्दर...” और फिर हाँफने लगी, आँखें बन्द कर लीं और रोकर बोली, “पापा, तुम कहाँ चले गये?”

नर्स ने चन्दर और बिनती को बुलाया। बिनती पास जाकर खड़ी हो गयी-आँसू पोंछकर बोली, “दीदी, हम आ गये।” और सुधा की बाँह पर हाथ रख दिया। सुधा ने आँखें नहीं खोलीं, बिनती के हाथ पर हाथ रखकर बोली, “बिनती, पापा कहाँ गये हैं?”

“खड़े तो हैं मामाजी!”

“झूठ मत बोल कम्बख्त...अच्छा ले, शरबत तैयार है, जा चन्दर स्टडीरूम में पढ़ रहा है बुला ला, जा!”

बिनती फफककर रो पड़ी।

“रोती क्यों है?” सुधा ने कराहकर कहा, “मैं जाऊँगी तो चन्दर को तेरे पास छोड़ जाऊँगी। जा चन्दर को बुला ला, नहीं बर्फ घुल जाएगी-शरबत छान लिया है?”

चन्दर आगे आया। रुँधे गले से आँसू पीते हुए बोला, “सुधा, आँखें खोलो। हम आ गये, सुधी!”

डॉक्टर साहब कुर्सी पर पड़े सिसक रहे थे...सुधा ने आँखें खोलीं और चन्दर को देखते ही फिर बहुत जोर से चीखी...”तुम...तुम ऑस्ट्रेलिया से लौट आये? झूठे! तुम चन्दर हो? क्या मैं तुम्हें पहचानती नहीं? अब क्या चाहिए? इतना कहा, तुमसे हाथ जोड़ा, मेरी क्या हालत है? लेकिन तुम्हें क्या? जाओ यहाँ से वर्ना मैं अभी सिर पटक दूँगी...” और सुधा ने सिर पटक दिया-”नहीं गये?” नर्स ने इशारा किया-चन्दर कमरे के बाहर आया और कुर्सी पर सिर झुकाकर बैठ गया। सुधा ने आँखें खोलीं और फटी-फटी आँखों से चारों ओर देखने लगी। फिर नर्स से बोली-

“गेसू, तुम बहुत बहादुर हो! तुमने अपने को बेचा नहीं; अपने पैर पर खड़ी हो। किसी के आश्रय में नहीं हो। कोई खाना-कपड़ा देकर तुम्हें खरीद नहीं सकता, गेसू। बिनती कहाँ गयी...?”

“मैं खड़ी हूँ, दीदी?”

“हैं...अच्छा, पापा कहाँ हैं?” सुधा ने कराहकर पूछा।

डॉक्टर साहब उठकर आ गये-”बेटा!” बड़े दुलार से सुधा के माथे पर हाथ रखकर बोले। सुधा रो पड़ी-”कहाँ थे पापा, अभी तक तुम? हमने इतना पुकारा, न तुम बोले न चन्दर बोला...हमें तो डर लग रहा था, इतना सूना था...जाओ महराजिन ने रोटी सेंक ली है-खा लो। हाँ, ऐसे बैठ जाओ। लो पापा, हमने नानखटाई बनायी...”

डॉक्टर शुक्ला रोते हुए चले गये-बिनती ने चन्दर को बुलाया। देखा चन्दर कुर्सी पर हथेली में मुँह छिपाये बैठा था। बिनती गयी और चन्दर के कन्धे पर हाथ रखा। चन्दर ने देखा और सिर झुका लिया, “चलो चन्दर, दीदी फिर बेहोश हो गयीं।”

इतने में नर्स बोली। “वह फिर होश में आयी हैं; आप लोग वहीं चलिए।”

सुधा ने आँखें खोल दी थीं-चन्दर को देखते ही बोली, “चन्दर आओ, कोई मास्टर ठीक किया तुमने? जो कुछ पढ़ा था वह भूल रही हूँ। अब इम्तहान में पास नहीं होऊँगी।”

“डेलीरियम अब भी है।” नर्स बोली। सहसा सुधा ने चन्दर का हाथ छोड़ दिया और झट से हथेलियाँ आँखों पर रख लीं और बोली, “ये कौन आ गया? यह चन्दर नहीं है। चन्दर नहीं है। चन्दर होता तो मुझे डाँटता-क्यों बीमार पड़ीं? अब बताओ मैं चन्दर को क्या जवाब दूँगी...चन्दर को बुला दो, गेसू! जिंदगी में दुश्मनी निभायी, अब मौत में तो न निभाए।”

“उफ! मरीज के पास इतने आदमी? तभी डेलीरियम होता है।” सहसा डॉक्टर ने प्रवेश किया। कोई दूसरा डॉक्टर था, अँग्रेज था। बिनती और चन्दर बाहर चले आये। बिनती बोली, “ये सिविल सर्जन हैं।” उसने खून मँगवाया, देखा, फिर डॉक्टर शुक्ला को भी हटा दिया। सिर्फ नर्स रह गयी। थोड़ी देर बाद वह निकला तो उसका चेहरा स्याह था। “क्या यह प्रैग्नेन्सी पहली मर्तबा थी?”

“जी हाँ?”

डॉक्टर ने सिर हिलाया और कहा, “अब मामला हाथ से बाहर है। इंजेक्शन लगेंगे। अस्पताल ले चलिए।”

“डॉक्टर शुक्ला, मवाद आ रहा है, कल तक सारे बदन में फैल जाएगा, किस बेवकूफ डॉक्टर ने देखा था...”

चन्दर ने फोन किया। ऐम्बुलेन्स कार आ गयी। सुधा को उठाया गया...

दिन बड़ी ही चिन्ता में बीता। तीन-तीन घंटे पर इंजेक्शन लग रहे थे। दोपहर को दो बजे इंजेक्शन खत्म कर डॉक्टर ने एक गहरी साँस ली और बोला, “कुछ उम्मीद है-अगर बारह घंटे तक हार्ट ठीक रहा तो मैं आपकी लड़की आपको वापस दूँगा।”

बड़ा भयानक दिन था। बहुत ऊँची छत का कमरा, दालानों में टाट के परदे पड़े थे और बाहर गर्मी की भयानक लू हू-हू करती हुई दानवों की तरह मुँह फाड़े दौड़ रही थी। डॉक्टर साहब सिरहाने बैठे थे, पथरीली निगाहों से सुधा के पीले मृतप्राय चेहरे की ओर देखते हुए...बिनती और चन्दर बिना कुछ खाये-पीये चुपचाप बैठे थे-रह-रहकर बिनती सिसक उठती थी, लेकिन चन्दर ने मन पर पत्थर रख लिया था। वह एकटक एक ओर देख रहा था...कमरे में वातावरण शान्त था-रह-रहकर बिनती की सिसकियाँ, पापा की नि:श्वासें तथा घड़ी की निरन्तर टिक-टिक सुनाई पड़ रही थी।

चन्दर का हाथ बिनती की गोद में था। एक मूक संवेदना ने बिनती को सँभाल रखा था। चन्दर कभी बिनती की ओर देखता, कभी घड़ी की ओर। सुधा की ओर नहीं देख पाता था। दुख अपनी पूरी चोट करने के वक्त अकसर आदमी की आत्मा और मन को क्लोरोफार्म सुँघा देता है। चन्दर कुछ भी सोच नहीं पा रहा था। संज्ञा-हत, नीरव, निश्चेष्ट...

घड़ी की सुई अविराम गति से चल रही थी। सर्जन कई दफे आये। नर्स ने आकर टेम्परेचर लिया। रात को ग्यारह बजे टेम्परेचर उतरने लगा। डॉक्टर शुक्ला की आँखें चमक उठीं। ठीक बाहर बजकर पाँच मिनट पर सुधा ने आँखें खोल दीं। चन्दर ने बिनती का हाथ मारे खुशी से दबा दिया।

“बिनती कहाँ है?” बड़े क्षीण स्वर में पूछा।

सुधा ने आँख घुमाकर देखा। पापा को देखते ही मुस्करा पड़ी।

बिनती और चन्दर उठकर आ गये।

“आहा, चन्दर तुम आ गये? हमारे लिए क्या लाये?”

“पगली कहीं की!” मारे खुशी के चन्दर का गला भर गया।

“लेकिन तुम इतनी देर में क्यों आये, चन्दर!”

“कल रात को ही आ गये थे हम।”

“चलो-चलो, झूठ बोलना तो तुम्हारा धर्म बन गया। कल रात को आ गये होते तो अभी तक हम अच्छे भी हो गये होते।” और वह हाँफने लगी।

सर्जन आया, “बात मत करो...” उसने कहा।

उसने एक मिक्सचर दिया। फिर आला लगाकर देखा, और डॉक्टर शुक्ला को अलग ले जाकर कहा, “अभी दो घंटे और खतरा है। लेकिन परेशान मत होइए। अब सत्तर प्रतिशत आशा है। मरीज जो कहे, उसमें बाधा मत दीजिएगा। उसे जरा भी परेशानी न हो।”

सुधा ने चन्दर को बुलाया, “चन्दर, पापा से मत कहना। अब मैं बचूँगी नहीं। अब कहीं मत जाना, यहीं बैठो।”

“छिह पगली! डॉक्टर कह रहा है अब खतरा नहीं है।” चन्दर ने बहुत प्यार से कहा, “अभी तो तुम हमारे लिए जिन्दा रहोगी न!”

“कोशिश तो कर रही हूँ चन्दर, मौत से लड़ रही हूँ! चन्दर, उन्हें तार दे दो! पता नहीं देख पाऊँगी या नहीं।”

“दे दिया, सुधा!” चन्दर ने कहा और सिर झुकाकर सोचने लगा।

“क्या सोच रहे हो, चन्दर! उन्हें इसीलिए देखना चाहती हूँ कि मरने के पहले उन्हें क्षमा कर दूँ, उनसे क्षमा माँग लूँ!...चन्दर, तुम तकलीफ का अन्दाजा नहीं कर सकते।”

डॉक्टर शुक्ला आये। सुधा ने कहा, “पापा, आज तुम्हारी गोद में लेट लें।” उन्होंने सुधा का सिर गोद में रख लिया। “पापा, चन्दर को समझा दो, ये अब अपना ब्याह तो कर ले।...हाँ पापा, हमारी भागवत मँगवा दो...”

“शाम को मँगवा देंगे बेटी, अब एक बज रहा है...”

“देखा...” सुधा ने कहा, “बिनती, यहाँ आओ!”

बिनती आयी। सुधा ने उसका माथा चूमकर कहा, “रानी, जो कुछ तुझे आज तक समझाया वैसा ही करना, अच्छा! पापा तेरे जिम्मे हैं।”

बिनती रोकर बोली, “दीदी, ऐसी बातें क्यों करती हो...”

सुधा कुछ न बोली, गोद से हटाकर सिर तकिये पर रख लिया।

“जाओ पापा, अब सो रहो तुम।”

“सो लूँगा, बेटी...”

“जाओ। नहीं फिर हम अच्छे नहीं होंगे! जाओ...”

सर्जन का आदेश था कि मरीज के मन के विरुद्ध कुछ नहीं होना चाहिए-डॉक्टर शुक्ला चुपचाप उठे और बाहर बिछे पलँग पर लेट रहे।

सुधा ने चन्दर को बुलाया, बोली, “मैं झुक नहीं सकती-बिनती यहाँ आ-हाँ, चन्दर के पैर छू...अरे अपने माथे में नहीं पगली मेरे माथे से लगा दे। मुझसे झुका नहीं जाता।” बिनती ने रोते हुए सुधा के माथे में चरण-धूल लगा दी, “रोती क्यों है, पगली! मैं मर जाऊँ तो चन्दर तो है ही। अब चन्दर तुझे कभी नहीं रुलाएँगे...चाहे पूछ लो! इधर आओ, चन्दर! बैठ जाओ, अपना हाथ मेरे होठों पर रख दो...ऐसे...अगर मैं मर जाऊँ तो रोना मत, चन्दर! तुम ऊँचे बनोगे तो मुझे बहुत चैन मिलेगा। मैं जो कुछ नहीं पा सकी, वह शायद तुम्हारे ही माध्यम से मिलेगा मुझे। और देखो, पापा को अकेले दिल्ली में न छोडऩा...लेकिन मैं मरूँगी नहीं, चन्दर...यह नरक भोगकर भी तुम्हें प्यार करूँगी...मैं मरना नहीं चाहती, जाने फिर कभी तुम मिलो या न मिलो, चन्दर...उफ कितनी तकलीफ है, चन्दर! हम लोगों ने कभी ऐसा नहीं सोचा था...अरे हटो-हटो...चन्दर!” सहसा सुधा की आँखों में फिर अँधेरा छा गया-”भागो, चन्दर! तुम्हारे पीछे कौन खड़ा है?” चन्दर घबराकर उठ गया-पीछे कोई नहीं था... “अरे चन्दर, तुम्हें पकड़ रहा है। चन्दर, तुम मेरे पास आओ।” सुधा ने चन्दर का हाथ पकड़ लिया-बिनती भागकर डॉक्टर साहब को बुलाने गयी। नर्स भी भागकर आयी। सुधा चीख रही थी-”तुम हो कौन? चन्दर को नहीं ले जा सकते। मैं चल तो रही हूँ। चन्दर, मैं जाती हूँ इसके साथ, घबराना मत। मैं अभी आती हूँ। तुम तब तक चाय पी लो-नहीं, मैं तुम्हें उस नरक में नहीं जाने दूँगी, मैं जा तो रही हूँ-बिनती, मेरी चप्पल ले आ...अरे पापा कहाँ हैं...पापा...”

और सुधा का सिर चन्दर की बाँह पर लुढ़क गया-बिनती को नर्स ने सँभाला और डॉक्टर शुक्ला पागल की तरह सर्जन के बँगले की ओर दौड़े...घड़ी ने टन-टन दो बजाये...

जब एम्बुलेन्स कार पर सुधा का शव बँगले पहुँचा तो शंकर बाबू आ गये थे-बहू को विदा कराने...

तीसरा खंड समाप्त। उपसंहार पढ़ने के लिए अगले पृष्ठ पर जाएँ