वो भूख पढ़ती थी, वो भूख लिखती थी-महाश्वेता देवी / सपना मांगलिक

Gadya Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ब्रेख्त के अनुसार "भूखा आदमी किताब की और जाता है, यह उसका एक हथियार है।" उसी तरह महाश्वेता देवी के अपने जीवन में भी कम संघर्ष नहीं थे, इसलिए वह उन शोषित और वंचितों का दुःख पढ़ सकती थीं जिनके लिए सरकार ने अनगिनत क़ानून तो बना रखे हैं मगर उन कानूनों की जानकारी और सहायता प्रदान करने के बारे में कभी सोचा ही नहीं। महाश्वेता ऐसे ही वंचित भूखे उदरों की मूक चीत्कार थीं और उस चीत्कार को समाज के सामने लाना और उनकी आवाज बनकर क़ानून का दरवाजा खटखटाना उनके जीवन का मिशन था जिसके लिए उस देवी ने अपने निजी जीवन को ही ताक पर रख दिया। अन्ना हजारे कहते हैं कि "जो ज़िंदा रहने के लिए मरते हैं वह कभी ज़िंदा नहीं रहते और जो मरने के लिए ज़िंदा रहते हैं वह अमर हो जाते हैं दुनिया के लिए।" उनका शरीर लोगों के मध्य से उठाता है मगर उनकी याद हर एक दिल में ज़िंदा रहती है उनकी मौत के सैंकड़ो साल बाद भी दुनिया उन्हें उतने ही सम्मान और प्रेम से याद करती है। महाश्वेता देवी ने समाज से लिया कुछ नहीं सिर्फ दिया। अपने घर परिवार का सुख चैन अपनी सेवा, अपना सम्पूर्ण जीवन उन्होंने शोषितों और वंचितों पर खर्च किया।वह जितनी भावुक और सशक्त समाजसेविका थीं उससे भी कहीं ज़्यादा बेहतर एक लेखिका थी और इससे भी ज़्यादा प्रभावशाली वक्ता भी थीं। कहते हैं कि दो हजार छह के फ्रंक्फार्ट पुस्तक मेले में भारत एक ऐसा देश था जिसे दोवारा आमंत्रित किया गया था और उस विश्वप्रसिद्ध पुस्तक मेले के शुभारम्भ में महाश्वेता देवी ने ऐसी भावनापूर्ण और दिल को छू लेने वाला भाषण दिया कि हर एक सुनने वाले की आँखों से अश्रु धारा बह निकली। उन्होंने राजकपूर के गीत की प्रसिद्द पंक्तियों को इस्तेमाल करते हुए कहा कि "भारत में यह वह समय है जब जूता जापानी पहना जाता है, पतलून इंगलिश्तानी पहनी जाती है टोपी रूसी होती होता है मगर दिल जैसा कि हमेशा था, और युगों युगों तक रहेगा हिन्दुस्तानी है। महाश्वेता की कलम किसी यश या पुरूस्कार की भूखी नहीं थी न ही वह अपनी लेखनी से धनोपार्जन करना चाहती थीं। कहते हैं कि शोध के बिना बोध असंभव है और महाश्वेता पूरे शोध के बाद ही अपनी लेखनी को गति देती थीं। वो उन छपास की भड़ास वाले तमाम लेखकों की दौड़ से अलग थीं जो यह समझते हैं कि पाठक को जो कुछ भी अधकचरा ज्ञान परोसा जाएगा वह उसको भूखे विलाव की तरह से लपक लेगा। महाश्वेता देवी से पहले बांग्ला साहित्य में पारिवारिक द्वंद की कहानियां होती थीं। मगर महाश्वेता देवी पहली ऐसी लेखिका हैं जिन्होंने नक्सलबादी आंदोलन के दौरान जितनी लोगों ने यातनाएं सहीं, उनपर जितने भी अत्याचार हुए.उन सबको अपनी कहानियों का विषय बनाया, उनकी कहानियों के पात्र राजा - रानी की तरह रूमानी और अलादीन के चिराग की तरह पलक झपकते ही ईच्छा पूरी करने या सपने सच करने वाले काल्पनिक नहीं होते थे। वरन आम ज़िन्दगी के संघर्षशील जुझारू सच्चे नायाक होते थे जैसे कि "बिरसा मुंडा"। न्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि "हम सभी लेखकों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी को नज़दीक से देखे-सुने बिना लिखने का कोई अधिकार नहीं है। यह ज़रूरी है कि हम जनता तक जाए और उनकी वास्तविक ज़िंदगी से जुड़ी कहानियों को समझें। और हमारे पास जो कुछ है वह उन्हें दें।" एक बार महाश्वेता देवी आदिवासियों के साथ भोजन पर बैठीं तो देखा भात के साथ चुटकी बहर नमक रखा है, उन्होंने आदिवासियों से पूछा "इस भात को कैसे सानेग" आदिवासियों में से एक ने उत्तर दिया "हम इसे भूख से सानेगा" आदिवासी का यह उत्तर उन्हें द्रवित कर गया और इस घटना का जिक्र उन्होंने अपनी किताबों के साथ अपने दिए विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के इंटरव्यू में भी किया।

बिहार, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके महाश्वेता देवी के कार्यक्षेत्र रहे। वहाँ इनका ध्यान लोढ़ा तथा शबरा आदिवासियों की दीन दशा की ओर अधिक रहा। इसी तरह बिहार के पलामू क्षेत्र के आदिवासी भी इनके सरोकार का विषय बने। इनमें स्त्रियों की दशा और भी दयनीय थी। महाश्वेता देवी ने इस स्थिति में सुधार करने का संकल्प लिया। 1970 से महाश्वेता देवी ने अपने उद्देश्य के हित में व्यवस्था से सीधा हस्तक्षेप शुरू किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल की औद्योगिक नीतियों के ख़िलाफ़ भी आंदोलन छेड़ा तथा विकास के प्रचलित कार्य को चुनौती दी। वह आदिवासियों पर लिखने मात्र से अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं समझती थीं अपितु उनके हाथों से बने हस्तशिल्प के सामान की प्रदर्शनी लगाना और उनका विक्रय करवाने से लेकर, उनके होनहार बच्चों के शिक्षा की व्यवस्था करना और उनकी तरफ से कानूनी लड़ाई लड़ने के कार्य भी वह किया करती थीं तभी तो उन्हें सभी प्रेम से महाश्वेता माँ कहकर संबोधित करते थे।जितनी उच्च लेखन क्षमता और करुनामय दिल था उनका उतनी ही सादगी पसंद भी थीं।समाचार पत्रों और टीवी चेनलों को इंटरव्यू देते समय वह कभी अपनी वेश भूषा और शृंगार पर ध्यान नहीं देती थीं।अगर कोई इस बाबत उनका ध्यान भी आकर्षित करता तो उनका जवाब होता "हमारा साडी देखेगा या हमारा चूल देखेगा।"

महाश्वेता का साहित्य:-

बाहर के देशों में भारतीय साहित्य को जिन रचनाओं की बदौलत जाना गया, उनमें महाश्वेता देवी की रचनाएं भी हैं।महाश्वेता देवी अपने शब्दों का अमीर के बच्चों की भाँति कल्पनाओं से शृंगार नहीं करती थीं अपितु वह गरीव के बालकों की तरह से उन्हें अनुभव और भूख की तपती आग में तपाकर उन्हें जीवन की कडवी सच्चाइयों का एक आइना बनाती थीं। आदिवासियों के हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़ना, उनके क्षेत्रों का दौरा कर उनकी समस्याओं को सुनना इन सब पर अपना पूरा समय और ऊर्जा खर्च करने के उपरान्त भी वह लेखन के लिए समय निकाल ही लेती थीं तभी तो सौ उपन्यास और बीस कथा संग्रह वह अपने खाते में जोड़ पायी। उनका खुद का कहना था कि "मैं कितनी भी भागदौड़ क्यों न कर लूं, रचनाएँ मेरे सर पर सवार हो जाती हैं" तीन तीन कहानिया एक दिन में और हज़ार चौरासी की माँ जैसा उपन्यास महज चार दिन में उन्होंने पूरा किया था कभी कभी वह सुबह लिखने बैठतीं और रात के डेढ़ बज जाते लिखते - लिखते। सृजन के लिए इतना समर्पण तो विरलों में ही देखने को मिलता है। वह हर एक रचना को अथक परिश्रम और शोध के बाद गहरी सम्बेद्नात्मक दृष्टि से परखती और फिर अपने भावों की स्याही से रच डालतीं आम आदमी की ख़ास गाथा। जिसका एक उदाहरण उनका प्रसिद्द उपन्यास 'अरण्येर अधिकार' है जो कि हिन्दी में 'जंगल के दावेदार' के नाम से प्रकाशित हुआ है, इस उपन्यास को लिखने के लिए महाश्वेता देवी ने काफी लंबा समय रांची और उसके आसपास के इलाके में बिताया। अपने जमीनी हक के लिए मुंडा लोगों के संघर्ष के विरुद्ध ब्रिटिश हुकूमत का कुटिल अभियान, मुंडाओं के सहज स्वभाव का तथ्य संग्रह करने के साथ ही उन्होंने वहाँ के आदिवासियों के जीवन को नजदीक से देखा और उनके संघर्षों से जुड़ गईं। उन्होंने साहित्य के माध्यम से जन-इतिहास को सामने लाने का वह काम किया जो उनके पहले नहीं हुआ था। 'जंगल के दावेदार' उनकी ऐसी कृति है, जिसे 1979 में जब साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तो आदिवासियों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई थी। उन्हें लगा जैसे यह पुरूस्कार महाश्वेता देवी को नहीं अपितु उन्हें मिला है, उन्होंने अपने आदिवासी वाध यंत्र ढ़ाक को बजाकर इस ख़ुशी को जाहिर किया।

'झासेंर रानी' के लिए महाश्वेता ने झाँसी की रानी के भतीजे गोविंद चिंतामणि से पत्र व्यवहार शुरू किया। सामग्री जुटाने और पढ़ने के साथ-साथ उत्साहित होकर महाश्वेता ने लिखना भी शुरू कर दिया। फटाफट चार सौ पेज लिख डाले। पर इतना लिखने के बाद उनके मन ने कहा – यह तो कुछ भी नहीं हुआ। उन्होंने उसे फाड़कर फेंक दिया। झाँसी की रानी के बारे में और जानना पड़ेगा। तो इसके लिए छह वर्ष के बेटे नवारुण भट्टाचार्य और पति को कलकत्ता में छोड़कर अंततः झाँसी ही चली गईं। तब न पति के पास नौकरी थी न उनके पास। 'रुदाली' कहानी में महाश्वेता ने औरत की अस्मिता का प्रश्न उम्दा तरीके से उठाया तो 'अक्लांत कौरव' में विकास और छद्म प्रगतिवाद की तीखी आलोचना की। 'चोट्टि मुंडा और उसका तीर' में आदिवासी समाज की हकीकत को दर्शाया गया है। 'अमृत संचय' उपन्यास 1857 से थोड़ा पहले प्रारंभ होता है। 'अमृत संचय' में प्रतिकूल स्थितियों में भी जीवन के प्रति जो ललक है और प्रतिरोध की जो चेतना है, उस चेतना पर महाश्वेता की बराबर नजर रही है। गोरों के विरुद्ध ही वह चेतना नहीं थी, बल्कि आज़ाद भारत में भी प्रतिरोध की चेतना रही है, जिसे महाश्वेता पूरे साहस के साथ अभिव्यक्त करती हैं। 'आपरेशन बसाईटुडु', 'जगमोहन की मृत्यु' में महाश्वेता की वेदना और संघर्ष की स्मृति भी संचित है। महाश्वेता इतिहास, मिथक और वर्तमान राजनैतिक यथार्थ के ताने-बाने को संजोते हुए सामाजिक परिवेश की मानवीय पीड़ा को स्वर देती हैं। सर्कस की पृष्ठभूमि पर लिखा 'प्रेमतारा' प्रेम की कथा है, फिर भी उसकी पृष्ठभूमि में सिपाही विद्रोह रहता है। महाश्वेता ने 'हजार चौरासी की माँ' में नक्सल आंदोलन को माँ की नजर से देखा। नक्सल आंदोलन की वे साक्षी रही थीं। जनसंघर्षों ने उनके जीवन को भी परिवर्तित किया और लेखन को भी। 'हजार चौरासी की माँ' उस माँ की मर्मस्पर्शी कहानी है, जिसने जान लिया है कि उसके पुत्र का शव पुलिस हिरासत में कैसे और क्यों है।

महाश्वेता देवी ने लेखन की शुरुआत कविता से की थी, पर बाद में कहानी और उपन्यास लिखने लगीं। 'अग्निगर्भ', 'जंगल के दावेदार', '1084 की मां', 'माहेश्वर', 'ग्राम बांग्ला' सहित उनके 100 उपन्यास प्रकाशित हैं। बिहार के भोजपुर के नक्सल आन्दोलन से जुड़े एक क्रान्तिकारी के जीवन की सच्ची कथा उपन्यास के रूप में उन्होंने 'मास्टर साहब' में लिखी। इसे उनकी बहुत ही महत्त्वपूर्ण कृति माना गया। महाश्वेता देवी वामपंथी विचारधारा से जुड़ी रहीं, पर पार्टीगत बंधनों से अलग ही रहीं।महाश्वेता देवी ने हमेशा वास्तविक नायकों को अपने लेखन का आधार बनाया।

महाश्वेता देवी के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर फैल गई। उनके निधन पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि बंगाल ने अपनी माँ को खो दिया है। यह साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्‍होंने एक ट्वीट में लिखा, "भारत ने एक महान लेखक खो दिया है। बंगाल ने एक ममतामयी माँ को खोया है। मैंने एक निजी मार्गदर्शक को खो दिया है। ईश्‍वर महाश्‍वेता दी की आत्‍मा को शांति प्रदान करे।"