'औरत', 'ग्रेप्स ऑफ रेथ' और 'द गुड अर्थ' / जयप्रकाश चौकसे

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'औरत', 'ग्रेप्स ऑफ रेथ' और 'द गुड अर्थ'
प्रकाशन तिथि :02 फरवरी 2016


यह आश्चर्य की बात है कि 1939 में भारत में मेहबूब खान 'औरत' बना रहे थे, जिसे 1956 में उन्होंने 'मदर इंडिया' के नाम से दोबारा बनाया, तब अमेरिका में जॉन स्टीनबैक के उपन्यास से प्रेरित 'द ग्रेप्स ऑफ रेथ' और पर्ल एस. बक की 'द गुड अर्थ' पर फिल्में बनाई जा रही थीं। जॉन स्टीनबैक तथा पर्ल एस. बक दोनों ही नोबेल पुरस्कार विजेता बने। जहां स्टीनबैक की किताब और फिल्म औद्योगीकरण के कारण जमीन से उखाड़े गए किसानों की व्यथा-कथा है, वहां पर्ल एस. बक की किताब और फिल्म चीन के किसानों की दु:ख की गाथा है। इसके साथ महाजन की ब्याज की चक्की में पिसते भारतीय किसानों की कथा मेहबूब खान की 'औरत' थी। इससे संकेत स्पष्ट है कि दुनिया के सभी देशों के किसानों का समान रूप से शोषण हुआ है और औद्योगीकरण एक विराट किसान विरोध के रूप में उभरा है। दरअसल, कृषि भूमि को बिना छुए भी औद्योगीकरण हो सकता था और वर्तमान में भी हो सकता है।

खेती बनाम कारखाना कोई युद्ध नहीं है। 'ग्रेप्स ऑप रेथ' का एक दृश्य है कि गांवों से रोजी-रोटी की तलाश में महानगर आए किसानों का पहला विरोध वे किसान करते हैं, जो उनसे पहले महानगर आए और अब तक बेरोजगार हैं, अर्थात रोजी-रोटी के सवाल एक साधनहीन को दूसरे साधनहीन के विरुद्ध खड़े करते हैं। जब दो भूखे एक-दूसरे से भिड़ेंगे तब दोनों ही जमीन पर चारों कोने चित पड़े हुए मिलते हैं। कौन है वह जो इन भूखों को आपस मेें भिड़ा रहा है? कौन है वह जो इनके आपसी युद्ध से लाभान्वित हो रहा है और यह सारा खेल एक विकसित सभ्यता में पुन: जंगल के कानून की वापसी का प्रयास है, जिसमें फिटेस्ट के बचे रहने की बात है। सबसे ताकतवर ही बना रहेगा या बड़ी मछली छोटी को खाती रहेगी। जैसे ही आप शारीरिक ताकत को निर्णायक बनाते हैं, आप फिर असभ्यता की ओर बढ़ते हैं अौर विपरीत दिशा में लाए जाना भयावह संकेत है। यह जीवन का अवमूल्यन भी हैै। उपरोक्त विचार गिरीश कर्नाड के महान नाटक 'हयवदन' का स्मरण कराता है, जिसकी प्रेरणा उस पुरातन कथा से ली गई है, जिसमें योद्धा राजकुमारों की स्वयंवर में मौजूदगी के बावजूद कन्या एक घोड़े के गले में वरमाला डालती है। 'हयवदन' दो दोस्तों की कहानी है। एक पहलवान है और दूसरा कवि है। पहलवान ने अपने कवि-मित्र के आग्रह पर एक सुंदर स्त्री से उसका विवाह कन्या के माता-पिता को यह कहकर कराया कि वह अपने मित्र कवि की आर्थिक इत्यादि सभी समस्याओं का हल करता रहा है और करता रहेगा। विवाह के बाद कन्या देखती है कि उसका पति कल्पना के संसार का प्राणी है और कहीं काव्य रचना मात्र परिश्रम करने से बचने का साधन मात्र तो नहीं? वह मन ही मन कर्मठ और मजबूत पहलवान की अोर आकर्षित है तथा एक यात्रा में वह दोनों को आपस में भिड़ा देती है और दोनों एक-दूसरे का सिर काट देते हैं। तब कन्या देवी मां से प्रार्थना करती है कि उसके पति को पुन: जीवित कर दे। उनींदी-सी प्रस्तुत देवी कहती है कि सिर धड़ के ऊपर रख दो वे जीवित हो जाएंगे और देवी पुन: निंद्रालीन हो जाती है। यह उनींदी देवी प्रतीक है कि मनुष्य को ही काम करना है। पत्नी को ऐसा पति चाहिए, जो कवि की तरह रोमांटिक तो हो परंतु पहलवान की तरह बलिष्ठ हो। वह कवि का सिर पहलवान के और पहलवान का सिर कवि के धड़ पर रख देती है। यह उनकी 'संपूर्णता' के लिए प्रयास है परंतु कालांतर में पहलवान दिमाग वाला धड़ जंगल में कसरत करके पुन: शरीर सौष्ठव प्राप्त करता है और कवि का सिर लगाया धड़ कल्पना लोक में खोए रहकर पुन : कमजोर हो जाता है गोयाकि 'संपूर्णता' एक भ्रम है।

सारे द्वंद्व रचे ही एक उद्देश्य के लिए हैं कि धरतीपुत्र अपनी जमीन से उखड़ जाएं, क्योंकि उखड़े हुए लोगों को गुलाम बनाना आसान होता है। 'ग्रेप्स ऑफ रेथ' के आखिरी दृश्य में नाम-मात्र के वेतन पर महानगरों में नारकीय जीवन बिताने वाले अपने खेतों की ओर लौटते हैं। वे समझ चुके हैं कि केवल धरती पर परिश्रम ही बिना उनका आत्म-सम्मान हारे, उन्हें रोजी-रोटी दे सकता है। यह बार-बार जो जड़ों की अोर लौटने की बात होती है, उसका अर्थ है कि जीवन के सारभूत आदर्श की और लौटना तथा खेत भी बहाा ही है। इस खेत में गांव और शहर की अवधारणा भी एक हो जाती है।