'हरे रामा' से 'उड़ता पंजाब' तक / जयप्रकाश चौकसे

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'हरे रामा' से 'उड़ता पंजाब' तक
प्रकाशन तिथि :14 जून 2016

अनुराग कश्यप को अंधकार, अपराध और आतंक का सिनेमा पसंद है। यह संभव है कि उन्हें सांप्रदायिकता में भी रुचि हो, क्योंकि उनकी पहली फिल्म 'ब्लैक फ्रायडे' में कुछ इस तरह का हल्का-सा झुकाव भी नज़र आया और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में हिंसा का अतिरेक था अौर अधिकांश नकारात्मक पात्र मुस्लिम समुदाय के दिखाए गए थे। अनुराग कश्यप के पसंदीदा अमेरिकी फिल्मकार ने 'गैंग्स ऑफ न्यूयॉर्क' बनाई तो उनके भारतीय प्रशंसक कश्यप ने जाने क्यों वासेपुर को चुना जबकि अपराध जगत की राजधानी मुंबई है और वे किसी भी शहर के नाम का इस्तेमाल कर सकते थे, क्योंकि अपराधी सभी शहरों में सक्रिय हैं। इन्हीं महोदय की एक फिल्म में भूतपूर्व राजा-महाराजा अपनी सेना गठित करके दिल्ली पर कब्जा करना चाहते हैं। अमेरिका में आर्थिक तंगी के दौर में अपराध और अंधकार की फिल्में बनीं, जिन्हें 'द नोए सिनेमा' कहते हैं। इस अंधकार के सिनेमा में जहां राम गोपाल वर्मा सहमे से खड़े हो जाते हैं, उस स्थान के बाद की यात्रा अनुराग कश्यप करते हैं।

अनुराग कश्यप के लिखे संवाद में अपशब्दों की भरमार होती है और उनका खयाल है कि यही अवाम की जबान है। गालियां और गोलियां उन्हें पसंद है और इनका अतिरेक उनके सिनेमा का हिस्सा है। उनके पात्र गोली दागने में जितने निपुण हैं उससे अधिक योग्यता अपशब्द की बौछार करने में दिखाते हैं। भारत-पाकिस्तान की सरहदों पर भी गालियों का द्वंद्व होता है और वे इसका मुहूर्त भी अापसी बातचीत में निकालते हैं। कश्यप द्वारा प्रस्तुत तमाम रिश्तों का केंद्र यौन संबंध हैं। उनकी पारो साइकिल के कैरियर पर बिस्तर रखकर अपने 'देव डी' के साथ जंगल के झुरमुट में जाती है। शरतचंद्र चट्‌टोपाध्याय की आत्मा कांपती होगी 'देव डी' देखकर। राम गोपाल वर्मा और अनुराग कश्यप के लगातार प्रयासों से एक छोटा दर्शक वर्ग उभरा है, जिसे अंधकार, अपराध व आतंक का सिनेमा पसंद है। उनकी इस पसंद में उनकी छिपी हुई काम भावना भी एक कारण हो सकती है। भारतीय समाज के तंदूर में काम भावना की चिंगारियां राख के नीचे हमेशा धधकती रहती है।

प्रारंभ में अंधकार के सिनेमा को पसंद करने वाला वर्ग केवल महानगरों में अपनी मौजूदगी दर्ज करता था परंतु अब यह सब छोटे शहरों और कस्बों में विकसित हो रहा है। अमेरिका में आर्थिक मंदी के दौर में इस तरह का सिनेमा पनपा है और अब भारत में यह लोकप्रिय हो रहा है, जिसका एकमात्र कारण धन की कमी नहीं है वरन् कुछ चुनिंदा लोगों के पास धन की विपुलता है। जीवन की क्षणभुगंरता भी कुछ युवा लोगों को नशीले पदार्थ की खाई में फेंकती है। कोई आश्चर्य नहीं कि इसी विषय पर लिखे गए एक उपन्यास का नाम 'वैली ऑफ डॉल्स' है।

लगभग पांच दशक पूर्व देवआनंद ने नशीले पदार्थ के सेवन पर 'हरे रामा, हरे कृष्णा' बनाई थी, जिसमें उन्होंने जीनत अमान को अवसर दिया था और पंचम का गीत 'दम मारो दम' अत्यंत लोकप्रिय हुआ था। उन्हीं दिनों विदेशों में भक्ति-दौर का भी उदय हुआ था। इस भक्ति-दौर में अमेरिका में एक विशाल मंदिर परिसर भी बना था। पश्चिम के युवा वर्ग को अपने देश के भौतिकवादी मूल्यों से नफरत थी और 'हरे रामा, हरे कृष्णा' वे इतनी तन्मयता से गाते थे कि उन्हें इसमें भी अलग किस्म के नशे का अहसास होता था गोयाकि यात्रा एक नशे से दूसरे नशे की अोर जाती थी तथा मोहभंग से उत्पन्न विरक्ति का भाव उन्हें अध्यात्म का भ्रम मात्र देता था, क्योंकि असल अध्यात्म तो सदियों की तंद्रा से जागना है। लोग इसको साधने की प्रक्रिया में सो जाते हैं, जो पलायन है, परमात्मा से निकटता नहीं है।

बहरहाल, अनुराग कश्यप की फिल्म 'उड़ता पंजाब' विवाद के कारण दर्शक वर्ग में उत्सुकता जगा चुकी है और अंधकार तथा ड्रग्स की इस फिल्म को कुछ लाभ मिलेगा। अगर यह विवाद नहीं होता तो अंधकार और नशे की धुआं-धुअां फिल्म कम दर्शक ही देखते। देव आनंद की 'हरे रामा' एक मासूम-सी फिल्म थी। अनुराग कश्यप मासूमियत के खिलाफ खड़े हुए फिल्मकार हैं। अंंधकार और अपराध का सिनेमा भारतीय सिनेमा की मुख्यधारा नहीं है।