अक्षय कुमार की एकाग्रता और सम्पत्ति मोह / जयप्रकाश चौकसे

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अक्षय कुमार की एकाग्रता और सम्पत्ति मोह
प्रकाशन तिथि :04 मार्च 2017


मुंबई फिल्म उद्योग के सितारे प्राय: उसी समय सोने जाते हैं, जब आसमान के सितारे अलविदा कहते हैं परंतु अक्षय कुमार रात दस बजे तक सो जाते हैं और प्रात: चार बजे उठकर समुद्र तट पर सैर करते हैं, जिसके बाद वे अपने जिम में कसरत करते हैं। एक अभिनेता का जिस्म उसकी दुकान होता है, जिसे उसे संभालकर रखना होता है, यद्यपि यही बात वेश्याओं के बारे में भी की जा सकती है परंतु उनके व्यवसाय में देह की दुर्दशा होती है। इरशाद कामिल का गीत याद आता है, 'कतिया करूं कतिया करूं सारी सारी रात।' सितारों की दौड़ में अक्षय कुमार उस कछुए की तरह हैं, जो अपने आलस करते हुए खरगोश से जीत जाता है। फिल्म उद्योग में खान शासित कालखंड में अक्षय कुमार ने एक के बाद एक अनेक सफल फिल्मों की शृंखला ही खड़ी कर दी। उसकी ताज़ा फिल्म जॉली एलएलबी भाग-2 भी सौ करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है परंतु यह भी सच है कि अभी तक अक्षय कुमार की कोई भी फिल्म तीन सौ करोड़ के आंकड़े को पार नहीं कर पाई है। कोई बल्लेबाज चौकों और छक्कों से शतक बनाता है, कुछ एक-एक या दो-दो रन लेकर शतक बनाते हैं, बात तो शतक बनाने की है। अक्षय कुमार सिंगल्स से शतक बना रहे हैं। खुदरा व्यापारी भी धन कमाते हैं, केवल डीलर ही लाभ नहीं कमाता!

अक्षय कुमार न दावतें देते हैं और न ही दावतों में शिरकत करते हैं, क्योंकि फिल्मी दावतें आधी रात को शुरू होती है बतर्ज 'उत्सव' के गीत के 'रात शुरू होती है आधी रात को।' ज्ञातव्य है कि यह गीत लता मंगेशकर और आशा भोसले ने गाया है। उन दिनों उनमें अबोला चल रहा था, अत: पहले लताजी ने गीत िरकॉर्ड करवाया, फिर आशाजी ने रिकॉर्ड करवाया परंतु टेक्नोलॉजी का कमाल है कि वह साथ गाया ध्वनित होता है। इन दोनों सगी बहनों का बहनापा भी कमाल का है। दशकों से दोनों बहनें मुंबई के पेडर रोड पर 'प्रभु कंुज' नामक इमारत में एक ही मंजिल के दो फ्लैट्स में रहती हैं, जिनके बीच का दोनों फ्लैट्स को जोड़ने वाला द्वार सदैव खुला रखा जाता है और अबोले के बावजूद रियाज़ का एक ही कमरा है, जिसमें पहले लताजी रियाज़ करती हैं और कुछ समय बाद आशाजी रियाज़ करती हैं। तानपुरा एक ही है, जिस पर दोनों बहनों के हाथ की छाप लगी है। अत: हथेलियों पर उभरी रेखाएं गलबहियां करती हैं। खालिद मोहम्मद ने दो गायिकाओं के जीवन पर एक काल्पनिक फिल्म बनाई थी परंतु उनके जीवन से प्रेरित एक सीरियल सत्य के अधिक निकट था।

अक्षय कुमार ने पूंजी निवेश भी चतुराई से किया है। उनका एक बिल्डर मित्र है और भवन निर्माण के पहले ही कम दाम एकमुश्त चुकाकर वे कुछ माले खरीद लेते हैं। इमारत पूरी होते ही दाम बढ़ जाते हैं। जुहू में समुद्र किनारे एक इमारत की तीन मंजिलें उन्होंने अरसे पहले खरीदी हैं। आजकल उसी इमारत में एक माला ऋतिक रोशन और एक माला निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने किराये पर लिया है। मुंबई के वरसोवा क्षेत्र में साजिद नाडियाडवाला की नई इमारत निर्माणाधीन है।

हर क्षेत्र में मनुष्य के मन में इतिहास में अमर हो जाने की इच्छा दबी होती है। अवाम तो इस झमेले में नहीं पड़ता। टीएस एलियट के काव्य-नाटक 'मर्डर इन द कैथेड्रल' में हेनरी और थॉमस बैकेट बचपन के मित्र हैं और समय बीतने पर हेनरी इंग्लैंड का राजा हो जाता है और वह अपने मित्र थॉमस बैकेट को कहता है कि वह चर्च के शिखर पद पर बैठे तो दोनों मिलकर सत्ता का भरपूर उपभोग करेंगे, क्योंकि चर्च भी सत्ता का केंद्र है। थॉमस बैकेट उसे कहता है कि प्रभु का चाकर होते ही वह चर्च की सत्ता से कोई समझौता नहीं करेगा। कालांतर में बचपन के मित्र एक-दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं। यह टीएस एलियट का जीनियस है कि हेनरी एक टेम्पटर को सम्पत्ति सुख का लोभ देकर बैकेट के पास भेजता है। सारे प्रयास विफल होते हैं। चौथा टेम्पटर कहता है कि बैकेट चर्च के अधिकार के सर्वोच्च होने के पीछे यह जानकर पड़ा है कि राजा हेनरी उसका कत्ल करा देगा, तो वह अमर हो जाएगा। हर वर्ष उसकी स्मृति में शहीद दिवस मनाया जाएगा। इस अमरत्व के लोभ के परे तो बैकेट नहीं है और शायद वह यही चाहता भी है। ज्ञातव्य है कि फिल्म 'बैकेट' में पीटर ओ टूल ने बैकेट की भूमिका की थी और रिचर्ड बर्टन ने राजा हेनरी की। इसकी प्रेरणा से ही ऋषिकेश मुखर्जी ने 'नमक हराम' नामक फिल्म बनाई, जिसमें राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन ने बचपन से मित्र रहे पात्र अभिनीत किए थे। धनाढ्य अमिताभ मिल का मालिक है और मजदूरों की मांग से परेशान है। अत: वह षड्यंत्र रचकर अपने गरीब मित्र राजेश खन्ना को मजदूर यूनियन का नेता बना देता है परंतु राजेश खन्ना पूरी निष्ठा से मजदूरों के हित की लड़ाई लड़ता है। ऋषिकेश मुखर्जी 'मर्डर इन द कैथेड्रल' की तरह अमरत्व के छलावे वाला दृश्य नहीं कर पाए। आसान रास्तों पर चलकर अमरत्व मिलता भी नहीं। जिन न्यायाधीशों ने सुकरात को जहर पीने की सजा दी उनका आज कोई नामलेवा नहीं है परंतु सुकरात आज भी जीवित है।

बहरहाल, संपत्ति को समर्पित अक्षय कुमार को भी किसी भूमिका द्वारा अमर हो जाने की इच्छा नहीं है। दिलीप कुमार की तरह वे कोई महान 'गंगा जमुना' नहीं करना चाहते। उनका लक्ष्य प्रतिवर्ष तीन या चार फिल्में अभिनीत करना है और वे किसी निर्माता को चालीस दिन से अधिक का समय नहीं देते। सर्वकालिक महान फिल्म समय या बजट की किसी सीमा में नहीं बनाई जा सकती। उन्हें प्रवाह के साथ बहना पसंद है और धारा के विपरीत तैरने वाला डूब भी जाता है परंतु अक्षय अनभिज्ञ हैं कि डूबने वाले की उंगलियां डूबते हुए भी लहरों पर इतिहास लिख देती हैं।