अच्छी कविता दलगत रीति-नीति से परे .. / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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(किशन सरोज हिन्दी के उन गिने-चुने गीतकारों में से एक हैं, जिनकी आवाज हृदय से निकलकर हृदयों तक उतर जाती है। 1986 में प्रकाशित गीत संग्रह 'चंदन वन डूब गया' इनके मर्मस्पर्शी गीतों का संग्रह हैं। 'इंडियन एसोसिएशन' मैनचेस्टर द्वारा आयोजित यूरोप के प्रथम अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में आपके गीतों को लोगों ने बेहद सराहा। 25-26 सितम्बर 93 को संपन्न इस आयोजन से लौटे श्री किशन सरोज से रामेश्वर काम्बोज 'हिंमाशु' की बातचीत।)

-काव्य के क्षेत्र। में आने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?


मैं बचपन से ही बहुत भावुक था। शरत्चंद्र से बहुत प्रभावित हुआ। इनके लगभग सारे उपन्यास पढ़ डाले। मेरी भावुकता को इन उपन्यासों ने परिष्कृत किया। एक बार मनोहर भूषण इंटर कॉलेज में कवि सम्मेलन था। इस सम्मेलन में रघुवीरशरण मित्र, संतोषी जी और प्रेमीजी को सुना। इनकी कविताओं ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसके बाद मैंने दो गीत लिखे। 'दोस्त ने ये गीत लिखे हैं-' कहकर प्रेमी जी को गीत दिखाए. जब उन्होंने दोस्त से मिलाने के लिए कहा तब मैंने वस्तुस्थिति बताई. गिरिराजशरण पाण्डेय ने मुझे व्याकरणिक सजगता से अवगत कराया।

-मंच और कविता का पारस्परिक सम्बंध क्या है? क्या मंच के कारण कविता का स्तर घटा है?

हिंदी के विकास में रेल, फ़िल्म और कवि सम्मेलन का बड़ा योगदान है। मंच ने कविता को हजारों लोगों तक पहुँचाया है। मंच के कारण कविता का स्तर नहीं घटा वरन् उन लोगों के कारण घटा है, जो पैसे के लिए हर किस्म की उछलकूद कर सकते हैं।

-क्या इस गिरते हुए स्तर के लिए श्रोता भी उत्तरदायी हैं?

बिल्कुल नहीं। श्रोता वही तो सुनेगा, जो उसे बहुतायत में सुनाया जाएगा। जो यह कहते हैं कि श्रोता समझदार नहीं हैं, वे ग़लत हैं। श्रोता मूढ़ नहीं हैं। श्रोता का स्तर तो कवि के स्तर से बनता है। जो श्रोता चलताऊ विषयों पर लिखी कविताओं पर ताली बजाता है, वह गंभीर रचनाओं पर गद्गद् होता है।

-इस समय कवियों की तो बाढ़ है, पर सही कविता का अभाव क्यों है? जो कविता आज तालियाँ लूट रही हैं, वह कल क्यों मर जाती हैं?

नारेबाजी की कविताएँ लिखने वाले कविता की हानि कर रहे हैं। कविता दिल से निकलती है, दिमाग़ से नहीं, दिमाग़ से तो केवल अनुशासित होती है। रागात्मकता के बिना साहित्य, संगीत, कला-यहाँ तक कि सृष्टि भी संभव नहीं, मेहँदी रचे हाथ न होते, तो सृष्टि भी न होती। बाढ़ हमेशा नहीं रहती। बाढ़ उतरने पर सही कविता ही बच रहती है। जो कविता हृदय को स्पर्श करेगी, वह न कल मरेगी, न परसों, परंतु कुछ कविताएँ किसी तात्कालिक घटना या मुद्दे से जुड़ी होती हैं। इस तरह की ही कविताएँ तात्कालिकता के अवसान के बाद गायब हो जाती हैं। जो रचना अपनी पूरी रागात्मकता के साथ जीवन के शाश्वत प्रश्नों से जुड़ी है, वह ज़रूर जीवित रहेगी।

-कविता में दोहराव की स्थिति क्यों है?

कमोबेश यह स्थिति अन्य विधाओं में भी मिल जाएगी। जीवन-अनुभव में कमी के कारण दोहराव होगा। हमारे जीवन का फलक जितना व्यापक और गहरा होगा, कविता भी उतनी ही प्रभावित होगी। उथलापन कहाँ और कितनी देर टिक पाता है? चर्वित-चर्वण किसी भी विधा के लिए घातक है। सूर को देखिए-वात्सल्य और प्रेम के बहुआयामी चित्र खींचे हैं। विषय गिने-चुने हो सकते हैं। विषय की गहरी पकड़ ही कविता को प्राणवान् बना सकती है। जीवन-जगत् के गहन अध्ययन की नितांत आवश्यकता है।

-कुछ कवि कथ्य की कमजोरी को गेयता से ढकने की कोशिश करते हैं। यह खेल कब तक चलेगा?

कमजोर कथ्य उठाने वाले इस खेल के ही सहारे अपने पैर टिकाने की कोशिश करते हैं। यह खेल अब तक चल रहा है, आगे भी चलेगा। कारण, कुछ कवि होते हैं, कुछ बनते हैं, कुछ में कविता पैदा होती है, कुछ कविता पैदा करते हैं, कुछ के लिए कविता-रचना उतना ही यांत्रिक है, जितना दस बजे दफ्तर जाना।

-इधर आपके गीतों में कुछ बदलाव आया है। इसका क्या कारण है?

कवि दुनिया से बाहर का आदमी तो नहीं है। दुनिया में बदलाव आएगा, तो थोड़ा-बहुत परिवर्तन हर क्षेत्र में होगा। मैंनेे शुरू से हर विषय पर लिखा है, पर मेरी पहचान बनी है, रागात्मकता से ही। राजीव गांधी के महाप्रस्थान पर मेरी कविता को लोगों ने पढ़ा और पाया कि अच्छी कविता दलगत रीति-नीति से हटकर ही लिखी जा सकती है।

-नवगीत के शिल्प के बारे में आपके क्या विचार है?

नवगीत के क्षेत्र में ऐसे भी लोग आए हैं, जो अपने दोषपूर्ण (शिल्पगत दोष) गीतों को नवगीत के नाम से परोसने में तनिक नहीं झिझके. कुछ ने शिल्प को महत्त्व नहीं दिया। नवगीत की अभिव्यंजना में नयापन होना चाहिए. ग़ज़ल की तरह विशृंखल न होकर संश्लिष्टता होनी चाहिए, इस बात पर मैं जोर देना चाहूँगा। आज जो नवगीत लिखे जा रहे हैं, उनमें अधिकतर ऐसे हैं, जिनमें आद्यंत एक भाव, एक स्थिति की उपस्थिति नहीं मिलेगी, वरन् बिखराव मिलेगा।

-नवगीत और नयी कविता में आप किसे बेहतर मानते हैं?

दोनों को ही। दोनों परस्पर विरोधी नहीं। नवगीत को नयी कविता से बहुत कुछ मिला है। किसे कितना मिला, यह प्रत्येक की गुण-ग्राहकता पर निर्भर है।

इधर के वर्षों में कई साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ बंद हुई हैं। ऐसा क्यों हुआ?

पाठकीय अभिरुचि विकृत हुई है। मीडिया के बेहूदे आक्रमण ने पढ़ने का समय छीन लिया है। पढ़ना या पुस्तकें खरीदकर पढ़ना कितने लोगों की प्राथमिकता है? हिन्दी पढ़ाने वाले शिक्षकों से ही पूछकर देख लीजिए कि किसने साल भर में कितनी साहित्यिक पत्रिकाएँ या पुस्तकें खरीदकर पढ़ी है। यही कारण है कि प्रकाशन-जगत् संकट के दौर से गुजर रहा है। यहाँ मैं 'माया' , 'मनोहर कहानियाँ' , 'सरिता' , 'मुक्ता' के पाठकों की बात नहीं करता।

-पिछले दिनों आप मैनचेस्टर गए थे। हिन्दी के बारे में वहाँ की स्थिति कैसी है?


वहाँ नई पीढ़ी हिन्दी से दूर होती जा रही है। इसका कारण उपेक्षा न होकर उन अवसरों का अभाव प्रमुख है, जहाँ पर हिन्दी बोली जा सके. जो हिन्दी समझते हैं, उनकी संख्या भी पर्याप्त है। आप उनकी अभिरुचि का इसी से अनुमान लगा लीजिए कि साढ़े सात बजे कवि सम्मेलन शुरू हुआ और दो बजे खत्म किया गया। साढ़े छह घंटे तक श्रोता मनोयोग से सुनते रहे। भारतीय उच्चायोग के हिन्दी अधिकारी हिन्दी के प्रति काफी सजग हैं।

-अतुकान्त कविता के बारे में आप क्या कहना चाहेंगें?


छंद, लय आदि का ज्ञान न होने पर मजबूरी में बेसिर-पैर की कविताएँ लिखना ज़रूर कमजोरी है। श्री नरेश मेहता, भवानीप्रसाद मिश्र, गिरिराजप्रसाद माथुर की अतुकांत कविताएँ भी मुझे पसंद हैं। इन कवियों का छंद पर भी पूरा अधिकार रहा है।

-कविता का एक मात्र उद्देश्य क्या है?

कविता मेरे विचार में स्वांतः सुखायः होनी चाहिए।

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 (19-10-1993 -सण्डे मेल 28 नवम्बर-4दिसम्बर 1993