अनुत्सव भी उत्सव है: श्रीनरेश मेहता / लालचंद गुप्त 'मंगल'

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'साहित्य अकादेमी' (1988) , 'भारतीय ज्ञानपीठ' (1992) और 'भारतभारती' पुरस्कारों सहित अन्य-अनेक सम्मानों से अभिनंदित, 'दूसरा सप्तक' (1951) के प्रमुख कवि, विस्तृत साहित्यिक फलक के अधिकारी तथा बहुआयामी प्रतिभा के धनी श्रीनरेश मेहता (पूर्णशंकर शुक्ल मेहता) एक-साथ कविताकार, कथाकार, नाटककार, संस्मरणकार, पत्रकार और आलोचनाकार के रूप में समादृत हैं। आपका जन्म मालवा (मध्यप्रदेश) के शाजापुर कस्बे में 15 फरवरी 1922 ई. को हुआ। स्थानीय विद्यालयों-महाविद्यालयों में शिक्षा अर्जित करने के उपरान्त आपने 1946 ई. में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से हिन्दी-साहित्य में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में सैनिक शिक्षा प्राप्त की; बौद्ध भिक्षु भी बने और 'महिमा' जी के साथ अपना वैवाहिक / पारिवारिक जीवन बहुत-आदर्श और प्रेम-पूर्ण रूप में निभाया। राजनीति और साहित्य को पर्यायवाची मानकर राजनीति के क्षेत्र में भी मेहता जी अनेक वर्षों तक सक्रिय रहे। उनका रुझान कम्युनिस्ट पार्टी की ओर था। इसी मानसिकता के फलस्वरूप उनका गहन-गंभीर परिचय गजानन माधव 'मुक्तिबोध' से हुआ; लेकिन बाद में वे अध्यात्म की ओर उन्मुख हो गये। सन् 1948 से 1953 तक लखनऊ, नागपुर तथा प्रयाग के आकाशवाणी-केन्द्रों में विभिन्न पदों पर सेवाएँ दीं। अन्ततः, सरकारी नौकरी को अपनी राजनीतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों में बाधक मानकर, त्यागपत्र दे दिया और लेखन-सम्पादन को समर्पित हो गए। लगभग 78 वर्ष की आयु में 22 नवम्बर, 2000 ई. को आपका स्वर्गवास हो गया।

श्रीनरेश मेहता ने, दस वर्ष की आयु में, सन् 1932 में, अपनी पहली रचना रची-'लगता है, ये दो भौंहे हैं।' उनकी 'रेशमी रूमाल' कहानी लाहौर की 'शांति' पत्रिका (1937-38) में प्रकाशित हुई। उनकी एक कहानी, 'हम जिसे ज़िन्दगी कहते हैं' , एक कहानी-प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाकर, जैनेन्द्र जी के हाथों पुरस्कृत हुई। उनकी कई रचनाएँ, सरकारी हस्तक्षेप के कारण, प्रकाशित भी नहीं हो सकीं। आगे चलकर मेहता जी अनेक पत्रिकाओं से भी जुड़े। 'आँधी' और 'साहित्यकार' पत्रिकाओं में सहायक-संपादक का दायित्व निभाया तथा प्रसिद्ध मासिकी 'कृति' का सुचारु संपादन भी किया।

यद्यपि श्रीनरेश मेहता ने अपनी लेखनी से साहित्य की लगभग प्रत्येक विधा का सशक्त संस्पर्श किया है, तथापि उनकी केन्द्रीय सर्जना-विधा कविता ही कहलाई है; क्योंकि उन्होंने कविता को अतिबौद्धिकता के आकाश से उतारकर मानवीयता की सहज भावभूमि पर प्रतिष्ठित करने में अपार सफलता पाई है। भावयित्री-कारयित्री प्रतिभा का सुन्दर समन्वय सँजोये श्रीनरेश मेहता एक ऐसे सुधी रचनाकार हैं, जिनकी कविता में एक ओर भावनात्मक सौन्दर्य है, तो दूसरी ओर अभिनव शिल्प है। उनके काव्य में आस्था और आशा के स्वर प्रमुख हैं। 'किन्तु मैं लड़ूँगा ही' में कवि की अदम्य आस्था और साहस की अभिव्यक्ति समाहित है। प्रकृति, प्रेम, सौन्दर्य, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रीयता, युद्ध और शान्ति तथा नवीन जीवन-दृष्टि उनके काव्य को कालजयी बनाने वाले तत्त्व हैं। परम्परा के जीवन्त तत्त्वों को ग्रहण करते हुए भविष्योन्मुखी जीवन-दृष्टि के पोषक श्रीनरेश मेहता यह मानते थे कि दूसरी-सारी खण्ड वैचारिकताओं की अपेक्षा काव्य-दृष्टि ही शायद पूर्ण और अखण्डता के कहीं-अधिक निकट है। अतः कवि और काव्य को यह समझना ही होगा कि उसकी वाणी ही चैत्य वाणी है, उसका स्वर ही आश्वस्ति का स्वर है; इसीलिए सृष्टि के इस छंद-महोत्सव में काव्य को ही दक्षिणावर्त शंख बनना होगा। स्पष्ट है कि नरेश जी की सर्जना के गहरे आयाम उनकी कविता से ही निःसृत होते हैं।

श्रीनरेश मेहता ने मुक्तक एवं प्रबन्ध, दोनों रूपों में, भरपूर काव्य-सृजन किया है। सन् 1937 में, संध्या-वर्णन'कविता लेखन के साथ शुरू हुई यात्रा में' बनपाखी सुनो'(1956) ,' बोलने दो चीड़ को'(1961) ,' मेरा समर्पित एकांत'(1962) ,' उत्सवा'(1979) ,' तुम मेरा मौन हो' (1982), 'अरण्या'(1985) ,' आखिर समुद्र से तात्पर्य'(1988) ,' पिछले दिनों',' नंगे पैर'(1989) ,' देखना एक दिन'(1992) और' चैत्या'(1993) आदि आपके मुक्तक काव्य-ग्रन्थ हैं।' संशय की एक रात'(1962) ,' महाप्रस्थान'(1964) ,' प्रवाद-पर्व'(1977) ,' शबरी'(1977) ,' प्रार्थना-पुरुष'(1985) और मृत्यूपरान्त प्रकाशित' पुरुष'(2005) उनके प्रबन्धकाव्य / नाट्यकाव्य हैं।' गाँधी कथा',' वाग्देवी',' चैत्य संसार',' आज',' भारतीय श्रमिक 'तथा' हिन्दी कविता: पहचान और परख' आदि आपके संपादित ग्रन्थ हैं।

संक्षेप में, श्रीनरेश मेहता उषा-काव्य के स्मरणीय कवि हैं, शिल्प-प्रधान कविताओं के प्रणेता हैं तथा प्रयोगों की मौलिकता के रचनाकार हैं। उनकी आरम्भिक कविताओं पर ऋग्वैदिक ऋचाओं के आदिम बिम्बों का गहरा प्रभाव है। उनकी प्रेम-संवेदना का आरम्भ नारी-प्रेम की निष्कलुष अनुभूति से होता है और वही धीरे-धीरे व्यापक आयाम और वृहत्तर संवेदना को ग्रहण करता चला जाता है। 'दूसरा सप्तक' में संगृहीत 'समय देवता' को, स्वयं श्रीनरेश मेहता ने, नई कविता की पहली 'लम्बी कविता' कहा है, जिसमें वैदिक प्रतीकों द्वारा वर्तमान जीवन की व्याख्या की गई है। उनकी बिम्ब-प्रस्तुतियों का तो कोई सानी ही नहीं है।

श्रीनरेश मेहता की काव्य-प्रतिभा का सर्वोत्तम निदर्शन उनके प्रबन्धकाव्यों में हुआ है। कवि ने अपनी इन कृतियों में, पौराणिक मिथकों में, समसामयिक अर्थ-सौन्दर्य प्रस्तुत किया है। चार सर्गों में विभाजित 'संशय की एक रात' में, युद्ध को लेकर राम के मन में उठने वाले अन्तर्द्वन्द्वों को केन्द्र में रखकर, 'प्रज्ञा प्रतीक' राम को आधुनिक मानव का प्रतिनिधि बनाकर, युगीन संशयों, वैषम्यों और विसंगतियों से गु़जारते हुए, युगानुरूप नये मूल्यों को खोजने का प्रयास किया गया है। महाभारत पर आधारित तीन सर्गों के 'महाप्रस्थान' में हिमालय की ओर प्रस्थान करते हुए युधिष्ठिर निर्वेद स्थिति में, आत्मसाक्षात्कार की भावभूमि पर, जीवन की अनसुलझी गुत्थियों को विवेकपूर्ण ढंग से व्याख्यायित करते हैं। इस प्रकार, पौराणिक आख्यान के आधार पर इतिहास के विषम परिणामों का विश्लेषण और आधुनिक संदर्भों का संस्पर्श प्रस्तुत काव्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है। पाँच सर्गों में विभाजित 'प्रवाद-पर्व' सीता-परित्याग के प्रसंग पर आधारित है। चूँकि श्रीनरेश मेहता के मन में नवमानव की प्रतिष्ठा का प्रश्न सर्वोपरि है, इसलिए नायक राम और अनाम धोबी के माध्यम से इतिहास, तंत्र, सत्ता, शासक और जनसामान्य के आपसी सम्बन्धों की पुनर्व्याख्या अनिवार्य हो जाती है। फलतः, 'प्रवाद-पर्व' सामान्य जन के गौरव की रक्षा का काव्य, साधारण जन की अभिव्यक्ति-स्वतंत्रता का काव्य, राजा-प्रजा के अधिकारों का अभेदक काव्य और राज्याश्रित इतिहास पर सामान्य जन के प्रति इतिहास की विजय का काव्य सिद्ध होता है। 'शबरी' में कवि की मानवीय दृष्टि ने शबरी के साधारणत्व को असाधारणत्व प्रदान किया है। इसीलिए शबरी अपनी जन्मगत निम्नवर्गीयता को, कर्म-दृष्टि द्वारा, वैचारिक ऊर्ध्वता में परिणत करती है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि पौराणिक आख्यानों के माध्यम से वैष्णवी उदात्त की आराधना-स्थापना, प्रयोगधर्मिता तथा युगीन जटिलताओं एवं समसामयिक संदर्भों के अनुरूप भाषा तथा शिल्प को ढालने की कला ने उनके काव्य को प्रभविष्णुता प्रदान की है।

पद्य-सृजन के ही समान गद्य-सृजन में भी श्रीनरेश मेहता ने भरपूर सफलता पाई है। 'डूबते मस्तूल' (1954) , 'दो एकांत' (1954) , 'धूमकेतु: एक श्रुति' (1962) , 'नदी यशस्वी है' (1967) , 'वह पथबन्धु था' (1967) , 'प्रथम फाल्गुन' (1968) तथा 'उत्तरकथा-1, 2' उनके रोचक-चर्चित उपन्यास हैं। 'तथापि' (1962) , 'एक समर्पित महिला' (1965) और 'जलसाघर' (1987) उनके कहानी-संग्रह हैं। मृत्यूपरान्त इनकी समग्र उपलब्ध कहानियाँ 'प्रतिश्रुति-संग्रह' (2005) के रूप में भी उपलब्ध हैं। 'डूबते मस्तूल' के अन्तर्गत नारी-जीवन की विडम्बनाओं का आत्मकथात्मक शैली में चित्रण किया गया है। 'दो एकांत' दाम्पत्य सम्बन्धों की विसंगतियों को उजागर करता है। 'धूमकेतु: एक श्रुति' तथा 'नदी यशस्वी है' में, आत्मकथात्मक रूप में, व्यक्ति और समाज के सम्बन्धों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण हुआ है। 'प्रथम फाल्गुन' में प्रेम की शाश्वत व्याप्ति रूपायित हुई है। 'वह पथबन्धु था' श्रीनरेश मेहता का सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है, जिसमें शिक्षकीय और लेखकीय जीवन के प्रेम-प्रसंगों का अत्यंत प्रभावशाली निरूपण हुआ है।

जहाँ तक कहानी-सृजन के उद्देश्य का सम्बन्ध है, बकौल श्रीनरेश मेहता, 'मूल प्रश्न यह है कि रचना का पाठकों पर प्रभाव पड़ा है या नहीं, रचना ने उनके निकट सार्थकता ग्रहण की है या नहीं? कहानी यदि लेखक की कलात्मक रचना-प्रक्रिया में से निःसृत हुई है, तो निश्चय ही वह पाठक एवं काल के संदर्भ में सार्थकता प्राप्त करेगी।' इसी अवधारणा के आलोक में रचित मेहता जी की कहानियों में, मुख्य रूप से, जीवन के व्यापक यथार्थ की पहचान-परख को सार्थक अभिव्यक्ति मिली है, जिसमें निष्ठा, गरिमा और मर्यादा का संतुलन उपलब्ध है। निस्संदेह, उनकी कहानियाँ न-केवल अपने समय का प्रतिनिधित्व करती हैं, बल्कि आने वाले समय की निधि बने रहने की क्षमता भी रखती हैं।

दृश्यकाव्य के क्षेत्र में भी श्रीनरेश मेहता का योगदान सराहनीय रहा है। यदि 'सुबह के घण्टे' (1956) , 'खण्डित यात्राएँ (1962) और' रोटी और बेटी'आपके नाटक हैं, तो' सनोबर के फूल 'तथा' पिछली रात की बर्फ'एकांकी-संग्रह हैं। पूर्वदीप्ति शैली में रचित' सुबह के घण्टे 'एक क्रान्तिकारी के जीवन पर आश्रित है, जिससे स्वाधीनता-पूर्व तथा पश्चात् के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य पर अच्छा प्रकाश पड़ा है।' खण्डित यात्राएँ'के अन्तर्गत प्रचलित संस्कारों और बदलते मूल्यों के मध्य रोचक टकराहट देखने को मिलती है। हरिजन-समस्या पर केन्द्रित' रोटी और बेटी'नाटक साक्षी है कि हमारे देश में एक हरिजन राष्ट्रपति तो बन सकता है, परन्तु सबके साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध नहीं रख सकता। मेहता जी के एकांकी-नाटक प्रायः हास्य-व्यंग्यात्मक हैं, जिनमें, आधुनिक भावबोध के परिप्रेक्ष्य में, हमारे जीवन की विसंगतियों-विडंबनाओं को मुखरित किया गया है। इन एकांकियों में बरती गई प्रयोगधर्मिता भी स्पृहणीय है। श्रीनरेश मेहता द्वारा' मुक्तिबोध 'और' अज्ञेय'आदि पर लिखे गये कई संस्मरण भी चर्चित रहे हैं।' काव्य का वैष्णव व्यक्तित्व' (1992) मेहता जी की एक प्रमुख समीक्षात्मक कृति है।

श्रीनरेश मेहता की साहित्य-सृजन विषयक अवधारणा भी एकदम स्पष्ट थी। उनके अनुसार, साहित्य का उद्देश्य है—मनुष्य को रचना। उन्हें यह स्थिति लगातार सालती रही कि मनुष्य को रचा नहीं जा रहा है—बस, देखा-भर जा रहा है। "हम मनुष्य को देखकर उसको केवल-लिख रहे हैं। हमारी उससे कोई सहानुभूति नहीं है। अगर वह ग़लत दिशा में जा रहा है, हमें ऐसा लग भी रहा है, तो भी हम उसे केवल लिख-भर देते हैं। हमने मनुष्य को रचा नहीं, जबकि अटल सत्य यह है कि एक दिन मनुष्य सूर्य बनेगा / क्योंकि वह आकाश में पृथिवी का / और पृथिवी पर आकाश का प्रतिनिधि होगा।"

उपर्युक्त विवेचन-विश्लेषण और तथ्यों-सत्यों के सिंहावलोकन से यह स्पष्ट है कि श्रीनरेश मेहता, प्रथमतः और अन्ततः, मानवीय उदात्तता के पैरोकार-साहित्यकार थे। वेशभूषा से लेकर चिन्तन-मनन-सृजन तक, वे विशुद्ध भारतीय थे। पीड़ित और शोषित व्यक्ति के उत्थान में निरत श्रीनरेश मेहता ने समकालीन संदर्भों, व्यक्ति के अन्तर्द्वन्द्वों, संशयों-कुण्ठाओं, हताशा-निराशा, मानवीय दुर्बलता एवं सामाजिक प्रतिष्ठा को गहराई से चित्रित करते हुए अपनी सारी शक्ति और समूची चेतना मानव-मुक्ति पर केन्द्रित की तथा मनुष्य की अपराजेय शक्ति को अपने पाठकों तक बाखूबी पहुँचाने में भरपूर सफलता प्राप्त की। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि अनुत्सव भी उत्सव है, निराशा भी सबसे बड़ी आशा है। यदि पेरेंटली किसी को लगता है कि यह अनुत्सव का क्षण है, तो उस पर छाई धूल को ज़रा-सा हटाकर देखें—भीतर से स्फटिक-सी चमक दिखाई देगी। जीवन का यह होना ही उत्सव है।

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