आरिफ अली और अरमान जैन की जुगलबंदी / जयप्रकाश चौकसे

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आरिफ अली और अरमान जैन की जुगलबंदी
प्रकाशन तिथि : 09 मई 2014


ईम्तियाज अली के भाई आरिफ की पहली फिल्म 'लेकर हम दीवाना दिल' चार जुलाई को प्रदर्शित होने जा रही है। इसके निर्माता सैफ अली खान हैं और भागीदार इरोज इंटरनेशनल कंपनी है। इसमें राजकपूर की छोटी बेटी रीमा जैन का सुपुत्र 'अरमान' अपनी अभिनय यात्रा शुरू करने जा रहा है। ज्ञातव्य है कि राजकपूर की मृत्यु के बाद उनके मित्र के बेटे मनोज जैन से रीमा का विवाह हुआ। रनवीर कपूर और बेगम करीना के प्रयास से रीमा अपने बेटे की पहली फिल्म के लिए तैयार हुई, क्योंकि पारिवारिक मित्र करण जौहर अपने सहायक निर्देशक अरमान को प्रस्तुत करना चाहते थे और वे आज भी इसको लेकर कुछ खफा से है। आरिफ अपने भाई इम्तियाज अली के साथ जुड़े थे और बड़े भैया का प्रभाव तो पहले जारी किए पोस्टर से ही ज्ञात होता है। अनेक प्रकार के छोटे बैग और गिटार पीठ पर लादे एक युवा मोटर साइकिल पर सवार अनजानी मंजिल की ओर रवाना हुआ। यात्राएं इम्तियाज अली की फिल्मों में महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वह दोहरे स्तर पर होती हैं। बाहरी यात्रा के साथ पात्र के भीतर की यात्रा शामिल होती है और निदा फाजली के शब्दों में कहे तो 'यहां हर शै मुसाफिर है, सफर में जिंदगानी है'।

इस फिल्म की शूटिंग शुरू होने के महीनों पहले अरमान की ट्रेनिंग अलग ढंग से हुई। उसे कुछ दिन अनेक शहरों में अजनबी परिवारों के साथ रहना पड़ा गोयाकि विविध परिवारों के भीतर के वातावरण में स्वयं को समाहित करना पड़ा। इन अनुभवों में अरमान पर्यवेक्षक होते हुए स्वयं भी अजनबियों के राडार पर था और वे उसके बारे में क्या सोचते हैं- यह उस प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा था। ज्ञातव्य है कि सुभाष घई के फिल्म प्रशिक्षण केंद्र 'विसलिंग वुड्स' में ऊंची फीस के कारण अमीरजादे ही दाखिला लेते रहे हैं और उनके विदेश से आए प्राचार्य ने विद्यार्थियों से कहा कि कुछ दिन गरीबों के घर रहकर देखो। झोपड़ पट्टी के जीवन को देखो। सच तो यह है कि इस तरह के तमाम नामी स्कूलों के लिए यह बात महत्वपूर्ण होना चाहिए कि भावी फिल्मकार पहले भारत को समझने का प्रयास करे अर्थात अपने दर्शकों के सपनों, भय और चिंताओं को महसूस करे अन्यथा उसकी फिल्म उसके ह्रदय से निकल कर दर्शक के ह्रदय तक कैसे पहुंचेगी। भारत के तमाम महान फिल्मकार जैसे शांताराम, महबूब खान, विमल राय, गुरुदत्त, राजकपूर इत्यादि लोग अपने देश को भली भांति जानते थे। वे कबीर की तरह अपनी फिल्मों की चदरिया बुनते थे।

साहित्य में एक दौर भोगे हुए यथार्थ को प्रस्तुत करने का था परंतु उस दौर में पाश्चात्य साहित्य से आतंकित कुछ लेखक यूरोप के लेखकों के 'भोगे हुए यथार्थ' को अपने 'भोगे हुए यथार्थ' की तरह प्रस्तुत करते थे। ठीक इसी तर्ज पर आजकल कुछ टैरिंटीनो के प्रभाव में आए फिल्मकार भी कुछ अपरिचित से वातावरण को अपना 'भोगा यथार्थ' बताकर प्रस्तुत कर रहे हैं। भारत में 'बुद्धिजीवी' का तमगा आसानी से लगाया जाता है। उधार की जानकारियों और इंटरनेट की गटर गंगा से प्राप्त सामग्री के आधार पर इंटलैक्चुअल का आयात किया जैकेट पहना जा सकता है। सारा असल ज्ञान और उसे ग्रहण करने की क्षमता देश की मिट्टी से मिलती है, उसकी असल सांस्कृतिक परम्पराओं से मिलती है परंतु इसके नाम पर बेची जा रही संकीर्णता का बाजार आज बहुत गर्म है। ऐसे भी देश के बुद्धिजीवी जीवन संग्राम के सक्रिय सदस्य प्राय: नहीं रहे हैं, वे तो किसी संजय से युद्ध की आंखन देखी सुनकर उसे अपने धृतराष्ट्रीय पूर्वग्रह में संचित होने देते हैं। अत: अरमान जैन जिसकी रगों में कपूर रक्त भी बह रहा है, के लिए यह स्वर्णिम अवसर था कि वह जीवन को नजदीकी से देखे और अपने नाना के संगमरमरी गुंबद से बाहर आकर धूप में तपे। यह आत्मा का ताप ही जीवन के हर क्षेत्र में काम आता है। यही ताप उसके नाना की भी असल पूंजी थी और यही उसे विकी डोनर बनाती है।