आशावादी शाहरुख की नव वर्ष शुभकामना / जयप्रकाश चौकसे

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आशावादी शाहरुख की नव वर्ष शुभकामना
प्रकाशन तिथि : 25 अक्टूबर 2014


शाहरुख खान के अपने निजी विश्वास के अनुरूप उनकी एक सौ साठ करोड़ की लागत से बनी तीन घंटे की फिल्म 'हैप्पी न्यू ईयर' का आखि‍री आधा घंटा छद्म देशप्रेम की भावना से आेत-प्रोत 'विनर्स' है आैर ढाई घंटे तक 'लूजर्स' की एक टीम हीरों की एक डकैती की योजना बनाती है, जिसका अनिवार्य हिस्सा है एक अंतरराष्ट्रीय नृत्य प्रतियोगिता, जिसमें टीम का हिस्सा लेना भी शामिल है। उनकी नृत्य प्रशिक्षक बार डांसर मोहिनी (दीपिका पादुकोण) डकैती की योजना के अनुरूप दुबई छोड़ने से इनकार करती है आैर नृत्य प्रतियोगिता जीतने को भारत की लाज बचाने की तरह लेती है। दीपिका पादुकोण अपनी विगत तीन फिल्मों की तरह इसे भी आधे घंटे में सफल बनाने का काम चपलता से करती है। सारे प्रयास 'मोहिनी' को 'नीलम्मा' (चेन्नई एक्सप्रेस) नहीं बना पाते परंतु यह दौर दीपिका का उसी तरह है जिस तरह से माधुरी दीक्षित की 'तेजाब' के साथ शुरू हुआ था आैर इस फिल्म में उसे 'तेजाब' की नायिका 'मोहिनी' नाम दिया गया है तथा उसके प्रवेश का नृत्य भी तेजाब के 'एक दो तीन' की तर्ज पर गढ़ा गया है।

फराह का सिनेमाई सोच विगत फिल्मों के दृश्यों पात्रों को दोहराना या उनका मखौल उड़ाना होता है आैर इसी शैली के कारण उनके पति कुन्दर आैर भाई साजिद ने अनेक फूहड़ फिल्में रची हैं। यह शाहरुख खान का सितारा ताकत है जो फराह के मखौल उड़ाने की शैली की सेवनहार 'आेम शांति आेम' में भी रही है। बतौर निर्माता शाहरुख खान फराह की बेजान पटकथा को इतना सजाते संवारते हैं कि भव्यता के माध्यम से ही सफलता अर्जित करना चाहते हंै। इतना समृद्ध निर्माता आैर लोकप्रिय छवि वाला सितारा एक सुरुचिपूर्ण ढंग से रची पटकथा पर इतने साधन क्यों नहीं लगाता- यह उनके अपने स्वतंत्र निर्णय आैर रुचि का मामला है जिसमें किसी अन्य के विचार का कोई अर्थ नहीं है।

फराह ने हीरों की चोरी की कथा में तोड़े जा सकने वाली तिजोरी का नाम भी 'शालीमार' रखा है, जो अमेरिका से आए निर्माता कृष्णा शाह की सितारा जड़ित असफल फिल्म का नाम है। इसी तरह वे नृत्य प्रतियोगिता के फाइनल के पहले भी अपने साथियों को प्रेरित करने के लिए 'मोहिनी' वही संवाद बोलती है जो 'चक दे इंडिया' में शाहरुख खान बड़े प्रभावोत्पादक ढंग से अदा किया था। इसी तरह शाहरुख खान भी भंसाली के देवदास में अपने ही बोले संवाद कि "कौन कम्बख्त पीता है" की पैरोडी इस फिल्म में प्रस्तुत की है। फिल्म के प्रारंभ में भी 'दीवार' की तरह 'तेरा बाप चोर है' गूंजता रहता है।

पुरानी फिल्मों को आदरांजली देना एक बात है, उनका मखौल उड़ाना दूसरी बात है आैर पैरोडी प्रस्तुत करना तीसरी बात है। फराह खान को इनके अंतर को समझना चाहिए। उन्होंने 'तीस मार खां' से कुछ सीखा नहीं है। दरअसल शाहरुख खान जैसे समर्थ निर्माता का साथ उन्हें अति विश्वास से भर देता है आैर यह विश्वास का अतिरेक तथा साधनों की विफलता उनके लिए सोने का हिरण है आैर यही मुगालता उन्हें विपुल साधनों के सदुपयोग से दूर ले जाता है।

शाहरुख ने विपुल धन लगाने के साथ ही एक्शन दृश्यों के लिए 'एट पैक' शरीर बनाने पर भी बहुत मेहनत की है। इस तरह के शरीर के लिए परिश्रम, अनुशासन के साथ प्रोटीन एवं अन्य पौष्टिक दवाएं लगती हैं परंतु पटकथा प्रोटीन से सशक्त नहीं बनाई जा सकती। शाहरुख एक गैर फिल्मी मध्यम वर्ग परिवार से आए आैर उन्होंने सफलता अर्जित की। इस व्यक्तिगत सफलता को वे अपनी फिल्म के काल्पनिक पात्रों द्वारा भी पाना चाहते हैं। उनकी व्यक्तिगत जीवन कथा परी कथा की तरह है परंतु अपने फिल्म विचार का आधार भी उन्होंने इसी अजूबे को बनाया है। दरअसल हीरों की चोरी की विदेशी फिल्मों में दार्शनिक स्पर्श यह होता है कि वे हीरे किसी को नहीं मिलते, जैसे 1965 में बनी 'ग्रेन्ड स्लेम' में दिखाया है। सारी खजाने की खोज की फिल्मों में भी यही संदेश होता है कि 'खजाना' एक कल्पना है आैर असली संपदा मनुष्य की प्रतिभा प्रयास से ही बनती है। शाहरुख खान के आशावादी होने का प्रत्यक्ष प्रमाण यह महंगी फिल्म है।