इंग्लैंड / संतोष श्रीवास्तव

Gadya Kosh से
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रात आठ बजे को रात कहना गुस्ताखी होगी क्योंकि सूरज अभी ढला नहीं था। केसल स्ट्रीट से गुज़रते हुए हमने दो गोलाकार पुल पार किये। मेनचेस्टर बेहद खूबसूरत इमारतों, घरों वाला शहर है। सभी मकान बेहद मज़बूत दिखते हैं... ज्यादातर गेरू और भूरे रंग के यकसाँ मकान, मकानों में अंग्रेज़ी स्थापत्य साफ़ झलकता है। अंग्रेज़ों ने लगभग पूरे विश्व में राज किया। उनके स्थापत्य की एक अलग पहचान है जैसे हमारे मुम्बई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनस जो अंग्रेज़ों के समय विक्टोरिया टर्मिनस था और चर्चगेट का इलाक़ा आज भी अंग्रेज़ी राज की कहानी कहता है। मेनचेस्टर में साढ़े छै: बजे शाम से ही बाज़ार बंद हो जाते हैं। रिंग रोड, टाउन हॉल, मोस्ले स्ट्रीट, स्पिंग गार्डन, न्यू मार्केट, किंग स्ट्रीट से गुज़रते हुए मैं देख रही हूँ सत्रहवीं सदी की इमारतें। इतनी खूबसूरत जैसे अभी-अभी बनी हों। सड़कों पर इक्का दुक्का लोग ही... गहरी शांति चारों ओर फैली है। यह शहर सूती कपड़ों और फुटबॉल के लिए प्रसिद्ध है। इसी शहर में है प्रसिद्धफुटबॉल खिलाड़ी डेविड। एरिक ने पार्किंग प्लेस पर थोड़ी देर के लिए कोच रोकी और हम सड़कों पर विचरने लगे। मैं तेज़ी से चलती हर सड़क पर अपनी पदचाप छोड़ने लगी। ठंडी हवा कान और नाक ठंडे किये दे रही थी। सब कुछ बहुत सुहावना, बहुत प्यारा लग रहा था। वे गलियाँ जैसे आमंत्रण-सा देती है... 'आओ हमें देखो, हममें छुपे इतिहास की परतें खोलो... उसमें तुम मुझे भी पाओगी और ख़ुद को भी।' हाँ सच ही है... मैंअंग्रेजों के गुलाम रहे देश की वासी हूँ। इंग्लैंड के इतिहास में भारत भी तो रचा पगा होगा।

रात हो चली थी। हमने 'गेलॉर्ड' रेस्तरां में खाना खाया और 'ब्रिटानिया एटरपोर्ट' होटल की ओर चल दिये जहाँ हमें रात बितानी थी। मुझेलगा मेरी दशा उस पंछी जैसी है जो दिन भर उड़ता है और रात बिताने के लिए जहाँ ठौर मिली, रेनबसेरा कर लेता है। मुझे दूसरी मंज़िल पर कमरा मिला जो कार्ड सिस्टम होने की वज़ह से मुझसे खुल नहीं रहा था। न जाने क्या तकनीक है इसकी ओर अजब इत्तफाक कि इसे खोलने में जब-जब अटकी हूँ, नीग्रो ने ही मदद की है। इस बार भी दरवाज़ा खुलते ही मैंने थैंक्स कहते हुए उसकी ओर देखा। वह मुस्कुरा रहा था। सच है, मुसीबत की कोई भाषा नहीं होती।

4 जून बुधवार, सुबह के नौ बजे हैं। कुछ ही घंटों में लंदन पहुँच जायेंगे। लंदन ने न जाने किन कारणों से मेरे मन में हलचल मचा दी है। एक कारण तो मेरा नया लिखा उपन्यास है 'टेम्स की सरगम'। यह उपन्यास अपने अन्तिम अध्याय तक पहुँच चुका है। इसकी नायिका 'रागिनी रोज़' इंग्लैंड के लंदन शहर में पली बढ़ी, शिक्षा प्राप्त की और फिर भारत के वृंदावन में जाकर बस गई। मैंने केवल अध्ययन के आधार पर लंदन शहर का जैसा वर्णन किया है क्या वह वैसा ही है? मैं लंदन का चप्पा-चप्पा देखने को उत्सुक थी और दूसरा कारण लंदन हिन्दी का गढ़ बन चुका है। लंदन ही क्यों बर्मिंघम, मेनचेस्टर आदि शहरों में हिन्दी के कई लेखक गंभीरता से रचना धर्मिता का पालन कर रहे हैं। आज ब्रिटेन में अंग्रेज़ी के बाद सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिन्दी ही है। यहाँ मेरी मित्र बीना कई सालों से सपरिवार रह रही हैं। मैंने उसे अपने आने की सूचना तथा कार्यक्रम का विस्तार ई-मेल से भेज दिया था। विदेश में कोई अपना मिल जाए तो आनन्द दुगना हो जाता है। तनहाई सताती नहीं।

बर्मिंघूंट और कॅवेंट्री सिटी के बाद कोच लंदन में प्रवेश कर रही है। पहले कॉटेजनुमा मकान ईंटों की टाइल्स लगी दीवारों वाले मिले। खुली-खुली-सी सड़कें... हर मकान के आगे छोटा-सा बगीचा। अजय ने बताया कि–" लंदन सिटी टूर के लिए गाइड हमारा इंतज़ार कर रही है इसलिए पहले उसे पिकअप करेंगे फिर सिटी घूमेंगे और अजय नक़्शा खोलकर बैठ गए। रोड मैप के सहारे ही गाइड तक पहुँचना था लेकिन यह आसान काम न था। कई बार तो हमें उन्हीं सड़कों पर दुबारा गुज़रना पड़ा जिससे गुज़र चुके थे। हॉलवे एरिया, विट्ले रोड, एल्थॉन रोड, हर्न्से रोड, क्राउन हाउस, अल्बर्ट हाउस, लंदन ब्रिज, डॉकलैंड एरिया, टेम्स नदी... मटमैले पानी की जो समंदर जैसी दिखती है, उस पर बना टॉवर ब्रिज, द टॉवर ऑफ लंदन म्यूज़ियम जहाँ राजा-रानी के जेवरात रखे हैं। हमारे भारत का विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी यहीं रखा है। मेरी गर्दन शर्म से झुक गई। कोहिनूर हीरे का लंदन म्यूज़ियम में होना इस बात का सबूत है कि हम अंग्रेजों के गुलाम थे।

टॉवरब्रिजयहाँ का प्रतीक है। जब टेम्स नदी की सागर जैसी लहरों पर बड़े जहाज़ चलते हैं तो यह ब्रिज अपने आप खुलकर उन्हें रास्ता देता है। इस ब्रिज के चार गेट हैं। स्वान लेन, प्रिंसेज़हाउसके बाद एक टनल मिली। जॉइंट व्हील के बड़े-बड़े झूले दूर से ही दिख रहे थे। यह सन 2000 में बनाया गया है। घूमते समय उसके झूले टेम्स जलराशि पर ही रहते हैं। सबसे ऊपर के झूले से पूरा लंदन देखा जा सकता है। वाटर लू ब्रिज, इजिप्शियन कॉलम, टफ़ालगर स्क्वेयर जिस में नेल्सन की मूर्ति है। नेल्सन वाटरलू युद्ध में मारा गया था। एक स्तूप जैसा है जिसके चारों ओर चार काले पत्थर से बने बब्बर शेर हैं। इस पूरे कॉलम को नेल्सन कॉलम कहते हैं। नेल्सन शेर जैसी बहादुरी से लड़ा था इसलिए प्रतीक रूप में शेर बनाये गये हैं। कुछ काली पत्थर की मूर्तियाँ भी हैं। पिकाडिली सर्कस एक मनोरंजन की जगह है। सड़क के बीचोंबीच एक चौक है जहाँ इरॉस की मूर्ति है। इरॉस बहुत ही रोमेंटिक था, इसीलिएपिकाडिलीसर्कस में कई जोड़े रोमांस में डूबे नज़र आ रहे हैं। वहाँबार भी है, पब भी है। जी भर कर ज़िन्दगी के मज़े लूटने के लिए। खुली प्रकृति में, नीले आसमाँ तले। इसमें एक फ़व्वारा भी है। जिसका पानी रोशनी में झिलमिलाता है। कुछ इस तरह जैसे पिघली चाँदी फैल गई हो लहरों पर। रीज़न स्ट्रीट में महँगा बाज़ार है। पत्थर से बनी बादामी रंग की इमारतें, ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट, सेल्फ़ीरेज स्ट्रीट से गुज़रते हुए गाइड को लेने के चक्कर में पूरा लंदन घूमते रहे जो मेरे लिए लाभदायक था। अब मैं लंदन को अच्छी तरह पहचान रही थी। बार-बार उन्हीं गलियों रास्तों से गुज़रते हुए मेरे लिए लंदन अपनी अजनबीयत खो चुका था। मिस हिपी यानी गाइड मुश्किल से मिलीं और जब उन्होंने लंदन की जानकारी देनी शुरू की तो मुझे लगा जैसे लंदन मेरे भारत का ही कोई शहर हो। लंदन की इसी खासियत ने इसे भारत-सा बना दिया है। हर तरफ़ घूमते भारतीय, भारतीय रेस्तरां, भारतीय बाज़ार... और हिन्दी... पूरा का पूरा भारतीय टच।

कोचगुजर रही है मार्बल आर्च, हाइड पार्क, मेपल दरख्तों से सजी सड़कों और पार्क लेन पर। चार सौ साल पहले पार्क लेन में घोड़ों की रेस होती थी। यलो स्टोन हाउस, टुकविलिंगटन हाउस और बंकिघम पैलेस गार्डन जो 40 एकड़ भूमि पर बना है। वेस्टमिनस्टर कैथेड्रल, वेस्टमिनिस्टर सिटी हॉल और वेस्टमिनस्टर ऐबे जिसमें पोएट्स कॉर्नर है। मन में प्रश्न उठा क्या पोएट्स कॉर्नर पर कवियों का जमावड़ा होता है पर मिस हिपी मेरे सवाल का जवाब नहीं दे पाई। बकिंघम पैलेस के लिए कोच से उतरकर मिस हिपी हमें पैदल ही ले गई। लेकिन पैलेस के गेट के अंदर प्रवेश करना मना था। पर्यटकों के लिए अगस्त और सितम्बर मास में साढ़े बारह पौंड की टिकट लेकर गेट खोला जाता है। इन दोनों महीनों में रानी स्कॉटलैंड में आराम करती है। विंसल कासल में पुनर्निर्माण का कार्य चल रहा था। बारह साल पहले इस कासल में आग लग गई थी। कासल के पुनर्निर्माण का ख़र्च बकिंघम पैलेस के प्रवेश शुल्क से पूरा होता है। यानी सरकार नहीं जनता निर्माण करवा रही है कासल को।

मिस हिपी बहुत एहतियात से रास्ता पार कराती है। बकिंघम पैलेस के विशाल परिसर को मैं देख रही हूँ। तीन सौ साल पहले की रानी विक्टोरिया के ज़माने की कहानी। जब ग्लास कोच में रॉयल फ़ेमिली और गोल्ड स्टेट कोच में रानी शान से निकलती थी तफ़रीह के लिए, विशेष इसी के लिए बनाये रॉयल रास्ते से... क्या मंज़र रहता होगा तब। लाला पोशाक में रीछ जैसे बालों वाला स्पेशल हैट लगाए सुरक्षा गार्ड... इस समय रानी एलिजाबेथ द्वितीय है और ये जो सामने ड्यूटी गार्ड परेड कर रहा है यह लगातार दो घंटे तक इसी तरह परेड करता रहता है फिर ड्यूटी बदल जाती है। काले रंग के बड़े-बड़े फाटक जिन के कंगूरे सुनहले हैं। जब पैलेस परिसर से गाड़ियाँ बाहर की ओर जाती हैं तो गेट का डिवाइडर अंदर चला जाता है फिर गाड़ियाँ गुज़र जाने के बाद उठ जाता है। पैलेस के सामने क्वीन विक्टोरिया की मूर्ति वाला फ़व्वारा है। आसपास काली मूर्तियों से घिरा।

क्लॉक टॉवर 123 साल पुराना है। तीन सौ बीस फीट ऊँचा... पार्लियामेंट हाउस में किंग रिचर्ड्स की मूर्ति है। यह भी 159 साल पुरानी इमारत है। अंग्रेज़ राजाओं रानियों के ठाठ बाट लंदन के चप्पे-चप्पे से झाँक रहे हैं। रानी की घुड़साल में उम्दा क़िस्म के घोड़े बंधे होंगे। और यह सब 'लंदन आई' यानी लंदन की आँख से देखा जा सकता है। 'लंदन आई' एक ऐसी जगह है जिस पर बैठकर 26 मील की एरिया तक देखा जा सकता है। लेम्बर्ट ब्रिज, लेम्बर्ट पैलेस, वाटर लू ब्रिज। इतने सारे ब्रिज। टेन डाउनिंग स्ट्रीट में टोनी ब्लेयर का ऑफिस है। वहीँ है 'हर मैजिस्ट्रेट थियेटर' , किंग जॉर्ज द्वितीय की मूर्ति और सेंट पीटर्स फाउंटेन। फाउंटेन के आसपास ढेरों कबूतर दाना चुग रहे थे। तभी बस में बैठे लोगों की नज़र क्रिकेट खिलाड़ी आशीष नेहरा पर पड़ी। सभी उसे पुकारने लगे। वह भी हमें देख ख़ूब खुश होकर हाथ हिलाता रहा। मैं चौंक पड़ी जब मैंने एक खूबसूरत इमारत पर देवनागरी लिपि में 'हिन्दी भवन' लिखा देखा। हिन्दी भवन के कार्यों की जानकारी तो पहले से थी, आज सामने देख अच्छा लगा। वहीँ है हाईकोर्ट, द रॉयल कोर्ट ऑफ जस्टिस, बीचों बीच ड्रैगन पक्षी बना है। सड़क के बीच में भी ड्रैगन की मूर्ति है। जिसके दो काले पंख हैं। ये मूर्ति पहचान है कि अब यहाँसे पुराना लंदन शुरू होता है।

पुराना लंदन... तीन सौ साल पहले बनी इमारतें। सेंट पॉल चर्च, रोमन केथोलिक चर्च, क्वीन एलिजाबेथ प्रथम की कंधों तक मूर्ति, मिलेनियम ब्रिज, केनन स्ट्रीट, मेंशन हाउस, 505 साल पुराना टेम्स टॉवर ब्रिज, टेम्स पर पुल बहुत हैं। न्यू लंदन ब्रिज, ओल्ड लंदन ब्रिज, सिटी हॉल सारा लंदन घूमकर हम मस्ती नामक रेस्तरां में डिनर के लिए आये। उसके बाद तो और भी मज़ा तब आया जब होटल हिल्टन डॉकलैंड्स का रास्ता एरिक फिर भूल गया और फिर रास्तों में भटकाव शुरू हुआ। अरे, ये भटकाव मेरे मन को ज़रा भी पीड़ा नहीं पहुँचा रहा है। अब मैं लंदन के गली कूचों को पहचान गई हूँ। और मेरी आँखों के सामने खुल रहे हैं वे पृष्ठ जो मैंने अपने उपन्यास में लिखे हैं। ताज्जुब है, इतनाहू बहू कैसे? क्या मैं लंदन का भूगोल पढ़ते-पढ़ते इस शहर में समा गई थी? या किसी तीसरी शक्ति ने लिखवाया था मुझसे?

होटल के कमरे भी भूल भुलैया वाले थे। मुझेपाँचवीं मंज़िल का कमरा मिला था तो मुझे पाँचवे नम्बर की ही लिफ्ट लेनी थी। एक लम्बा गलियारा पार करके लिफ्ट थी। कमरा खुल नहीं रहा था, वही कार्ड सिस्टम। अनिलने भी मदद की पर उससे भी नहीं खुला कमरा। रिसेप्शन से एक आदमी को बुलाया तब जाकर कमरा खुला। कमरा बहुत बड़ा और खुला-खुला-सा था। सामने ही टेम्स नदी बह रही थी। ठंडी हवा का झौंकातन बदन कंपा गया। फ्रेश होकर-थककर चूर बिस्तर में दुबकी ही थी कि फ़ोन की घंटी बजी। सोचा शरारती अनिल होगा। रिसीवर उठाते ही मैंने कहा। "सो जाओ, सुबह मिलेंगे।"

"संतोष मैं..."

"अरे तुम कब आ रही हो बीना?" अपनी लंदनवासी दोस्त को फ़ोन पर पा मैं ख़ुशी से भर उठी।

"थकी हो न चलो, बाद में फ़ोन करेंगे।" कहते हुए बीना ने फ़ोन काट दिया। घंटी फिर बजी पर फ़ोन की नहीं दरवाजे की। दरवाज़ा खोलते ही बीना अपने पति सहित सामने। हम तीनों एक साथ लिफ्ट गए। बहुत अच्छा लगा। घंटे भर तक ढेर सारी बातें होती रहीं। बिदा के समय मैंने अपनी किताबें उन्हें भेंट कीं जो मैं मुम्बई से उन्हीं के लिए लाई थी। बीना ने बताया कि "चूँकि तुम तीन दिन लंदन में हो तो एक गोष्ठी हो सकती थी पर लंदन के सभी लेखक सूरीनाम गये हैं विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने। कल मौका मिला तो मैं तुम्हें घर ले जाऊँगी।" तय हुआ कि जिस जगह मैं घूमने से फ्री हो जाऊँ उन्हें उसी जगह से फ़ोन कर दूँ। बीना के घर मैं भी जाना चाहती थी। लिहाज़ा इसी वादे पर उन्होंने विदा ली।

सुबह नाश्ते के लिए जब मैं लिफ्ट से नीचे उतरी तो जिसे रात को गलियारा समझ रही थी वह टेम्स पर बनाया गया लकड़ी का पुल था जिसने दो भागों में बँटे होटल को जोड़ा था। आधे घंटे के सफ़र के बाद हम 'मदाम तुसाद संग्रहालय' पहुँच गये जो बेकर स्ट्रीट में स्थित है। इस संग्रहालय की स्थापना सन 1935 में मदाम (श्रीमती) तुसाद ने की थी जो फ्रांसीसी कलाकार थी और मोम के पुतले बनाया करती थी। इस संग्रहालय में विश्व के वर्तमान और अतीत के नेताओं, राजघरानों, खिलाड़ियों, मीडिया कलाकारों, लेखकों, मूर्तिकारों, चित्रकारों, गायकों, अभिनेताओं आदि के आदमकद पुतले हैं जो एकदम सजीव दिखाई देते हैं। मैं नेल्सन मंडेला, दलाईलामा और महात्मा गाँधी के पुतलों के सामने देर तक खड़ी रही। लोग फ़िल्मी कलाकारों के पुतलों के संग फोटो खिंचवा रहे थे। खासकर अमिताभ बच्चन के हाथ में हाथ डालकर। तीसरी मंज़िल पर सारे पुतले अपनी विशेष मुद्राओं में ऐसे लग रहे थे जैसे किसी पार्टी में इकट्ठा हुए हों, इंग्लैंड की रानी का पूरा अतिथि कक्ष सजा था। सोफों पर शाही ख़ानदान के पुतले बैठे थे। रानी कीमती सिंहासन पर... ऐसा लग रहा था जैसे हम रानी के मेहमान हों। प्रिंसेज़ डायना का पुतला इतना मोहक था जैसव मोम से बने चेहरे से भी उसका रूप छिटका पड़ रहा था। 'चैम्बर ऑफ हॉरर' में फ्रांसीसी क्रांति में मारे गये प्रसिद्ध व्यक्तियों के पुतले हैं। उनकी चीख-पुकार, मृत्यु का अमानवीय तरीका, खून, रोना, कलपना जैसे हम युद्ध के मैदान में ही पहुँच गये हों। उफ़ कितना खौफ़नाक होता है युद्ध... ज़मीन और समृद्धि यदि मरने के बाद आत्मा के साथ जाती तो शायद शब्दकोश में शांति शब्द होता ही नहीं। उससे भी खौफ़नाक एक गुफ़ा थी जहाँ की परेश टिकट दो पौंड थी। टिकट लेते समय ही हमें डरा दिया गया था कि कमज़ोर दिल वाले गुफ़ा में न जाएँ। बहरहाल जहाँ जाना मना हो या जिज्ञासा भरा हो वहाँ जाने का मन तो करता ही है। गुफ़ा में प्रवेश के साथ ही अजीबो ग़रीब आवाजें... हुँकारें... डरावनी रोशनियाँ कलेजा कँपा रही थी। कौनकहाँ से वार कर दे। जीवित व्यक्तियों का शो है वहाँ। सब कुछ भयभीत कर देने वाला था। गुफ़ा से निकलकर हम एक ऐसी टैक्सी में आ बैठे जिसके पहिए नहीं थे और जो ख़ुद नहीं चलती बल्कि रास्ता चलता है। टैक्सी में मैं अकेली ही बैठी क्योंकि केवल दो ही व्यक्ति बैठ सकते थे और हमारी साथी पर्यटक अपने-अपने जोड़े में थे। रास्ता मुझे ले चला एक ऐसा अद्वितीय मंज़र दिखाने जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी। इंग्लैंडका चार सौ साल पुराना इतिहास मोम के पुतलों झाँकियों के रूप में मेरे सामने मौजूद था। राज घराने से लेकर आम जनता तक का जीवन जीवन्त हो उठा था। मुझे लगा जैसे मैं चार सौ साल पुराने इंग्लैंड में घूम रही हूँ। एक-एक झाँकी बड़ी बारीकी से उकेरी, गढ़ी गई थी। सिगरेट का कश खींचते पुतले के गाल पर पड़ी सलवटें और मुँह से निकला धुआँ कलाकार की कला का बेजोड़ नमूना था।

टैक्सी ने जहाँ उतारा वहाँ कुछ सोविनियरशॉप, स्टूडियो वगैरह थे। रिसेप्शन पर भी एक पुतला खड़ा था। सामने कम्प्यूटर पर हमारी टैक्सी में बैठी तस्वीरें आतीं रहीं। सात पौंड की एक तस्वीर थी जिसे खरीदने के लिए हम रिसेप्शनिस्ट का इंतज़ार करते रहे। अनिल ने बेसब्र होकर कहा–"कब तक इंतज़ार करें, चलो चलते हैं।" कि तभी पुतले ने अनिल का हाथ पकड़ लिया। हम जिसे पुतला समझ रहे थे वही तो रिसेप्शनिस्ट था जो हमें हँसाने के लिए पुतले की तरह खड़ा था।

इसके बाद सबको ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट पर लाकर छोड़ दिया गया शॉपिंग के लिए। वैसे शॉपिंग रीजेंट स्ट्रीट, बॉन्ड स्ट्रीट में भी की जा सकती थी। मुझे तो शॉपिंग में कोई रूचि नहीं है लेकिन फिर भी मैं दुकानों में साथी पर्यटकों के साथ घूमती रही। फुटपाथ पर कुछ जवान लड़कियाँ ट्रे में कोल्ड कॉफी के कप लिए खड़ी थीं। मुझेजबरदस्ती एक कप चखने के लिएथमा दिया। पताचलाकोई कंपनी है जो कोल्ड कॉफी के अपने नये फ़्लेवर का विज्ञापन कर रही थी। कॉफीस्वादिष्ट थी। एक कॉस्मेटिक की बड़ी-सी शॉप में जब कुछ औरतें लिप्स्टिक वगैरह देख रही थीं, एक लड़की मेरा हाथ पकड़कर ले गई और शीशे के सामने बैठाकर बोली–"हम फ्री ऑफ़ चार्ज आपका फ़ेशियल करेंगे, इस कॉस्मेटिक किट की खरीदी पर।" अरे बाबा, न फ़ेशियल कराना है, न किट खरीदना है। क्यों पीछे पड़ी है ये? बहरहाल ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट से अजीबोगरीब अनुभव ले हम निर्धारित समय पर लौट आये पर बस नदारद थी। पता चला बस का शीशा किसी दूसरी गाड़ी ने तोड़ दिया है इसलिए बस पुलिस स्टेशन गई है। हमें स्वामी नारायण मंदिर जाना था और दिन ढल रहा था और कोई साधन भी तो नहीं था। सामने टेलीफोन-बूथ से मैंने बीना के यहाँ फ़ोन लगाकर स्थितिबतादेनीचाहीपर उसके बेटे ने फ़ोन उठाया। मैसेज छोड़कर मैं फुटपाथ पर खड़े अपने ग्रुप के पास आ गई। ठंडी हवा ने हमें कँपाना शुरू कर दिया था। स्वेटर पहने हुए भी ठंड लग रही थी। साथीपर्यटक इधर उधर बैठने की जगह तलाश रहे थे। मैं अजय से कहकर दूर तक टहल आई। बड़ी बेरौनक और ठंडी सड़क थी। लोगों की आवाजाही न के बराबर थी। दो लड़कियाँ अखरोट चुभलाती मेरे पीछे चल रही थीं। मुझे देखकर मुस्कुराईं। जवाब में मेरे भी मुस्कुराने पर वे मेरे सामने आ खड़ी हुईं। 'इंडिया? अमिताभ बच्चन' और हँसते हुए गाने लगीं–अरे, मेरे अंगने में टुमारा क्या काम है? " मैं रोमांचित हो उठी। हिन्दी फ़िल्मों का क्रेज़ तो लगभग पूरे विश्व में है पर भारतीयों को देखकर इस तरह अपना हिन्दी प्रेम दिखाना मेरे लिए रोमांच से कम न था। वे मुझे पार्किंग प्लेस तक छोड़ने भी आईं और एरिक के स्वामी नारायण मंदिर का रास्ता पूछने पर अनभिज्ञता प्रगट करती हुई चली गईं। लेकिन आज का दिन ही बेकार था। एक तो कोच ने ढाई घंटे इंतज़ार कराया था और अब दो घंटे से मंदिर की तलाश में हम भटक रहे थे। एरिक का दिमाग़ भी भन्नाता जा रहा था। एक तो शीशा टूट गया था। ऊपर से भटकना, रास्ते का न मिलना। आज हमारे साथ का उसका आखिरी दिन था। जब हम बिना मंदिर देखे ही 'मस्ती' रेस्तरां से डिनर के बाद होटल जाने के लिए बस की ओर आए तो देखा उसने बस साफ़ करके कचरा बस के दोनों दरवाज़ों पर डाल दिया था। इतने दिन के साथ का इतना बुरा अन्त। सभी का मन एरिक के प्रति खिन्नता से भर गया। माना कि साथी पर्यटकों ने सफ़र के दौरान नमकीन, चॉकलेट वगैरह खाकर पैकेट इधर उधर दबा दिए थे जो उनकी भारतीय आदत में शामिल था जबकि बताया गया था कि जहाँ भी बस रुके सारा कचरा डस्टबिन में डाला जाए। लिहाज़ा कुछ लोगों ने नाराजीवशउसे टिप नहीं दी।

छै: जून। आज यूरोप यात्रा का अंतिम दिन है। रात को मुम्बई के लिए फ़्लाइट लेनी है। सुबह-सुबह ही पैकिंग कर डाली। तैयार होकर नाश्ते के लिए जब डाइनिंग रूम मेंआई तो अजय ने बताया–" एक लोकल बस अरेंज की है जो हमें स्वामी नारायण मंदिर घुमाते हुए एयरपोर्ट छोड़ देगी। हम यहाँ से 3.30 बजे रवाना होंगे। तब तक आप लोगों को जहाँ भी घूमना हो घूम आईये। सभी अपने-अपने परिवार के साथ घूमने का कार्यक्रम तय करने लगे। सरदारजी को गुरुद्वारा देखना था। आगरे से आए परिवार को अभी और शॉपिंग करनी थी। कोई ट्रेन में सफ़र करना चाहता था। मेरा मन था कि बीना आ जाए तो मैं उसके घर हो आऊँ। पर उसका कोई संदेशा नहीं मिल रहा था। मेरे पास सौ डॉलर का नोट था। फ़ोन के लिए सिक्के बचे ही नहीं। मैं भी फ़ोन नहीं कर पा रही थी। लंच तो मिलना नहीं था इसलिए डाइनिंग रूम से थोड़े से फल ले लिए। यूँ ही भटकती रही होटल के कंपाउंड में। पर मन नहीं लगा। कमरे में लौटकर टी. वी. चलाया पर कुछ ख़ास नहीं लगा। थोड़ी देर लेटी रही। महसूस हुआ मेरा भी परिवार साथ होता तो घूमती। यह भी सोचती रही कि पच्चीस दिनों की लम्बी यात्रा मैंने अकेले कैसे कर डाली? सोचकर रोमांच हो आया। इतने सारे देशों में लगातार पच्चीस दिन अजनबी चेहरों के बीच गुज़ारना... लेकिन शायद मुसाफ़िरी इसी को कहते हैं। सोचते हुए मैं बाल्कनी में आ गई। सामने टेम्स की हल्के कंपन से भरी लहरों पर दूर तक क्रूज़ चल रहा था। सुना है लंदन के दक्षिणी भाग में रॉयल बॉटेनिकल गार्डन है जो 132 हैक्टेयर भूमि पर फैला किऊ गार्डन नाम से मशहूर है। वैज्ञानिकों के शोध के लिए वनस्पति की ढेरों प्रजातियाँ हैं। किऊ गार्डन देखने की चाह अधूरी रह गई। और भी बहुत कुछ है यहाँ जो मैं नहीं देख पाई। बीना ने भी मेरे यहाँ आने को कोई तवज्जो नहीं दी। शायद इसी तरह टूट जाते हैं रिश्ते।

चार बजे लोकल बस आई। सामान बस में चढ़ाया गया। अजय रिसेप्शन पर आखिरी फार्मेलिटी पूरी कर रहे थे। थकानऔर ऊब भरा लंदन का यह दिन हमेशामेरी यादों में कील की तरहगड़ा रहेगा।

स्वामी नारायण मंदिर वास्तु शिल्प के आधार पर बनाया गया यू.के. का सबसे बड़ा मंदिर है। इसके निर्माण में 2820 टन बल्गेरियन मार्बल, 2000 टन इटैलियन करारा मार्बल शिप से भारत भेजा गया। स्वामी नारायण ट्रस्ट ने पूरा ख़र्च उठाया। भारत में 1500 कारीगरों ने 2600 पीसेज़ बनाकर शिप से लंदन भेजे। वे ख़ुद भी लंदन आये, इन पीसेज़ को जोड़कर मंदिर बनाने के लिए। इस काम में तीन साल लगे और जब मंदिर बनकर तैयार हुआ तो उसकी भव्यता देखते ही बनती थी। मंदिर बने अभी केवल सात साल हुए हैं यानी 1996 में बना है। मंदिर के अंदर कैमरा, चमड़ेकी कोई भी वस्तु ले जाना मना है। सिक्यूरिटी से गुज़रकर बाईं ओर पुरुषों के लिए और दाहिनी ओर औरतों के लिए जूते उतारने के रैक हैं। नीलेगलीचों पर चलते हुए मैंसीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर मंदिर में आई। सीता राम, राधा कृष्ण, गौरा शिव, हनुमान और घनश्यामजी की मूर्तियाँ हैं। फ़र्श पर सफ़ेद लाल फूलों वाला कालीन बिछा था जिस पर बैठकर लोग प्रार्थनाएँ कर रहे थे। भव्य सीलिंग पर कृष्ण लीलाएँ उकेरी गई थीं। पाँच-पाँच मेहराबों से घिरे इस मंदिर को देखना... खासकर लंदन में एक आश्चर्यजनक ख़ुशी दे गया। मंदिर के प्रांगण से बाहर निकलते ही सामने भारतीय व्यंजनों से भरे स्टॉल लगे थे। समोसे, पकौड़े, चाय आदि। सभी पर्यटक समोसे और चाय पर टूट पड़े। इधर एयरपोर्ट पहुँचने की जल्दी थी और लोकल बस में खाना पीना मना था। लोगों को आधा खाया चाय नाश्ता फेंकना पड़ा।

चल लौट मुसाफिर देस अपने...

लंदन को विदा कहने का समय आ गया था। हिथ्रो एयरपोर्ट की ओर बस तेज़ी से भाग रही थी। मैं अपनी आँखों में भर लेना चाहती थी लंदन की हरियाली, लाल टाइल्स वाले दुमंजिले मकान, कैप्स्यूलनुमा बिल्डिंगें, नया बसा लंदन साथ ही दिल में बीना की बेरुखी... मेरे साथ ज़िन्दगी ने हमेशा छल किया। यहाँ भी कर गई।

"संतोषजी वह शॉपिंग सेंटर देख रही हैं। यहाँरॉयलफ़ेमिली शॉपिंग के लिए आती है। यहीं लेडी डायना का निवास स्थान है।" अजय ने खिड़की से बाहर देखते हुए बतायौर मेरी नज़रों के सामने से गुज़र रहे थे कई महत्त्वपूर्ण स्थान, विक्टोरिया अल्बर्ट आर्ट म्यूज़ियम, नेचरल हिस्ट्री म्यूज़ियम, क्रॉमवेल रोड। यह रोड इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ कई घर होटल में तब्दील कर दिये गये हैं। इनमें विद्यार्थी रहते हैं। विद्यार्थियोंको ध्यान में रखकर ही होटल बनाए गये हैं। यहाँ क्रॉमवेल हॉस्पिटल भी है। किंग क्रॉस रोड के बाद ब्रॉडवे शॉपिंग सेंटर आया और फिर बी.बी.सी. रेडियो टी.वी. सेंटर, बी.बी.सी. वर्ल्ड वाइड। कितना कुछ है एयरपोर्ट मार्ग पर। एयरपोर्ट में दाखिल होते ही एक लम्बी थकान ने घेर लिया। यह थकान थी 25 दिन की यूरोप यात्रा की, यह थकान थी अकेलेपन की और यह थकान थी उस सपने के पूरे होने की जो मैंने दस साल पहले देखा था। ख़्वाब को हक़ीक़त में बदला देख मन बल्लियों उछलना था पर इस रूप में नहीं। हेमंत के बिना तो हरगिज़ नहीं।