उनींदी / अन्तोन चेख़व / अनिल जनविजय

Gadya Kosh से
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रात का समय है। एक कमरे में तेरह वर्ष की एक नन्हीं लड़की वारिका एक पालने को हिला रही है और बहुत ही धीमी आवाज़ में गुनगुना रही है —

’आजा री निन्दिया... आजा... मेरे मुन्ने को आकर... सुला जा...’

उस कमरे के कोने में एक देवचित्र लगा है, जिसके सामने एक छोटा-सा हरा लैम्प जल रहा है। कमरे के एक कोने से दूसरे कोने तक एक रस्सी बँधी हुई है, जिसपर बच्चे के पोतड़े और एक बड़ा-सा काला पाजामा लटका हुआ है। छत पर लैम्प की रोशनी का हरा-सा बड़ा चकत्ता झलक रहा है। रस्सी पर लटके पोतड़ों और पाजामे की लम्बी-लम्बी परछाइयाँ कमरे में बने आतिशदान पर, पालने पर और वारिका पर पड़ रही हैं। जब अचानक लैम्प की लौ फड़फड़ाने लगती है, तो छत पर दिखाई देने वाला हरा चकत्ता और कपड़ों की परछाइयाँ भी इस तरह से हिलने-डुलने लगती हैं, मानो तेज़ हवा चल रही हो और वे हवा से हिल रही हों। कमरे में बेहद घुटन है और गोभी के शोरबे व नए जूतों की वैसी ही गन्ध भरी हुई है, जैसी गन्ध जूतों की दुकान में आती है।

बच्चा रो रहा है। उसकी आवाज़ फटी हुई है, मानो वह रोते-रोते थक चुका हो। बच्चा सचमुच बेहाल हो गया है, लेकिन फिर भी लगातार रो रहा है। पता नहीं, वह कब चुप होगा। वारिका की पलकों में नींद भरी हुई है। वह बार-बार अपनी आँखों को खोलने की कोशिश करती है, लेकिन उसकी पलकें फिर से मुन्द जाती हैं। उसका सिर नीचे की तरफ़ लटक जाता है। उसकी गर्दन में दर्द होने लगा है। उसका चेहरा सूखकर काठ हो गया है। वह न अपने होंठ हिला पाती है और न ही अपनी पलकें। किसी कील के सिर की तरह उसका सिर भी जैसे ठस हो गया है।

नींद में ही वह गुनगुना रही है — ’आजा री निन्दिया ... आजा ... , मैं तेरे लिए हलुआ पकाऊँ ...’

आतिशदान में एक झींगुर झनकार रहा है। बगल वाले कमरे में घर के मालिक और उसके यहाँ रहकर काम सीखने वाले अफ़ानासी के खर्राटे सुनाई दे रहे हैं। पालना ऐसे चरमरा रहा है, मानो शिकायत कर रहा हो। वारिका घुरघुराने लगती है। यह सब देखकर ऐसा लग रहा है कि रात ने अपनी वह लोरी गानी शुरू कर दी है, जिसके असर में दुनिया के प्राणियों को बिस्तर में लेटने के बाद नींद आ जाती है। लेकिन वारिका के मन में लोरी की यह धुन चिड़चिड़ाहट पैदा कर रही है क्योंकि उसे सुनकर उसे नींद आने लगती है। जबकि वारिका को सोना नहीं है। ईश्वर न करे, अगर वारिका को नींद आ जाएगी और उसके मालिक-मालकिन उसे सोते हुए देख लेंगे तो उसकी ज़ोरदार पिटाई करेंगे।

अचानक लैम्प की लौ फड़फड़ाने लगती है। छत पर दिखाई देने वाला हरा चकत्ता भी हिलने-डुलने लगता है। कपड़ों की परछाइयाँ वारिका की अधखुली आँखों पर नाचने लगती हैं। उसके उनींदे दिमाग में तरह-तरह के रहस्यमय सपने झलकने लगते हैं। उसे आसमान में काले बादल दौड़ते दिखाई देने लगते हैं। ये बादल बच्चों की तरह चीख़ रहे हैं और एक-दूसरे का पीछा कर रहे हैं। तभी हवा चलने लगती है और बादल ग़ायब हो जाते हैं। सपना बदल जाता है। अब वह एक ख़ूब चौड़ी और लम्बी सड़क को देख रही है, जिस पर कीचड़ पड़ी हुई है। बहुत-सी घोड़ागाड़ियाँ और बग्घियाँ सड़क पर आ-जा रही हैं। लोगों की भीड़ अपनी पीठ पर थैले और गठरियाँ लादे एक रेले की शक़्ल में बढ़ती जा रही है। चारों तरफ़ धुन्ध फैली हुई है। लोग छायाओं की तरह लग रहे हैं। सड़क के दोनों तरफ़ घना जंगल है। एकाएक मनुष्यों की ये छायाएँ, वह सारी भीड़ अपने थैलों और गठरियों के साथ सड़क पर पड़ी कीचड़ में गिरने और फिसलने लगती है। वारिका उनसे पूछती है — ’आप यह क्या कर रहे हैं?’ वे कहते हैं — ’ सोने के लिए, सोने के लिए लेट रहे हैं !’ ये कहकर वे गहरी मीठी नींद में सो जाते हैं। सड़क के दोनों ओर लगे बिजली और टेलिफ़ोन के तारों पर बैठे कौए और नीलकण्ठ बच्चों की तरह चीख़ और चिल्ला रहे हैं और सोने वाले लोगों को जगाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

वारिका फिर बुदबुदाने लगती है — ’आजा री निन्दिया ... आजा ... , गीत गाकर मुन्ने को ... सुला जा।’ अब वह दूसरा ही सपना देख रही है। वह एक अन्धेरी और बन्द कोठरी में है।

उसका स्वर्गवासी हो चुका पिता येफ़िम स्तिपानफ़ कोठरी के फ़र्श पर पड़ा हुआ है और इधर से उधर लुढ़क रहा है। लेकिन वह उसे दिखाई नहीं दे रहा। वह तो बस, उसकी आवाज़ें सुन रही है। उसे पिता की कराहें और आहें सुनाई दे रही हैं। उसकी करवटों की आहटें भी उसके कानों में पड़ रही हैं। पिता ने उसे बताया था कि उसके पेट में बना फोड़ा फट गया है। उसके पेट में तभी से भयानक दर्द है। दर्द इतना ज़्यादा है कि वह एक शब्द भी नहीं बोल पाता, सिर्फ़ गहरी-गहरी साँसें लेता है और इस तरह अपने दाँत किटकिटाता है. मानो कहीं दूर पर कोई तबला बज रहा हो।

किट-किट-किट-किट

उसकी माँ पिलागेया, दौड़ी-दौड़ी मालिक के घर चली गई है ताकि उन्हें यह बता सके कि येफ़िम मर रहा है। माँ को गए बहुत देर हो चुकी है। अब तक उसे लौट आना चाहिए था। वारिका अँगीठी के पास लेटी हुई है और अपनी माँ का इन्तज़ार कर रही है। पिता के दाँतों के बजने की आवाज़ उसे साफ़-साफ़ सुनाई दे रही है। तभी उनके झोंपड़े के पास एक घोड़ागाड़ी आकर रुकती है। शायद यह वह नौजवान डॉक्टर है, जो इन दिनों मालिक का मेहमान है और एक मरीज़ के इलाज के सिलसिले में शहर से यहाँ आया हुआ है। डॉक्टर झोपड़ी का दरवाज़ा खोलकर अन्दर घुसता है। लेकिन झोंपड़ी में गहरा अन्धेरा छाया हुआ है। हाथ को हाथ सुझाई नहीं पड़ता, पर डॉक्टर के खाँसने और दरवाज़े के खड़खड़ाने की आवाज़ सुनाई दे रही है।

— मोमबत्ती जलाओ — डॉक्टर कहता है।

— बू... बू... बू... येफ़िम कुछ कहने की कोशिश करता है।

पिलागेया दौड़कर अँगीठी के पास जाती है और वहाँ एक आले में रखी हुई टूटी हुई दियासलाई ढूँढ़ने की कोशिश करती है। एक मिनट तक कोठरी में ख़ामोशी रहती है। तब तक डॉक्टर टटोलकर अपनी दियासलाई निकाल लेता है और एक तीली जलाता है।

— एक मिनट, साहब ! बस, एक मिनट रुकिए ... — पिलागेया कहती है और जल्दी से झोंपड़ी के बाहर निकल जाती है। इसके फ़ौरन बाद वह मोमबत्ती का एक टुकड़ा लिए हुए वापिस लौटती है।

येफ़िम के गाल लाल हैं और उसकी आँखें अन्धेरे में भी चमक रही हैं। उसकी आँखों में ऐसी चमक है, मानो वह उस डॉक्टर को पहचान गया हो। उसकी निगाहें ऐसे ताक रही थीं जैसे डॉक्टर के पार, झोंपड़ी की दीवार के पार उसने कोई रहस्यमय चीज़ देख ली हो।

— क्या हुआ? क्या हुआ तुम्हें? — डॉक्टर ने येफ़िम के ऊपर झुकते हुए कहा — ओह ... क्या बहुत तकलीफ़ हो रही है ... बहुत दिनों से बीमार हो क्या ...?

— क्या कहूँ ...? मर रहा हूँ, सरकार ! मेरा वक़्त पास आ गया है ... अब तो मरकर ही चैन आएगा...।

— अरे ... बेवकूफ़ी भरी बातें मत करो ... हम तुम्हें अच्छा कर देंगे !

— जैसी आपकी मरज़ी, सरकार ! हम आपके एहसानमन्द होंगे ... वैसे हमें मालूम है ... जब मौत आती है ... तो बस, आ जाती है ...।

डॉक्टर पन्द्रह मिनट तक येफ़िम की जाँच-पड़ताल करता है और सीधा खड़ा हो जाता है ... फिर कुछ देर रुककर वह कहता है — अब मैं कुछ नहीं कर सकता। तुम्हें अस्पताल जाना होगा। वहाँ डॉक्टर तुम्हारा ऑपरेशन करेंगे। अभी ... तुरन्त चले जाओ। पहले ही काफ़ी देर हो चुकी है ... घबराओ नहीं ... अभी ... एकदम अभी ... अस्पताल चले जाओ। वहाँ डॉक्टर होंगे, जो तुम्हारा ऑपरेशन कर देंगे ... मैं तुम्हें एक चिट्ठी लिख दूँगा ... । सुन रहे हो?

— मेहरबानी, सरकार ! लेकिन कैसे लेकर जाएँगे? हमारे पास कोई सवारी नहीं है... — पिलागेया ने कहा।

— कोई बात नहीं। मैं अभी तुम्हारे मालिक से कह दूँगा। वे एक घोड़ा भिजवा देंगे।

यह कहकर डॉक्टर चला गया। पिलागेया ने मोमबत्ती बुझा दी। येफ़िम फिर दाँत किटकिटाने लगा। क़रीब आधे घण्टे बाद झोंपड़ी के पास एक ताँगा पहुँचने की आवाज़ सुनाई दी। यह ताँगा येफ़िम को अस्पताल ले जाने के लिए आया है। येफ़िम तैयार होता है और ताँगेवाले के साथ चला जाता है ...।

अब सुबह हो चुकी है। पिलागेया घर पर नहीं है। वह येफ़िम को देखने अस्पताल चली गई है। कहीं एक बच्चा रो रहा है। और वारिका को अपनी ही आवाज़ में एक गीत सुनाई पड़ रहा है —

’आजा री निन्दिया... आजा... मेरे मुन्ने को आकर... सुला जा...’

पिलागेया वापिस लौट आई है। वह बार-बार अपने सीने पर सलीब का निशान बना रही है और ख़ुद-ब-ख़ुद बुदबदा रही है—

रात को तो सब ठीक-ठाक था। उन्होंने उसे अच्छा कर दिया था ... मगर सुबह ... सुबह उसकी आत्मा परमात्मा के पास चली गई ... ईश्वर उसकी आत्मा को शान्ति दे ... डॉक्टरों ने बताया कि वह बहुत देर से अस्पताल पहुँचा था ... उसे बहुत पहले ही वहाँ आ जाना चाहिए था...।

वारिका यह सुनकर झोपड़ी से बाहर चली जाती है और रोने लगती है। मगर तभी कोई उसके सिर पर इतनी ज़ोर से चोट करता है कि उसका सिर सामने खड़े बिर्योजा (भोजपत्र) के पेड़ से टकरा जाता है। उसकी आँख खुल जाती है। सपना टूट जाता है। वह आँखें ऊपर उठाती है और अपने सामने अपने मालिक मोची को खड़ा पाती है।

— क्या कर रही है, झबरीली फूहड़? — वह कहता है — बच्चा रो रहा है और तू सॊ रही है !

वह उसके कान के पीछे सिर पर ज़ोर की एक चपत लगाता है। वारिका अपना सिर हिलाती है और फिर से लोरी गाने लगती है। वह हरा चकत्ता, पाजामा और बच्चे के पोतड़ों के छायाएँ पहले की तरह हिल रही हैं। उन हिलती परछाइयों के असर से उसकी आँखें फिर बन्द होने लगती हैं और नींद उसपर फिर काबू पा लेती है। वह फिर से अपना वही पुराना सपना देखने लगती है। वही कीचड़ वाली सड़क। थैले और गठरियाँ लादे हुए लोगों की भीड़ और वे छायाएँ सड़क पर लेट चुकी हैं और गहरी नींद में सो रही हैं। उन्हें देखकर उसकी पलकें भी भारी हो जाती हैं और वह सोने के लिए बेचैन हो जाती है। वह सोना चाहती है, लेकिन उसकी माँ पिलागेया उसके साथ-साथ चल रही है और वह उसे तेज़ चलने के लिए कह रही है। वे दोनों एक साथ भीख माँगने के लिए शहर की ओर जा रही हैं।

— यीशु के नाम पर कुछ दे दो, भाई ! — आते-जाते राहगीरों से उसकी माँ भीख माँगती हुई चल रही है — ख़ुदा आपकी क़िस्मत चमकाए, ख़ुदा आपको हर ख़ुशी दे, ग़रीब की मदद करो, भाई !

— बच्चे को ला। बच्चे को इधर ला ! — उसे एक परिचित-सी आवाज़ सुनाई देती है — बच्चे को लेकर आ, सुनाई नहीं दिया — वही आवाज़ फिर से सुनाई देती है। इस बार आवाज़ में सख़्ती और गुस्सा है — तू सो रही है, हरामी !

वारिका उछल पड़ती है। वह चारों तरफ़ देखती है और यह अनुमान लगाती है कि आख़िर मामला क्या है। उसे वह सड़क नहीं दिखाई देती। पिलागेया भी कहीं नहीं है। वे सो रहे मनुष्य भी कहीं दिखाई नहीं पड़ते। वहाँ तो सिर्फ़ उसकी मालकिन खड़ी हुई है, जो बच्चे को दूध पिलाने के लिए आई है। जब तक वह तगड़ी औरत बच्चे को दूध पिलाती है, वारिका उसका इन्तज़ार-सा करते हुए चुपचाप वहाँ खड़ी रहती है। खिड़की के बाहर नए उभरते हुए दिन की नीलिमा दिखाई दे रही है। कमरे में हिल रही परछाइयाँ धुँधली पड़ गई हैं और छत पर दिखाई देने वाला हरा चकत्ता पीला पड़ता जा रहा है। जल्दी ही सुबह हो जाएगी।

— ले, पकड़े इसे ! — अपने ब्लाउज के बटन बन्द करते हुए मालकिन ने कहा — यह रो रहा है, इसे बहलाकर सुला दे।

वारिका बच्चे को ले लेती है और उसे पालने में लिटाकर पालने को झुलाना शुरू कर देती है। धीरे-धीरे वह हरा चकत्ता और कमरे में हिल-डुल रही छायाएँ पूरी तरह से गुम हो जाती हैं। अब कमरे में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो उसके दिमाग पर छा जाए और उसे उनींदा बनाए। लेकिन फिर भी उसकी आँखों में नींद भरी हुई है। वह बुरी तरह से सोना चाहती है। वारिका पालने की पट्टी के एक किनारे पर अपना सिर रख देती है और नींद को भगाने के लिए अपने हाथ-पैर हिलाने लगती है। वह फिर से खड़ी हो जाती है और एक अँगड़ाई लेती है। लेकिन उसका सिर भारी है और उसकी पलकें एक-दूसरी से चिपकी जा रही हैं।

— वारिका, चल, चूल्हा जला — अचानक दरवाज़े के उस पार से मालिक की आवाज़ आती है।

लो, अब उठने और काम करने का समय हो गया। वारिका पालने के पास से उठ जाती है और घर के बाहर बनी लकड़ी की टाल से लकड़ी लेने के लिए बाहर भाग जाती है। अब वह ख़ुश है। जब वह भाग-दौड़ करती है तो उसे नींद उतना नहीं सताती, जितना कि किसी एक जगह पर लगातार बैठे रहने पर। वह लकड़ी उठा लाती है और चूल्हा जलाने लगती है। उसे महसूस होता है कि उसका काठ की तरह कठोर चेहरा फिर कोमल हो गया है और नींद जैसे दूर भाग गई है।

— वारिका, समोवार साफ़ कर दे ! — उसकी मालकिन चीख़ रही है।

— वार्का समोवार को उठाकर अभी उसे पूरी तरह से साफ़ भी नहीं कर पाई है कि उसे नया हुक़्म मिल जाता है।

— वारिका, मालिक के गमबूट साफ़ कर !

वह फ़र्श पर बैठ जाती है और गमबूट झाड़ने लगती है। गमबूट झाड़ते-झाड़ते वह सोचने लगती है, कितना अच्छा होता यदि वह इस बूट में ही घुसकर लेट जाती और एक झपकी ले लेती ... और अचानक वह गमबूट फूलने लगता है, वह बड़ा होता चला जाता है और एक बिछौने में बदल जाता है। पूरे कमरे में वह बिछौना बिछा हुआ है। जूते साफ़ करने का ब्रुश उसके हाथ से छूट जाता है...। लेकिन तभी वह फिर से सचेत हो जाती है, ज़ोर से अपना सिर हिलाती है, आँखें पूरी तरह से खोलने की कोशिश करती है और आसपास की चीज़ों को देखती है। वह उन चीज़ों को साफ़-साफ़ देखने की कोशिश करती है, ताकि वे उसके आँखों के सामने घूमना बन्द कर दें।

— वारिका, बाहर की सीढ़ियाँ कितनी गन्दी हैं। जा, उन सीढ़ियों को धो दे। मुझे शरम आती है कि ग्राहक इतनी गन्दी सीढ़ियों से होकर दुकान में आते हैं।

वारिका सीढ़ियों को धोने लगती है। वह उन्हें पोंछे से पोंछती है और फिर दुकान में झाड़ू लगाने लगती है। फिर वह आतिशदान जलाती है और वापिस घर वाले हिस्से में लौट आती है। बहुत काम करना है, उसे एक पल की भी फ़ुरसत नहीं है।

मगर कोई दूसरा काम इतना मुश्किल नहीं होता, जितना रसोई में एक ही जगह पर बैठकर आलुओं को छीलना। आलू छीलते-छीलते उसका सिर फिर नीचे की तरफ़ झुक जाता है और उसकी आँखों के आगे आलू नाचने लगते हैं। चाकू उसके हाथ से नीचे गिर जाता है। पर उसके कान बज रहे हैं। कानों में मालकिन की आवाज़ सुनाई दे रही है, जो अपने गाऊन की आस्तीन ऊपर चढ़ाए रसोई में इधर से उधर घूम रही है और लगातार कुछ न कुछ बोल रही है।

नाश्ते का समय ख़त्म हो चुका है, दोपहर के खाने की तैयारी शुरू हो चुकी है, घर की सफ़ाई भी की जा चुकी है, कपड़ों की धुलाई करना बहुत मुश्किल और दुखदायी लग रहा है। वारिका लगातार सोना चाहती है। काम करते-करते बार-बार ऐसे क्षण आते हैं, जब वह यह चाहती है कि सारा काम छोड़कर वह फ़र्श पर लेट जाए और सो जाए।

धीरे-धीरे दिन बीत जाता है। खिड़कियों के बाहर अन्धेरा छा जाता है। वारिका अपनी कनपटियों को दबाती है। ऐसा लगता है, मानो वे काठ की हो चुकी हैं। अचानक वार्का मुस्कराने लगती है। उसे शाम का यह धुँधलका पसन्द है। अन्धेरा आँखों को आराम देता है। अन्धेरे को देखकर यह आस मिलती है कि वह जल्दी ही सो पाएगी। लेकिन शाम को घर में मेहमान आ जाते हैं।

— वारिका, समोवार तैयार कर ! — उसकी मालकिन फिर चीख़ने लगती है।

समोवार बहुत छोटा है। मेहमानों के चाय ख़त्म करने से पहले उसे पाँच बार पानी गरम करना पड़ता है। चाय के बाद वारिका को अगले आदेश के इन्तज़ार में मेहमानख़ाने के बाहर एक घण्टे तक खड़े रहना पड़ता है।

— वारिका, भाग कर जा और बीयर की तीन बोतलें ख़रीद ला।

वारिका पैसे लेकर बीयर की दुकान की ओर चल पड़ती है। वह पूरी तेज़ी से भागने की कोशिश करती है ताकि नींद का झोंका उसे परेशान नहीं करे।

— वारिका, जा, वोद्का की बोतल लेकर आ। वारिका, बोतल खोलने वाला सूजा कहाँ है? वारिका, एक मछली तो भून कर ला।

आख़िरकार मेहमान विदा लेकर चले गए। घर की सभी बत्तियाँ बुझा दी गईं। मालिक और मालकिन भी सोने चले गए। जाते-जाते मालकिन ने कहा — वारिका, बच्चे को झुलाते रहना, ताकि वह सो जाए।

आतिशदान में फिर झींगुर झनकारने लगता है। लैम्प की लौ फड़फड़ाने लगती है। छत पर दिखाई देने वाला हरा चकत्ता भी हिलने-डुलने लगता है। कपड़ों की परछाइयाँ वारिका की अधखुली आँखों पर फिर से नाचने लगती हैं। वह आँखें मिचकाती है और उसका दिमाग डूबने लगता है। उसके सिर पर फिर नींद छाने लगती है। वह गुनगुनाने लगती है —

’आजा री निन्दिया... आजा... मेरे मुन्ने को आकर... सुला जा...’

थोड़ी देर में बच्चा फिर रोने लगता है और देर तक लगातार रोता रहता है। वह रोते-रोते थक जाता है। वारिका फिर से कीचड़ भरी उस सड़क वाला सपना देखने लगती है। थैले और गठरियाँ लादे मनुष्य, माँ पिलागेया और पिता येफ़िम फिर से उसकी आँखों में लहराने लगते हैं। वह इन सबको देख रही है और पहचान रही है। लेकिन वह इतनी उनींदी है कि उसके हाथ-पैर ही उसके बस में नहीं हैं। यह उनींदापन ही उसे जैसे आगे जीवन जीने से रोक रहा है। वह चारों तरफ़ देखती है और किसी ऐसी चीज़ को खोजती है, जो उसे जीने की ताक़त दे। वह बुरी तरह से थक जाती है। वह पूरी कोशिश करती है। वह आँखों पर ज़ोर देकर छत पर हिल रहे रोशनी के उस हरे चकत्ते को ताकती है और उसे लगता है कि यह लगातार रो रहा बच्चा ही उसका दुश्मन है। यह बच्चा ही उसे जीने नहीं देगा।

वह समझ चुकी है कि उसका दुश्मन कौन है।

वह हँसने लगती है। उसे अचरज होता है कि यह सीधी-सी बात वह पहले क्यों नहीं समझ पाई थी। वह हरा चकत्ता, पाजामे और पोतड़े की परछाइयाँ और झींगुर की गूँजती आवाज़ भी उसकी इस नई जानकारी पर आश्चर्य करने लगते हैं।

यह फ़रेबी विचार उसके दिमाग पर छा जाता है। वह अपने स्टूल से उठकर खड़ी हो जाती है और मुस्कराने लगती है। फिर उसके चेहरे पर ख़ुशी-सी झलकने लगती है। कुछ देर वह कमरे में ही इधर से उधर चक्कर काटती है। उसे लगता है कि उसे उसकी परेशानी का हल मिल गया है। अब वह इस परेशानी से मुक्त हो सकती है। वह इस बन्धन से छुटकारा पा सकती है, जो उसके हाथों और पैरों को बाँधे हुए है... वह बच्चे को मार देगी और फिर आराम से सो जाएगी। न बाँस रहेगा... न बाँसुरी बजेगी।

वह हँसते हुए, आँखें मिचकाते हुए और उस हरे चकत्ते की तरफ़ उँगली से कोई इशारा करते हुए पालने तक आती है और पालने में रो रहे बच्चे के ऊपर झुक जाती है। वह उसकी गरदन अपने दोनों हाथों में कस लेती है और फिर जल्दी से फ़र्श पर लेट जाती है। वह ख़ुश है, वह हँस रही है, अब वह आराम से सो सकेगी। पल भर में ही वह नींद के आगोश में समा जाती है। वह ख़ुद भी किसी मुरदे की तरह गहरी नींद में सो जाती है।

मूल रूसी से अनुवाद -- अनिल जनविजय