उसके बादल / विमल चंद्र पांडेय

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घर में घुसने पर पूरा घर किसी कला फिल्म के रुके हुए बेरंग, बेरौनक रंगों से बना हुआ लगा। लालटेन की जर्द बीमार रोशनी, बिखरे और अस्त व्यस्त सामान। दीवार पर ठेठ मध्यवर्गीय सजावट जिसमें गणेश जी से लेकर आसाराम बापू तक की तस्वीरें थीं। हर चीज के असली रंग में मद्धम पीला रंग मिला हुआ था। पीले रंग की एक पारदर्शी चादर जैसे पूरे घर में टाँग दी गई हो।

उसकी नजर चारपाई पर जाकर अटक गई। चारपाई इस तरह खाली थी जैसे उस पर बरसों से कोई न सोया हो। वह आकर चारपाई के पास खड़ा हो गया। पिता की देहगंध सूँघने की कोशिश की पर माहौल में अब कोई गंध नहीं बची थी। शायद हवा पूरी गंध उड़ा ले गई थी। अभी कुछ देर पहले तक सब कुछ था, पिता थे, उनकी आवाज, उनके कपड़े, उनकी गंध तक... अब कुछ भी नहीं, गंध तक नहीं। चीजें वक्त के साथ कैसे पूरी तरह से गायब हो जाती हैं। वह चारपाई के पास जमीन पर बैठ गया। जब वह बहुत छोटा था तो पिता के पसीने की गंध उसे बहुत अच्छी लगती थी।

जब कभी वह उनसे उलझा रहता और वह कहते, ‘छोड़ मुझे, मैं नहाने जा रहा हूँ। पूरा शरीर महक रहा है।’

‘नहीं, महक नहीं रहा है। बहुत अच्छी खूशबू आ रही है।’ वह सूँघकर कहता।

‘अच्छा, मेरे पसीने से तुझे खूशबू आ रही है?’ वह हँसते।

‘हाँ, ...बहुत अच्छी।’ वह उनसे लिपट जाता।

अभी दो महीने तक सब कुछ था। माँ थी, पिता थे, वह भी वह था और घर भी घर था। अच्छा हुआ माँ की सुहागन मरने की बरसों पुरानी साध पूरी हुई। माँ के मरने के दो महीने के भीतर ही पिता भी चले गए।

वह चारपाई के पास से उठकर कमरे में आ गया। क्या उसे सुकून मिल रहा है आज...? क्यों...? पिता के मर जाने से...? इसका जवाब वह जानता है पर खुद से कहता कैसे...? पिछले दो महीने से पिता की हर छूटती साँस के पीछे उसका यही इंतजार तो रहा है। जो होना है वह समय क्यों ले? जल्दी से जल्दी होना चाहिए... कष्टों का अंत, जीवन के साथ... क्योंकि जीवन कष्ट है उनके लिए... और उसके लिए? वह भी तो उनकी हर छूटती साँस के साथ अपना जीवन छोड़ता रहा है। हर पल होती उनकी मौत में वह बराबर का हिस्सेदार रहा है। और जब वह आज चले गए हैं तो उसका भी एक बड़ा हिस्सा तो मर गया है... उसका बचपन, उसकी जवानी और वह बत्तीस साल का एक थका, परेशान और निराश बूढ़ा होकर अकेला रह गया है।

बादल का एक टुकड़ा खिड़की के बिल्कुल पास आ गया था। सारी चीजें हवा, वक्त, रोशनी, बादल, जिन्हें छुआ नहीं जा सकता, कितने पास होती हैं। हम सिर्फ उन्हें महसूस कर सकते हैं। पर बादल को तो छुआ भी जा सकता है। वह उठ आया। खिड़की के पास आने पर पता चला कि बादल का वह टुकड़ा कुछ दूर सरक गया है। वह जबरदस्ती उसमें किसी शक्ल को ढूँढ़ने लगा... पर काफी देर बाद भी नाकामयाब रहा। कभी दो आँखें मिल जातीं तो नाक नहीं मिलती, कभी नाक मिल जाती तो एक आँख गायब हो जाती। कभी दोनों मिलते तो मुँह की आकृति नहीं बनती। कितनी कोशिशों के बावजूद भी पिता का चेहरा उस बादल में नहीं बन पाया था। माँ कहती थी जो लोग मर जाते हैं वो बादल बन जाते हैं। वे अपनी सबसे प्रिय जगह अपने सबसे प्रिय के पास जाकर बरसते हैं। माँ बरसी थी, अपनी मौत के तीन दिन बाद। उस बादल के टुकड़े में वह घंटों बैठकर माँ का अक्स बनाता रहा था। पिता चारपाई पर लेटे थे। मौसी उनके सिरहाने बैठी थी। उस दिन मौसी अपना बहुत सा सामान समेटकर चली आई थी क्योंकि अब उसे माँ का कोई डर नहीं था। माँ सब कुछ बिखरा छोड़कर, जिसे वह जिंदगी भर समेटती रही, अचानक चली गई थी। बीमार पिता उस बीमार रोशनी में अपनी बीमार चारपाई पर थे। सन्नाटा इतना कि पलक भी झपके तो सुनाई दे। मगर ये सन्नाटा उपस्थितियों की कमी से नहीं था, यह छाया था संवादों की कमी से जो जबान से आकर आँखें में कैद हो गए थे। मौसी पिता के सिरहाने लगी कुर्सी पर बैठी उनकी उठती गिरती साँसों के साथ उठती गिरती जिंदगी को देख रही थी। पिता की आँखें बंद थीं जैसे उनमें जीवन का कोई अंश और जीने की कोई इच्छा शेष न बची हो। वह आश्चर्य से मौसी के बैग और होल्डाल को देख रहा था।

‘मैं यहीं रहना चाहती हूँ मुन्ना। तेरे पिताजी के साथ। आज तक तो कुछ नहीं कर पाई... कुछ दिनों इनकी सेवा करना चाहती हूँ।’ मौसी ने धीरे से कहा था, बिना उससे नजरें मिलाए। कुछ बोलने से पहले उसके दिमाग में खटका था, अगर मौसी की कोई गलती नहीं होती तो वह उसकी ओर देख कर बात नहीं करती? नजरें न मिलाने का मतलब...? माँ अपनी जगह बिल्कुल ठीक थी? उसका संदेह फिर गहराया था। अब वह बच्चा तो था नहीं जो कुछ समझ नहीं सकता था।

जब बच्चा था तब मामले भले उसके सिर के ऊपर से चले जाते थे। उस समय वह छठी-सातवीं में रहा होगा जब मौसाजी का देहांत हुआ था। मौसी उसके घर आई थी। पिता न जाने क्यों मौसी से बहुत कम बोलते और उसके सामने भी जल्दी नहीं पड़ते थे। मौसी भी चुपचाप रहती। माँ से मौसी की बातें ऐसी होतीं कि उसे लगता कि वे दोनों किसी दूसरी ही भाषा में बातें करतीं थीं। एक विचित्रता यह थी कि अकेले में पिता से आँखें मिलते ही न जाने दोनों के कौन से जख्म उभर आते जिससे रिसते खून को सँभालते दोनों अलग दिशाओं में मुड़ जाते।

एक दिन माँ मुहल्ले में किसी के यहाँ गीत गाने गई थी। किसी की शादी थी और माँ व मौसी दोनों को गीत गाने का बुलावा आया था। वह शायद शाम को ज्यादा खेलने के कारण थक कर जल्दी सो गया था। जब उसकी नींद खुली तो पड़ोस के घर से आती गाने की आवाज से वह समझ गया कि माँ और मौसी घर में नहीं हैं। वह स्वयं रसोईघर से खाना लेने जाने लगा कि रुलाई की आवाज ने उसके कदम जड़ कर दिए।

वह सन्न रह गया। मौसी पिता से लिपट कर हिलक-हिलक कर रो रही थी। पिता उसके सिर पर हाथ फेर रहे थे। वह यह मान सकता था कि मौसी को मौसाजी की याद आ रही होगी पर इस बात का जवाब उसका बालमन नहीं ढूँढ़ पाया कि पिता क्यों मौसी को चुप कराते-कराते खुद भी रोने लगे और मौसी की आँखों और गालों को चूमने के बाद उसे खींचकर सीने से लगा लिया।

वह खाना निकालना भूल गया और अपने कमरे में जाकर बैठ गया। न वह इतना बच्चा ही था कि इसे देखकर एक सामान्य घटना मानकर भूल जाता न ही इतना समझदार कि किसी उचित निष्कर्ष पर पहुँच जाता। वह यह भी नहीं समझ पा रहा था कि ये बात माँ को बतानी चाहिए कि नहीं।

उस बार मौसी सबसे ज्यादा दिन रही थी। तकरीबन तीन महीने। बीच में कुछ दिन माँ और पिता में दबी जबान में तकरार भी हुई थी। उसे अब लगता है कि सब कुछ वहीं से शुरू हुआ होगा। फिर एक दिन अचानक, जब पिता दफ्तर में थे, माँ मौसी का सामान उठवा कर उन्हें ट्रेन में बिठा आई थी। वह हैरान हुआ था। उसका खयाल था कि पिता आकर मौसी को न पाकर बहुत शोर मचाएँगे और झगड़ा करेंगे पर वह शांत रहे। आते ही वह सीधा मौसी के कमरे में गए और मौसी के साथ मौसी का सामान भी गायब देखकर थके कदमों से आ कर बरामदे में कुर्सी पर बैठ गए। माँ चाय लेकर आई और पिता को देती हुई बोली, ‘वह दोपहर की गाड़ी से चली गई।’

बदले में पिता ने कातर भाव से पहले माँ की तरफ देखा, फिर घड़ी की तरफ और फिर उसकी तरफ देखते हुए बोले, ‘जाओ, बाहर जाकर खेलो।’ और वह खुशी से उछला हुआ बाहर चला गया।

ऐसी कई अपरिभाषित चीजें और लम्हे दिमाग में अव्यक्त होकर रह गए पर दिमाग की क्षमता बढ़ने पर अपरिभाषित चीजें भी अपनी परिभाषा गढ़ने लग गईं।

‘पिताजी हर दस दिन पर टूर पर कैसे चले जाते हैं? संजय और दिनेश के पिताजी को तो कभी टूर नहीं मिलता।’ उसे याद है ये उसने तब पूछा था जब वह हाईस्कूल की परीक्षा में फर्स्ट आया था और पिता घर में मौजूद नहीं थे।

बदले में माँ ने जिस नजर से उसे देखा था उसमें न गुस्सा था, न प्रीति, न प्रतीक्षा न आकांक्षा, बस एक भीगी हुई संवेदना थी जिसमें वह ऊपर से नीचे तक भीग गया था। वह कुछ और भी पूछना चाहता था तब तक माँ नहाने चली गई थी हालाँकि यह उसके नहाने का समय नहीं था।

पिता जब भी टूर पर जाते, माँ न जाने क्यों स्वेटर बुनने लगती। मौसम चाहे सर्दी का हो, गर्मी का या बरसात का, पिता के घर से निकलते ही माँ के हाथों में ऊन और सलाइयाँ आ जातीं और स्वेटर वहीं से शुरू हो जाता जहाँ पिछली बार पिता के लौटने पर रुका था। इस बीच वह कम बोलती किसी से बात करने से बचती। कुछ पूछने पर बिना आँखें मिलाए इस तरह उत्तर देती जैसे यह स्वेटर बुनना उस समय उसके लिए जीवन-मरण का प्रश्न हो। उसने ध्यान दिया था कि कमरे में किसी के न रहने पर माँ स्वेटर बुनना रोक कर दीवारों की तरफ देखने लगती है या मेज पर रखी अपनी शादी की फोटो की तरफ, मगर अंदर जाते ही फिर आँखें और ध्यान स्वेटर पर लगा देती है। प्रश्नवाचक निगाहों से देखने पर कभी कह देती है, ‘डिजाइन सोच रही थी।’

चीजों को समझने की एक सीमा होती है... उम्र की सीमा। उस सीमा के पार जाने पर बिना कुछ कहे सब कुछ समझा और जाना जा सकता है। मगर क्या सब कुछ...? उसी उम्र में उसे यह पता चला कि यूँ चीजों को जानने की भी एक सीमा होती है। लाख कितने भी करीब रहो, चीजों को उनके दिखने की आवृत्ति और कोण से नहीं जाना जा सकता।

उस सीमा तक समझने और जानने के बाद उसने कुछ भी पूछना और यथासंभव सोचना छोड़ दिया था। माँ अगर बातों को उसके सामने अब भी नहीं खोलना चाहती तो वह क्यों माँ को शर्मिंदा करे? कई बार उसके भीतर उठ रहे तूफान ने उसे माँ के सामने लाकर खड़ा कर दिया पर माँ की आँखों में स्वयं को दिलासा देती रोशनी देखकर कुछ भी पूछने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। धीरे-धीरे ये जरूर हुआ कि मौसी के प्रति मन में घृणा की भावना जमीन लेती गई।

माँ के बिस्तर पर पड़ने का पता नहीं क्या कारण था? एक से एक डॉक्टर और उनकी पूरी प्रतिभा माँ की बीमारी नहीं पकड़ पा रही थी। पिता माँ की देखभाल में हमेशा उसके सिरहाने बैठे रहते। उनकी दिल की बीमारी अभी बहुत भयंकर रूप में नहीं बदली थी। उसे याद आया जब माँ को सीने में दर्द उठा था, उसकी मौत के ठीक तीन दिन पहले। मौसी माँ की बीमारी का सुन कर कुछ दिन पहले आई थी और माहौल तब से तनावपूर्ण था। वह जान रहा था कि यह तनाव इसलिए खामोशी की चादर ओढ़े हुए है कि क्योंकि वह इस घर में ऐसा व्यक्ति है जिससे तीनों ही अपने कोने छिपाना चाहते हैं। वह चाहता तो बाहर जाकर इस तनाव को घुलने का मौका दे सकता था पर इस बार उसने एक बार भी इस तनाव से खुद को अलग नहीं किया। कोई तो कुछ बोलेगा... कुछ तो बात खुलेगी। माँ बिस्तर पर अपनी अंतिम साँसें गिन रही है, तनाव अंतिम स्तर पर है... शायद खुले। उसने माँ की जिंदगी पर जुआ खेला था और दाँव हार गया था।

दर्द उठते ही पिता माँ के लिए दवाई लेकर दौड़े थे और मौसी पानी। माँ ने मौसी के हाथ में पकड़े पानी के गिलास को झटका दिया था और वह दूर जा गिरा था।

‘इसे मेरी नजरों से हटा दो वरना मैं कल की मरती आज मर जाऊँगी। ...तुम भी शायद यही चाहते हो कि मैं जल्दी से जल्दी...।’ माँ रो पड़ी थी।

तनाव सभी सीमाओं को तोड़कर सतह पर आ गया था। उसे लगा अब पिता या मौसी में से कोई माँ को समझाने या सफाई देने की कोशिश करेगा पर ऐसा नहीं हुआ। मौसी चुपचाप वहाँ से हटकर अपने कपड़े समेटने लगी। पिता उसके पास आकर धीरे से बोले, ‘इसे घर छोड़ आओ।’

घर मतलब मौसी की वह कोठरी जिसमें वह अकेली रहती थी और उसकी खोज खबर लेने वाला कोई नहीं था। मौसाजी की मौत के बाद हुए बँटवारे में यह अकेली कोठरी और इसका विरोध करने पर दुनिया की तनहाइयाँ और उपेक्षाएँ उसके हिस्से आई थीं।

वह मौसी को उनके घर छोड़ आया। रास्ते में मौसी ने उससे कुछ बात करने की कोशिश की पर वह उदासीन बना रहा। माँ की उदास तस्वीर आँखों के सामने घूमती रही।

क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ जैसे अनेकों प्रश्न मन को बचपन से मथते रहते थे। वह चाहता कि वह पिता से पूछे कि आखिर मौसी से उनका रिश्ता क्या है, माँ क्यों उनकी वजह से खुद को तिल-तिल कर मारती जा रही है, सारी समस्या की जड़ क्या है पर वह कभी पूछ नहीं पाया। पिता खुद भी तो उसे बता सकते हैं। यदि उसके सामने सब कुछ घट रहा है और पिता ने अब तक कुछ नहीं बताया तो इसका सीधा मतलब तो यही होता है कि उन्हें पता है कि पूरे प्रकरण में उनकी गलती है। उसने कल्पनाओं की ईंट-ईंट जोड़कर संभावनाओं का घर खड़ा कर लिया था जिसमें उसे साफ दिखाई देता कि सबसे बड़ी अपराधी मौसी है, फिर पिता। पिता को शायद पिता होने की रियायत मिली थी क्योंकि प्रत्यक्षतः सारी गलती पिता की ही दिखाई देती थी फिर भी बचपन से उसके घर के इर्द-गिर्द बने रहस्यमय आवरण ने उसे यह विश्वास दिला दिया कि ज्यादा अपराध मौसी का है।

इन सब बातों से सर्वोपरि कारण यह था कि पिता को वह सारी कमजोरियों के बावजूद बहुत प्रेम करता था और पिता के बिना जीवन की कल्पना उसके लिए कठिन थी। एक मानसिक जुड़ाव जो कई धरातलों पर चेतनाओं की कई परतों से जुड़ा था, उसे हर समय झकझोरता। माँ के गुजरने के कुछ दिनों बाद जब माँ की कुछ पुरानी चीजें एक बोरे में बंद की जाने लगीं तो पिता ने दौड़कर बोरा छीन लिया, ‘उसकी कोई भी चीज कहीं नहीं हटेगी। सारी निशानियाँ और उसकी सारी प्रिय चीजें यहीं मेरे कमरे में ही रहेंगी... मेरी आँखों के सामने।’ पिता आँखों में ही बिलख पड़े थे।

उसने पिता की प्रिय आसाराम बापू की तस्वीर उतारी और सख्त नापसंद होने के बावजूद उसे एक कपड़े से पोंछ कर यथास्थान टाँग दिया। पिता की प्रिय बाँसुरी जो उन्होंने अरसे बाद एक दिन बजाई थी, सामने की रैक पर पड़ी हुई थी। उसने बाँसुरी को उठा कर अपनी कमीज से पोंछा। सिरे पर लगा खून जम चुका था और काला हो चुका था पर बिल्कुल ताजा सा लग रहा था। उसने निश्चय कर लिया था कि पिता की सारी प्रिय चीजें अपनी आँखों के सामने रखेगा।

जब इस बार मौसी अपना बैग और होल्डाल लेकर आ गई तो उसे बहुत बुरा लगा। क्या हुआ जो माँ नहीं है घर में, इस घर में वही होगा जो माँ को पसंद था। तीन दिन तक किसी तरह मौसी की उपस्थिति को उसने बर्दाश्त किया पर माँ जैसे हर वक्त पूछती, ‘मुन्ना, तुझे पता है न, मैं इसे अपने घर में बर्दाश्त नहीं कर सकती?’

उस दिन जब पिता सोकर उठे और वह सहारा देकर उन्हें उठाने लगा तो उनकी आँखें इधर-उधर भटकने लगीं। उसे लगा जैसे माँ उसके ऊपर सवार हो गई हो और वह पंद्रह सोलह साल पुराने संवाद बोल रहा हो।

‘मैं रात की गाड़ी से उन्हें उनके घर छोड़ आया।’ पिता की आँखें यह सुनकर बुझ गई थीं। रात की बारिश के बाद सुबह पूरी तरह धुली साफ सड़कों जैसी आँखें। वह चाहता था कि पिता उससे सवाल करें, ‘किससे पूछ के छोड़ आए तुम उसे घर?’ उसे डाँटें,’ तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे बिना पूछे उसे यहाँ से ले जाने की?’ शायद कोई छिपा हुआ राज ही कबूल कर लें, ‘उसे वापस ले आओ, मैं उसके बिना नहीं रह सकता।’

पर पिता ने सिर्फ अपनी थकी हुई आँखें मूँद लीं। उसे थोडा़ सा दुख हुआ। पिता अब सिर्फ पिता नहीं रहे थे। वह धीरे-धीरे बादल बनते जा रहे थे। वह स्पष्ट देख रहा था उनका धीरे-धीरे करके बादल में बदलते जाना। शुरुआत ऊपर से हुई थी। उनकी आँखें कब की बादल बन चुकी थीं। जिस दिन पाँव बादल बन जाएँगे, पिता सारी थकन समेटे आसमान की और चल देंगे। फिर कुछ दिनों बाद उसके पास आकर बरसेंगे। उसके पास...? अपने सबसे प्रिय के पास।

अँधेरे के अंदर अँधेरा, सिर्फ संभावनाएँ, कोई सत्य नहीं... वह शायद ऐसे अँधेरों में घिर गया है जहाँ से उसे टटोलते-टटोलते ही गंतव्य तक पहुँचना है। कभी खूब चीखने का मन होता, कभी रो पड़ने का और कभी सोचता कि पिता को झकझोर कर उठाए और सारे सवालों के जवाब माँगे।

जब पिता की आँखें बंद हो जातीं तो कमरे की सारी चीजों का वजूद मिट जाता। उसकी आँखें पिता के निर्विकार चेहरे पर टिक जातीं। घंटों-घंटों उन्हें देखता रहता और आगे ही आगे निकलता जाता। समंदर की लहरें जैसे ऊपर जाने के बाद ऊपर ही ऊपर चली जातीं हों, वापस नीचे आने का उन्हें ध्यान ही न रहा हो। सैकड़ों घोड़े खाली मैदान में आगे ही आगे बढ़ते जा रहे हों, उन्हें सिर्फ आगे ही राह दिखाई दे रही हो।

‘अरे, डायरी नहीं पढ़ते किसी की... चलो इधर लाओ।’ पिता ने लाड़मिश्रित डाँट पिलाई थी।

‘उहहूँहूँ... मैं पढ़ूँगा।’ वह ठुनका था।

‘नहीं, चलो अपनी पढ़ाई करो। जब बड़े हो जाना तब पढ़ना।’

‘तब आप पढ़ने देंगे’

‘हाँ...।’

पिता ने आँखें खोलीं और अपनी बाँसुरी मँगाई। वह उन्हें बाँसुरी देकर पैर की तरफ बैठ गया। पिता बजाने लगे। एकाध बार उन्हें खाँसी आई और थोड़ी तकलीफ हुई पर जल्द ही एक धीमी दर्द भरी धुन हवा में तैर कर हर अनुभूति और हर रंग को और गाढ़ा करने लगी। उसका मन बहुत भारी हो गया। उसे लगा जैसे वह रो देगा।

‘यह धुन बहुत अच्छी है... नहीं ?’ पिता थकी आवाज में उससे क्या पूछना चाह रहे थे?

उसने देखा बाँसुरी के सिरे पर खून लगा हुआ था। मृत्यु... उसने सोचा। धीरे-धीरे जिंदगी की तरफ बढ़ती मृत्यु कितनी डरावनी है, अचानक होनेवाली दर्दनाक से दर्दनाक मौत से भी ज्यादा भयंकर, डरावनी और दर्दनाक। ...या एक उत्सव ...जिसके इंतजार में पल-पल सरकती जिंदगी का सफर बोझिल और यंत्रणादायक लगता है। क्या वह उस क्षण का इंतजार कर रहा है? पिता क्या कहेंगे उस वक्त? मृत्यु अपने आने से पहले अपना बोध दे देती है। क्या पिता को मृत्युबोध हो जाय तो उसे कोई संदेश देकर जाएँगे?

पिता अपनी आदत के अनुरूप गए। कोई शोर शराबा नहीं ...कष्ट सहने की अभूतपूर्व क्षमता।

‘सुनंदा की कोई गलती नहीं...।’ उसे लगा जैसे पिता को मृत्युबोध हो गया था। पर आगे भी शायद कुछ कहना बाकी रह गया था जो वह नहीं कह पाए। पिता के कहे में उसे कुछ भी नया नहीं लगा था। न जाने क्यों उसे पहले से ही लग रहा था कि पिता अंतिम समय में उससे यही बोलेंगे... पर सिर्फ इतना ही?

रात लगभग पूरी जा चुकी थी। उसने चाबी लगाई और पिता का संदूक खोला। पिता की डायरी उठाई। अपने अकेलेपन से तो सभी ईमानदार होते हैं। खुद से सभी सच बोलते हैं। तभी बाहर बादल गरजा। डायरी उसके हाथ से छूट कर गिर गई। क्या पिता आए हैं? ...उसके पास बरसने? उसने खिड़की से बाहर देखा। बारिश के आसार नहीं थे। नहीं बारिश नहीं होगी... पिता अपने सबसे प्रिय के पास जाकर बरसेंगे... उसके पास नहीं। उसने देखा डायरी के भीतर से कई पत्र गिर कर इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। उसने एक पत्र उठाया और पढ़ने लगा। पत्र पर तारीख दस-बारह साल पुरानी थी।

प्रिय अजीत

एक अभागिन विधवा जैसी हो सकती है, मैं उतनी ठीक हूँ। तुम्हें मेरी चिंता नहीं करनी चाहिए। हर दस-बारह दिनों पर तुम्हारा यहाँ आना मुझे ठीक नहीं लगता। दीदी परेशान होती हैं तो मुझे दुख होता है। मेरी किस्मत में जो था वह हो चुका है। मैं खुद को सँभाल लूँगी। तुम अपने परिवार पर ध्यान दो। कहीं ऐसा न हो कि तुम अपने परिवार को खो बैठो। ऐसा हुआ तो मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाऊँगी।

तुम्हारी सुनंदा

वह फटी आँखों से इस पत्र को देख रहा था। उसकी टाँगें कँपकँपा रही थीं। मौसी का चेहरा आँखों के सामने नाच रहा था। हर वजह की कितनी परतें होती हैं। हर परत में सम्मलित हुए बिना किसी भी वजह को पूरी तरह से नहीं जाना जा सकता। फिर भी संवेदनाओं का एक स्पर्श बिना कुछ कहे भी सब कुछ समझा जा सकता है। एक के बाद एक उसने सारे पत्र पढ़ डाले। उसकी आँखों से आग और पानी दोनों बरस रहे थे। सारे बादल छँट चुके थे। बाहर शांति थी और भीतर अंधड़ उमड़ रहे थे।

एक तेज हवा का झोंका आया और सारे पत्र कमरे में उड़ने लगे। वह चुपचाप खड़ा सारे पत्रों को उड़ता हुआ देख रहा था। पत्रों में लिखे शब्द और उनमें लगी इबारतें उसके दिमाग में नाच रही थीं।

डॉक्टर कहते हैं कि दीदी का मानसिक संतुलन शादी के बाद ठीक हो सकता है। ...हमें ये कुर्बानी देनी होगी अजीत, हमारे प्यार की खातिर, मेरी दीदी और बाबूजी की जिंदगी की खातिर...। तुम इतनी लंबी जिंदगी कैसे जिओगी सुनंदा? दस पंद्रह दिनों पर तुम्हें देखने आता रहूँगा, मना मत करो। ...मैं तुमसे प्रेम करती हूँ पर दीदी की आँखों में अपने लिए नफरत नहीं देख सकती। ...दीदी हमारे संबंध को गलत समझ रही हैं, तुम यहाँ मत आया करो। ...मैं दीदी को देखने आना चाहती हूँ, उनकी सारी नफरतों को सह लूँगी। ...सुनंदा, मैं चाहता हूँ मैं मरूँ तो तुम मेरे सामने रहो। ...मुन्ना की बेरुखी मुझे बहुत कष्ट देती है, तुम उसे सब बता दो ताकि वह मुझसे नफरत न करे।

उसे लगा जैसे वह किसी घिसी पिटी पुरानी पारिवारिक फिल्म की कहानी जी रहा है। इसमें सबके संवाद भावुक होने हैं और बहुत सी गलतियों को सुधारना है। मगर उसने जो गलतियाँ कर दी हैं वो उसकी गलतियाँ कहाँ हैं। और यह गलती कहाँ यह तो पाप है भले इसका जिम्मेदार वह पूरी तरह से नहीं है पर पाप तो उसके हाथों हुआ है। किसी भी मुकम्मल चीज को सिर्फ एक आयाम से देखकर उसके बारे में जानना कितना गैरमुकम्मल है। उसने अनजाने में जो पाप कर दिए हैं उनका कोई प्रायश्चित नहीं हो सकता। उसने सोचा था कि वह इन संवादों का हिस्सा नहीं बनेगा। सब कुछ यांत्रिक तरीके से नहीं करेगा। उसकी प्रतिक्रिया वैसी नहीं होगी। वह ठंडे दिमाग से सोचेगा। मगर वह न चाहते हुए भी न जाने कब फूट-फूटकर रोने लगा था, ‘मौसी मुझे माफ कर देना।’ उसने खिड़की के बाहर देखा और पूरी ताकत से चीखा, ‘पिताऽऽऽऽऽऽऽ...तुम काऽऽऽऽऽयर थे।’

उसने पिता की और मौसी की सारी चिट्ठियाँ तह करके डायरी में रख दीं। संदूक बंद करके पिता की डायरी उठाई। थोड़ी देर उसे देखता रहा फिर उसे पिता की ऐनक के पास रख दिया। पिता की सारी प्रिय चीजें और निशानियाँ इसी कमरे में रखी थीं। मगर क्या सारी प्रिय चीजें...? उसने आँखें पोंछी और घड़ी की ओर देखा। सुबह के पाँच हो रहे थे। एक शर्ट और एक तौलिया उसने बैग में डाला और मुँह धोने लगा।

बाहर मौसम अच्छा था और बारिश के आसार बिल्कुल नहीं थे पर बारिश अचानक ही धीरे-धीरे शुरू हो गई थी और खिड़की के पास बादल का एक टुकड़ा आ गया था।