एक बार फिर होली (पृष्ठ-2) / तेजेन्द्र शर्मा

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नजमा बेटी तुम बाहर जा रही हो तो पंसारी से थोडा सामान भी लेती आना.

जी अम्मी. मुझे लिखवा दीजिये.

एक किलो मूंग साबुत, मलका, काले चने और 6 टिकिया लक्स साबुन. ओवलटीन का एक डिब्बा.

अरी बहू तुम ये कौन सी ज़बान में लिख रही हो?

जी अम्मी हिन्दी में लिख रही हूं.

अरे तुम्हें उर्दू लिखनी नहीं आती क्या ?

नहीं अम्मी हमारे हिन्दुस्तान में तो सभी लोग हिन्दी लिखते हैं.

अरे हिन्दू चाहे किसी ज़बान में लिखें, हमें क्या फ़र्क पडता है. मगर तुम तो मुसलमान हो. अपनी ज़बान में लिखो.

मगर अम्मी मुझे तो उर्दू लिखनी नहीं आती है. हां पढ ज़रूर लेती हूं. हमारे हिन्दुस्तान में तो बहुत से मुसलमान सिर्फ़ तेलुगू, तमिल या मलयालम जानते हैं. वहां हर मुसलमान की ज़बान उर्दू नहीं है.

या अल्लाह ! कैसी लडक़ी मिली है! नजमा ये बात तुम समझ लो अच्छी तरह कि उर्दू तो तुम्हें सीखनी ही पडेग़ी.

नजमा की समस्या ये थी कि वह अपनी मर्ज़ी के विरूद्ध इमरान से विवाह करके पाकिस्तान रवाना कर दी गयी थी. ऐसे में अगर उसे थोड़ा अतिरिक्त प्यार मिल जाता या फिर उस की मनःस्थिति को समझने का प्रयास किया जाता तो वह अवश्य ही अपने ससुराल से हिलमिल जाती. लेकिन कसूर ससुराल का भी कहां था. पूरे परिवेश में खलनायक कोई नहीं था. बस स्थितियां ही ऐसी थीं कि नजमा के लिये उनमें पिसना उसकी विवशता थी.

अपनी भोली ग़लतियां करने से भी बाज़ नहीं आती थी नजमा. एक दिन ज़ुबेदा से पूछ ही तो लिया, जुबेदा, यहां कराची में होली कहां खेलते हैं?

होली ! ये क्या होती है?

यह एक त्यौहार होता है जिसमें सब एक दूसरे पर रंग डालते हैं.

अम्मी ने सुन लिया, नजमा बेटी, तू काफ़िरों जैसी बातें क्यों करती है. रंग खेलना इस्लाम में हराम है मेरी बच्ची. मैं तो समझ भी लूंगी क्योंकि मैं भी हिन्दुस्तान की पैदायश हूं, अगर कहीं इमरान के कानों में ये बात पड ग़ई तो गज़ब हो जाएगा. अब तू शादी करके यहां आ गई है बेटी, अपने आपको यहां के रस्मो-रिवाज़ में ढाल मेरी बच्ची. तू भूल जा कि तू हिन्दुस्तान से यहां आयी है. अब तू इस घर की इज्ज़त है. इस इज्ज़त को बनाए रख बेटी. तेरी ज़िन्दगी अब इमरान है, होली नहीं.

नजमा प्रयत्न भी करती कि इमरान के प्रति उसके मन में कोई कोमल तंतु जन्म ले ले. किन्तु इमरान का फ़ौजी अक्खडपन उस तंतु को जन्म लेने से पहले ही कुचल देता. उसे रत्ती भर फ़र्क नहीं पडता था कि नजमा क्या महसूस कर रही है. उसे तो अपनी भूख शांत करनी होती थी जो हो ही जाती थी. प्रकृति ने बनाए हैं नर और मादा शरीर और प्रकृति ने ही बनायी है वासना. सृष्टि ने उत्पत्ति के लिये ही वासना को जन्म दिया है. सभी जानवर उत्पत्ति के लिये संभोग भी करते हैं. इन्सान ने अपने आप को जानवरों से अलग करने के लिये प्रेम जैसी कोमल भावना का आविष्कार किया है. यदि प्रेम एवं वासना दोनों का समन्वय हो जाये तो जीवन के अर्थ ही बदल जाते हैं.

प्रकृति ने अपना रंग यहां भी दिखाया और नजमा गर्भवती हो गई. रेहान के जन्म ने इमरान के अहम की तुष्टि तो की ही. नजमा की थोडी इज्ज़त भी बढवा दी. नजमा सोचती रह गयी कि अगर कहीं ग़ल्ती से भी बेटी पैदा हो जाती तो इमरान से क्या क्या सुनने को मिलता. इमरान ख़ुश था कि पाकिस्तानी फ़ौज के लिये एक और सिपाही ने जन्म लिया है.

फ़ौजी स्कूलों में पढ रहे रेहान के साथ भी नजमा के कोमल तन्तु नहीं जुड पा रहे थे. वह उसे अपने पुत्र से कहीं अधिक अपने पति का पुत्र ही लगता. उसके नाक नक्श भी इमरान पर ही गये थे. वैसे वह देख कर हैरान अवश्य होती कि कैसे प्रकृति एक छोटे से बालक में अपने पिता की शक्ल हूबहू डाल देती है.

समय बीतता रहा. बंगला देश युद्ध को लोग भूलने लगे थे. लेकिन इंदिरा गांधी का नाम आज भी वहां एक बला की तरह लिया जाता था. बंगला देश इमरान के मन में एक नासूर बना बैठा था. वह हमेशा किसी ऐसे मौके की तलाश में रहता कि वह बंगला देश का बदला कश्मीर में ले सके. समय ने रेहान को भी बडा कर दिया. समय ने ही ऐसा भी किया कि रेहान के किसी भी और भाई या बहन ने जन्म नहीं लिया. इमरान और नजमा ने रेहान को अपनी अपनी ओर से बेहतरीन परवरिश देने का प्रयास भी किया. लेकिन इससे हासिल ये हुआ कि रेहान चकरा सा गया. दो लोग जिनकी सोच एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत थी, एक बच्चे को अपनी अपनी तरह से परवरिश देने का प्रयास कर रहे थे.

रेहान लंदन में पढाई कर रहा था. शादी के छब्बीस साल बाद भी नजमा और इमरान के बीच यदि किसी चीज़ की कमी थी तो वो थी विश्वास की. इमरान का नजमा पर अविश्वास का सीधा सीधा कारण था नजमा का हिन्दुस्तानियत से बाहर न आ पाना; हिन्दी भाषा का प्रयोग करना; होली में अतिरिक्त रूचि होना; उसकी स्कूल कॉलेज की सहेलियों की सूची में सभी नाम हिन्दू लडक़ियों के नाम होना और बार बार अपना तक़िया कलाम दोहराना कि हमारे हिन्दुस्तान में तो ऐसा होता है. वहीं नजमा के दिल में ये बात गहराई तक उतरी हुई है कि इमरान उसे कभी भी कहीं भी छोड सकता है. नजमा के दिल से इस घटना को हटा पाना लगभग असंभव है.

बेगम साहिबा, अब तो आप भी कार चलाना सीख लीजिये. आप मोबाइल भी हो जाएंगी और कार चलाना तो एक अच्छी कला भी है.

आप क्यों तकलीफ़ करते हैं? हम किसी मोटर ड्राइविंग स्कूल से सीख लेंगे.

अरे बेगम, जब हम हैं तो स्कूल की क्या ज़रूरत ! पूरे पाकिस्तान में हम से अच्छा उस्ताद आपको कहां मिलेगा?

देखिये मैं ग़लती करूंगी, तो आपको गुस्सा ज़रूर आयेगा. फिर आपका मूड ख़राब होगा. चलिये हम कहीं घूम आते हैं. हम कार चलाना ड्राइविंग स्कूल से ही सीख लेंगे.

किन्तु इमरान हाशमी आज बहुत बढिया मूड में थे. नहीं माने. और हो गई कार की ट्रेनिंग शुरू.

अरे बेगम ध्यान से. आप अगर क्लच दबाए बिना गेयर बदलेंगी तो सोचिये बेचारा गेयर क्या करेगा. टूट फूट जायेगा और नुक़सान होगा सो अलग.

नुक़सान की चर्चा सुनते ही नजमा के दिमाग में तनाव बढ ग़या. ग़लतियां भी उसी हिसाब से बढने लगीं. बार बार इमरान का टोकना और व्यंग्य कसना.

नजमा जी, आप गाडी सांप की मानिंद क्यों चला रही हैं?ऐ सड़क़ पर चलने वालो सब जा कर अपने घरों में दुबक कर बैठ जाओ आज हमारी बेगम सडक़ पर गाडी ले आईं हैं, जिस जिस को अपनी जान प्यारी हो, भाग लो सर पर पांव रख कर..

नजमा ने एक बार फिर कहा कि बाकी ट्रेनिंग फिर कभी हो जाएगी. लेकिन इमरान कहां मानने वाला था. जब नजमा ने ग़लत मोड़ क़ी ओर मोड़ दी गाडी, तो इमरान फट पडा, बेगम हम अगर भैंस को भी कार चलाना सिखा रहे होते, तो वो भी अब तक बेसिक बातें सीख गई होती. आप तो कमाल करती हैं. आपके हिन्दुस्तान में लोग ऐसे ही कार चलाते हैं क्या?

बस, अब बहुत हो चुका था, हम अब कार नहीं चलाएंगे. कह कर नजमा ने कार का दरवाज़ा खोला और कार से नीचे उतर गई. इमरान के अहम को ठेस लगी, अरे भाई अगर छोटी सी बात कह भी दी तो क्या फ़र्क पड़ ग़या?

हम ने कह दिया न, हमें कार चलानी नहीं सीखनी.

देखो नजमा, हम आख़री बार कह रहे हैं कि कार में बैठ जाओ और कार चलाओ, वर्ना हम से बुरा कोई न होगा.

हमारा फ़ैसला आख़री है. आप ड्राइविंग सीट पर आ जाइये.

अगर मैं ड्राइविंग सीट पर आ गया, तो आपके लिये अच्छा न होगा.

' इमरान ड्राइविंग सीट पर आये, कार स्टार्ट की और नजमा को घर से पांच मील दूर सुनसान सी सड़क पर अकेले छोड क़र कार आगे बढा दी.

नजमा सोचती रह गई कि ये हुआ क्या. वह अभी भी उम्मीद लगाए बैठी थी कि इमरान कार मोड़ क़र वापिस लायेंगे और उसे मना कर ले जाएंगे. लेकिन इमरान नहीं आये. नजमा वहीं सडक़ किनारे बैठ कर खूब रोयी. अल्लाह से ले कर संकटमोचन तक सभी को शिकायत भरे लहजे में याद किया. फिर हारी हुई खिलाड़ी क़ी तरह, अपनी बेइज्ज़ती की पोटली को साथ बांधे, फटफटिया आटो रिक्शॉ पर घर पहुंची. वहां ज़ुबेदा ने बताया, भाभी जान, भैया तो क्लब चले गये हैं. रात का खाना वहीं खा कर आयेंगे. नजमा ने उस रात कुछ नहीं खाया. उसे एक बात का विश्वास हो चुका था कि यह इन्सान उसे ज़िन्दगी के किसी भी मोड पर अकेला छोड क़र जा सकता है. विश्वास के काबिल नहीं है इमरान.


आजकल नजमा अपनी कविताओं की पेंटिंग बना रही थी. अपनी कविता को कैनवस पर उतारने का उसका शौक उसे एक ही थीम को दो कलाओं के माध्यम से पेश करने का मौका देता था. पाकिस्तान में राजनीतिक माहौल गरमा रहा था. कारगिल की तैयारियों में कर्नल इमरान हाशमी की भूमिका बहुत अहम थी. इमरान ने कभी नजमा को कारगिल के बारे में कोई सूचना नहीं दी.

कारगिल युध्द शुरू हो गया. सभी फ़ौजी सरहद पर निकल गये थे। मुहल्ले में बस औरतें ही दिखाई देती थीं। शहर में कब्रिस्तान का सा सन्नाटा महसूस होने लगा था। वैसे यह युद्द भी एक अजीब सा युद्ध था. दोनों देश लड़ भी रहे थे और पाकिस्तान कहे भी जा रहा था कि उनका देश युद्ध में किसी तरह से नहीं जुड़ा हुआ है. दोनों ओर से लोग मारे जा रहे थे. बहुत से पाकिस्तानी सैनिक भी शहीद हुए. किन्तु राजनीतिक कारणों से पाकिस्तानी सरकार ने उन शवों को पहचानने या स्वीकार करने से इन्कार कर दिया. उन शवों में से एक शव कर्नल इमरान हाशमी का भी था. इमरान को कहां पता था कि उसका अंतिम सरकार हिन्दुस्तान की थल सेना करेगी और वो भी भारत की धर्ती पर. उसका परिवार उसके शरीर के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पायेगा.

इमरान की मौत के बाद नजमा पाकिस्तान में नितांत अकेली पड ग़ई. अम्मी तो जन्नत के लिये कब की रवाना हो चुकी थीं. दोनों ननदें भी अपने अपने घरों वाली थीं. नजमा को कराची कभी अपना घर लगा ही नहीं था और पाकिस्तान सरकार ने इमरान की मौत को कोई महत्व ही नहीं दिया था. कोई मरणोपरांतर् पदक तक नहीं. कोई ज़मीन या वज़ीफ़ा नहीं. राजनीति की शिकार नजमा ने भारत जाने का फ़ैसला किया. अपने हिन्दुस्तान जा कर देखना चाहती थी कि वहां क्या कुछ बदला है.

लेकिन अब उसे भारत जाने के लिये वीज़ा लेना पडेग़ा. जिस देश की ख़ातिर वह कभी पाकिस्तानी नहीं हो पायी, आज वहीं जाने के लिये वीज़ा लेना होगा. इमरान की अच्छी जान पहचान थी, उसकी बेवा होने का एक लाभ तो था कि काम हो जाते थे. यह भी हो गया. किन्तु फिलहाल तो दोनो देशों में उडानों पर ही प्रतिबंध लगा हुआ था. नजमा पहले अपने पुत्र रेहान को मिलने लंदन गई, और वहां से ब्रिटिश एअरवेज़ से दिल्ली. बडी भाभी और उनके बच्चे नजमा को लेने आये थे.

दिल्ली से बुलंदशहर का सफ़र उसकी रगों में रक्त का बहाव बहुत तेज़ करता गया. सोच सोच कर परेशान थी कि क्या चंदर आज भी वहां रहता होगा, क्या डाक्टर बन गया होगा, क्या उसे याद करता होगा? फिर मन ही मन मुस्कुरा भी रही थी. कितनी बेवक़ूफ है वो, भला चंदर ने क्या अपना जीवन नहीं जीना था. उसकी भी शादी हुई होगी, उसके भी बच्चे होंगे. कितना मज़ा आयेगा चंदर के बच्चों को देखकर. अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा होता, तो वो बच्चे उसके अपने होते! इस उम्र में भी उसके गाल लाल हो आये थे. बडे भाई के घर जाने से पहले तो वह दिल्ली को पहचानने का प्रयास कर रही थी. एअरपोर्ट इतना बडा और माडर्न हो गया था. रास्ते में चौडी सडक़ें, फ्लाइ ओवर, और सभी माडर्न कारें. जब भारत छोड क़र गई थी तो बस एम्बेसेडर और प्रीमियर कारें ही तो होती थीं. क्या चंदर के पास भी अपनी कार होगी.अगर डाक्टर बन गया होगा तो ज़रूर होगी. चित्रा उसे देख कर क्या करेगी. बच्चे अपने फूफी को देख कर ख़ुश थे मगर पहली बार मिलने वाली झिझक ज़रूर थी. भाभी जान इमरान के बारे में बातें कर रही थीं. रेहान की पढाई, नौकरी और शादी. भला भाभी से चंदर के बारे में कैसे पूछे. भाभी ने बताया कि चित्रा ने तो वहीं एक वकील से शादी कर ली थी. उसके तीन बच्चे हैं - एक बेटी और दो बेटे. इंदु शादी कर के लखनऊ चली गई थी. कमला से कोई संपर्क रहा नहीं था. चित्रा से मिलने को बेताब थी नजमा. क्या उसे पहचान लेगी? अगर पहचान गई तो कैसे व्यवहार करेगी?

घर आ पहुंचा. भाई जान से मुलाकात हुई. दुआ सलाम. औपचारिक बातें. छब्बीस साल पुरानी कडवाहट को दोनों ही भुला देना चाहते हैं. बहन के जुर्म के लिये उसे देश निकाला देने के बाद मुलाकात के अवसर बने ही नहीं. आठ भाई बहनों में सबसे छोटी नजमा के बाद घर में कोई दूसरी शादी भी तो नहीं होनी थी जिसके लिये नजमा आने का प्रयास करती. अम्मी और अब्बा के इंतकाल का दुख भी उसने पाकिस्तान में अकेले ही सह लिया था. वह एक ओर पाकिस्तान में अपने अकेलेपन से लड़ी, अपने वतन की याद में तडपी, वहीं वह यह भी नहीं भूली थी कि उसे कराची एक सज़ा के तौर पर भेजा गया था. इमरान उसकी सज़ा था, इनाम नहीं. छब्बीस साल की क़ैद हुई थी उसे, बामुश्शक्त. जेल से छूट कर घर आई थी नजमा. आज सज़ा देने वाले भी इस दुनिया में नहीं थे और सज़ा भी.

घर में भी बडे भाई के रूतबे के साथ साथ बहुत से परिवर्तन भी महसूस किये नजमा ने. बुलंदशहर में भी अब दिल्ली की सुविधाएं आ पहुंची थीं. सब कुछ देखते हुए भी नजमा का दिल किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था. चित्रा का पता मालूम नहीं था - न उसे और न ही भाभी जान को. चित्रा के मायके जाना होगा. पता नहीं वहां कौन होगा. बिखरे हुए धागों को समेटना भी तो आसान काम नहीं होता. धागे उलझते जाते हैं - गांठें नहीं खुल पाती हैं.

दो दिन के बाद चित्रा का पता लग पाया. और चित्रा तो नजमा को देख कर जैसे पगला सी गई. भूल गई कि तीन बच्चों की मां है. समय जैसे थम सा गया था. दोनो सहेलियों में जम के बातें हुईं. दोनों ने मिल कर भोजन बनाया. नजमा ने चित्रा को आश्चर्यचकित कर दिया, क्या कहा, तुम शाकाहारी हो गई हो ! यह चमत्कार कैसे हो गया ?

वहां कराची में सब गाय का मीट खाते थे. हमने तो ज्ािन्दगी में कभी नहीं खाया था. जब मना किया तो हम पर हिन्दू होने का इल्ज़ाम लगा दिया. हमने फ़ैसला कर लिया कि हम मीट खाना ही बंद कर देंगे. हम ने घास फूस खाना शुरू कर दिया. अब तो यही खाना अच्छा लगता है. पहले पहले अम्मी के हाथ के गोश्त की याद आती थी मगर अब तो सब पुरानी बातें हो गईं. वहां कराची में तो लोग हमें हिन्दू ही कहने लगे थे.

कितने साल बीत गये न ? यहां की याद तो खूब आती होगी ? हम सहेलियां भी बिछड ग़यीं. कोई लखनऊ में है तो कोई दिल्ली में. कांता तो मुंबई चली गई है. और सुरेखा को अमरीका वाला आ कर ले गया. पहले पहले तुम्हारे बारे में खूब बातें करते थेफिर आहिस्ता आहिस्ता सब के काम बढते गये और नजमा रानी पीछे छूटती गईं. न तो चित्रा ने चंदर के बारे में कोई बात छेड़ी और न ही नजमा ने कुछ पूछा।

भाईजान के घर जल्दी ही नजमा बच्चों के साथ घुल मिल गई. बच्चे रेहान के बारे में बातें करते. उसके लंदन में रह कर पढने से वे खासे प्रभावित लग रहे थे. नजमा के शाकाहारी हो जाने से भाभी जान को भोजन का मीनू बनाने में खासी परेशानी हो रही थी. बच्चों के लिये गोश्त बनाने के साथ साथ अब सब्ज़ी और दाल भी बनानी होती. दो तीन दिन बस ऐसी ही बातें होती रहीं, जिनके न होने से नजमा को कोई फ़र्क नहीं पडता. क्ई बार तो नजमा बिना ठीक से सुने ही जवाब दे देती. उम्र के इस पडाव पर भी किसी ऐसे व्यक्ति से मिलने की चाह कितनी प्रबल हो सकती है जिसके हवाले कभी अपना जीवन कर देना चाहा था.

अगले सप्ताह एक बार फिर होली है। नजमा के दिल में अपनी आख़री होली की याद अचानक ताज़ा होने लगी है। कराची की घुटन के बाद अचानक एक और होली की खुली ख़ुश्बू! कैसी होगी अगले सप्ताह की होली? क्या उसके भतीजा भतीजी भी होली खेलते होंगे ? अचानक नजमा को लगा कि किसी ने उसके चेहरे पर गुलाल लगा दिया है. उसका चेहरा आज फिर ठीक वैसे ही लाल हो गया, जैसे छब्बीस साल पहले हुआ था. बस आज उसे देखने के लिये दुर्गा मासी ज़िन्दा नहीं थी.