एक सिनेमाघर की मौत पर शौक / जयप्रकाश चौकसे

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एक सिनेमाघर की मौत पर शौक
प्रकाशन तिथि :09 अप्रैल 2017


दिल्ली के कनॉट प्लेस क्षेत्र में एक अंग्रेज द्वारा बनाया गया रीगल सिनेमा आज़ादी के समय हिंदुस्तानी ने खरीद लिया। यह सिनेमाघर 1931 में बना था। इसी वर्ष 30 मार्च को शाम के शो में राज कपूर की 'संग्राम' और अंतिम शो में 'मेरा नाम जोकर' दिखाई गई। 'संगम' का प्रथम प्रदर्शन भी रीगल में ही हुआ था। इसके मालिक या मालिक समूह ने 86 वर्षों तक आम आदमी के मनोरंजन के इस जलसाघर को बनाए रखा और जो दर्शक मल्टीप्लैक्स के महंगे टिकट नहीं खरीद सकते थे, वे रीगल में ही फिल्में देखते थे। जैसा 'मेरा नाम जोकर' के अंत में यह लिखा होता था, 'द एंड, पॉजिटिवली नॉट' क्योंकि राज कपूर उसकी अगली कड़ी भी बनाना चाहते थे गोयाकि 'द शो मस्ट गो ऑन' के मनोरंजन आदर्श का निर्वाह करना चाहते थे, वैसे ही 'रीगल' के मालिक उस स्थल पर बहुमंजिले व्यापार केंद्र में चार छोटे सिनेमाघर भी बनाना चाहते हैं। मनोरंजन जगत में आया आदमी कभी पूरी तरह से उससे बाहर नहीं जाना चाहता।

हिंदुस्तान में मात्र नौ हजार एकल सिनेमा घर हैं और धीरे-धीरे वे बंद होते जा रहे हैं। विरोधाभास यह है कि एक तरफ हम घटते सिनेमाघरों को लेकर विलाप कर रहे हैं तो दूसरी तरफ दर्शक संख्या औसतन तीस प्रतिशत ही रहती है। पहले तीन दिन की बहार से शेष चार दिनों की खिज़ा का अनुमान लगाना कठिन है और दूसरे सप्ताह में तो सिनेमाघर एक रैन बसेरे की तरह हो जाता है। तीस मार्च को बंद हुए रीगल में टिकट खरीदने वालों की कतार सर्पाकार होती थी। किसी दौर में रीगल का जलवा ही अलग होता था। मल्टीप्लैक्स की कमाई का आधार तीस प्रतिशत दर्शकों द्वारा खरीदा हुआ टिकिट नहीं वरन दर्शक द्वारा खरीदा पॉपकॉर्न, सैंडविच और शीतल पेय होता है। इस तरह से मल्टीप्लैक्स खाने-पीने का ठिया बन जाता है। नीरद चौधरी का कथन है कि भारतीय लोग नदियों, मेलों, तमाशों, उत्सवों को पसंद करने वाले और भोजनप्रेमी लोग हैं परंतु हमने अपनी नदियों को प्रदूषित कर दिया है और मेले-तमाशे का रूप बदल दिया है। अब हम चुनाव नामक नए मेले तमाशे को पसंद करते हैं, क्योंकि इसमें तरह-तरह के स्वांग रचे जा रहे हैं। बाजार की ताकतों ने हमें उस गन्ने की तरह बना दिया है, जिसका रस निकाला जा चुका है।

अधिकतर शहरों में रीगल नाम के सिनेमाघर हैं, रीगल नामक होटल, लॉज हैं। हमारा सामंतवाद के प्रति मोह अभी तक कायम है, जिस कारण रीगल नाम इतना लोकप्रिय है। एक दौर में इंदौर के रीगल सिनेमा में केवल टाई पहना आदमी ही बालकनी के टिकट खरीद सकता था। यह सिनेमा भी संभवत: 1935 में प्रारंभ हुआ था और शहर के मध्य में होने के कारण बहुमंजिला व्यापार केंद्र के लिए बड़ा मौजू़ है परंतु उसके मालिक भी केवल सिनेमाघर ही चलाना चाहते हैं।

सिनेमाघरों में घटती हुई दर्शक संख्या के कई कारण हैं। अब मनोरंजन के विकल्प उपलब्ध हैं। कानून व्यवस्था के ढीलेपन के कारण परिवार अंतिम शो में नहीं जाना चाहते। सबसे भयावह कारण यह है कि फिल्मों में मनोरंजन का अभाव है। दरअसल सिनेमा उद्योग में उन फिल्मकारों की संख्या ही कम है, जो भरपूर मनोरंजन रच सकें या मनोरंजन के साथ सामाजिक सौद्‌देश्यता को जोड़ सकें। अब ऐसी फिल्में कम बन रही हैं, जिनके बारे में यह कह सकें कि यह फिल्म नहीं देखी तो कुछ नहीं देखा। इसके साथ यह भी सच है कि विगत समय में ही 'पानसिंह तोमर,' 'वेडनस डे', 'विकी डोनर,पिंक' जैसी फिल्में बनी हैं। दरअसल, किसी भी क्षेत्र में साधारणीकरण करके आप किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते। कोई इबारत साफ नहीं पढ़ी जा सकती, अक्षर धुंधले नज़र आते हैं और शब्दों-वादों को भी फरेबी बना दिया गया है। फिल्म उजाला का एक गीत कुछ इस तरह था, 'नफरत है हवाओं में, दहशत है फिज़ाओं में, यह कैसा जहर फैला दुनिया के नज़ारों में, कोई रास्ता नहीं,कोई मंजिल नहीं, जाएं तो जाएं कहां।'

हर कालखंड में तेजी से बदलती दुनिया में, फिल्मों ने अपने आपको आज भी कायम रखा है और दर्शक रूठा हुआ-सा प्रेम लग रहा है और उसकी इच्छा है कि मेहबूबा उसे मनाए, कम से कम वापस आने का कोई संकेत तो दे ही दे। घर में छोटे परदे पर कथा फिल्म देखने का वह आनंद नहीं, जो सिनेमाघर में बैठकर देखने का आनंद होता है। इसके साथ ही हमें स्वयं को दिखाने का शौक भी सिनेमाघरमें ही पूरा होता है। अकेले बैठे दर्शक और सिनेमाघर में बैठे दर्शक की प्रतिक्रिया अलग-अलग होती है। भीड़ का हिस्सा बनकर मंदिर में प्रार्थना करना और अपने घर में बने छोटे मंदिर में प्रार्थना करने में अंतर होता है और कमोबेश ऐसा ही अनुभव सिनेमा देखने का भी है। नमाज घर में भी पढ़ी जा सकती है परंतु मस्जिद में अनेक लोगों के साथ नमाज अदा करना दो अलग-अलग अनुभव होते हैं।

के. आसिफ की 'लैला मजनू' के एक दृश्य में बादशाह नमाज अदा कर रहे हैं और दीवाना मजनू उनके सामने से गुजरने लगता है तो उसे डांटा जाता है कि नमाज में खलल डाल रहे हो। दीवाना मजनू कहता है कि लैला की याद में डूबा वह यह जानता ही नहीं कि कहां से गुजर रहा है परंतु बादशाह नमाज अदा करने में दिल से डूबे नहीं थे, इसलिए उन्हें खलल महसूस हुआ। असल बात है खुद में पूरी तरह डूबकर प्रार्थना करना। हम प्रार्थना का प्रहसन करते हैं, जबकि सभी धर्मों में यह बात समान है कि खुद को जान लेना ही महत्वपूर्ण है। प्राय: मनुष्य जितना झूठ स्वयं से बोलता है, उतना झूठ वह दूसरों से नहीं बोलता। 'नो दायसेल्फ' अर्थात 'आत्मन: विदी।'