कथा-समय में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज़ कराती लघुकथाएँ / सुकेश साहनी

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लेखकों/पाठकों के बीच निरंतर बढ़ती लोकप्रियता के बीच ‘कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता -14 ‘ का आयोजन संपन्न हो गया है और पन्द्रहवें आयोजन(लघुकथा -प्रतियोगिता ) की घोषणा की जा चुकी है। कथादेश के प्रभु जोशी (दिसंबर 2022 ) और विनोद कुमार शुक्ल (जनवरी 2023 )पर एकाग्र विशेषांकों के कारण परिणाम घोषित होने के बावजूद पुरस्कृत लघुकथाओं का प्रकाशन फ़रवरी 23 में संभव हो पा रहा है। सम्पादक कथादेश के पास एक विकल्प यह भी था कि परिणाम घोषित होते ही सीमित पृष्ठों में पुरस्कृत लघुकथाओं को नवम्बर 22 के अंक में प्रकाशित कर दिया जाता, परन्तु पहली प्रतियोगिता के आयोजन से ही उनके द्वारा पुरस्कृत लघुकथाओं को लेखकों के फोटो-परिचय सहित किसी विशेषांक की तरह कथादेश में प्रकाशित किया जाता रहा है, इस बार भी उन्होंने पुरस्कृत लघुकथाओं को पूर्ण महत्त्व देते हुए माह फ़रवरी 23 में प्रकाशित करने का निर्णय लिया। हम उन सभी प्रतिभागियों के आभारी हैं, जिन्होंने धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हुए पूर्ण सहयोग प्रदान किया। उल्लेखनीय है कि लघुकथा-जगत् में ‘कथादेश मासिक’ को बहुत सम्मान प्राप्त है, इसमें लघुकथा प्रकाशित होने पर लेखक इस उपलब्धि को गर्व के साथ प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि कथादेश द्वारा आयोजित इस प्रतियोगिता में भाग लेने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।

कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता से जुड़ रहे नए पाठकों के लिए यह जानकारी बहुत जरूरी लगती है कि प्रतियोगिता क्रमांक एक से ग्यारह तक की सभी पुरस्कृत लघुकथाएँ ‘कथादेश- पुरस्कृत लघुकथाएँ ‘ के रूप में प्रकाशित हैं , जिसे नयी किताब प्रकाशन, 1 / 11829 , ग्राउंड फ्लोर , पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली -110032 से प्राप्त किया जा सकता है। इस संग्रह के महत्त्व को इसी से समझा जा सकता है कि विभिन्न स्तरों पर आयोजित हुई/हो रही कुछ लघुकथा प्रतियोगिताओं में आयोजकों ने इस पुस्तक का चयन पुरस्कार देने के लिए किया है। एक साथ इतनी सशक्त, पुरस्कृत लघुकथाओं का यह पहला संग्रह है, जिसमें कथाकारों, निर्णायकों और सम्पादक कथादेश का श्रम निहित है। यह पुस्तक लघुकथा में रुचि रखने वाले हर लेखक, पाठक के पुस्तकालय में होनी ही चाहिए। भविष्य में यह प्रयास रहेगा कि कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता -11 के बाद की लघुकथाओं को भी इस पुस्तक के आगामी संस्करणों में शामिल किया जाए।

पावर विंडो (अरुण मिश्रा ),धरोहर(आनंद),मुजरिम(कुमार शर्मा ‘अनिल’),मानुस-गंध(सरोज परमार),गेट मीटिंग(उर्मिल कुमार थपलियाल),दृष्टि(जय माला),गाली(अरुण कुमार ),जरुरत,पिता (महेश शर्मा),कोशिश (मीना गुप्ता ), हार(राम करन)सीक्रेट पार्टनर(मीनू खरे)जैसी लघुकथाओं को प्रकाश में लाने का श्रेय कथादेश को जाता है, जिन्हें आज विभिन्न शोध लेखों में उत्कृष्ट लघुकथाओं के रूप में उद्धृत किया जाता है। देश-विदेश से प्रकाशित हो रहे महत्त्वपूर्ण संकलनों में कथादेश की इन पुरस्कृत रचनाओं ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज़ कराई है।

लघुकथा प्रतियोगिता-1 से 14 तक निर्णायक मंडल में मैनेजर पाण्डे, सुभाष पन्त, महेश कटारे, विभांशु दिव्याल, सुरेश उनियाल, हृषिकेश सुलभ, राजकुमार गौतम, सत्यनारायण, शिवमूर्ति, भालचंद्र जोशी, आनंद हर्षुल, योगेंद्र आहूजा, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, श्याम सुन्दर अग्रवाल, देवेंद्र, श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’, जितेंद्र रघुवंशी, गौतम सान्याल, जय प्रकाश, प्रियम अंकित, वैभव सिंह, हरिनारायण एवं सुकेश साहनी शामिल रहे।

लघुकथा प्रतियोगिता -14 के लिए लगभग छह सौ लेखकों ने ई-मेल से रचनाएँ भेजीं, करीब सौ लेखकों द्वारा डाक से भेजी गईं। प्रत्येक रचनाकार से नियमानुसार अधिकतम तीन लघुकथाओं की अपेक्षा की गई थीं, उसी के अनुसार अधिकतर लघुकथाएँ प्राप्त हुईं। किसी एक रचनाकार की प्रथम तीन से अधिक रचनाओं पर विचार नहीं किया गया। इस प्रकार देखा जाए, तो सदैव की भाँति बहुत ही कम लघुकथाओं को निर्णायकों के पास भेजने के लिए उपयुक्त पाया गया। सुखद पहलू यह रहा कि गत वर्ष की भाँति नवोदितों के अलावा कई वरिष्ठ कथाकारों ने प्रतिभाग कर आयोजन की गरिमा बढ़ाई।

लघुकथा में निरंतर हो रहे उथले लेखन के बावजूद लघुकथा अपनी विकास यात्रा में निरंतर आगे बढ़ी है, विभिन्न भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में इसके अनुवाद प्रकाशित हो रहे हैं, पाठ्यक्रम में शामिल है,जो पत्रिकाएँ पहले इन्हें छापने से परहेज़ करती थीं, वे इन पर विशेषांक प्रकाशित कर रही हैं,। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘साक्षात्कार’ का हाल ही में प्रकाशित लघुकथांक इसका उदाहरण है। योगराज प्रभाकर के संपादन में ‘लघुकथा-कलश’ के महविशेषांकों की शृंखला ने सभी नए-पुराने लेखकों को एक ही छतरी के नीचे लाने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इससे विधा को अपनी विकास-यात्रा में आगे बढ़ने की ताकत मिली है।

लघुकथा-जगत् के वर्त्तमान परिदृश्य पर निगाह डालें ,तो सोशल मीडिया पर लघुकथा लेखन में सक्रिय लेखकों की संख्या बहुत अधिक है। वर्षों पहले इस विधा में लिखने वालों कि संख्या बहुत सीमित थी। कथाकार पहले अपनी रचना पत्र-पत्रिकाओं में छपवाते थे और बाद में संग्रह प्रकाशित होता था, इस प्रक्रिया से संपादक के रचना चयन(स्वीकृति/अस्वीकृति) के स्तर पर ‘स्क्रीनिंग’ के फलस्वरूप बेहतर लघुकथा-संग्रह सामने आते थे। वर्त्तमान में अनेक ऐसे संग्रह देखने को मिल जाते हैं, जिनके रचनाकारों की कोई रचना संग्रह से पहले किसी पत्र -पत्रिका में देखने को नहीं मिलती। आत्ममुग्ध कथाकार द्वारा किताब छपवाने की हड़बड़ी के कारण ऐसे संग्रह विधा में अपनी पहचान नहीं बना पाते। ऐसे संग्रहों में अच्छी रचनाओं की तलाश से निराशा ही हाथ लगती है।

ऐसा भी नहीं है कि सोशल मीडिया से लेखन की शुरुआत करने वालों में प्रतिभा नहीं हैं, अनेक लेखकों ने इस प्लेटफार्म पर ही लिखना शुरू किया और आज प्रिंट तथा सोशल मीडिया में अच्छे लघुकथा लेखक के रूप में जाने जाते हैं। सोशल मीडिया में सक्रिय अधिकतर युवा लघुकथा लेखकों से वरिष्ठ लेखकों को मिल रहे प्यार और सम्मान के फलस्वरूप वरिष्ठों को उनके बीच ‘सेलिब्रिटी’ जैसा दर्ज़ा प्राप्त है। ऐसे वरिष्ठ, जो जमीन से जुड़े हैं, नए लेखकों से मिल रहे सम्मान के कारण आत्ममुग्धता के शिकार नहीं हुए हैं, नए लेखकों के लिए मार्गदर्शन की भूमिका निभा रहे हैं। नए-पुराने लेखकों कि यह जुगलबंदी लघुकथा के लिए बहुत लाभकारी है।

कथादेश प्रतियोगिता के पिछले चौदह आयोजनों में कुल प्राप्त रचनाओं और निर्णायकों के पास भेजी गईं लघुकथाओं के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि इस विधा में उत्कृष्ट लेखन सीमित मात्रा में ही हो रहा है।

प्राथमिक चयन में ही बड़ी मात्रा में लघुकथाओं के बाहर हो जाने के कारणों से अवगत कराने का विनम्र प्रयास पिछली टिप्पणियों में भी किया जाता रहा है। प्राप्त अधिकतर रचनाओं का विश्लेषण किया जाए, तो ‘मुख्य कारण’ यही सामने आता है कि इस विधा को बहुत आसान समझते हुए पर्याप्त मेहनत नहीं की जाती। ऐसे लेखकों के लिए रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’ की यह टिप्पणी गौर करने लायक है- ‘लघुकथा के वर्त्तमान परिदृश्य का अवलोकन करने से कुछ स्थितियाँ और उनके प्रतिफलन सामने हैं, जिनपर विचार करना आवश्यक है। कोई किसी भी विधा में रचना करे, उसके रचना-कर्म का उद्देश्य स्पष्ट रूप से परिभाषित होना चाहिए। लिखने के लिए लिखना, लेखन नहीं है। अन्य विधाओं की तरह लघुकथा एक गंभीर और श्रमसाध्य विधा है। अन्य विधाओं में स्थान न बना पाने के कारण ‘लघुकथा में ही हाथ आजमा लिया जाए’ इस तरह की सोच से लघुकथा का अहित ही अधिक हुआ है। जब लघुकथा में आपाधापी की बात आती है,तो वहाँ कुछ इतने समर्पित योद्धा भी हैं की उन्हें एक या दो लघुकथाएँ प्रतिदिन लिखनी ही हैं। उस लिखे को साँस लेने का अवसर दिए बिना, किसी न किसी पत्रिका /अखबार /फेसबुक के लिए समर्पित कर देना है ।(लघुकथा :लेखन से सृजन तक से)

राजेंद्र यादव सदैव कहते थे -‘लघुकथा लेखन बहुत कठिन है, मैं नहीं लिख सकता,हालाँकि उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण लघुकथाएँ लिखीं। वरिष्ठ कथाकारों में संभवतः वह पहले थे, जिन्होंने अपनी लघुकथाओं को छोटी कहानी या लघु कहानी कहने पर बल नहीं दिया। हंस में अपनी रचनाओं को ‘लघुकथा’ के रूप में ही प्रकाशित किया।

पिछले दिनों ‘लघुकथा-साहित्य’ पर बलराम अग्रवाल ने एक पोस्ट साझा की थी, जिसमें उन्होंने नई कहानी के उन्नायकों में एक कथाकार मोहन राकेश के लेख ‘मैं कहानी क्यों लिखता हूँ’ से चुनिंदा अंश प्रस्तुत किये थे। लघुकथा को आसान विधा समझकर, बिना श्रम किये प्रतियोगिता हेतु रचनाएँ भेजने वाले साथियों को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए-

‘कहानी छोटी भी लिखी जा सकती है और बड़ी भी, मगर बात उस नुक्ते को पकड़ने की है, जीवन के उस व्यंग्य, संवेद, विरोध या अन्तर्विरोध को शब्दों में उतारने की है जो कई बार अपनी सूक्ष्मता के कारण पकड़ में नहीं आता। बात वही साधारण होती है। वही जीवन हम-सब जीते हैं। लगभग एक-सी परिस्थितियों से हम सभी को गुजरना पड़ता है। कोई भी अच्छी कहानी हम पढ़ें, जीवन का वह खंड-सत्य हमारे लिए अपरिचित नहीं होता। उस सत्य को कैसे उठाना है, कितनी बात कहनी है और किन सार्थक शब्दों में कहनी है-यह जानना ही सम्भवतः कहानी कहने की कला है। हम जानते हैं कि अपरिचित और असाधारण जीवन को चित्रित करने वाली रचनाएँ उतनी लोकप्रिय नहीं होतीं, जितनी साधारण, रोजमर्रा के जीवन को चित्रित करने वाली रचनाएँ। मैं साधारण जीवन जीता हूँ और हर दृष्टि से एक बहुत साधारण व्यक्ति हूँ। इसलिए भी कहानी लिखना, अपनी इस साधारणता के वातावरण को कहानी में ढालना, मुझे स्वाभाविक लगता है। ‘

मोहन राकेश की यह टिप्पणी कहानी को लेकर है, यहाँ इस टिप्पणी को देने का यही उद्देश्य है कि ‘बड़े’ कथाकारों की अपने सृजन को लेकर चिंता, सजगता और जागरूकता से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए। क्या लघुकथा लेखक अपने रचना-कर्म को लेकर इतना गंभीर है? क्या वह अपनी लिखी जाने वाली रचना के ‘कथ्य’ को लेकर इतना चिंतन करता है? अन्य विधाओं की भांति लघुकथा भी बहुत श्रम की माँग करती है। प्राथमिक छंटनी में अधिकतर रचनाओं के प्रतियोगिता से बाहर हो जाने का प्रमुख कारण ही यही है कि लघुकथा लेखन को ‘चुटकियों का खेल’ समझ लिया जाता है।

देखने में यह भी आ रहा है कि रचना के अंत के में जिस तरह की वैचारिक टिप्पणी जड़ दी जाती है, उससे कथा का समापन ‘निबंध’ जैसा हो जाता है। ‘पंच लाइन’ को लेकर झंडे गाड़ने के अतिरिक्त मोह के कारण लघुकथा और कहानी के बीच की बारीक विभाजक रेखा का अतिक्रमण देखने को मिलता है-

‘लघुकथा: प्रकार, प्राविधि और भाषा’ विषयक आलेख में गौतम सान्याल लघुकथा और कहानी के अंतर को बहुत ही रोचक अंदाज़ में पेश करते हैं जो युवा लेखकों के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है-

‘लघुकथा न तो कहानी की भूमिका है और न ही परिशिष्ट। कहानी उपस्थित समाज का आख्यानपरक ब्लूप्रिंट है, जबकि लघुकथा सम्भावित समाज का कथाकली–निर्देश । कहानी अगर नृत्य है, तो लघुकथा एक सार्थक भावमुद्रा। लघुकथा कथ्य की कोख में अँखुआया हुआ मानवता का वह कथात्मक क्षण है, जो हमें युग–युग तक नई प्रेरणा और उत्तेजना प्रदान करता है,एक ही कथ्य, परिधि से केन्द्र की ओर चले, तो लघुकथा और केन्द्र से परिधि की ओर चले तो कहानी का जन्म हो सकता है, बशर्ते हम व्यक्त करने और व्यंजित होने के फर्क को ध्यान में रखें। लघुकथा कहानी की तरह ‘कथा’ को व्यक्त नहीं करती, व्यंजित कर देती है-

‘एक था राजा, एक थी रानी, दोनों मर गए–खत्म कहानी’–यह कहानी की भाषा नहीं, बल्कि कविता की भाषा है। कहानी की भाषा यह है कि, राजा रानी से बेहद प्यार करता था, रानी बीमार थी और एक दिन राजा शिकार से लौटा, तो उसने पाया कि रानी मर चुकी है–और राजा उसके शोक में मर गया। कहानीपन ‘जाड़े की उदास शाम’ के चित्रण में है, जब राजा आखेट से लौट रहा था और रह–रहकर उसे आज के आखेट का वह दृश्य याद आ रहा था कि किस तरह वह मासूम सिंह शावक अपनी माँ के निष्प्राण शव को चाट रहा था। राजा शिकार से महल में लौटा, तो देर तक अपनी प्रियतमा की निर्जीव देह के सिरहाने बैठा रहा। फिर अचानक उठकर उसने आदेश जारी किया कि आज से राज्य में निरीह वन्य प्राणियों का शिकार, दंड–योग्य अपराध है। दूसरी सुबह उसे मृत पाया गया।

इस कथ्य–निर्देश से सिनिसिज्म (दृश्यपरकता) को निकाल दें, इससे नैरेटिव डिस्कोर्स को पृथक् कर दें और इसी को एक परिदृश्यात्मक चित्रात्मकता में प्रस्तुत करें, तो यही एक लघुकथा बन सकती है। मैंने अवधी का एक लोकगीत सुना है, जिसमें ऊँची अटारी पर बैठी हुई कौशल्या माता से एक हरिणी रो–रोकर शिकायत करती है कि किस तरह उसके पुत्रों ने एक अदद मृगछाला के लिए उसके परम प्रिय हरिण का वध कर दिया है। कौशल्या जवाब नहीं दे पाती, अटारी से हट जाती है और अशांत मन को शांत करने के लिए ध्यान के निमित्त जिस पर बैठती है, वह मृगछाला ही होती है। ‘यह लघुकथा है। ‘

प्रतियोगिता हेतु प्राप्त लघुकथाओं में से कुल 24 लघुकथाओं का चयन निर्णायकों के पास भेजने हेतु किया जा सका । निर्णायकों (कथाकार शिवमूर्ति ,आलोचक वैभव सिंह और कथाकार सुकेश साहनी) द्वारा दिए गए अंकों के आधार पर प्रथम 10 पुरस्कृत लघुकथाएँ निम्न हैं –

(1)संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण (सुषमा गुप्ता ), (2) ञ माने कुछ नहीं (सोनाली ), (3) बादल (राम करन ), (4) रोटी शो (रोचिका अरुण शर्मा ), (5)पालनहार (मधु जैन), (6) बदलती प्रश्नावली (शील कौशिक), (7) कारोबार (सतीश सरदाना ), (8)भोर की पहली किरन(सीमा वर्मा ), (9) अपने -अपने अबुर्द (अश्विनी कुमार आलोक), (10) चश्मे का नंबर(अंतिमा सिंह)

कथादेश परिवार और निर्णायकों की ओर से पुरस्कृत सभी लघुकथा लेखकों को हार्दिक बधाई!

शेष चयनित लघुकथाओं का विवरण निम्नानुसार है –

नंगा (दिव्या शर्मा), गुमनाम (अर्चना राय), बुनियाद से झंडे तक (मुकुल जोशी), कच्ची इमारत,गहरी लकीरें (वीरेंद्र ‘वीर’ मेहता), सुवास ( नमिता सचान ), मुसहर टोला (ज्योति स्पर्श), पंथ निरपेक्षता (अरिमर्दन कुमार सिंह ), आदतें (सारिका भूषण), ताकत (राजीव रोहित), गीता का ज्ञान (अखिलेश श्रीवास्तव चमन ), एक लोहार की (अनिता ललित ), दंश (ऋचा शेखर ‘मधु’), रात यहीं बिताने दो (शंकर मुनि राय), अफवाह (वाचस्पति सौरभ ‘रेणु’),

अंतिम चक्र तक पहुँची लघुकथाओं को कथादेश के सामान्य अंक में प्रकाशित किया जाता रहा है। जाहिर सी बात है कि इसमें समय लगता है, धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इस बार तो वैसे भी बहुत विलम्ब हो गया है, इस स्थिति में जो लेखक इसमें रुचि न रखते हों और अपनी रचना अन्यत्र छपवाना चाहते हों, वे कथादेश को सूचित करते हुए अपनी रचना अन्यत्र भेज सकते हैं, ताकि भविष्य में रचना के प्रकाशित/अप्रकाशित होने को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो।

यहाँ भी यह स्पष्ट करना है कि सभी पुरस्कृत लघुकथाएँ स्वागत योग्य हैं। गुणवत्ता के आधार पर ही इनका चयन हुआ है। इन रचनाओं पर चर्चा का उद्देश्य लघुकथा के विकास के लिए बेहतर ज़मीन तैयार करना होता है, न कि रचना की कमजोरियाँ गिनाना। विमर्श के इस दोतरफा आदान-प्रदान से निर्णायकों समेत सभी को कुछ सीखने को मिलता है। निर्णायकों से बड़ा तो आम पाठक होता है। कथादेश के स्तम्भ ‘अनुगूँज’ में पाठक निर्णायकों के निर्णय पर खुलकर अपना फैसला सुनाते हैं।

इस बार राम करन, मधु जैन और अश्विनी कुमार आलोक को छोड़कर सात कथाकार पहली बार कथादेश प्रतियोगिता में पुरस्कृत हो रहे हैं। पिछले चौदह वर्षों में इस प्रतियोगिता के माध्यम से अनेक नए कथाकारों ने अपने उत्कृष्ट लेखन से लघुकथा जगत् में अपनी पहचान बनाई है।

सुषमा गुप्ता की लघुकथा ‘संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण’ निर्णायकों के सम्मिलित अंकों के आधार पर प्रथम स्थान के लिए पुरस्कृत हुई। इधर लेखकों में ‘लघुकथा में प्रयोग’ का चलन बढ़ा है, इस तर्ज़ पर लिखी जा रही रचनाओं को देखकर यही लगता है कि इनमें अति उत्साह के चलते कुछ अलग कर दिखाने की हड़बड़ी ही अधिक है, जबकि सुषमा गुप्ता ने कथ्य की माँग पर ‘डायरी शैली’ में सफल प्रयोग किया है, कोष्ठक में स्टेटस अपडेट के साथ जिन फोटोज का ब्यौरा दिया गया है, उससे पाठक और भी गहरे रचना से जुड़ जाता है। एक अति साधारण , रोजमर्रा के जीवन में घटने वाली घटना को लेखिका ने अपनी कथा का विषय बनाया है, जिससे हम रोज ही दो-चार होते हैं। फेसबुक पर हम खुद किसी प्रियजन के आकस्मिक निधन पर दुखी हो जाते हैं, ‘सादर नमन’ करते हैं और अगले ही कुछ क्षणों में किसी दूसरी पोस्ट पर हँसता हुआ ‘इमोजी’ चिपका देतें हैं। इस लघुकथा में पुत्र अपने पिता की बीमारी की सूचना फेसबुक-मित्रों से साझा करता है, पिता की मृत्यु तक का स्टेटस अपडेट करता जाता है। पुत्र का अपनी प्रोफ़ाइल पर आए ढेरों कमेंट्स का पढ़ना, साथ वाले कमरे में माँ का खाँस-खाँसकर दोहरे होते हुए, बेटे से ख़त्म हो गई दवाइयों को लाकर देने की अपेक्षा, बेटे का माँ को झिड़कना और समय मिलते ही दवाएँ लाकर देने की बात करना। लघुकथा के अंत को लेकर अक्सर बात होती है कि इसे विस्फोटक / धारदार/ होना ही चाहिए, जबकि जरूरी यह है- लघुकथा का अंत कथानक/ कथ्य के अनुरूप होना चाहिए। लघुकथा का समापन प्रभावी है, लेखिका ने अंतिम पंक्ति में प्रयुक्त शब्दों के चयन में श्रम किया है, जिससे लघुकथा का कथ्य चरमोत्कर्ष पर पूर्णता को प्राप्त करता है- ‘पिता जी के बाद माँ की हालत बिगड़ने लगी है। हे ईश्वर ! मुझ पर रहम करो। मुझमें अब और खोने की शक्ति नहीं बची है। ‘ अपने विशिष्ट लेखन के दम पर विभिन्न विधाओं में पाठकों के बीच निरंतर लोकप्रिय होती लेखिका ने लघुकथा के क्षेत्र में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज़ कराई है।

द्वितीय पुरस्कार के लिए चयनित सोनाली की लघुकथा ‘ञ माने कुछ नहीं’ छुआछूत जैसे पुराने विषय पर नवीन और प्रभावी प्रस्तुति के कारण निर्णायकों का ध्यान खींचने में सफल रही है। वर्णमाला को लेकर कक्षा में टीचर और बच्चे के बीच हुए संवाद, अछूत और निरर्थक समझे जाने वालों को लेकर, जो प्रश्न खड़े करते हैं ,वे आज भी अनुत्तरित हैं। कक्षा में टीचर पढ़ा रही है -च से चरखा, छ से छतरी, ज से जहाज, झ से झरना ,ञ माने कुछ नहीं ..। कक्षा में मौजूद अबोध बच्चा टीचर से सवाल करता है, “सच में कुछ नहीं ?जिसके माने कुछ नहीं तो वह क्यों है यहाँ ? पंक्ति से बाहर क्यों नहीं बिठा दिया गया?” प्रश्न के उत्तर में टीचर कहती है,”ये कैसा सवाल बेतुका-सा! जो सदियों से चला वो क्रम से किस तरह अलग हो सकता है। “

अछूत वर्ग से संबधित बच्चे के मासूम सवाल, जो उसके दिमाग में दादी, अम्मा द्वारा दी जानकारी के कारण सिर उठाते हैं, “तो फिर हमें क्यों अलग बिठा दिया जाता है भोज की पंक्तियों में बाकियों से दूर? हमारे माने भी तो सदियों से कुछ नहीं रहे हैं। “

यहाँ लेखिका के रचना-कौशल और कल्पनाशीलता की तारीफ करनी होगी, बच्चा पूछता है कि ‘ञ’ भी साँस भरता है? रोता है? जैसे कि हम। उसे दुत्कार क्यों नहीं मिलता च,छ ,ज और झ से,जबकि ये सब तो हमें हमेशा से अछूत और निरर्थक समझते हैं। इस सृजनात्मक टिप्पणी से हमारा ध्यान एकाएक उन बेजान वस्तुओं की ओर चला जाता है, जिन्हे गंगाजल की तरह पवित्र माना जाता है,और वहीं किसी अछूत कहलाने वाले हाड़-मांस के साफ़ -सुथरे,निष्पाप व्यक्ति के स्पर्श मात्र से खुद को गंगाजल छिड़ककर पवित्र किया जाता है। विडंबना यह है कि सदियाँ बीत जाने पर भी हमारा समाज छुआछूत के इस कलंक से मुक्त नहीं हुआ है।

तीसरे स्थान के लिए पुरस्कृत राम करन की लघुकथा ‘बादल’ हमारा साक्षात्कार उस ‘डर’ से कराती है, जिसमें आज भोला-भाला निरपराध आम आदमी जीने को विवश है। राम करन की ‘हार’ लघुकथा पूर्व में भी कथादेश प्रतियोगिता में प्रथम स्थान के लिए पुरस्कृत हो चुकी है, परन्तु इस कथा का कथ्य विश्व के किसी भी मुल्क में घटा हो सकता है। लघुकथा में सत्तर साल का अब्दुल गनी है, जिसका व्यवहार एकदम बदला हुआ है-वह गुमसुम,अकेला और डरा हुआ रहने लगा है। खासतौर पर अपने बेटे असलम को लेकर बहुत परेशान रहता है । जैसे ही उसके आने में देर होती है ,अँधेरा होने लगता है, तो पूछने लगता है ,”असलम आया क्या ..अब तक क्यों नहीं आया ?..जल्दी घर आना चाहिए।” इतने घबराया रहता कि कोई बाहर से आवाज़ देता, तो सन्न रह जाता, चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगती। दंगों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय फलक पर लिखी गई रचना में राम करन शब्दों के चयन में बहुत ही संतुलन बरतते हैं, कहीं हिंदू-मुस्लिम शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। पत्नी के संवाद से ही पाठक को पता चलता है की लक्ष्मी नारायण अब्दुल गनी के बहुत अच्छे दोस्त हैं। उनके इस व्यवहार से चिंतित रशीदा हैरान रह जाती है,जब पति के मुँह से सुनती है कि बांग्लादेश के हालत अच्छे नहीं हैं। रचना लघुकथा की प्रकृति के अनुकूल अंत में एकाएक पाठक के सामने खुलती है –

” हाय अल्लाह! रशीदा चीख पड़ी, बांग्लादेश से हमें क्या? हम तो हिंदुस्तान में रहते हैं। “

“वहाँ दंगा हुआ है न..।” अब्दुल गनी धीरे से बोले।

“तो ..।”

“इधर का बादल उधर बरसता है …उधर का इधर …”-अब्दुल गनी फुसफुसाए।

लघुकथा पहली पंक्ति से ही पाठक को बाँध लेती है और जिज्ञासा बनी रहती है कि आगे क्या होने वाला है। अंत में लेखक विश्व स्तर पर बदलते उन हालात की ओर हमारा ध्यान खींचता है, जहाँ कहीं भी दंगा हो जाने पर विश्व के किसी कोने में बैठा व्यक्ति बिना किसी वजह के असुरक्षित ही महसूस नहीं करता, दंगो का शिकार तक हो जाता है। कथा भले ही दंगों ओर उसके विश्वव्यापी प्रभाव की बात करती हो; लेकिन बरबस हमारा ध्यान विश्व स्तर पर पनप रहे रंगभेद,रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन में पैर पसारते कोरोना ओर भी जाने कितने कारणों से उत्पन्न ‘डर ओर असुरक्षा’ की ओर चला जाता है, जिससे हम दिन -रात खुद को घिरा महसूस करते हैं।

पुरस्कृत लघुकथाओं में सत्तर प्रतिशत उपस्थिति महिलाओं की हैं, दो दशक पहले लघुकथा लेखन में महिलाओं की संख्या बहुत सीमित थी, अधिकतर लघुकथाओं के विषय भी घर-परिवार से सम्बंधित होते थे। इधर सोशल मीडिया पर लघुकथा लेखन में सक्रिय महिलाओं की संख्या कहीं अधिक हैं, घर-परिवार के दायरे से निकलकर विविध विषयों पर उनकी लेखनी चल निकली है। चौथे स्थान के लिए पुरस्कृत रोचिका अरुण शर्मा की ‘रोटी शो’ और पाँचवे स्थान के लिए चयनित मधु जैन की ‘पालनहार’ सड़क पर करतब दिखाने वाले खानाबदोश परिवारों को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। ‘रोटी शो’ में अमीर घर की मायरा टी वी पर टैलेंट शो में भाग लेने के बाद मुंबई घूमने निकलती है, तो उसकी नज़र सड़क पर रस्सी पर चलने का करतब दिखा रही खानाबदोश लड़की पर पड़ती है, मायरा अपने पिता से सवालों की झड़ी लगा देती है। लेखिका ने लघुकथा में लीक से हटकर मायरा के परिवार की सकारात्मक सोच को दिखाया है, जो गरीबी में जी रहे लोगों को नीची निगाह से नहीं देखते, जिसका प्रभाव मायरा पर भी पड़ा है। मायरा के पिता और नानी के मायरा से संवाद से पूरी कथा बुनी गई है और सड़क पर करतब दिखाने वाली गरीब बालिका की जिजीविषा का मार्मिक चित्रण हुआ है-

“पर यह सड़क पर तमाशा क्यों करती है।”

“यह लड़की बहुत गरीब है मायरा, इसे पैसे कमाने के लिए यह शो करना पड़ता है।”-कहते हुए पिता का दिल भर आता है।

“इस शो को क्या कहते है पापा?” मायरा का मासूम सवाल।

पिता को कुछ सूझता नहीं है, “शायद रोटी शो।”

नानी का वीडियो कॉल आने पर मायरा रस्सी पर चलती लड़की को दिखाते हुए नानी से पूछती है, “नानी यह लड़की टीवी वाले टैलेंट शो में रोटी शो क्यों नहीं दिखाती?”

लघुकथा के अंत की प्रशंसा करनी होगी, इसी प्रकार के सांकेतिक और अर्थगर्भी अंत की अपेक्षा कथाकार से की जाती है-“जब पेट की भूख सताती है, तब यह टैलेंट आता है मायरा, इसके ऑडियंस भी सिर्फ सड़क पर मिलते हैं।”

मधु जैन की ‘पालनहार’ में खानाबदोश परिवार के दस वर्षीय बालक मंगू के माध्यम से उस तबके की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है,जो अपने और परिवार के पेट भरने के लिए जान हथेली पर लेकर करतब दिखाने को विवश है। अपने पूरे परिवार के लिए ‘अन्नदाता’ की भूमिका निभाता मंगू खुद पेट भर नहीं खा सकता; क्योंकि ज्यादा खाएगा तो वजन बढ़ जाएगा, करतब नहीं दिखा पाएगा और परिवार का पेट भी नहीं भर पाएगा। बहुत ही मार्मिक अंत वाली लघुकथा।

छठे स्थान के लिए पुरस्कृत शील कौशिक की लघुकथा ‘बदलती प्रश्नवाली’ वस्तुतः डरी हुई माँओं की व्यथा-कथा है।

लघुकथा में कुछ विकृत मानसिकता के लोगों के कारण माँओं और बच्चों के जीवन पर पड़ते विपरीत प्रभाव का चित्रण हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में लड़कियों और बच्चों के साथ यौन शोषण की जो घृणित घटनाएँ हुई हैं, उनके कारण बच्चों से उनका स्वाभाविक भोला -भाला बचपन छिन गया है,। माँएँ इस कदर डरी हुईं हैं कि बच्चों के मानसिक विकास के लिए जरूरी व्यवहार से इतर किसी जासूस या पुलिस वाले जैसे सवाल करती हैं-कोई शिक्षक तुम्हारा हाथ तो नहीं पकड़ता? कोई तुम्हारी तरफ घूरता तो नहीं? वैन का ड्राइवर तुम्हें छूने का प्रयास तो नहीं करता? कोई तुम्हारी अत्यधिक प्रशंसा तो नहीं करता?

माँ के इस अंतिम सवाल पर स्वाति सचेत हो जाती है …उसकी साँसें अटक जाती हैं …”भाटी सर..” कंधे से बैग पटककर, बिना यूनिफार्म बदले वह दौड़ती हुई माँ के गले लग जाती है।

सतीश सरदाना की लघुकथा ‘कारोबार‘ निर्णायक-मंडल के अंकों के आधार पर सातवें स्थान के लिए पुरस्कृत हुई है। इस रचना में कम्पनी के मालिकों द्वारा गरीब मजदूरों के श्रम को निचोड़ने के लिए अपनाए जा रहे हथकंडों का बहुत ही रोचक वर्णन है। एम डी महोदय आधा घंटा अपने बचपन की गरीबी और माँ के त्याग पर बोलते हुए वर्कर्स को शीशे में उतारते हैं, इस हाथ दे उस हाथ ले का हथकंडा अपनाते हुए कुछ घोषणाएँ करते हैं। रचना के अंत से लघुकथा अर्थपूर्ण हो गईं है, टॉफी कम्पनी के मालिक के बरक्स देश के राजनेता खड़े दिखाई देते हैं-

ए सी आफिस से पसीना पोंछता सेक्रेटरी बाहर निकला, “बॉस टॉफी कम्पनी चला रहा है या देश?”

सीमा वर्मा की ‘भोर की पहली किरन’ में गाँव की दाई माँ के चरित्र पर फोकस कर लेखिका ने यह सन्देश सम्प्रेषित करना चाहा है कि गरीबी और अभावों में जीते लोगों में अपने सपनों को त्यागकर दूसरों के लिए कुछ करने का जज्बा कहीं अधिक देखा जाता है। दाई माँ का एक ही सपना है-जीवन के बचे -खुचे दिन वृंदावन में जाकर गुजारे, अगले दिन सुबह वह वृंदावन जाने कि पूरी तैयारी कर सोने की कोशिश कर रही होती है कि तभी नौ महीने की गर्भवती नक्कु दर्द से कराहती उसके दरवाजे पर आ जाती है, जमील की घरवाली नक्कु का कोई नहीं है। पति शहर गया था, फिर वापस नहीं लौटा। बच्चे के रुदन के साथ नक्कु दम तोड़ देती है। बच्चे की जिम्मेवारी फिर दाई माँ पर आ जाती है। वृंदावन जाने के लिए तैयार किया बक्सा वह वापिस पलंग के नीचे सरका देती है।

अश्विनी कुमार आलोक की लघुकथा ‘अपने-अपने अर्बुद’ नौवें स्थान पर रही। घर -परिवार को लेकर पवन शर्मा ने अद्भुत लघुकथाएँ लिखीं है, पृथ्वीराज अरोड़ा की ‘कथा नहीं’ इस श्रेणी की उत्कृष्ट लघुकथा है। कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता-13 में अश्विनी कुमार आलोक की लघुकथा ‘नृशंस’ पुरस्कृत और प्रशंसित हुई थी। ‘अपने-अपने अर्बुद’ भी एक सशक्त लघुकथा है। पति, पत्नी, उद्भव और आलिया ‘अपने-अपने द्वीप’ की तरह व्यवहार करते हैं। हमारे जीवन में मोबाइल, इंस्टाग्राम, वाट्सएप, गूगल, विकिपीडिया, जोमैटो और ऑनलाइन ऑर्डर का हस्तक्षेप बढ़ता ही जा रहा है। कथा में लेखक ने विभिन्न घटनाओं के साथ इनका आवश्यकता के अनुसार उपयोग किया है। इन सबके बीच पति का अपने परिवार के लिए चिंतित होना पत्नी को पागलपन लगता है, वह पति को नींद की एक गोली और एक गिलास पानी थमाकर सोने चली जाती है।

दसवें स्थान के लिए पुरस्कृत अंतिमा सिंह की लघुकथा ‘चश्मे का नंबर’ का विषय बहुत पुराना है। कहानी में एकाएक हृदय परिवर्तन को कमजोरी के रूप में देखा जाता है। लघुकथा में तो इसका अवसर और भी कम होता है। मंदिर की सीढ़ियों से उतरते हुए संतुलन बिगड़ने पर अचानक दादी का चश्मा सीढ़ियों के किनारे बनी गंदी नाली में गिर जाता है। नीचे खड़ा सफाईकर्मी तुरंत नाली में हाथ डालकर चश्मा निकलता और साफ पानी मे धोकर मंदिर की सीढ़ियों पर रखकर खुद डरकर दूर खड़ा हो जाता है!

“क्यों दादी ये चश्मा तो अब अछूत हो गया न?”

पोती की बात सुनकर दादी सीढ़ियों पर रखे गीले चश्मे को अपनी सूती साड़ी के पल्लू से साफ करती हैं और सफाईकर्मी को पास बुलाकर कहती हैं ,”लगता है अब तक गलत नम्बर का चश्मा पहनकर मंदिर आती थी।”

यहाँ दादी का हृदय परिवर्तन अविश्वसनीय लगता है; परन्तु लेखिका ने ‘दादी की बात सुनकर पोती ने उछलकर मंदिर की घंटी बजा दी’ जैसा अंत लिखकर रचना का एक और पाठ पाठकों के सामने खोल दिया है।

और अंत में

कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता-15 की घोषणा हो गई है, लघुकथाएँ भेजने की अंतिम तिथि 28 फरवरी है, रचनाएँ प्राप्त होने लगी हैं। सम्पादक कथादेश से बहुत से लेखकों द्वारा पूछा जा रहा है कि लघुकथा की शब्द सीमा कितनी होनी चाहिए। कितना विचित्र प्रश्न है? इसका एक ही उत्तर हो सकता है कि रचना को ‘लघुकथा’ होना ही चाहिए। लघुकथा में प्रयोग को लेकर विभिन्न शैलियों में इधर जो प्रयास हो रहे हैं, उनमें बहुत हड़बड़ी और कच्चापन दिखता है, जैसे किसी बच्चे को बड़ों के कपडे पहना दिए गए हों, इस सन्दर्भ में लघुकथा-कलश के संपादक द्वारा नवोदितों को दिया जा रहा मार्ग दर्शन प्रशंसनीय है। उल्लेखनीय है कि लेखक के भीतर जो सामग्री है. वही यह तय करेगी कि उसे प्रभावी प्रस्तुति के लिए किस शैली में ढलना है, एक उदहारण –

कोलाज़

एक सर्वें के मुताबिक गर्भपात के लिए नर्सिंग होम लाई जाने वाली कुँआरी माँओं की औसत आयु उन्नीस से घटकर हुई चौदह (अमेरिका की ‘बार्बी गुड़िया की तर्ज पर जापान में बनने वाली गुड़िया ‘रीकाचान’ हुई गर्भवती,बच्चों के बीच दिनोंदिन हो रही लेाकप्रिय)'t लगातार तीसरी बच्ची पैदा होने पर एक व्यक्ति ने अपनी तीनों बेटियों की गोली मारकर कर दी हत्या……पत्नी के बेटा पैदा न कर पाने से खिन्न था पति (टैक्नेलॉजी हैज नाउ बीन एबल टू इनश्योर दैट द गर्ल चाइल्ड विल नाट इवनबी कंसीव्ड) दो जून रोटी के लिए खेतों में जुलाई के लिए हल को बैलों की जगह खींच रही महिलाएँ और लड़कियाँ। सोनीकोल ने गरीबी और भुखमरी के कारण बेच दिया अपने इकलौते एक वर्षीय कलेजे के टुकड़े को (हंग्री क्या? डायल हंग्री हैल्पलाइन! आधे घण्टे में होम डिलिवरी) देवास जिले के सुदूर बसे गाँव के दरबार सिंह के अनुसार गाँव में आज तक किसी ने नहीं देखा कोई स्कूल और न ही कोई मास्टर (घर बैठे शिक्षा पाएँ,जस्ट लॉग आन टू टीचर्स डॉट काम) दूसरों का मैला ढोने पर मजबूर दलित महिलाएँ गाँव से दूर गंदे तालाब का पानी पीने पर मजबूर। गलती से जब कभी उनका घड़ा दूसरे घड़े से छू जाता है, दूसरी महिलाएँ फोड़ देती हैं उनका घड़ा (याहू!! वाटरवर्ल्ड में रहूँगा मैं …..दिन-दिन भर घूमूँगा….मस्ती में झूमूँगा…घर नहीं जाऊँगा मैं) मुम्बई की लोकल ट्रेन में दिन दहाड़े बालिका से हुआ गैंगरेप (चैट विद रियल ‘टीन लीजा हू सेटस् द हार्ट ऑन फायर। अवर डॉल्स नेवर से ‘नो) बिहार के मरबल जिले के तीरा गाँव में सविता देवी की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि वह काली थी (दो हफ्तों में मनचाहा गोरापन पाएँ, मिल्की व्हाइट अपनाएँ) विज्ञापनों में महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में दिखाने से महिला सांसद नाराज। सर्वदलीय बैठकर बुलाकर सख्त कानून बनाने की अपील (पश्चिमी अफ्रीका में आयोजित क्वीनकोन्सेटस् के मानकों के अनुसार नारी का शरीर गिटार जैसा होना चाहिए। आदर्श क्वीन की देह का आकर्षण उसके भरे-पूरे नितम्ब हैं। नारी चले तो इन नितम्बों का हिलना अपने आप में आकर्षक होना चाहिए) स्टैण्डर्ड एण्ड पुअर्स ने भारत की रेटिंग घटाई। दूसरी बड़ी ग्लोबल रेटिंग एजेंसी ‘मूडीज’ ने भी एस एण्ड पी की हाँ में हाँ मिलाई। साम्राज्यवादियों की ये दोनों वित्तीय संस्थाएँ विश्व पूंजीवाद और खासकर साम्राज्यवाद की आवश्यकताओं और भविष्य के मद्देनजर काम करती हैं। इनकी नजर भारत के विशाल बाजार और समृद्ध प्राकृतिक सम्पदा पर है। घटती रेटिंग के दबाव के चलते भारत का शासक वर्ग अपने ही देश के मजदूरों के सस्ते श्रम को निचोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता (इण्डिया एक चमकता हुआ ब्राण्ड है। अगले दशक में शामिल होगा दुनिया की तीन बड़ी ताकतों में। पिछले तीन वर्षों में सरकार की उपलब्धियों की विस्तृत जानकारी के लिए जस्ट लाग आन टू शाइनिंग इण्डिया डॉट कॉम)

(कथादेश, फरवरी 2013)