कबिरा की कासी / कुमार रवीन्द्र

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एक स्मृतिगाथा कबिरा की कासी की

                                                                              
‘बनारस
एक चादर है
जिसकी बुनावट में कहीं-न-कहीं कबीर हैं

जो भी इसे
साँचे मन से ओढ़ता है एक बार
अलग नहीं रह पाता एक पल भी
स्मृति से
ऐसी लिपट जाती है वह चादर’
— शिवकुमार पराग

कबिरा की कासी, बाबा विश्वनाथ की काशीनगरी, आम आदमी का बनारस और शासकीय केन्द्र वाराणसी— इन्हें मेरा जानना आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व का है। और, सच में, तभी से लिपटी है मेरी स्मृति से कबीराई बुनावट की यह चादर।हाँ,जतन-से-ओढ़ी-नहीं-गई यह चादर पता नहीं कहाँ-कहाँ का मैल लपेट लाई है। भारतेन्दु की नगरी से बहुत दूर मैं आ बसा हूँ उनके पूर्वजों के मूलस्थान अग्रोहा के पड़ोसी नगर हिसार-ए-फिरोज़ा में। इस पचास साल के अंतराल में बस दो बार जा सका हूँ बनारस, किंतु दोनों बार पचास वर्ष पहले का ही बनारस मेरी याद से लिपटा रहा। इक्कीसवीं सदी की तेज चाल में ढलता, ‘मल्टीप्लेक्स’ और ‘मैक्डोनाल्ड’ की फ़िलवक्ती रवायत को अपनाता आधुनिक बनारस पिछली बार इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में जाने पर भी पता नहीं क्यों मेरी नज़रों में नहीं आया। आधी सदी के बाद भी बनारस मेरी यादों में वैसा ही रहा अलमस्त और चउचक, जैसा तब था, जब मैं गोदौलिया के पास के बंगाली मोहल्ले में लगभग दो माह रहा था। हमारे चाचा लखनऊ से स्थानान्तरित होकर बनारस पहुँच गए थे सन् 1958 में और सन् 1959 में हम उनके दो बड़े भतीजे अपनी गरमी की छुट्टियाँ बिताने उनके पास आ गए थे। चाचा विधुर थे, एकाकी भी। मैं उम्र के उस मोड़ पर था यानी युवावस्था की उस दहलीज पर, जब हर अनुभव, हर एहसास रोमांस से भरपूर लगता है, हर साँस रोमांचित करती है और हर वस्तु चित्त को लुभाती है। बनारस आस्था की नगरी होने से हमारे हिन्दू संस्कारी मन को विशिष्ट लगता था। हम ‘शाम-ए-अवध’ की अनुभूति लेकर पहुँचे थे ‘सुबह-ए-बनारस’ को महसूसने। दोनों तहज़ीबें अपने-अपने ढंग से अनूठी। किसी नये शहर को देखने की ललक से ज्यादा बनारस के सांस्कृतिक परिवश का हिस्सा होने की इच्छा। काशी को अनादि नगरी कहा जाता है। धरती पर कैलास और काशी— यही दो महादेव शिव के आदि आवास-स्थल। ‘कल्याण’ पत्रिका के ‘शिवांक’ के माध्यम से मैं परिचित था इस नगरी से— अवचेतन में उपस्थित इस पुण्यस्थली का साक्षात्कार करने की उत्कण्ठा धुर बचपन की थी।

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गोदौलिया के बिल्कुल ही निकट है प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट। सुबह हम वहीं स्नान करने के लिए पहुँच गए हैं। बनारस आकर हमारे युवावस्था में लगभग नास्तिक रहे चाचा भी आस्तिक हो गए हैं। गंगा स्नान कर प्रातः बाबा विश्वनाथ की आरती में पहुँचना उनकी दिनचर्या का ज़रूरी हिस्सा बन गया है। हाँ, तो पहले दशाश्वमेध घाट पर गंगा स्नान। पौराणिक काल में कभी दसियों अश्वमेध आयोजित हुए थे इसी तट पर। मेरी कल्पना में एकाएक कौंध गए हैं उस काल की इस यज्ञभूमि में गूँजते मंत्रोच्चार, समवेत आहुतियों के दृश्य, भव्यता, ऐश्वर्य एवं अलौकिक श्री-प्रताप की छवियाँ और उसी के साथ निरीह अस्वों की चमचमाती खड्ग-धार के सामने भयाक्रांत हिनहिनाहट। एक ओर देवत्व का आवाहन, उसकी खोज, तो दूसरी ओर मृत्यु का भयावह साक्षात्कार। अश्वमेध के बहाने से आक्रान्ता के विजय-अभियान। आज मैं देख रहा हूँ इस घाट का एक नया रंग— सुब्हे-बनारस की जनसंकुल छवि। बनारस गंगा के साथ-साथ धनुषाकार तट-प्रदेश में त्रिपुण्ड की आकृति में बसा नगर है। हर गली प्राचीन— अपना एक अलग इतिहास सँजोए— गंगाजी से जोड़ती। सुबह का वह दृश्य आज भी मेरी आँखों में बसा है। गोदौलिया के चौराहे से दशाश्वमेध घाट की दूरी मुश्किल से चौथाई किलोमीटर। उस ज़रा-सी दूरी में सैकड़ों स्नानार्थी पुरूष-स्त्री, छोटे-बड़े,अधेड़-बूढ़े। अधिकांश पुरूष एक गमछा कमर में लपेटे, दूसरा काँधे पर लटकाये नंगे बदन। सभी का गंतव्य गंगातट। अधिसंख्य बनारसवासियों की दिनचर्या की शुरूआत गंगा-स्नान से ही। घाट पर ही व्यायामशालाएँ और अखाड़े। वहाँ मुग्दर घुमाते, दंड-बैठक लगाते, जोर आजमाइश करते युवक-किशोर, उनके उस्ताद। सारा दृश्य एक अद्भुत ऊर्जा से भरा हुआ। मुझे जयशंकर प्रसाद जी की प्रसिद्ध कहानी ‘गुंडा’ याद आने लगी है। मैं उस कहानी के नायक को तलाश रहा हूँ इन युवकों में। किंतु अब उस तरह के सात्त्विक गुंडे कहाँ रहे। पिछली पीढ़ी के समय तक गुंडई भी एक कला थी, उसमें भी एक गरिमा थी। घाट से उतरते-चढ़ते जनसमूह के बीच मेरा मन उस अद्भुत मानुषी श्रद्धा को देख रहा है, जो गंगा मइया के प्रति सबके मन-प्राण में बसी हुई है। मैं पुण्य-पाप की आम अवधारणा को स्वीकार नहीं कर पाता, किंतु इस सामूहिक श्रद्धाभाव के सामने नतमस्तक होने को विवश हो रहा हूँ। गंगा में स्नान करते स्त्री-पुरूषों की हाथ जोड़े नमन करती मुद्रा में एक पूरी परम्परा, एक सामूहिक अवचेतना के दर्शन मैं कर रहा हूँ। अभिभूत हो रहा हूँ हर दृश्य से।

सूर्योदय होने को है। अरूणिमा पूर्वी क्षितिज से उतरकर पूरे माहौल को ‘लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल’ कर रही है। नदी का जल भी लालाभ हो रहा है। हम उतर पड़े हैं नदी की उस अरूणाभ छुवन को अपनी देह में समोने-सँजोने, ख़ुद भी लाल होने। हम— मतलब हमारे चाचा और हम दोनों भाई। गंगा का जल एकदम साफ-शीतल। दो-तीन डुबकियाँ— मन-प्राण में एक अनूठी शीतलता व्याप गई। हम तीनों में से मुझे ही तैरना आता है। बचपन में वृंदावन की जमुना जी में एक बार डूबने से बचा था। तभी से सोच लिया था तैरना सीखूँगा। लखनऊ विश्वविद्यालय में बी0ए0 प्रथम वर्ष में था, तभी गोमती तट पर स्थित जसबीर सिंह क्लब में मैंने तैरने का थोड़ा-सा अभ्यास किया था। पाँच वर्ष पूर्व के उस अभ्यास को मैं गंगा में आज़माना चाहता हूँ। चाचा ने बेमन से इज़ाज़त दी। थोड़ी दूर तक ही तैरकर जा पाया, तभी उन्होंने आवाज़ देकर वापस बुला लिया। अधूरा रह गया मेरा उत्साह। गोमती तो मैं पार कर जाता था, किंतु गंगा का पाट उससे कम-से-कम चौगुना और बहाव भी काफी तेज।

घाट की सीढ़ियाँ चढ़ते मैं देख रहा हूँ थोड़ा-सा ऊपर चढ़ आये सूर्यदेव को, उनके तेज को अपने में समेटती गंगा की पीताभ धारा को। सब कुछ अद्भुत लग रहा है मुझे। घाट पर सीढ़ियों के साथ-साथ तख्.त सजाये बैठे हैं पंडे और दूकानदार। हिन्दू आस्तिकता का यह भी एक स्वरूप है— रोज़ी-रोटी का, व्यवसाय का। सभी धर्मों में है इस तरह की व्यवसायवृत्ति। पुण्योदका गंगा का यह स्नान कहीं बहुत गहरे भीतर तक मुझे भिगो गया है। मैं सोच रहा हूँ उस आदियुग की, जब गंगा इस धरती पर नहीं आईं थीं। सगरपुत्रों की अगति न होती, तो शायद कभी भी न आतीं। क्या तब गंगा का यह मैदान टी0 एस0 एलियट की ‘वेस्टलैंड’ में वर्णित बंजर भूमि थी? कहीं राजा सगर और उनके वंशज ही तो वे मछुआरा राजा नहीं थे, जिनकी जल की खोज निरन्तर बनी रही और भगीरथ के भगीरथ-प्रयास से ही पूरी हो पाई। काश, टी0 एस0 एलियट ने इस कथानक को भी अपनी महाकविता में समोया होता। पुरखों की सद्गति के लिए ही तो भगीरथ हिमशिलाओं के किसी ब्रह््म-कमंडल से निकालकर शिव-जटाओं तक और फिर उन महादेव की उलझी अलकों में अटकी इस महानदी को यानी जह्नु ऋषि की दुहिता जाह्नवी को इस भस्म हुई बंजरभूमि में अपने पुरखों एवं अपने पुण्य-प्रतााप से खींच लाए थे। आज यह तीन पीढ़ियों की श्रम-गाथा एक पौराणिक कहानी बनकर रह गई है। कैसा रहा होगा भगीरथ और उनके पिता-पितामह का वह महान अभियांत्रिकी अभियान, सोचकर विस्मय होता है। स्वर्गगंगा का धरती पर वह अवतरण मनुष्य के श्रम-कौशल एवं उसकी सात्त्विक आस्था का एक अद्भुत प्रकरण है। एक चित्र देखा था बहुत बचपन में गंगावतरण का। शायद राजा रविवर्मा का बनाया हुआ था। एक ऊँची शिला पर महादेव शिव अपनी खुली जटाएँ फहराये खड़े हैं और देवी गंगा की आकृति आकाश से लहराती-उतरती उनकी जटाओं में उलझती-उलसती जा रही है। नीचे खड़े हैं राजा भगीरथ एवं ऋषि-मुनि हाथ जोड़े नमन की मुद्रा में। काश, मैं भी उस समय उपस्थित होता। हो सकता है होऊँ भी। वह जो चित्र में एक युवा तापस खड़ा है, कहीं वह मैं ही तो नहीं हूँ। मेरी विचार-समाधि तब टूटी, जब चच्चा ने कहा—‘इसी गली में है बाबा विश्वनाथ का मंदिर’।

हाँ, एक पतली-सी गली में है आवास बाबा विश्वनाथ का यानी वह विश्वख्यात मंदिर जिसे काशी विश्वनाथ का धाम कहा जाता है। घुमावदार पतली-सी तंग गली, जो चलती ही जाती है और जिसका अंत होता है मंदिर के परिसर में। आदिनगरी है काशी और अक्षय भी, ऐसा है वरदान औघड़दानी का इसे। हाँ, यह भी कि जो भी यहाँ मृत्युवास के ल्एि आता है, उसे स्वयं कैलासपति मोक्ष-मंत्र देते हैं। मोक्षदायी उसी प्रभु के दर्शन को हम इस गर्भगुहा-सी गली में से होकर जा रहे हैं। मेरी जिज्ञासा आतुर और प्रश्नाकुल, दोनों है। एक अज़ीब-सी सुखानुभूति भी है मेरे मन में। शिव ने गंगा-तट की इसी नगरी को क्यों चुना अपने उपधाम के लिए? किंवदंती है कि काशी ही पृथिवी का केन्द्रबिंदु है। यही सब सोचता हुआ मैं पहुँच गया हूँ मंदिर के छोटे-से प्रांगण में। गर्भगृह एक छोटी कोठरी जितना, जिसमें भक्तजन एक-दूसरे से टकराते। चच्चा आँख मूँदकर ध्यान लगा रहे हैं। उनके होंठ मौन हिल रहे हैं। संभवतः वे श्रीरामचरितमानस के काकभुशुंडि वाले प्रसंग के शिव-स्तोत्र का पाठ कर रहे हैं। हम दोनों भाई दर्शनकर गर्भगृह से बाहर निकलकर खड़े हो गए हैं एक ओर। चच्चा जब बाहर आये, तो मैंने पूछा— ‘लोग आपसे टकरा रहे थेऌ आपका ध्यान भंग नहीं हो रहा था’। चच्चा बोले— ‘ध्यान तो फिर भी लगाना ही है’। मंदिर परिसर से गली में वापसी में चलते हुए मैं सोच रहा हूँ इस धाम के बारे में। मुगल बादशाह औरंगजेब ने मूल मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनवाई थी, जो आज भी मंदिर को बौना करती साथ में खड़ी है। बाद में इन्दौर की होल्कर महारानी अहिल्याबाई ने वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया। मूल लिंग विग्रह भी, सुनते हैं, ज्ञानवापी में कहीं डूबा पड़ा है। हिंदू महासभा के स्वामी करपात्री जी ने गंगा-तट पर ही एक नए काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया है, जिसमें विग्रह के दर्शन बाहर से ही किए जाते हैं। मंदिर-परिसर में निर्माण कार्य अभी भी चल रहा है। मंथन शुरू हो गया है मेरे मन में धर्म के नाम पर हुए हिंसा-विध्वंस के बारे में। आस्थाओं की टकराहट का प्रश्न शासकों की अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाओं से तो कहीं नहीं जुड़ा हुआ है। औरंगजेब की आस्तिकता हिन्दू आस्था को क्यों स्वीकार नहीं कर पाई? आस्तिकता का हिन्दू-मुस्लिमीकरण मेरी समझ से परे है। मुस्लिम-आगमन से पूर्व हिन्दू धर्म की शैव-वैष्णव, हिन्दू-बौद्ध टकराहटें भी तो तर्क से परे ही थीं। योरोप में ईसाई कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट पंथों के झगड़े, मध्यकाल में मुस्लिम-ईसाई मतों की हिंसक टकराहट, उनके धर्मयुद्ध अभियान भी तो निरर्थक ही थे। धार्मिक आस्था का विद्रूपीकरण उस असहिष्णुता से उपजता है, जो मनुष्य के बर्बर आदिम स्वभाव में निहित है। धर्म तो एक बहाना मात्र है।

शाम को नौका-विहरण। शाम-ए-अवध नवाबी ज़माने में रही होगी। अब तो लखनऊ में कहीं वह दिखती नहीं। शाम-ए-बनारस भी सुब्हे-बनारस से कम नहीं है। दशाश्वमेध घाट पर नावों-बज़रों का हुजूम— गंगा पर तैरतीं बीसियों छोटी-बड़ी नावें और उन पर जमी किसिम-किसिम की महफ़िलें। किनारे पर लगी बड़ी-बड़ी रोशनियाँ जल में झिलमिलातीं, धार के साथ तैरतीं-बहतीं। लगता है जैसे आधा बनारस उमड़ आया हो नदी-तट पर। चच्चा और उनके संगी-साथियों की ताश की बाज़ी जम गई है और हम दोनों भाई अवलोक रहे हैं उस निराले दृश्य को— ऊपर आकाशगंगा और नीचे रोशनियों की झिलमिल को लहर-लहर दुलराती भारत की अस्मिता की गंगा। कई और नावों पर भी ताश की बाजी जमी हुई है। एक बड़ी-सी नाव बीच धार में है, जिस पर गैस के हंडों की रोशनी में संगीत की महफ़िल जमी हुई है। गायन की विविध मुरकियाँ, वाद्यों की गमक-धमक एवं तान तैरती हुई हमारे पास तक आ रही हैंऌ सारे वातावरण को भाव-विभोर कर रहीं हैं। एक और बजरेनुमा नाव पर बंगाली धज में स्त्री-पुरूषों की टोली है। बीच-बीच में ठहाकों की आवाज़ से पता चलता है कि वे सब युवा हैं और संभवतः एक ही परिवार के हैं अथवा मित्र-सखा हैं। मैं डूब-उतरा रहा हूँ आनन्द के उस नैश-महोत्सव में। हमारी नाव भी ताश का खेल ख़त्म होने पर किनारे से खोल दी गई है और अब लगभग बीच-धारा में विभिन्न घाटों की छवि अवलोकती आगे बढ़ रही है। सुदूर मणिकर्णिका घाट पर चिताएँ जल-बुझ रही हैं। वहीं पास में है हरिश्चन्द्र घाट, जहाँ भी लगभग वैसा ही दृश्य है। हरिश्चन्द्र घाट से जुड़ा है भारत की सत्य-प्रतिष्ठा का एक अनूठा कथानक— भगवान राम के पूर्वज उस राजा की कहानी, जिसने अपने स्वप्न में दिये वचन का पालन करने के लिए अपना राजपाट गँवाया, काशी के हाट में अपनी पत्नी सहित बिककर दास बना और चांडाल कर्म करने को विवश हुआ, फिर भी न तो अपने व्रत को टूटने दिया और न ही अपने धैर्य को। पुत्र रोहिताश्व की देह को भी दाह देने के लिए मसान-कर लेने के अपने धर्म से विमुख नहीं हुआ वह व्यक्ति। सत्य और वचन के प्रति आग्रह का ऐसा कथानक विरल ही मिलेगा दुनिया के किसी और समाज में। इसी आग्रह की तो परिण्ति हुई है अंततः रामराज्य की अनूठी परिकल्पना में। बनारस के इन ऐतिहासिक घाटों की यह नैश-यात्रा एक अनोखे भावलोक में मुझे पहुँचा गई है, जहाँ वर्तमान की सारी संज्ञाएँ धुँधला गई हैं और मैं एक अछूती अतीत-गंध से महमहा गया हूँ। यह अतीत-गंध सतयुग के सत्य हरिश्चन्द्र से लेकर कबीर-रैदास की विद्रोही सात्त्विक मुद्रा तक और निकटस्थ समय में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और जयशंकर प्रसाद तक मुझे खींच लाई है। मैं देख रहा हूँ इन सारी संज्ञाओं को अपने भीतर अवतरित होते। हाँ, यही तो है मेरी अस्मिता, मेरी परंपरा। उस रात सोते समय और शायद स्वप्न में भी मैं उसी का अनन्य हिस्सा बना रहा।

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हमें बनारस आए कई दिन हो चुके हैं और इस बीच हम दोनों भाई बनारस की तमाम तंग और पेचीदा गलियों से परिचित हो चुके हैं। चाचा को इतवार को फुर्सत होगी, तब हम सारनाथ जाएँगे। तब तक हम दोनों अकेले ही काशी के शोध में लगे हैं अपने ढंग से। एक दिन सुबह-सुबह हम हो आये हैं बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय भी। गोदौलिया से लंका तक के लिए रिक्शे भी जाते हैं, पर हम पैदल ही गए यूनिवर्सिटी देखने। ग्रीय्मावकाश होने से विश्वविद्यालय की हलचल तो हमें देखने को नहीं मिली, किंतु हम पुस्तकालय आदि आसानी से देख पाये। विश्वविद्यालय परिसर में स्थित विश्वनाथ मंदिर की भव्यता और उसके शांत वातावरण से हम विशेष प्रभावित हुए। विश्वविद्यालय की अधिकांश इमारतों में भी मंदिर स्थापत्य एवं शिल्प की बानगी। साफ-सुथरा, खुला-खुला, हरीतिमा से उत्फुल्ल विस्तृत परिसर लखनऊ विश्वविद्यालय के मुकाबले अधिक सुन्दर, अधिक सम्मोहक लगा हमें। गोस्वामी तुलसीदास के समय में इसी क्षेत्र में उनके द्वारा प्रचारित रामलीला में रावण की लंका की सज्जा की जाती थी, तभी से इसका नाम लंका पड़ गया। तबकी पूरी काशी ही रामलीलामय हो जाती होगी। मैं उस अनूठे कालखंड की कल्पना करके ही भाव-विह््वल हो गया हूँ। स्मृति में कौंध गई तुलसीदास जी की लोकभाषा में लिखी रामकथा को काशी के विद्वत्समाज से स्वीकृत कराने की संघर्षगाथा। राम के प्रति उनके वंदनीय संपूर्ण समर्पण भाव को ही तो सही मिली थी बाबा विश्वनाथ की। गोदौलिया से चौक की ओर जाते हुए हमें मिली प्रसिद्ध सुँघनीसाहु की गली। हाँ, यही तो है बनारस का एक प्रमुख काव्यतीर्थ—सुँघनीसाहु के वंशज जयशंकर ‘प्रसाद’ की सर्जनास्थली। पूरी गली में तम्बाकू की महक भरी हुई। सुँघनीसाहु की दूकान अब भी है। कभी इसी गद्दी पर विराजते होंगे मेरे इष्टकवि प्रसाद जी। तम्बाकू का व्यवसाय और ‘कामायनी’ जैसा दार्शनिक महाकाव्य। यहीं बैठे-बैठे प्रसाद जी मगध, कोसल और जाने कहाँ-कहाँ के इतिहास का मानसिक भ्रमण करते रहे होंगे। कैसे-कैसे चरित्रों के संग कितनी-कितनी अंतर्यात्राएँ उन्होंने की होंगी । यह दूकान, ये दीवारें, यह गद्दी कितने-कितने कथा-प्रसंगों की गवाह रहीं होंगी। मैं सोच-सोचकर विस्मित-भ्रमित हो रहा हूँ। वह जो ‘आँसू’ कथा है, जो मेरी स्मृति में पूरी तरह बसी हुई है, यहीं कहीं तो व्यापी होगी। हाँ, प्रसाद मेरे प्रिय कवि रहे हैं। मेरे मन में व्याप रही कविता के उद्गाता यानी मेरे पहले काव्य-गुरू भी। कविता की गली में मैं खड़ा हूँ और प्रसाद जी के नाटकों के तमाम दृश्य , उनके अनूठे पात्र और वार्तालाप, उनकी रची कहानियों के प्रसंग, पूरा ‘आँसू’ काव्य मेरी यादों में कौंध रहे हैं। ‘कामायनी’ के ‘रहस्य’ सर्ग के मनु-श्रद्धा के ‘इच्छा-ज्ञान-क्रिया’ के समन्वयन वाले दार्शनिक प्रसंग पर मैंने एक चित्र भी बनाया है कुछ दिनों पहले। अपने काव्य-गुरू को श्रद्धांजलि स्वरूप। उस गली से जब मैं बाहर निकला, तो मुझे लगा कि जैसे स्वयं के एक अनजाने स्वरूप को मैं खोज लाया हूँ और वही मेरी असली पहचान है।

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मई मास का अंतिम रविवार। कल रात अच्छी वर्षा हो गई है। सुबह धुली-धुली धूप , स्वच्छ नीलाभ आकाश, सारा वातावरण सद्यःस्नात, शीतल मंद बयार। हम तांगे से चल पड़े हैं सारनाथ की ओर। सारनाथ सिद्धार्थ गौतम बुद्ध की जाग्रत चेतना का पहला गवाह— ऐतिहासिक भूमि, जहाँ बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। ताँगा अपनी गति से चला जा रहा है और उसी मंथर गति से अंतर्यात्रा कर रही है मेरी कल्पना। कल्पना से संवेदना के उस धरातल को हम स्पर्श कर पाते हैं, जो कालातीत और निर्वैयक्तिक होती है। यह व्यक्ति से इतर होना ही तो है कला-सर्जना का मर्म। मैं उसी भावभूमि में संवाद कर रहा हूँ ढाई हज़ार साल पहले के वर्तमान से। यह अतीत में वर्तमान होना, कालचक्र की धुरी से मुक्त हो जाना, सच में, कैसा अद्भुत होता है। हम जिस वनानी से होकर गुज़र रहे हैं, इसी में तो कभी गूँजा होगा ‘बुद्धं शरणं गच्छामि-संघं शरणं गच्छामि-धम्मं शरणं गच्छामि’ का पहला उद्घोष। बुद्ध कभी इसी ‘बनी’ के बीच से पाँव-पियादे गुज़रे होंगे। उनके और उनके शिष्यों की ‘धम्म’ यात्राओं से बनी पगडंडियाँ आज कहीं नहीं दिखतीं, किंतु यह सोचकर कि यहीं कहीं वे रही होंगी, मन एक अलौकिक उत्फुल्लता और जिज्ञासा से भर उठा है।

दूर से ही दिखने लगा है सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तूप। एक घनघोर युद्ध और महानरसंहार के बाद एक विजयी राजा के हृदय-परिवर्तन का यह प्रकरण विश्व इतिहास में अनूठा है। जब कोई घटना इतिहास से किंवदंती बन जाती है, तभी वह लोक में स्वीकृत हो पाती है। ऐसा ही हुआ है बुद्धकथा के तमाम प्रसंगों के साथ भी। बुद्ध स्वयं भी तो राम और कृष्ण की भँति एक किंवदंती-पुरूष बन गए हैं। वैष्णव अवतारों में उनका शामिल किया जाना इसी प्रक्रिया का ही तो अंग है। बुद्ध की परंपरा-विरोधी क्रांति भी तो अंततः एक परंपरा में ही बदल गई। यही सभी अवतारों, मसीहों, पैगंबरों के साथ होता रहा है। बुद्ध भी मंदिर में स्थापित एक और देवता बनकर रह गए हैं। पूजा-क्रियाओं से घेरकर हम क्रांति-पुरूषों को वंदनीय तो बना लेते हैं, किंतु उनकी क्रांति-दृष्टि को ऐसा कर हम धुँधला भी देते हैं। उसी धुँधलके से उपजती है सांप्रदायिक हठधर्मिता। बौद्ध सम्प्रदाय के साथ भी ऐसा ही हुआ। अशोक के बाद का बौद्ध भारत छल-प्रपंचों की, षडयंत्रों की कहानी कहता है। राजनीति से जुड़कर उसका भी अधःपतन हुआ। गुप्तकाल के स्वर्णयुग में उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका भी संदिग्ध हो गई और अंततः वह बौद्धविहारों और मठों तक ही परिसीमित होकर रह गया। बज्रयान पूजा-पद्धतियों ने उसे आमजन से दूर कर दिया। रहस्य के घटाटोप ने बुद्धकालीन जाग्रत आध्यात्मिकता को घेरकर उसे अविश्वसनीय बना दिया। किंतु बुद्ध आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने समय में थे । सहज सर्वव्यापक करूणा का उनका संदेश आज के विध्वंसक समय के लिए एकमात्र मार्गदर्शक शेष रह गया है। यही एकमात्र सर्वकालिक मानुषी धर्म है। मूलगंध कुटी के मुख्य बुद्ध मंदिर में अवस्थित सौम्य बुद्ध प्रतिमा के सामने खड़ा चिन्तन के इसी ऊहापोह में मैं डूबा रहा। मंदिर का स्वच्छ खुला हाल, बाहर का विस्तृत हरिताभ परिसर और शांत वातावरण— इन्हीं से उपजा यह सारा चिन्तन। हम बाहर निकल आए हैं मंदिर-परिसर से। और मैं भी निकल आया हूँ बाहर अपनी अंतर्यात्रा से।

जापानियों द्वारा निर्मित बुद्धमंदिर का स्थापत्य अलग किसिम का। बुद्ध प्रतिमा भी आम जापानी पुरूष की आकृति की। याद आ गया कैसे बौद्ध भिक्षु पद्मसंभव चीन तक ले गए बुद्ध की आध्यात्मिक चेतना को और फिर वहाँ से वह प्रसारित हुई जापान आदि पास के तमाम द्वीप-देशों में। कैसी अद्भुत रही होगी बौद्ध धर्म-प्रचारकों की वे धम्म-यात्राएँ, सोच-सोचकर मन विस्मय से भर रहा है। बुद्ध की जन्मभूमि से अति-सुदूर क्षेत्रों तक उनकी भावभूमि के विस्तार का इतिहास, सच में, विस्मयकारी है।

सारनाथ से लौटकर बनारस मुझे बड़ा गुंजान और भीड़भरा लगा। दोनों का सम्मोहन अलग-अलग— एक शांतिस्थल और दूसरा मनुष्य की प्रागैतिहासिक सामूहिक धार्मिक संचेतना का महातीर्थ। मेरा मन दोनों में अलग-अलग रूपों में रम रहा है। बनारस आकर वही दिनचर्या — प्रातः नदी और मंदिर से जुड़ाव और शाम को नौका-विहरण। दिन भर बनारस के विभिन्न दर्शनीय स्थलों का भ्रमण। भारतमाता मंदिर, मानस मंदिर, संकटमोचन मंदिर के अतिरिक्त काशी विद्यापीठ, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की हवेली, स्वामी करपात्री जी का आवास हम देख आए हैं। बनारस की गलियाँ-बाज़ार तो हमने छान मारे हैं। एक अतीत-गंध उन गलियों में— सदियों का सुबास। कबीरचौरा जाकर उन स्मृतियों को भी सँजो लाए हैं, जो उस फक्कड़ जुलाहे के क्रांतिकारी व्यक्तित्व को जीवन्त करती हैं। घाटों-हाटों में घूमते हुए काशी के ‘राँड़-साँड़-सीढ़ी-संन्यासी’ स्वरूप को भी बार-बार अवलोक चुके हैं। दो बार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और हो आए हैं। ग्रीय्मावकाश समाप्ति पर है। लखनऊ जाने का मन होने लगा है। और फिर बनारस की सुखद यादों को अंतर्मन में समेटे वहाँ से प्रस्थान।

पुनश्चः
ईस्वी सन् 1986- 26-27 सितंबर

एक स्थापित नवगीतकार के रूप में आया हूँ मैं आदरणीय डॉ0 शंभुनाथ सिंह द्वारा आयोजित नवगीत समारोह में भाग लेने। बनारस के कबीरचौरा में दो दिनों का यह आयोजन है। सुदूर इलाकों से आए तमाम नवगीतकार इकट्ठे हुए हैं। मैं हिसार, हरियाणा से आया हूँ। दोनों दिन लगातार वर्षा होती रही है। कहीं आना-जाना नहीं हो सका है। एक दिन गंगा-तट तक हो आए हैं हम लोग। लगभग सत्ताइस सालों का अंतराल— किंतु 1959 का बनारस आज भी अंदर से टेरता हुआ। यादें जो उस प्रवास में सँजोकर मैं ले गया था, उन्हीं को दोबारा जीता रहा आने-जाने के यात्रा-पथ में और दो दिनों के इस वास में। कबीरचौरा में नवगीत समारोह का आयोजन इस दृष्टि से विशिष्ट कि नवगीत की भावभूमि में कबीर की बानी-कहन का कहीं-न-कहीं वास है। कबीर की साधना-स्थली से यह सीधा जुड़ाव मेरे कवि को समृद्ध कर गया है।

ईस्वी सन् 2001

मैं फिर आया हूँ बनारस— तीसरी बार। इस बार पत्नी सरला, विवाहिता बेटी अपर्णा और उसके दोनों बच्चों, कनू और एलिस के साथ। केवल चौबीस घंटों के लिए। उसी में सारनाथ और काशी-दर्शन। सरला की चचेरी बहन कबीरचौरा के निकट त्रिमुहानी पर। वहीं हम टिके हैं। शाम को उनका बेटा हमें सारनाथ दिखा लाया । काफी कुछ बदल गया है सारनाथ 1959 से। स्वच्छता आदि वैसी ही, किंतु अब वहाँ कई विदेशी मंदिर बन गए हैं। रास्ता अब भी हरा-भरा सुनसान, किंतु अब ताँगों की फुर्सतभरी मंथर यात्रा का स्थान ले लिया है ऑटो रिक्शाओं की भागमभागी और उनके इंजनों के शोर ने। सभी शहरों में जो परिवर्तन आया है, वही यहाँ भी। सारनाथ से लौटकर हम गंगातट पर आ गए हैं। किंतु शाम-ए-बनारस की नौकाओं का वह समारोह हमें कहीं नहीं दिख रहा है। बाज़ार बहुत बढ़ गया है। गोदौलिया से दशाश्वमेध घाट तक दोनों ओर गुंजान ‘शापिंग-ही-शापिंग’ । गंगा निरीह-कमजोर -घाट भी निर्जीव। कुछ हमारी उम्र का तकाज़ा कुछ वक्त का बदलाव।

दूसरे दिन सुबह से हम आ गए हैं दशाश्वमेध घाट। एक-डेढ़ घंटे में सभी घाटों का भ्रमण और फिर लौटकर बाबा विश्वनाथ के दर्शन। गली वही, किंतु भीड़ और ज्यादा। मंदिर परिसर और भी सिकुड़ा-सिमटा लगा मुझे। मुख्य विग्रह के अतिरिक्त बरामदों में भी छोटे-छोटे लिंग-विग्रह स्थापित। हम थोड़ी देर में पहुँचे, इसलिए दर्शन सुलभ हुए। वरना समय काफी लगता। बाहर निकलकर हमने ऑटोरिक्शा कर लिया है विश्वविद्यालय और अन्य स्थानों को देखने के लिए। पहली बार हम फुर्सत से पैदल ही खूब घूमे थे। बच्चों-परिवार के साथ का सुख इस बार। तब मैं आया था एक युवा विद्यार्थी, कलाकार और कवि की दृष्टि लेकर। अब मात्र एक भ्रमणार्थी। दृष्टि का अंदर-बाहर का अंतर भी। यानी स्मृतियों में बसे बनारस के सम्मोहन के टूटने का एहसास। फिर भी जो बनारस मेरे भीतर है और जिसकी अंतर्यात्रा मैंने ऊपर की है, वह तो अक्षुण्ण ही रहेगा। कबिरा की बुनी-ओढ़ी बनारस की चादर ज्यों की त्यों आज भी कहीं धरी है मेरे भीतर।