कर्म / गोपाल चौधरी

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कुछ अजीब है कर्म या कार्यों की लीला! करो तो बाँधता है न करो तो भी बाँधता है! कर्म के मामले में स्थिति कुछ साँप छुचदार-सी होतो है। न निगलते बनता न उगलते। न करो तो रह-रह कर कोंचता है—कहीं ये न हो जाए, कहीं वह न हो जाए। करो तो कर्तापन और अहम की पुष्टि! परिणाम से तो बंधता ही। इसके अलावे उसका होने, न होने; ऐसे होने, वैसे होने के कार्य फल के जंजाल में फंस जाता है मन अक्सर!

फिर विचारों, आशंकाओं व विकल्पों का विस्तृत भंवर जाल! इसमे डूबता उतराता हमारा जीवन! हरेक पल होने को आतुर। जो है वह उस होने की बलिवेदी पर कुर्बान करता जीवन। बस आगत और विगत के बीच झूलता होता सारा जीवन। पल-पल कुर्बान होता आगत और विगत के हवाई और खोखले असीम पटल पर!

यह सिलसिला चलते रहता है। जिंदती भर। अनवरत और आधुनिक और उत्तर आधुनिक युग में तो इसे इंसानी जीवन की नियति ही मान ली गई है! और फितरत भी! पर वस्तुस्थिति कुछ ऐसी है: इससे छुटकारा पाना मुश्किल। अगर पकड़ेंगे तो भागेगा! और इससे भागेंगे तो यह और पकड़ेगा।

अब देखिये न! चार किताबें प्रकाशित कर ली। इनमे से पॉलिटिकल औडिटिंग पर एनजीओ भी बनाया और फिर इनसे बंध-सा गया! इतना कि चार पाँच साल कुछ नहीं कर पाया। बस अपनी विद्वता, अपनी तथाकथित विलक्षणता और किए पर इतराता रह। खोखली अमरत्व के मोहपाश में बंधा: रंहू या न रहूँ ये किताबें हमेशा रहेंगी।

पलछीन-सी लोकप्रियता! सर्दियों के तेज धूप की तरह विद्वता और अमरत्व के सपनों में दिन सोने लगे! और रातें जागने लगी उन्ही के बिंबों और प्रतिबिंबों मे। जब जग सोते होता, तो मैं जागता होता मरीचिका-सी उस महबूबा के आगोश मे, जो हो कर भी न होता। वह न तो मेरी थी न उसकी या किसी और की।

वो तो पानी की एक लकीर की तरह होती। जो बनने के साथ ही मिटना या फैलना शुरू कर देती! शांत झील में उठी लहर तरंगो की तरह। जो पल-पल असीम और अनंत में विलीन होती रहती। वही मेरी और आपकी जिंदगी! पर हमारी विवशता तो देखिये! हम उसे पकड़ना चाहते हैं! और वह हर पल फिसलती होती हैं! इस तरह हम आगत और विगत में फंसे होते कि पल-पल खोते रहते! जी कर भी पल-पल मिटते हुए!

तभी जिंदगी शायद मिल कर भी नहीं मिलती-सी लगती। सुख मिलकर भी नहीं मिलते होते! क्योंकि उनके साथ सुख के खोने का डर होता है। दुख तो जैसे पीछा ही नहीं छोडता! सुख आने पर भी उसके खो जाने के गम में दुखी रहता है मन। एक इच्छा पूरी नहीं होती सौ नए अरमान आ टपकते। बस लगे रहो इसी चूहे बिल्ली से लगते खेल मे।

पर ये कहीं हमारा दृष्टि दोष तो नहीं? कही गलत समझ का परिणाम तो नहीं लगता! नहीं तो जो हमारा वास्तविक निजी स्वरूप है वह तो बनने न बनने से परे लगता है। एक साक्षी, दर्शक, चेतना जो एक जड़ शरीर से जुड़ी होती है। शरीर से जुड़े होने के कारण इसकी सीमित, पल-पल बूढ़ा होने की अनिर्वयता से आक्रांत। मन के बेलगाम उड़ानों में फंसा। दर्शक कब खि ड़ी बन जाता, पता ही नहीं चलता!

हालाकि दर्शक और खिलाड़ी दो नहीं है, एक ही है। पर जब खेल में उतर जाता तो वह खिलाड़ी खेल से बंध जाता-सा लगता। फिर तो कभी हार तो कभी जीत! कभी निराशा तो कभी बेइन्ताह खुशी। पर दर्शक के खोते ही खेल और खिलाड़ी दो हो जाते है। अलगाव होते ही भेद शुरू। विक्षेप और संकल्प और विकल्प। बस बंध गए।

अगर चिड़िया उड़ने से बंध जाए: अलग समझने लगे उड़ने से अपने आप को। तो उड़ना बोझ ही बन जाएगा! जब काम से बंध जाये, उसके परिणाम, उसके फल, होने न होने में उलझे रहे! और सब पर नियंत्रण या पकड़ बनाए रहना चाहते हों! उस पर जो कार्य कारण सम्बंध हैं कार्यो के, वह तो स्वत चालयमान होता ही है!

फिर थके थके, बुझे-बुझे से चेहरे! जैसे बुझता हुआ दीपक पर जलने को मजबूर। काम के बोझ के तले दबे से लगते। मानो सारी दुनिया का बोझ उठा रखा हो! आपा धापी, भाग दौड़! कल की चिंता में डूबा आज को खोता हुआ। उस कल के लिए जो कभी नहीं आता या होता। जो कभी नहीं होता उसके लिए अभी को खोटा हुआ। क्योंकि वह आज की प्रतिछाया है और हम उसी को पकड़ने में लगे रहते हैं। छाया अपनी ही छाया को पकड़ने में लगी है!


अगर अस्तित्व के स्तर पर देखा जाय, तो हम सारी जिंदगी होने और न होने के बीच झूलते होते है। जो है या हो रहा वह कहीं खो जाता है। जो नहीं है उसे होने में और जो है उसे न होने मे। जो है या हो रहा है उसे स्वीकार न करना, अपने अहम और सोच थोपना न होना ही है।

तभी तो अक्सर लगता है: अरे जिंदगी बीत गयी! उम्र निकल गयी! पर लगता ही नहीं कि जिंदगी भी जी है! जब सब कुछ मिल जाता है जिसके लिए हम इतने बेचैन रहे। तिल-तिल मरते रहे उस पल को जीने के लिय, अपने हाथ में आए पलों से भागते हुए आगत के लिय और जब मिलता है तो लगता है कि मिला ही नहीं! इतने आतुर और बैचेन हो जाते परिणाम पाने के लिए! अगर न भी होते तो परिणाम वही होता जो अभी है। पर हमारी फितरत ही कुछ ऐसी ही है शायद!

फिर एक दिन अचानक तुली राम का ईमेल मिला। एक लंबे एटेचमेंट के साथ—इसमे उसकी आप बीती थी। तुली! तुली राम, मेरे बचपन से दोस्त रहा। साथ-साथ पढे और बड़े हुए। वह इंजीनियर बन गया और मैं? पता नहीं क्या? बन रहा हूँ या बन गया हूँ? अगर बन गया हूँ तो फिर और कुछ बनने की क्या जरूरत है? अगर नहीं बना हूँ, तो जो नहीं हूँ वह कैसा हो सकता?

कहीं होने और न होने के बीच तो नहीं हूँ! इसका मतलब वह मैं जो नहीं है वह हो रहा है! सफर में हैं या अधर: होने और हुए के बीच। पर स्व कहाँ हैं? वह तो हर पल शूली पर लटका होता है होने और हुए के बीच। जो है वह पल-पल खोता: आगत और विगत मे, होने और हुए मे।