कहानी लिखने का कारण / असगर वज़ाहत

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कहानी लिखने का कारण
समीक्षा : असगर वज़ाहत

कहानी हम क्यों लिखते हैं? कुछ बताने के लिए? कुछ कहने के लिए? कह कर संतोष पाने के लिए? दूसरों या समाज के सुख-दुख में हिस्सेदारी करने के लिए? मजबूरी में कि और कुछ नहीं कर सकते? आदत पड़ गयी है इसलिए? कुछ यादें कुछ बातें छोड़ने के लिए? समाज को बदलने के लिए? अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी करने के लिए? अपनी विद्वता दिखाने के लिए? भाषा और शिल्प के चमत्कार दिखाने के लिए?


मेरे ख्य़ाल में कहानी लिखने से पहले अगर कहानीकार के मन में सवाल उठता है कि मैं कहानी क्यों लिखने जा रहा हूं तो शायद वह इस सवाल का जवाब नहीं दे पायेगा और आख़िरकार कहानी भी नहीं लिख पायेगा। इसलिए कहानीकार को भी बहुत बाद में ही पता चलता है कि वह कहानी क्यों लिख रहा है।

इसी से जुड़ी हुई एक दूसरी रोचक बात यह है कि कहानीकार को अगर यह लग जाये कि उसे आज तक लिखी गयी कहानियों से अच्छी या कम से कम वैसी ही कहानी लिखनी चाहिए तो व शायद कहानी नहीं लिख पायेगा। अब चेख़व से अच्छी कहानी तो लिख नहीं पायेगा। इसलिए सोचेगा कि अगर चेख़व से अच्छी कहानी मैं नहीं लिख सकता तो क्यों लिखूं? मतलब यह कि सौ साल पहले जो कहानी लिखी गयी थी उससे मेरी कहानी अच्छी ही होना चाहिए, अगर नहीं तो क्या फ़ायदा?

जहां तक मेरा सवाल है मैंने आज से कोई तीस साल पहले एक कहानी लिख मारी थी जिसका नाम था 'वह बिक गयी` उस ज़माने में मैं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बी.एस.सी. कर रहा था। यह कहानी उर्दू लिपि में लिखी थी। वहां के विश्वविद्यालयी अख्ब़ार 'शहरे तमन्ना` में छपी थी जिसके सम्पादक जैद़ी साहब थे जिनके युवा चेहरे पर बड़ी काली और घनेरी दाढ़ी हुआ करती थी। कहानी लिखकर दोस्तों को सुनाई थी और सबकी यह राय बनी थी कि जैद़ी साहब का दे दो। जैद़ी साहब ने छाप दी थी और हॉस्टल के लड़कों में मैं थोड़ा जाना जाने लगा था। पता नहीं क्यों यह कहानी लिखने के बाद दिमाग में बैठ गया था कि अगली कहानी नहीं लिख सकता क्योंकि कहानी को किस शब्द से शुरू किया जाये या बहुत मुश्किल लगता था, 'वह बिक गयी` कहानी केवल संवादों पर आधारित नहीं हो सकती। इसलिए अगली कहानी का पहला शब्द कया होना चाहिए? शायद इस मुश्किल में ती-चार महीने फंसा रहा। फिर कोई कथानक मिल गया और पहले शब्द की समस्या दूर हो गयी। इस कहानी का नाम याद नहीं।


कहानियां लिखने के साथ-साथ कहानियां पढ़ने और चीज़ों को जानने समझने और लड़कियों से एकपक्षीय प्रेम करने के सिलसिले चल पड़े। चीज़ों को कार्यकलापों को, आदमियों को, समाज को, सरोकारों को, पड़ताल ने कहानी को बदलना शुरू कर दिया। और एक कहानी शायद नाम था 'उनके हिस्से का आकाश` यह सन् १९६८ के आसपास 'धर्मयुग` में छप गयी थी जो उस ज़माने में कहानीकारों के लिए मील का पत्थर माना जाता था। यह कहानी भावुक, संबंधों के तनाव पर केन्द्रित थी लेकिन कोई तिकोना प्रेम वगैरा नहीं था। बहरहाल जल्दी ही भावुकता के इस दौर से निकला क्योंकि कुछ मार्क्सवादी विचारों वगैरा की सुगंध मिलने लगी थी। समाजवादी राजनीति और उस पर बेलाग आलोचना- ये दोनों ही बातें एक साथ सामने आती चली गयीं। सोचा आंखें खुली रहे अंध भक्ति जब धार्मिक विश्वासों की नहीं की तो किसी भी 'वाद` की क्यों जी जाये? हालात उलटते-पलटते रहे। चीजें बनती बिगड़ती और बिगड़ कर बनती रहीं और कहानी भी उसी के साथ-साथ हिचकोले खाती रही।

आज तीस साल सोचता हूं कि कहानी क्यों लिखता हूं तो ईमानदारी से कई बातें सामने आती हैं।

पहली तो यह कि अपने परिवेश की विसंगतियों पर गुस्सा बहुत आता है जिसे दबाया नहीं जा सकता।

दूसरे यह इच्छा बनी रहती है कि 'शहर को यहां से देखो`

तीसरा यह कि और ऐसा क्या कर सकता हूं जो कहानी का 'बदला हो? शायद कुछ नहीं?

चौथा यह कि गवाही रहे कि मैंने या मेरी पीढ़ी ने क्या देखा और भोगा।

पांचवां यह कि पढ़कर शायद किसी की संवेदना को हल्की सी चोट पहुंचे और

छटवां यह कि दिल की भड़ास निकल जाये और रात कुछ चैन की नींद आये,

सातवां यह कि यार लेखक हैं तो लिखें। न लिखने की कोई वजह भी तो नहीं है।

हमारा माध्यम कितना प्यारा है कि क़लम है और कागज़ है और मानव सभ्यता की प्राचीनतम अभिव्यक्ति विध यानी शब्द है। कोई बीच में नहीं है, कोई मजबूरी नहीं है। बाहरी दबाव नहीं है। कहीं-न-कहीं छप तो जाता ही है। लोगों को रचना पसंद आती है, तारीफ करते हैं तो अच्छा लगता है।

प्रस्तुत चयन में कोई प्रांरभिक कहानी नहीं है। पर १९७१ से लेकर आज तक की कहानियां हैं पढ़ने वालों को सहज ही पता लग सकता है कि मैंने क्या खोया है, क्या पाया है? वैसे आलोचक क्या कहते हैं इस पर तो मुझे बहुत विश्वास है नहीं। असग़र वज़ाहत