कांग्रेस भोगवाद की ओर / कांग्रेस-तब और अब / सहजानन्द सरस्वती

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लेकिन , 1945 के चुनावों की सफलता के बाद उसमें पतन के चिद्द दीखने लगे और 15 अगस्त , 1945 के आते-न-आते वह खाँटी भोग-संस्था , भोगियों की जमात , उनका मठ बन गई। महात्माजी के उस समय के व्यथापूर्ण उद्गार इसे साफ बताते हैं। यही कारण है , उनने अपने बलिदान के एक दिन पूर्व- 29 जनवरी को बेलाग ऐलान किया था कि कांग्रेस तोड़ दी जाए और उसका स्थान लोकसेवक संघ ले ले। सारांश , कांग्रेस-जन योगी बने रहकर अब उसे लोकसेवक संघ के रूप में बदल दें। यही बात वे लिखकर भी दे गए-इसी की वसीयत कर गए। मगर भोगी लोग इसे कब मानते ? उनने महात्मा की महान आत्मा को रुलाया और कांग्रेस की भोगवादिता पर कसकर मुहर लगा दी। महात्मा चाहते थे कांग्रेस चुनावों के पाप-पक में न फँसे ; मगर उनके प्रधान चेलों ने न माना। कांग्रेस भोगियों का अव बन गई है , यह तो चोटी के नेता लोग साफ स्वीकार करते ही हैं। कौन-सी सार्वजनिक सभा नहीं है , जिसमें वे यह बात कबूल नहीं करते , सो भी साफ-साफ धिक्कार के साथ!

भोगवादिता के साथ ही कांग्रेस में एक ही विचारधारावाला प्रश्न भी बड़ी तेजी से उठा और महात्मा की महायात्रा के फौरन बाद ही दिल्लीवाली अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी ने फैसला हो गया कि उसके भीतर विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों के लिए अब गुंजाइश नहीं रही! ठीक ही है , ये राजनीतिक दल तो योगवादी ठहरे न ? उन्हें तो शोषित-पीड़ित जनता की आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता दिलानी है न ? इसीलिए उन्हें निरंतर संघर्ष चलाना है न ? फिर भोगियों के साथ उनकी पटे तो कैसे ? यह फैसला मेरे जैसों के लिए नोटिस थी कि कांग्रेस से भागो , भागो , भागो! फलत: एक प्रकार से मैंने तय कर लिया था कि अब इसमें नहीं रहना है। क्योंकि ' जहाँ साँप का बिल , तहीं पूत का सिरहाना! ' मगर कोई जल्दबाजी न थी। इसीलिए जब कांग्रेस के नए प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर करने की बात आई , तो मैंने प्रांतीय कांग्रेस के अधिकारियों से छह-सात मास पूर्व ही लिखकर पूछा कि सर्वात्मना स्वतंत्र किसान सभावादी मेरे जैसा आदमी क्या उस पर हस्ताक्षर कर सकता है ? यदि मैं हस्ताक्षर करूँ , तो क्या यह अनुचित होगा। मैंने और भी प्रश्न किए ; मगर आज तक उत्तार नदारद! सिर्फ यही कहा गया कि आपका पत्र दिल्ली मँगा लिया गयाहै!