कारत / गोपाल चौधरी

Gadya Kosh से
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एक देश की कहानी! नाम: कारत। यहाँ सभ्यता और संस्कृति क्योंकि सबसे पहले फली-फूली! इसलिए सबसे बाद तक रही है! और रहेगी भी! क्योंकि जो सबसे पहले है: जिसकी शुरुआत का पता नहीं, आदि का पता नहीं। उसके अंत का कैसे पता होगा!

कितनी सभ्यता आई गई। कितनी संस्कृतियाँ पानी के बुलबुले की तरह! इस दुनिया की असीम पटल पर आती गईं और कालांतर में विलुप्त भी होती गई। कितनों को नई सभ्यताओं, उदित संस्कृतियो ने निगल लिया।

पर कारत बना रहा! शाश्वत और सनातन सा!

इतिहास के दंश को सहता हुआ! संस्कृतियो के अतिक्रमण और आत्मसात करने की चुनौती को झेलता हुआ। डटा ही रहा कारत उत्तंग हिमाला की तरह! अपनों के भीतरघात और धोखा बर्दाश्त करता हुआ। सबों का सामाना करता रहा। कभी हारता तो कभी जीतता रहा। हारा भी तो अपनों के कारण। पर उसकी हस्ती को मिटा न सका कोई। उसे खत्म कर के आत्मासात करने की तमाम कोशीसों के बावजूद।

कारत: सदियों से होते आए आक्रमण, प्रतिक्रमण, भीतरघात और आत्मघात के बावजूद बना रहा। कुछ ऐसा है इसमे! कुछ सनातन और शाश्वत सा। हस्ती ही नहीं मिटती इसकी! अनगिनत दुश्मनों के बावजूद। वह भी सदियों से।

उसी कारत मे, प्राचीन काल में व्यवस्था थी: सारी आबादी के अपने-अपने व्यक्तिगत संभावनाओं और गुणो के आधार पर कार्य चुनने की और व्यक्तित्व गुनने की! और इसी आधार पर कार्यों का भी बटवारा भी होता। एक ऐसी वैज्ञानिक व्यवस्था का ऊदभव हुआ, उस सुदूर इतिहास के सुदूर काल मे! इसे कवर्ण व्यवस्था कहा जाता।

पर कब यह कवर्ण व्यवस्था कार्य और व्यक्तित्त्व के आधार को छोड़ कर जन्म आधारित हो गई! पता ही नहीं चला। और सबसे अजीब बात: कैसे और कब यह इस वैज्ञानिक कार्य विभाजन के आधार को छोड़ कर, जन्म और वंश के संकीर्ण और आत्मघाती घेरे में आ गया—इस बारे में कोई एक सर्व सम्मत राय नहीं है। काफी विवाद होता रहा है इस संदर्भ मे।

पर इस बारे में कोई संदेह नहीं है: यह जन्म आधारित हो गया! और इसे अलग-अलग काति का नाम दे दिया गया। धीरे-धीरे पूरा कारत समाज चार कातियो में बंट गया-कामन, कत्रिय, कनिया और कूद्र। पहले जो कार्य-विभाजन का आधार हुआ करता: अब समाज-समाज और काति विभाजन और भेदभाव का बन गया। कामन सबसे ऊपर और-और कूद्र सबसे नीचे। इतना नीचे! उनके स्पर्श मात्र से कामन और अन्य उच्च कातियों का अस्तित्व अपवित्र हो उठता। कुद्रों को तो जानवर से भी बदतर समझा जाता!

मानव जाति के इतिहास में ऐसा पहली और आखिरी बार हुआ! एक वैज्ञानिक सामाजिक-राजनैतिक संस्था और मूल्यों का उदय हुआ था। व्यक्ति को अपना पेशा, अपनी अभिरुचि व व्यक्तित्व के प्रकार चुनने की स्वतन्त्रता होती। ऐसा श्रम विभजन जो आज के आधुनिक और उत्तर आधुनिक युग में भी संभव नहीं हो पाया है! ऐसा श्रम विभाजन जिससे हरेक व्यक्ति सुखी रहता और समृद्ध भी।

पर कालांतर में इसे जन्म आधारित बना दिया गया। जन्म से जुड़ कर यह संकीर्ण और आत्मघाती बन गया। इसे उच और नीच का पैमाना बना दिया गया। ऊपर की दो कातियों ने अपना-अपना उच्च स्थान और वर्चस्व बानए रखने के लिए ऐसा किया।

इन दो उच्च कातियों ने पूरे कारत की सभ्यता और उसकी संस्कृति को कुंद कर दिया। अपना-अपना वर्चस्व व उच्च स्थान बनाए रखने के लिए। कहाँ तो उम्मीद थी कि यह अदभुत व्यवस्था पूरी दुनिया में फैले। पर यह जन्म आधारित बन गई। उच नीच के अतिक्रमण से एक सड़ांध व्यवस्था बन कर रह गई। रही सही कसर पूरी कि जब वैवाहिक और अन्य सामाजिक सम्बंध को काति आधारित कर दिया गया।

कोई भी काति के बाहर नहीं रख सकता वैवाहिक सम्बंध। अगर कोई-कोई ऐसा करने की हिमाकत करता, पहले तो वह कर ही नहीं सकता! अगर किसी तरह कर भी लेता ह, तो कठोर सामाजिक व मांसिक प्रतिबंध, बहिष्कार और कठोर दंड। यहाँ तक कि मृत्यु का भी प्रावधान है अगर इस कवर्ण व्यसथा का उलंघन करता कोई।

और आधुनिक युग! तो असंतोष, हताशा, ऊब और जीवन की अर्थहीनता का पर्याय बन गया-सा लगता! अधिकतर अपने कार्य, पेशा और जीवन से खुश नहीं लगते। काम बोझ-सा लगने लगता होता। उतना ही काम करते होते जितने से काम चल सके और जीवन की गाड़ी चलती रहे।

कोई व्यवस्था नहीं विकसित हो पायी है अब तक: व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व प्रकार और अभिरुचि के अनुसार काम मिले। उसे वह होने या बनाने दिया जाय जो उसकी वृति हो, अभिरुचि हो और उसके व्यक्तित्व के अनुरूप हो!

यह सबसे बड़ा असंतोष और दुख का कारण रहता आया है! फिर भी आज तक ऐसी कोई सुनियोजित व्यवस्था नहीं स्थापित हो पायी है: इस असंतोष, दुख और हताशा के निवारण के लिए। इतनी प्रगति और विकास होने पर भी। आधुनिक, उत्तर-आधुनिक और उत्तर-उत्तर आधुनिक युग के सूत्रपात के बावजूद।

कारत में सबसे पहले सभ्यता पली। यही से मानवता सारी दुनिया में फैली। ये अलग बात है कि मानवता का उद्गम स्थल अफ्रीका माना जाता है। हालाकि मानवता के उद्गम स्थल होने सम्बंधी एक पुख्ता प्रमाण 1.5 लाख पुराना अवशेष मिला है। नर्मदा घाटी के बेसिन मे।

काफी पहले मिला वह अवशेष। पर किसी ने कोई कारवाई नहीं की। न तो दुनिया के सामने इसे रखा गया और न ही कोई वेज्ञानिक पुष्टि की गई और फिर इस स्थल को जहाँ ये फोस्सिल मिले थे, उसे भी वहाँ बने डैम की बलिवेदी पर चढ़ा दिया गया।

कारत का राजनैतिक, सामाजिक नेतृत्व भी कुछ अजीब रहा है! अपने वर्गगत, अपने जातिगत हित व वर्चस्व बनाए रखने के लिए: इतिहास, सभ्यता और संस्कृति को विकृत करते रहे है। नहीं तो यह सभ्यता बहुत विकसित हुआ करती! सभी सभ्यतायों और संस्कृतियो पर इसकी अमिट छाप है। जो आज तक भी जारी है। इस आधुनिक और उत्तर-आधुनिक युग में भी। वह इसने प्राचीन काल में ही कर लिया था।

प्राचीन समय से लेकर अब तक! जितनी भी सभ्यताएँ विकसित हुई, जितनी संस्कृतियाँ फली-फुली उनमे यह न केवल सबसे पहले है: बल्कि सबसे नायाब, उन्नत और विकसित रहा है।

कारत के व्यापार सबसे हुआ करते। इसकी वस्तुएँ, संस्कृति, दर्शन, विज्ञान, युद्ध कला—सबों ने उपभोग किया। पर कोई-कोई ही इस बात को स्वीकार करता है। इसके लिए दूसरों को क्यों दोष देना! जब अपने-अपने राजनीतिक व सामाजिक नेतृत्व ही निहित स्वार्थ के लिए विदिशियों को बुलाते रहे। अपने ही धरोहरों और लोगों को लुटवाते रहे!

अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए अपने ही लोगों पर शासन और अत्याचार करते रहे। विशेष कर ऊपर की दो कातियाँ! वहशी और कबीलाई देशी-विदेशी हिंसक जातियों को बुला-बुला कर! वीरता और झूठी राजसी विरासत का तमगा देते रहे और अपना उल्लू सीधा करते रहे। उनके साथ मिलकर अपने वर्चस्व और उच्च स्थान बनाए रहे।

और यहाँ के लोग! नागरिक! लूटते ही रहे! विदेशी शासन और गुलामी की पीड़ा और दंश सहते रहे! यहीं की चीजें, नायाब वस्तुएँ, खोज, दर्शन और कला, विज्ञान की उपलब्धियों को लूट कर ले जाते रहे और उन्हे अपना बनाते रहे और तो और ये कैसी विडम्बना! कारतवासी को ही पिछड़ा, बिना संस्कृति और इतिहास का मानते रहे हैं! और लोग इसे ही अपना भाग्य मान कर जीते रहे!

एक उन्नत सभ्यता और संस्कृति। ऐसे-ऐसे सामाजिक व राजनीतिक कीर्तिमान! उस सुदूर समय में स्थापित हुए! जो आज तक संभव नहीं हो पाए! आज आधुनिक और उत्तर आधुनिक युग के तमाम क्रांतिकारी उपलब्धियों के बावजूद! व्यक्तिव व वृति आधारित कार्य विभाजन और उस पर आधारित सामाजिक व राजनीतिक संरचना। ऐसी नीतिगत और न्याय युक्त युद्ध प्रणाली, ऐसे हथियार जो लक्ष्य को बेध कर वापिस अपने स्रोत में लौट आते होते! जिसे आज तक भी नहीं बनाया जा सका है। ज्ञान विज्ञान की प्रणाली! दर्शन और कला के प्रतिमान! जो आज भी चलायमान हैं! किसी न किसी रूप मे! किसी न किसी अवस्था मे।

ऐसी उन्नत और विकसित सभ्यता और संस्कृति! फिर विश्व की कबीलाई और वहशी समुदायों का आना! या बुलाया जाना! कैसा लगता होगा उन्हे! आग लगा दें! मेस्तनाबूद कर दे सभ्यता और संस्कृति के ऊंचे-ऊंचे मीनारों को! ताकि ये उनके कबीलाई स्तर तक आ सके!

तभी तो कारत के प्राचीन विश्व विद्यालयों को आग लगा दी गई! संस्कृति के प्रतिमानों, चिन्हों और मूल्यों को रौंद डाला गया। फिर उन तथाकथित विकसित कबीलाई जातियों ने कारत के आदर्शों, मूल्यों, वस्तुओं और धरोहरों पर अपनी छाप लगाया और उसे अपने कह कर अपने को ऊंचे और कारत को नीचा मानने लगे।

और यहाँ के सामाजिक व राजनीतिक प्रबुध वर्ग और नेतृत्व! इसे ही इस देश का भाग्य मानने लगे और यहाँ के लोगों पर भी थोपने लगे। केवल अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए और अबाध चल रही लूट में हिस्सा मिलते रहने के लिए!


ऐसा है कारत! ऐसे हैं इसके लोग! पहले तो ऊपर के दो काति-कामन और कतरीय के बीच वर्चस्व के लिए स्पर्धा हुई। और वह संघर्ष और लड़ाई में बदल गई और ये संघर्ष और लड़ाई पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही। पहले तो कामन ने जमीन और जामींदारी के माध्यम से अपनी शक्ति बढ़ाने कि कोशिश की। पर कतरिय ने इंकार कर दिया।

वे कामनों की बात न मानने लगे। उनके धार्मिक प्रभुसत्ता की अवभेलना करने लगे। तब कामनों ने कबीलाई और पिछड़ी देशी जातियों को कतरित्व का तमगा देना शुरू किया और उन्हे कतरियों के खिलाफ लड़ाना शुरू कर दिया। फिर भी वे काबू न पा सके कतरियों पर।

तब उन्होने कबीलाई और हिंसक विदेशियों की मदद ली। फिर तो यह देश कई सौ सालों तक विदेशियों के कब्जे में रहा। यह देश, यहाँ के लोग लूटते रहे! और वे मजे में लूट और अत्याचार का शासन करते रहे! कामन भी अपना वर्चस्व बनाए रहे। सामाजिक और राजनीतिक सत्ताभोग करते रहे।

कामनो की समस्या होती: कतरिए के पास सत्ता और ज्ञान दोनों होते। इनके पास सिवा कर्मकांड और रीति रिवाजो के जंजाल के अलावे कुछ नहीं होता। सबसे पहले तो उन्होने इस ज्ञान की विरासत को करतीयों से छीना! दर्शन, राज शासन, प्रशासन, अध्यात्म, जीवन को जीने और अस्तित्व को समझने सम्बंधी ज्ञान और विज्ञान!

गूढ़ ज्ञान, दर्शन और विशिष्ट ज्ञान की परंपरा! बहुत पहले से ही कतरियों के पास रही है। यह सदियों से चलती आ रही होती। कामनों ने पहले तो इस ज्ञान भंडार को कतरियों से हड़पा! उनसे छीना। उसे क्षत विक्षत किया। और उसी के आधार पर अपने आप को भगवान से भी कुछ ऊपर स्थापित किया और राज करने लगे!

कामनों ने कतरियो के युग प्रवर्तक युग पुरुषों को भी नहीं छोड़ा! उन्हे भगवान बना दिया! और दूसरी तरफ उनको मीथ बना दिया गया। उनके आदर्शों, मूल्यों, सत्ता और संस्कृति के प्रतिमानों! राजनीतिक व सामाजिक प्रतिमानों और प्रतीको को! भगवान की लीला बताकर पारलौकिक घोषित कर दिया गया!

कतरियो की दूसरी महत्त्वपूर्ण व शक्तिशाली शाखा—कादवों का। उनको समाप्त करने के लिए तो कामनों ने एक बहुत बड़ा षड्यंत्र ही रच डाला! एक बहुत बड़ी युगांतकारी चाल चली! अंदर से चुनौती देने के लिए कबीलाई व बर्बर देशी जातियो व जन जातियो को कतरीयत्व का दर्जा देने लगे और सीधे कादवों के खिलाफ खड़ा करने लगे और उनसे सीधा भिढ़ा कर उन्हे कमजोर करने की साजिश शुरू हो गई!

इससे भी बात नहीं बनी। फिर बाहर से तुर्को, अरबों, मंगोलों, फारसीयो व अन्य से सहायता ली और उन्हे बुलाकर कादवों को और पूरे कारत वर्ष में फैले उनके राज्यों को! एक-एक कर निरस्त करने लगे। राणा कांगा द्वारा काबर को बुलाना। कादवो को खत्म करने के लिए। अनगिनत हराकिरी में से एक है। पर कादव तो खत्म हुए नहीं! कांगा ही काबर के-के हाथों मारा गया!

और देश में गुलामी का बीज बो गया। फिर क्ंग्रेज़ आए। खूब लूटा! और शासन किया। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो! अपनी ही लोगों और सेना द्वारा अपने को ही हराकर, क्ंग्रेज़ कारत पर राज करने लग गए।

और तो और! तथाकथित आज़ादी भी मिल गई! फिर भी कारत के देशी शासकों ने आक्रमणकारियों और उपनिवेशी लुटेरों के सारे हथकंडे, क़ानूनों और लुटेरी व्यवस्था! जारी रही: चलती रही अबाध! सब कुछ वही रहा: उन्ही लुटेरे विदेशी शासको का, जो उन्होने लूटने और शासन करने के लिए बनाया था। बस केवल गोरे साहब की जगह भूरे साहब ने ले ली!

कैसी विडम्बना है! वही राजा-महाराजा और उनके दलाल राजनीतिक व सामाजिक नेता गण! विदेशी लुटेरों और शासको को बुलाते रहे। अपना निहित स्वार्थ साधने के लिए। उन्ही ही को सत्ता सौंप दिया गया! और इसका नाम दिया गया आज़ादी!

और जिन्होने सचमुच आज़ादी की लड़ाई लड़ी! वे आज भी भूरे साहब की गुलामी के खिलाफ लड़ रहे हैं। जिन्होने विदेशी शासक के छक्के छुड़ा दिये! जिनके दहशत से कांग्रेज़ और अन्य लुटेरे डर कर भागने का मन बन लिया! उन्हे आतंकवादी घोषित करवा दिया या उनकी हत्या करवा दी।

और वह गद्दार वर्ग और उसके प्रतिनिधि! आज़ादी के बाद से शासन करते आ रहे हैं। उसी तरह से, उन्ही कानूनों और संस्थाओ से: लोगों और देश को लूटते आ रहे हैं!

आज़ादी के बाद के चंद 70 साल! उन्होने इतना लूटा! जितना एक हजार सालों में विदेशी लुटेरों और शासको ने भी नहीं लूटा होगा! और लूट के सारे पैसे विदेशी बैंक में भरते रहे। काले धन के रूप मे।

और उसी पैसे से! उसी काले धन पर! जिसे आज़ाद कारत के गुलाम शासक और उनके पोशक खूनी व्यापारी और उद्योगपतियों ने लूट कर विदेशी बैंक में डालते रहे हैं! आधा विश्व फल फूल रहा है! और कारत के तीन चौथाई लोग! अभी भी गरीबी और जिल्लत की जिंदगी जी रहे है! वे आधे भूखे पेट को पानी से भर कर! किसी तरह जिंदगी बसर कर रहे है!

वह काति! जिसने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिय सारी व्यवस्था को तहस नहस कर दिया! वह अक्षुण्ण रही! आक्रमण हुए। अनगिनत लड़ाईं लड़ी गई। पर उसका वर्चस्व बना रहा। दुश्मनों, आक्रमणकारियों और विदेशी शासको की कारन्दगी! गुलामी और दलाली कर-कर के भी! अपना वर्चस्व बनाए रखी रही!

कारत के लोग लूटते रहे! एक लूट कर जाता! और दूसरे लुटेरो के लिए रास्ते खोल जाता! पर यह काति ऐश करती रही। सत्ता और सुख का उपभोग करती रही।

गुलामी के इतिहास में ऐसा पहली बार! और आखिरी बार हुआ होगा! जब अपने ही लोगों ने विदेशियो, आक्रमणकारियो और औपनिवेसिक लुटेरी शक्तियों को बुलाया। उन्ही के साथ मिल कर अपने ही लोगों को गुलाम बनाया। लूटा। अत्याचार किया। उन्हे पशु से बदतर स्थिति में रखते रहे। हजारों साल तक! पर अपनी शाख, वर्चस्व और उच्च स्थान बनाए रखे रहे!

बाद में विदेशी शासक भागने पर मजबूर हुए। वही वर्ग, जाति नए शासक बन बैठे। सामाजिक नियंत्रण और अबाध अनौपचारिक सत्ता तो पहले से ही हासिल हुई होती। राजनीतिक सत्ता भी हाथ में आ गई। पहले से ही काफी शक्ति शाली रहते चले आ रहे होते। अपरोक्ष रूप से वही शासन कर रहे होते! कांग्रेजों के जाने के बाद तो सत्ता का हस्तांतत्रण हो गया। गोरे कांग्रेजों से सत्ता काले कांग्रेजों के हाथ में आ गई। इसे स्वतंत्रता व आज़ादी मान कर ढ़ोल पीटते रहे! लूटते रहे!

सब कुछ वही रहा! लूट और शोषण के सारे कानून! अधिनियम और एक्ट! संस्थान, मूल्य और प्रतिमान! यहाँ तक कि उन विदेशी लुटेरों और शासको के भवन और इमारतो को भी अक्षुण्ण रखा। उन पर रंग रोगन लगा कर चमकाते रहे! और उसी तरह जिस तरह विदेशी लूट कर गए, लूटते रहे। प्रजातंत्र, स्वतंत्रता, अधिकार के नाम पर।

और कारत की तीन चौथाई लोग! अभी भी गरीबी, शोषण और अत्याचार की जिंदगी जी रहे है! वे आधे पेट को पानी से भर कर रात में सोते है! तब जा कर भूखे पेट को कुछ आराम मिलता होता और नींद आती होती!