क्या कहूँ / राजा सिंह

Gadya Kosh से
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वह अपने घर से निकली हैं। मैं उन्हें दूर से देख सकता हूँ। वह सदैव अकेले ही निकलती है, घर में उनके पति बरामदे में बैठे रहते है। उनके पास एक बिल्ली है, जिसे वह दूर से देखते रहते है। सिर्फ देखभाल हेतु। बरामदे और गेट के बीच एक छोटा-सा लॉन है जिसकी क्यारियों में रंग बिरंगे फूल खिले रहते है। बिल्ली एकदम झक सफ़ेद है, छोटी से प्यारी सी. मुझे यह बड़ा ताज्जुब लगता है कि कोई व्यक्ति बिल्ली पालता है। कभी-कभी क्या, अकसर वह बिल्ली को टहलाने गेट से बाहर निकलकर सड़क पर आ जाते है। सड़क करीब दस बारह फिट की है, जो उस कालोनी के और पार्क के बीच स्थिति है।

मैं पार्क की बेंच पर बैठा उन्हें काफी दूर से देख सकता हूँ... वह गेट से बाहर निकलकर गेट को ऊपर खटके से बंद करती है, पति ने गर्दन उठाई और उन्हें बाहर निकलते देखकर फिर अपनी आँखें बंद कर ली। कुछ ही पलों में वह पार्क के गेट में प्रवेश करती दिख जाती है। मैं जानता हूँ कि वह टहलने वाले पथ पर करीब आधा घंटे से कम नहीं टहलेंगी। वह लम्बे लंबे डग भरती है, इतने लम्बें कि उस पथ पर किसी को भी पछाड़ सकती है। मैं तुरंत उठ जाता हूँ और उनके राउंड लेने से पहले ही मंद गति से चलने लगता हूँ। यह कोशिश करता हूँ कि उन्हें पता न चले कि मैं पहले से टहल नहीं रहा हूँ।

यह सिलसिला काफी दिनों से चल रहा था। सिर्फ यह अंतर था कि कभी वह पहले, कभी हम पहले पार्क पहुँच जाया करते थे। उनकी गतिविधि मुझमें उत्सुकता भरती चली जा रही थी।

यह जगह शहर के भीड़, माल्स, बाज़ार के कोलाहल से कुछ दूर, एक निहायत शांत स्थान पर है। चारों तरफ सन्नाटा बिखरा रहता है। इस जगह खेलते बच्चों के स्वर भी मंद और संतुलित रहते है। मैं यहाँ के लोगों के लिए अपरिचित और अनजान हूँ, हालांकि मैं यही पास में रहता हूँ, तीन सड़क पार एक दूसरी कालोनी के सबसे ऊँचे मकान में। एक बहुत बड़े मकान की तीसरी मंजिल में।एक छोटा-सा किचन, एक टायलेट, एक कमरा और बहुत बड़ी छत, ऊँची-ऊँची चहारदीवारी से घिरी। मेरी ऊँची बालकनी से वह पार्क दूर एक अंडाकार लट्टू की तरह दिखता था। जहाँ मैं रहता था, वह एक पुरानी उजड़ी कालोनी थी। जिसके पार्को पर निहायत गरीब लोगों ने अपनी-अपनी झुंगी-झोपड़ी बना रखी थी। मैं सोचता रहता था कि जब ये पार्क साफ हो जायेंगे और वास्तव में पार्क में बदल जायेंगे तो मुझे टहलने के लिए कही और जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मगर क्या मैं यहाँ स्थायी रूप से रह पाऊँगा? यह एक यक्ष प्रश्न सदैव कचोटता रहता था।

मैं यहाँ एक स्थानीय दैनिक में औजी में काम करता था। यानी जब कोई उप सम्पादक छुट्टी पर जाता तब मेरी जरूरत होती थी। अकसर सोचता रहता था, किसी न किसी दिन मैं स्थायी नौकरी पा लूँगा, ऐसा कुछ मेरे संपादक ने भी कह रखा था। मैं अभी-अभी पत्रकारिता में स्नातक हुआ था। मैं कवितायेँ और लेख भी लिखता था। उसके पारिश्रमिक से भी मुझे कुछ आमदनी हो जाती थी। किसी तरह खींच-तान कर खर्चा निकल रहा था।

हरे-भरे खूबसूरत पार्क का बिरानापन और एकांत, सुकून के दो पल मुहैया करवाता था। किन्तु उनकी आमद...?

नहीं यह कोरा भ्रम नहीं था। सचमुच वे पीछे आ रही थीं, मेरे कदमों से भी तेज गति से चलती हुई. यह कोई खास बात नहीं थी। अकसर वह मुझे क्रास करके निकल जाती है। परन्तु यह क्या? ...आज वह क्रास करके ठिठक कर खड़ी हो जाती है। मैं...स्थिर... सशंकित, पूछने के अंदाज में उन्हें देखा।

"गुड...इवनिंग...!" उन्होंने बेबाक कहा।

मैं थोड़ा-सा हैरान। जैसे मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि इस तरह की पहल उनके तरफ से कभी भी हो सकती है।

' आप...? ... मुझसे आगे कुछ अभिवादन में नहीं कहा गया।

"जी... हाँ... मैं..." उनके चेहरे पर एक अपरिचित मुस्कराहट चली आई.

"ओह...! गुड इवनिंग..." मेरा इतना कहते ही, उन्होंने स्वीकृत में सिर हिलाया। वह फिर मुस्करायी और चल दी। मैं शायद प्रसन्न हो गया था। मैं रुका था। फिर होश में आया कि मैं इवनिंग वाक पर आया हूँ, चल पड़ता हूँ। इतने पास से रूबरू पहली बार हुआ था, इसलिए उनकी एक छबि पूरी तरह मन मस्तिष्क पर अंकित हो गयी थी। उनकी छोटी-छोटी तीखी आँखें, मुरझाया सफ़ेद चेहरा और छरहरे शरीर से, उनकी उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था। चंचल चपल इतनी कि पार्क के मेरे एक चक्कर में उनके दो-ढाई चक्कर हो जाते थे।

वह चलते, रुकते, बोलती जाती धाराप्रवाह कभी हिन्दी अभी अंग्रेजी में, साथ मिलने वालों से। मुझे लगा ज्यादातर टहलने वाले स्त्री-पुरुष, वृद्ध या खेलते बच्चे उनकी जान पहचान के होते है। उस ट्रैक पर टहलते-घूमते, चलते-फिरते या भागते लोगों से वह मिलती, कभी साथ चलती, कभी उन्हें छोड़कर आगे निकल जाती।

उनके पहचान वालों में बाहरी या घरेलू कुत्ते भी थे। करीब-करीब रोज उन्हें उनसे उलझते देखता। उन्हें पुचकारते, डाँटते, प्यार करते और खिलाते। वे उनमें बिस्कुट, ब्रेड या रोटी बांटती थी। वितरण करते समय वे यह सुनिश्चित करती थी किसी को कम या ज्यादा न मिले। इस कारण वे उन पर बिगडती, फटकारती, पुचकारती और लहकाती थी। उनकी नज़रों से ओझल, पांच-छै कुत्तों में कोई नहीं रह पाता था, जिसको उसका समुचित हिस्सा न मिल पाया हो। परन्तु मेरी अबूझ, धूमिल और मन की जिज्ञासा कौतूहल में बदल जाती, जब मैं देखता की घर में पली बिल्ली से उनका लगाव नज़र नहीं आता और बाहरी कुत्तों पर इतना प्यार मनुहार और लाड़। मैं उन्हें कौतूहल एवं उत्सुकता से देखता रह जाता था। जब उनकी लापरवाह आँखें मेरी विस्फरित आँखों से टकराती। वे झेंपती और जल्दी से उन्हें भगाती और शीघ्र ही मुझे ट्रैक पर पछाड़ देती।

निःसंदेह उनकी पहचान वालों में मेरा नाम भी आ गया था। परन्तु मैं सिर्फ उनके संदेशों, मुस्कराहटों और अभिवादन का सिर्फ प्रति उत्तर ही दे पाया था। इतने दिनों बीत जाने के बाद भी मैं पहल नहीं कर पाया था। वे मुझे टटोलती निगाहों से देखती, तौलती और बतियाने की कोशिश करती।

अब वे देर से आने लगी थी जब अधिकांश लोग जा चुके होते। इक्का-दुक्का बचे लोग भी जाने की तैयारी में होते। अकेले में जब मैं उन्हें निर्लिप्त निगाहों से देखता तो वे जरूर बात करती। फिर हम आपस में काफी बात करने लगे, साथ-साथ टहलते, चलते-रुकते, उठते-बैठते और आगे-पीछे एक साथ अपने घरों को प्रस्थान करते।

मैं अकेले रहने का आदी था। एकांत मुझे आकर्षित करता था। आदमियों से अकेलापन। मैं अकेले रहना चाहता था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि इस अनजान जगह पर कोई मुझसे चिपक जायेगा। आर्थिक स्थिति मुझे कोफ्त से भरे हुए थी। किसी से जुड़ना मुझे और भी दयनीय बनाता था। परन्तु ऐसा लगता था कि मैं उसके प्रभा मंडल की तरफ आकर्षित हो रहा हूँ। ऐसे में झटके से अलग हो जाता और तेजी से कदम बढ़ाते हुए पार्क में स्थिति लोहे की बेंच पर बेतरतीब बैठ जाता। बेसुध अवस्था में रहता। कुछ देर बाद होश आता, तो पता चलता की वह जा चुकी है।

दो दिनों से पानी बराबर बरस रहा है। मैं कही नहीं जा पाया। अपने में कैद होकर रह गया। अपने कमरे, बाथरूम, रसोई में सिमटा हुआ मैं, उनसे भी महरूम हूँ जिनसे अकसर मिलता रहता हूँ। नीचे पास में बने झुग्गी-झोंपड़ी की गतिविधियाँ शांत है, नीचे के रास्ते, मकान और दुकानें तरबतर है, आकाश में उड़ने वाले जीव-जन्तु और यंत्र भी खामोश है, जो कभी-कभी मेरा दिल बहलाया करते थे और लिखने की कुछ प्रेरणा दिया करते थे। आकाश से बरसती बारिश की विभिन्न प्रकार आवाजें कमरे के भीतर सुनाई पड़ती रही। यह सिमटा अकेलापन ऊब पैदा कर रहा था।

कुछ अलग करने का मन कर रहा था। क्या? बहुत पहले की पड़ीं एक बोतल की वाइन अपने को समाप्त करने को लालायित करने लगी। कुछ ही क्षणों में वह मेरा साथ देने लगी...एक दो पैग के बाद, अशरीर वह भी मेरे पास आ गयी। वह भरमाने लगीं। शराब से ज्यादा उनकी छवि उत्तेजित और घायल कर रही थी।

रात के सात बज रहे है और मैं निपट अकेले कमरे की खिड़की से बारिश का नज़ारा देखते हुए भीग रहा हूँ। हम ज्यादातर उस जगह पर पहुँच जाते है जहाँ हम सामान्यता जाना नहीं चाहते। हम क्या सोचते है, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता। बल्कि आपका एकाकीपन आपको किस दिशा, किस दृश्य पर स्थिर कर देता है, असल में वह मायने रखता है।

मैं उस जगह पहुँच गया हूँ जहाँ रिटायर्ड-हर्ट कैप्टन ललित मोहन तिवारी, अपने मकान A-320 से निकल रहे है। उनके साथ उनकी सफ़ेद बिल्ली भी है। गेट पर वह कुछ देर निश्चल से खड़े रहे, अपने पीछे आती आवाज का पीछा करते हुए. वह आवाज उसे भी पहचान में आती है, मैडम की...गुड इवनिंग की और भी उससे मिलती जुलती।

वह ऐसी ही अवसन्न उतरती शाम थी, जब कैप्टन अपने घर के समीप इर्दगिर्द बिछी सड़क पर, पार्क के समानांतर बिल्ली को टहला रहे थे। बिल्ली कुत्ते के पट्टे से बंधी, जिसके जंजीर का एक सिरा उसके पट्टे में और दूसरा कैप्टन साहब के हाथ में था। उनका पिचका हुआ चेहरा, कुछ दिन पहले का क्लीनशेव किया था। दाढ़ी और मूँछ की जगह सफेद दानेनुमा बाल उग आए थे। ढीली पेंट और शर्ट में उनका चेहरा म्लान और क्लांत था। उनके चेहरे पर दुःख की छाया थी और उनकी बिल्ली भी ही वैसी मरगुल्ली-सी आस-पास टहल रही थी।

दोनों ने मुझे आते देखा। एक दृष्टि से वे मुंह फिराकर अलग हो गए. कुत्ते के विपरीत बिल्ली किसी अपरिचित आगंतुक से कोई संवाद नहीं करती। यह कुछ मामलों में बेहतर साबित होता है। पास आने पर उन्होंने पूछा, "आप काफी दिनों के बाद आये?" यह मेरे लिए अप्रत्याशित था।

"माफ! कीजिये! ...आप मुझे जानते है?"

"हाँ। आप, अकसर क्या करीब-करीब रोज ही इसी वक़्त यहाँ पार्क में टहलने आते है।" उनका स्वर शांत और गहरा था।

वह मेरे पास खड़े थे और मुझे ऐसे देख रहे थे, जैसे मुझे वर्षों से जानते हो। काश, मैं उनकी आंखों से अपने को देख पाता।!

मैं असमंजस में उन्हें देखता रहा।

"मेरी वाइफ रीता भी आपके समय ही पार्क में टहलती है... उसी ने ही बताया।"

"चलिए.। अगर आपको एतराज न हो, तो थोड़ी देर पार्क में सैर करके आते है।" मैंने कुछ बेतकल्लुफ होकर कहा।

"नो...थैंक्स...मेरी इसे टहलाने की ड्यूटी लगी है... आपका का साथ रीता देगी।" मुझे उनका स्वर कुछ व्यंग्यात्मक लगा। मेरे भीतर कुछ देर के लिए बवंडर उठा था फिर धीरे-धीरे वह शांत हुआ और बैठने लगा। मुझे लगा कि साथ जानबूझकर बोल गया वाक्य है, जो अनायास नहीं निकला था। क्या वह मेरे भीतर झांक रहे है? फिर एक सुन्न सन्नाटा उठा जो मुझे भयभीत-सा करने लगा। उनसे बेतकल्लुफ होने के प्रयास को झटका लगा।

मैडम वहाँ पहले से ही टहल रही थी। मैं धीरे से पीछे हो लिया। मगर वे भांप गयी थीं। हम कुछ देर चुपचाप चलते रहे। अचानक वे ठहर गयी। मेरी और देखा। वह मेरे सामने मुस्करा रही थीं, एक ऐसी मुस्कराहट जो मुझे कुछ अजीब लगी।

मुझे आये हुए ज्यादा समय नहीं गुजरा था, किन्तु शाम आये हुए काफी वक़्त निकल गया था। उन्होंने एक बार फिर मेरी तरफ कुछ अपनेपन से देखा। अब की बार वह बोली, "आप बहुत थके जान पड़ते है? ...चलिए कुछ देर के लिए बैठ जाते है।"

पार्क के किनारे-किनारे कई लोहे और सीमेंट की बेंचें थी। उन्होंने धीरे से मेरी कोहनी को छुंवा और मुझे लेकर एक बेंच में बैठ गई. पार्क के दूसरी तरफ बच्चों के खेलने के झूले लगे थे, नीचे फिसलने के स्टील की पटरियाँ, मेर्री गो राउंड, सी-सॉ और भी बहुत कुछ। हालाँकि उस समय कोई बच्चा नहीं था परन्तु वह जगह कुछ खुली-सी थी।

उनके पास एक लेडीज छाता था, जो वह घर से निकलते वक़्त लायी होंगी। इस आशंका के तहत कि बारिश किसी वक़्त आ सकती है, जो कि नहीं आई थी। हम दोनों के वहाँ पहुँचने के कुछ देर पहले ही बारिश बंद हुई थी। उन्होंने वह छतरी जो हम दोनों के बीच में थी, उसे उठाकर एक किनारे कर दिया।

वह बेंच पर एक सफ़ेद मूर्ति की तरह निश्छल बैठी थी। अंधे धुंधलके में एक अजीब-सी मुस्कराहट उनके चेहरे पर चली आई थी। मेरे भीतर एक हौल-सा उठने लगा।

अब वह कुछ देर चुप इधर उधर देखती। फिर मुझे देखती। फिर और निकट आते हुए मेरे चेहरे पर दृष्टि गड़ाते हुए कहा। जैसे अँधेरे में मेरी प्रतिक्रिया पढ़ना चाहती हो।

"रिश्ते होते नहीं है बनते, बनाये जाते है। आपका क्या ख्याल है?" मैंने इस तरह के प्रश्न, बात की उम्मीद नहीं की थी। मैं अचकचा गया। उनसे दृष्टि हटाकर मैंने बाहर गेट की तरफ कर ली।

"क्या सोच रहे हो?" मेरी चुप्पी उन्हें अखरने लगी थी। उन्होंने बड़ी सहजता से मेरे बेंच पर रखे हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया। उनके हाथ के नीचे मेरा हाथ शिथिल पड़ा रहा। मैं सोच रहा था कि कही कुछ गलत कह दिया तो उन्हें कष्ट पहुँच सकता है।

"शायद आप ठीक कहती है, परन्तु मैंने इस विषय में कभी सोचा नहीं है।" उनसे बात करते समय मैं बहुत संभलकर बात कर रहा था। क्योंकि मुझे डर था कि वह बात को कही और ले जा सकती है। वैसे भी मैं अपने जीवन के प्रति अनिश्चित था।

"कैप्टन साहब से डर लगता है?" उन्होंने पूछा।

जब मैंने कुछ नहीं कहा तो वे हंसने लगी। मेरे चेहरे को अपनी तरफ मोड़ लिया।

"आप नहीं डरती?" मैंने पूछा।

"उससे मैं डरती हूँ?" वह हंसी.। देर तक हंसती रहीं। उनकी हंसी मेरे लिए दहशत उत्पन्न कर रही थी। जैसे कह रही हो डरे मेरी जूती।

यकायक वह उठीं और लम्बें डग भरती पार्क से बाहर हो गईं। उनका छाता उनकी जगह पूरित कर रहा था। मैंने क्या गलत कह दिया था? ... अब मैं अपने शब्दों को वापिस नहीं ले सकता था। अब वे यहाँ नहीं थीं। उस समय मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?

मैं उनके छाते के साथ वापस कमरे चला आया।

रात देर तक नींद नहीं आई. अँधेरे में छतरी दिखती रही। जैसे उसका मेरे पास होना किसी संकेत का द्योतक है। क्या यह जान बूझकर छोड़ी गयी है या अनजाने में भूल वश? मुझे इसे तुरंत लौटना था? अपने साथ ले आना ठीक रहा? मुझे इसे अगले दिन ही लौटना होगा... चाहिए? सुबह...सुबह...नहीं...नहीं...अपने उसी समय पर? फिर कभी उलझ जाता, उनकी उस समय की बातों और क्रिया पर। कुछ निहितार्थ तलाशने की कोशिश करता, असफल रहता।

रीता जी अकेली नहीं है। कैप्टन साहब साथ रहते है। क्या सोचते होंगे? क्या सोचेंगे? अकेले के अलग तरह के डर होते है। परन्तु उनमें सम्बंधों, सम्पर्को की हदबंदी नहीं होती है। पति की मौजूदगी, घर के मालिक के अलग तरीके के डर, शंका-कुशंका, मान-मर्यादा और सीमा रेखाएँ होती है। इस तरह के डर, हर समय भीतर दुबके पड़े रहते है। जो सदैव कोचते रहते है। बाहर के डर को भगाना आसान होता है परन्तु भीतर डेरा जमाये डर को निकलना मुश्किल होता है। इसी उधेड़बुन में उनके घर और पार्क जाने का निर्णय लेना दुष्कर प्रतीत हो रहा था।

अगले दिन नियत समय पर मैं उनके गेट पर खड़ा, कालबेल दबा रहा था। बाहर भीतर पसरे सन्नाटे को तोड़ता हुआ स्वर भीतर उत्पात मचा रहा था। अधखुले दरवाजे से किसी ने बाहर झाँका और जल्दी से मुंह पीछे कर लिया। मैंने इसे अस्वीकार समझा और उलटे पैर लौटने ही वाला था कि मैडम दरवाजा खोलकर बाहर निकल आईं। मुझे देखकर उनके चेहरे पर इस हलकी-सी मुस्कान बिखरी, एक तृप्ति सरीखी।

"आप!" उनका विस्मय होना मुझे असहज कर गया।

"आपकी छतरी वापस करनी थी।" मैंने अपनी झेंप मिटाने के लिए कहा।

"आइये। आइये..." उनके चेहरे पर एक हलकी-सी चमक उभर आई.

"बाहर पार्क में सैर करने आया था..." मैंने सफाई दी।

"हाँ...हाँ...अवश्य...अवश्य..."

इसी बीच वह गेट खोलकर मेरे हाथ से छाता ले चुकी थी। इसके पहले अभी कुछ और कहता या जाने के लिए मुड़ता, एक मादक दृष्टि ने मुझे कैद कर लिया फिर वह खुशी में मेरा हाथ पकड़कर भीतर खींच चुकी थीं। मैंने उनकी प्रसन्नता में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं किया। परन्तु कई तरह के डर अब भी मेरे भीतर विद्यमान थे। ड्राइंगरूम में प्रवेश करते-करते मेरे एक डर ने मुंह खोला, " आपके डॉग्स...?

"अरे...! वे मेरे कहाँ? वे तो स्ट्रीट डॉग्स हैं। मेरी तो कैट है। वह देखो!"

मैंने देखा कि वह ड्राइंग रूम के एक कोने में चुप चाप दुबकी पड़ी थी। मुझे देखकर वह भी आहिस्ता से कही और चली गई. तब तक हम लोग दीवार अटैच्ड एक लंबे सफ़ेद सोफे में धंस चुके थे।

"अच्छा हुआ कि आप आ गए, नहीं तो मैं खुद आपको पार्क से बुलाती।"

" किस लिए मैडम? '

"आप इत्मीनान से बैठिये तो! बताती हूँ और हाँ, अपना सेल न। दीजिये।" यह कहकर वह वहाँ से निकल कर किचन में चली गयी।

कुछ ही पलों के बाद, जब वे आई तो एक ट्रे में दो कॉफी और कुछ हलके स्नेक्स अदि थे।

"मैं बहुत अच्छी काफी बनाती हूँ...यक़ीनन आपको भी पसंद आयेगी।" यह कहकर एक मग मेरी तरफ बढ़ाया और दूसरा लेकर मेरे से सटकर सिप करने लगी। स्नेक्स के लिये वह आँखों से इशारे करती रही और खुद ही सर्व करती रही।

वे चमकती आँखों से मेरे चेहरे को ऐसे ताक रही थी जैसे किसी मन मुताबिक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रही हो। मुझे अटपटा लग रहा था। बड़ी मुश्किल से मैं एक मरी हुई मुस्कराहट चेहरे पर ला पाया, "अच्छी है।" मैंने कहा।

"क्या...? ...मै...या...कोफी...?"

मैं चुप लगा गया। दूसरों के मामूली प्रश्नों के उत्तर देते देते, हम अचानक दूसरे की आँखों में अपने को देखने लगते है। भूल गया था कि मैं कहाँ बैठा हूँ। परन्तु वे मुझे देख रही थी। मैंने सहमति में सिर हिलाया, लेकिन कहा कुछ नहीं।

"आपने क्या सोचा था, कैप्टन साहब की तरह फीकी होगी?" उनके स्वर में हल्का-सा व्यंग्य था। लेकिन मैं यह शब्द सुनकर अचम्भित रह गया।

"नहीं। ऐसा मैं नहीं सोचता...तिवारी जी नहीं दिख रहे है...?" मेरा दूसरा डर बाहर आया।

"वे कैंटीन गए है। घर के आवश्यक सामान लेने और अपने कोटे का मॉल लाने।" एक सलज्ज मुस्कान उनके चेहरे पर तैर गयी।

मुझे भी याद आया कि जब मैं आया था तो उनकी सफेद लक्जरी कार उनके पोर्च में नहीं थी। एक ठंडी-सी सिहरने मेरे शरीर में व्याप्त हो गयी। मुझे लगा कि मेरे चेहरे पर पसीने की बुंदकियाँ आने वाली है।

"क्या करते है आप...?"

"अखवार में काम करता हूँ...पहले भी बताया था।"

"ओह! हाँ... हमें छाप सकते हो...?" एक उजली-सी मुस्कराहट और उनका चेहरा दमकने लगा। इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं उनके चेहरे पर सिर्फ प्रश्न देख रहा था।

" एक बात बताओ.। आपका विवाह हो गया है? उनका यह प्रश्न इतना अचानक था कि मैं हकबका गया।

"अभी नहीं हुआ है।"

"करोगे?"

"इतनी अल्प आय वाले से, एक तरह से बेकार, कौन शादी करेगा?"

"मै...!" उनके कहने में एक चमकीली खिलखिलाहट की गूंज थी।

मैं शब्दहीन चुप था। परन्तु गहरे उथल-पुथल में डूब रहा था। एक अजीब आशंका ने मुझे जकड़ लिया... तुम यहाँ आये, सो तो ठीक था...लेकिन ज्यादा रुकना गलती है। मैं उठ खड़ा हुआ।

"अच्छा, मैं चलता हूँ।"

"कहाँ जाओगे?"

"घर।" मैंने कहा।

वह कुछ सोचती रही, फिर मेरे पास आयी, कंधे पर धीरे से हाथ रखा... "यह भी घर है।" उन्होंने मेरे कंधे को हल्का-सा पुश देकर, प्यार से फिर सोफे में धंसा दिया... "क्या कुछ देर आप मेरे लिए ठहर सकेंगे?" उनके स्वर में एक भीगा-सा कम्पन था। मानों वह जबरदस्ती अपने आग्रह को दबा रही है। परन्तु उनके प्रति मेरे भीतर नीरस और तटस्थ रहने की कोशिश असफल होती जा रही थी।

एक क्षण के लिए लगा कि जैसे वह अधमुंदी आँखों से मुझे देखती हुई मुस्करा रहीं थीं और उसमें एक हल्का-सा व्यंग्य छिपा है। अब भी उनके दोनों हाथ मेरे कन्धों से चिपके हुए थे और उनका सिर मेरे माथे से चिपका था। मैं अझिप आँखों से केवल उनके चेहरे को देख रहा हूँ और फिर लगा कि मैं उन्हें देख नहीं रहा हूँ, बल्कि अपने भीतर उमड़ते तूफान को थामने की पुरजोर कोशिश कर रहा हूँ।

वह पूरी तरह मुझे अपने आगोश में लेने की कोशिश में संलग्न हो गयी थी। किन्तु मेरे भीतर अब भी कुछ हिचकिचाहट बाकी थी। उनकी इस भाव भंगिमा और स्थिति की मैंने कल्पना नहीं की थी। कुछ दिख रहा था, जो नहीं दिखना चाहिए था।

अचानक मुझे कुछ याद आया। मैंने विषय परिवर्तन की सोची।

"मुझे कुछ पूछना है, मैडम।?"

उनके दोनों हाथ मेरे चेहरें को सहला रहें थें और उनकी देह एकदम सटी हुई थी। पर जवाब देने हेतु एक हाथ की कोहनी सोफे पर रखते हुए कुछ टेढ़ी-सी हो आयीं। चिपकन कुछ कम हुई थी परन्तु स्पर्श बदस्तूर जारी था और वैसे ही पसरी-झुकी बोली, "हाँ! पूछो?"

उस पल वह चटासी-सी रह गयी। उन्हें अवश्य ही अपने प्रयास के निष्फल हो जाने का अफ़सोस रहा होगा। एक कसक और ठसक अभी तक बनी हुई थी कि वह मैं हूँ।

अब मुझे यह सोचकर कर शर्म आ रही थी। क्योंकि कुछ बाते ऐसी होती है जो एक उम्र के साथ जुडी होती है और अगर समय बीत जाए तो अनकही रह जाती हैं।

"आपके बच्चे नहीं है?"

एक झटका-सा उन्हें लगा। वे वापस उसी तरह हो गयीं। कुछ क्षणों तक निश्चल-खामोश बैठी रही, फिर अपनी कांपती पलकें मुझ पर उठा दी। देर तक मुझे देखती रही। अचानक उनका समूचा शरीर पत्ते की तरह हिल उठा।

फिर वह खो गयी अपने यादों के बियाबान जंगल में। वे जिंदगी के अलग-अलग हिस्सों में बिचरने लगीं। उन्हें देखकर अनुमान लगाया जा सकता था कि वह अपने को नए सिरे से खोजती फिर रही है। वह चुप थीं। जैसे नेपथ्य में चली गयी हो। जब वह वापस लौटी तो स्वर एकदम धीमा पड़ गया था।

कुछ पलों के बाद ही धुंध छट गयी थी। उनका चेहरा भोले भयभीत बच्चे-सा मेरी और ताकने लगा।

"बताती हूँ...यह कहकर वह रुकी। शायद असमंजस में थी, ... कहे कि नहीं...? ...युद्ध में कारगिल युद्ध में...कैप्टन साहब, घायल हो गए थे...काफी चिकित्सा के बाद, मरते-मरते बचे...परन्तु सेना की सर्विस के लिए मेडिकली अनफिट और मेरे लिए सेक्सुली...अनफिट..." आखिरी शब्द बेहद धीमे स्वर में निकले, शर्म, संकोच और लज्ज़ा से भरे।

इतना कहते हुए वह कही अँधेरे नाले में जा लुढ़की थी, जैसे उनकी आत्मा शरीर से निकल कर आकाश में विलुप्त हो गयी हो। हताशा की एक हद होती है उसके आगे कुछ नहीं... सिर्फ एक शून्य। उनके चेहरे पर एक सफ़ेद बर्फ की परत छा गयी। वह एक सफ़ेद भीगी बिल्ली-सी नज़र आ रही थीं, डरी, सहमी और प्रताड़ित अव्यक्त। अकसर कुछ लोग परायों को जितनी आसानी से अपने भेद बता देते है उतना अपनों से नहीं।

उसने कसकर मेरे हाथ पकड़ लिए और उसके होंठ फड़-फड़ा उठे। वह रो रहीं थीं और मैं पत्थर के बुत-सा बैठा था। उनके रोने की आवाज नहीं आ रही थी। कमरे में सन्नाटा था। उन्होंने मुझे इतना निरीह अशक्त और आरक्षित बना कर छोड़ दिया था कि मैं गुम था।

मुझे एक गहरे संदेह ने जकड़ लिया था। मुझे लगा कोई काली छाया मुझ पर छा गयी। मस्तिष्क में, संदेह, भय, आशंका, सब बारी-बारी से चक्कर लगा रहे थे। कौन हूँ मैं? क्यों हूँ? किसके साथ? अपने को खोजता हुआ। मैं अपने को नए सिरे से तलाश करने लगता हूँ... कि मैं वही हूँ जो चंद रोज पहले था? मैंने सिर उठाया।

कुछ समय गुजरा, वह नार्मल के करीब हो पाई थीं। नार्मल शरीर से हुआ जा सकता है मन से नहीं। हम दोनों अपने में खोये थे।

मैं उसके झुके सिर को देख रहा था जिसपर उसके काले लहराते बाल गरदन तक बिखर गए थे। उसका शुष्क चेहरा तपने लगा था। वह अजीब आँखों से मुझे निहार रही थी-जैसे कुछ पूछ रही हो।

वह फिर मेरे पास सरक आई और मेरे हाथ को पकड़ कर सहलाने लगी। कुँवारे हाथ, ताप फैलता हुआ सारे शरीर में फैल रहा था। मैं भुरभुरे पन्नों की तरह टूटने लगा। उसके भीतर एक अंधी वासना उठी जिसका मेरी देह से कोई रिश्ता नहीं था। उसने मुझे अपने पास घसीट लिया और मैं खिचता चला गया। चील ने कबूतर को छाप लिया, चालीस ने सीने में चौबीस को दबोच लिया।

उसने पूरी तरह पढ़ कर छोड़ दिया।

"अच्छा लगा?" उसकी आवाज इतनी धीमी थी की मुझे भ्रम हुआ कि उसने कुछ कहा भी है?

मैंने सिर उठाया, धीरे से उसके सिर को अपने सीने से अलग किया। हैरत से उसकी ओर देखा। उन्हें अजीब से सुकून में पाया।

डोर बेल बजी थी और हम दोनों चौक गए. वह अपने पति को भूल गई थी। किन्तु वह अकेली, निर्लिप्त सब खतरों से मुक्त थी। परंतु मैं संशय से घिर गया था।

एक दूसरे से अलग हो गए. कैप्टन साहब आ गए. उनके आने को आभास नहीं हुआ। मैं असहज हुआ परन्तु वह वैसे ही रही समय और परिस्थिति से बेज़ार।

"कैसे...?" उन्होंने मुझसे पूछा।

मैंने चौककर उन्हें देखा। उन्हें देखकर मुझे अपने पर शर्म आने लगी। उनका प्रश्न इतना तीखा और नंगा था कि मुझे उधेड़ता चला गया। यह समझ में नहीं आया कि क्या जवाब दूँ? जी में आया कि उठ जाऊँ या अभी...मैं असमंजस में था। मैंने उनकी तरफ देखा। वह वही निश्चल-सी खड़ी थीं। साहब की दृष्टि बारी-बारी से हम दोनों पर स्थिर हो रही थी। मेरा वहाँ होना अनावश्यक जान पड़ रहा था। मैं वहाँ से जाने के लिये उठ गया। तिवारी जी वैसे ही कुपित से खड़े थे।

किन्तु मैडम...! उनको क्या कहूँ? जैसे ही मैं चलते हुए उसकी तरफ देखा-सफ़ेद भीगी बिल्ली खूंखार हिंसक जंगली बिल्ली में बदल चुकी थी।

"अभी बैठो! ...और आप भी बैठिये। खड़े क्यों है?" एक आदेशात्मक हिंसक स्वर गरजा। जाने के लिये उठे पैर वापस हो चले। सफ़ेद खूंखार जंगली बिल्ली गुर्रायी और दोनों कुत्ते दुम दबाकर अपने-अपने स्थान पर सिमट गए. हम दोनों बिना ना-नुकर किये बैठ गए. वे असामान्य से सामान्य की तरफ अग्रसर होने लगीं।

"अच्छा हुआ आप आ गए." ' उन्होंने कुछ संकोच में कहा। हम लोग आपका ही इंतज़ार कर रहे थे। ये अभी आये है। मेरी कल पार्क में छूटी हुई छतरी लौटाने... मैंने ही इन्हें रोक लिया था। आपसे मुलाकात करवाने।

"मैं इन्हें जानता हूँ।" तिवारी साहब ने कहा।

"तो फिर क्या? इस ढंग से रिएक्ट किया जाता है? । क्या मेरा इतना अधिकार नहीं है कि मैं इस घर में किसी को रोक सकूँ, आमंत्रित कर सकूँ और कुछ बातचीत कर सकूँ? बताये...?"

वे वापस सिकुड़ गए.

मैं सहमी आँखों से दोनों को देख रहा था।

कैप्टन साहब को लकवा मार गया। वे नज़रें झुकाए सिर्फ प्रायश्चित का ढोंग करते दिखे। उनकी अकड़ ढीली पड़ गयी थी। वे सहज सामान्य दिखने में प्रयत्नशील हो गए. मुझे वह आदमी बीमार लगा। वह अपनों के साथ गुस्सा और मनुहार भी नहीं कर सकता, जो वह बाहर के लोगों के साथ कर सकता है। उनके अंदर सिर्फ शर्म, बेबसी और लांछना की तपन थी जिसे वह चौबीसों घंटे सहन कर रहा है।

वे फिर चली गयी थीं। हम दोनों आपस में गुमसुम बैठे रहे। हम दोनों विपरीत दिशाओं में ताक रहे थे। हम दोनों का कॉमनफ्रेंड भीतर गया था।

कुछ ही समय गुजरा था कि वे व्हिस्की-सोडा, पानी और कुछ स्नेक्स के साथ हाजिर हो गयी। आते ही कहने लगी, "मुर्दनी क्यों छाई है।?" ये कहते ही वह हंसी और हम भी हंसे बिना मतलब।

हम तीनों पी रहे थे। हमारा असमंजस कुछ क्षणों के लिए ठहरा था। परन्तु भीतर रह गयी कटुता बाहर निकल नहीं रही थी। माहौल असामान्य ही बना रहा। मुझे अपनी स्थिति कुछ अजीब-सी जान पड़ रही थी, एकदम अकेले और निराश्रित। इतनी देर से हम साथ रहे थे, परन्तु निरर्थक और उपेक्षित।

उस शाम के बाद मुझे लगा कि मुझे अपने आप को उनसे बहिष्कृत कर लेना चाहिए. कुछ भी रहना नहीं चाहिए. कुछ प्रारम्भ होने से पहले समाप्त करना ज्यादा सरल और सहज होता है। एक डर जेहन में समा गया था। कैप्टन अकेले में उसे शूट कर देगा। जिंदगी प्रारंभ होने से पहले ही समाप्त हो जाएगी। डर ने उस दिन भीतर का, फिर कुछ बचा नहीं रह सका। सब कुछ राख हो गया। शंकित मन के लिए पार्क, मैडम रीता और कैप्टन तिवारी सभी मृतप्राय: हो गए थे। मैंने उधर दिशा का रूख फिर कभी नहीं करने को ठानी।

किन्तु मैडम की चाट उकसा रही थी, बेर-बेर मिलने को। दस-बारह दिन काफी होते है, जिसके बीच उस जगह के आसपास नहीं गया था। विशेष रूप से उस हिसाब से, जब कोई प्रतिदिन जाया करता हो! शायद वह सोच रही होगी कि मैं कही बाहर दूसरे शहर न चला गया होऊंगा।

काश! कैप्टन साहब कुछ समय बाद आते तो...? किन्तु अपने विषय में सोचता हूँ तो अचम्भा होता है कि मैं अब तक उनके चुम्बकीय आकर्षण में था? अधीर मन बार-बार यह कह उठता कि वहाँ जाया जाए.।

मैं व्यस्त हो गया था। किन्तु उस दिन गुजरी घटनाएँ ऐसे याद आती है जैसे अभी कल ही हुई हो और कभी ऐसा लगता है, वह कभी हुई ही नहीं। मैडम का नशा खींचता किन्तु कैप्टन की पिस्टल का डर दूर फेंकता। मौत का भय सब नशे से भारी होता है। जो मौत से पार पा गया उसे कोई व्याधि नहीं व्यापती। मैडम की चाट मौत से भारी अभी नहीं हो पाई थी।

मेरी दिली इच्छा होती कि उससे मिलूं किन्तु बगैर वहाँ जाए. यह तभी सम्भव होता, अगर मैं ईश्वर में विश्वास करता। किन्तु ईश्वर में विश्वास करना मुझे एक बीमारी लगती। जिससे मैं अभी तक दूर था। परन्तु यह विश्वास आता कि वह चाहेगी तो बिना उसके घर जाये वह मिलेगी अवश्य।

...निश्चय ही वह लौट आई.

मेरी जिंदगी में यह पहला मौका था जब मैंने अपने से लिपटी एक अजीब-सी परछाई देखता रहता जो प्रत्यक्ष में नहीं थी। परन्तु अस्तित्व में सदैव थी। जाते-आते, बैठते-उठते, सोते-जागते और जब सो जाता तो सपने में आकर चिढ़ाया करती। यह एक तरह का सुख था जो मुझसे चिपक गया था। लेकिन यह सुख सताता रहता था। मैं इसके बारे में सोचता रहता की किस तरह से, कैसे इससे अपने को अलग करें...?

कुछ ज्यादा दिन नहीं बीते थे। सुबह के ग्यारह बजे थे। मैं खाजाना मार्किट आया हूँ। मेरे निवास से चंद कदमों के फासले पर, सड़क के पार। कल रात देर तक मैंने एक लेख लिखा था, जो पेन ड्राइव में था। उसका प्रिंट लेकर आज अखवार के संपादक को देना था। उसी से कुछ आमदनी होनी तय थी। इधर कई दिनों से कोई औजी कार्य नहीं मिला था और कही से पारिश्रमिक भी नहीं आया था। संरक्षित धन-राशि समाप्त होने के कगार में थी। इधर कुछ लिख पढ़ भी नहीं पाया था। क्योंकि मैं एक अजीब-सी बीमारी के गिरफ्त में था जिसका आदि अंत सब-कुछ बेतरतीब था...

प्रिंट लेकर जैसे ही चला कि फिर सहसा ठिठक गया... मैं तनता गया।

वे आ रही थीं...वह मुझे दूर से देख सकती थीं। उनकी आवाज और उठे हुए हाथ मुझे रुकने का इशारा करते है। मैं उनके सम्भावित प्रश्नों की दहशत में था, मेरी ऊपर की सांस ऊपर नीचे की नीचे। उन्होंने मुझे बहुत पहले देख लिया था। वह मुझे एकटक देखते हुई चली आ रही थीं कि मैं नज़रों से ओझल न हो जाऊँ। उनकी आँखें बेहद चौकन्नी थीं कि कही मैं सरक न जाऊँ।

पास आकर उन्होंने हाथ मिलाया और फिर उसे पकड़े रहीं... "कहाँ रहे इतने दिन?" जैसे कि उन्हें इसका भेद पाना हो।

मेरे पास चुप के अलावा कुछ नहीं था, सिर्फ एक आतंक था। मैं उनकी तरफ सीधी आँखों से देख भी नहीं पा रहा था फिर उनके शब्दों का सामना कैसे कर पाता? उनका सही से सामना करना दूभर था।

उसने दुबारा अपने शब्दों को दोहराया।

वह अजनबी नहीं थी। मुझे उससे डरना नहीं चाहिए था। परन्तु मुझे अपने पर यकीन नहीं था। मैंने फिर कोई जवाब नहीं दिया।

उसे हैरानी हुई... उसने फिर कहा, "जिसे मैं चाहती हूँ, जिसे मैं बेहद चाहती हूँ, जिसे मैं..." वह बीच में रूक गयी। यह शब्द-वाक्य इतने धीमे और अस्पष्ट स्वर में कहे कि मैं बमुश्किल उन्हें पकड़ पाया।

"एक काल तो कर सकते थे?" मेरे लगातार मौन से उनमें कुछ ऊब भर दी थी।

कितना आसान है...उसका कुछ भी कहना, पूछना। उनके लिए कोई बंधन नहीं है, जैसे मेरे है-उनकी अपनी शर्तें है और अपनी शर्तों में वह कितनी आत्मनिर्भर हैं और अकेली हैं। जितनी यहाँ मुझसे पूछ-तांछ करते हुए.

"मेरे पास आपका नंबर नहीं था...आपके पास मेरा है!" मैं बमुश्किल यह कह पाया। वह अचम्भे से मुझे देखती हैं, फिर मुझे उनकी आँखें और चेहरे पर छाई गहन उदासी खींचती हैं, उनकी अपनी दुनिया में जो पीड़ा से भरी है। मैं घिसटता चला जाता हूँ। एक गहन उदासी मेरे में भी उभरती है, जो उन्हें नागवार गुजरती है। फिर वह मुस्कराने की कोशिश करती है, जो इस समय उनमें फबती नहीं है...

"यही कही पास में तुम्हारा मकान है?" वह खोलतीं हैं।

"हाँ, वहाँ पर!" मैंने उन्हें सड़क पार इशारा किया।

वह मेरे इशारे की अंगुली को देखती हुई निशानदेही कर लेती है।

आश्वस्त हुई. तनाव ढीला पड़ा।

"यह तो एकदम निकट है। चलते हैं वहीं!" उन्हें किसी औपचारिकता की जरूरत नहीं थी। कितना आसान है... तुम कही भी जा सकती हो...? मेरे लिए कुछ भी खुला नहीं है। जाने कितनी आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक बाध्यताएँ हैं? ऐसा मैंने सोचा। मगर ऐसा था नहीं। शायद, उन्होंने अपने को उनसे मुक्त कर लिया था।

आती दुपहरी का सन्नाटा और मेरी हथेली उनके गिरफ्त में थीं। मैंने अपने हाथों को देखा। कही कुछ गलत है, उन्होंने सोचा...'यह सही नहीं हैं।' उसने हँसते हुए कहा और मेरा हाथ छोड़ दिया।

"हमें चलना चाहिए!" मैंने कहा। हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और चल पड़े, उस तिमंजिले कमरे की और।

यहाँ अपने कमरे में। उनकी उपस्थिति–लगता नहीं कि अपना कमरा है। वह एक कोने में बैठती हैं और मैं दूसरे कोने में बैठता हूँ, उनकी आंच से बचने के लिए. किन्तु धीमे से ताप वहाँ पहुँचने लगती है। वह एक नज़र से सारा समेट लेती है और एक जगह आकर उनकी निगाह टिक जाती है। फिर वह कहती है...

"तुम मुझे अजनबियों की तरह क्यों ट्रीट कर रहे हो?" उनका उलाहना मुझे झेंपा देता है। मैं कुछ क्षण जिद में जड़-सा बैठा रहता हूँ फिर भड़भड़ाता हुआ उसके पास आकर बैठता हूँ। वह कुछ पल मुझे घूरती रही फिर एकदम पास खिसक आई, चेहरें इतने पास कि हम दोनों एक दूसरे की साँसे सुन सकते हैं। मैं धीमे-धीमे सुलगने लगा।

"खाली-पीली बैठी हूँ... कुछ नहीं है क्या? ... कुछ करोगे नहीं। ।स्वागत-सत्कार!"

"अभी लाता हूँ।" मैंने कहा और बाहर जाने के लिए उठता हूँ। वह हाथ पकड़कर खींच लेती है। मैं उसके ऊपर गिरते-गिरते रह जाता हूँ।

"क्या...?" वह रोक देती है।

"चाय, समोसे और क्या...?"

"ये नहीं और कुछ... हार्ड ड्रिंक...?"

"इस समय?" संदेह और अनिश्चय से मेरे स्वर में एक तनाव खिंच आया।

एकबारगी जी में आया कि उसके सफेद स्पन्दन्हीन चेहरे पर अपनी अंगुलियों की छाप छोड़ दूँ। परन्तु जैसे ही उसके अंडाकार सफ़ेद आकर्षक चेहरे पर नज़र गयी और सिर से कन्धों में गिरते काले बाल, माथे पर पीली बिंदी और दो फफकती सी-आँखों से झरती प्रेमराशि, ...

"नहीं...नहीं...मै...तुम्हे अकेला छोड़कर ज्यादा समय के लिए नहीं जा सकता।" यह शब्द मेरे भीतर-बाहर घुमड़ने लगे थे।

"इसकी चिता मत करो... मैं यही रहूंगी तुम्हारे लिए और तुम भी कही नहीं जा रहे हो। सब कुछ यही है।"

"अच्छा!" मेरे स्वर में व्यंग्य था।

"देखिये जादू..." यह कहकर वह उठी और किचन से छुपी हुई व्हिस्की की बोतल उठा लायी जो एक चौथायी भरी थी।

"और हाँ...! शराब और शबाब के लिए समय नहीं, जगह देखी जाती है।" इस बार उसके होंठ अप्रत्याशित हंसी में फ़ैल गए. हंसी में एक विवश निरीहता उभर आई, जिसे उन्होंने जल्दी से आत्मसात कर लिया।

बहस करना व्यर्थ था। वह मानेगी नहीं। मैंने सोचा।

उसने अपने को होस्ट में बदल लिया और मैं गेस्ट में तब्दील हो गया था।

"सुनो," मैंने बहुत सहज भाव से कहा, "मैं कुछ नहीं लूँगा!"

"कैसी बातें करते हो...?" अबकी बार वह भभक उठी..."तुम्हें मेरा साथ हर तरह से देना होगा।" इस बार मैडम रीता के स्वर में अनुनय नहीं निर्णय था-ठंडा कठोर अविचलित जिसे टाला नहीं जा सकता था। उस दिन पहली बार मुझे लगा कि वह मुझसे उम्र में बहुत बड़ी है और मैं हास्यास्पद रूप से बहुत छोटा। जैसे मैं हाईस्कूल का छात्र हूँ और वह मेरी जीव विज्ञान की टीचर। मैं उस पर आसक्त था, अब प्रतिबद्ध हो गया हूँ।

हम दोनों पी रहे थे और हम दोनों सुलगने लगे। एक अजीब-सा हलकापन हम पर तारी था। पीना समाप्त ही नहीं हो पाया था कि वह नाचने लगी। उसने मुझे भी उस नाच में शामिल किया। सब कुछ इतना शांत और शालीन था कि मैं मगन हो गया। मुझे पहली बार पता ही चला कि मुझे नाचना आता है।

नाच समाप्त ही न हो पाया था कि उसने दो सिगरेट सुलगाई एक अपने होंठों पर और एक मेरे होंठों पर लगाकर, वह लम्बे लम्बें कश लेने लगी। मैं पीना जानता था किन्तु वह नहीं। शायद उसने पहली बार पिया था, इस कारण वह खांसने लगी। परन्तु उसने बंद नहीं किया। उसका चेहरा हल्का-सा सुर्ख हो आया।

उस समय उसने मुझसे कहा था, कोई भी काम करने के पहले, कोई कदम उठाने के पहले, या कोई यात्रा करने के प्रारम्भ में डर लगता है, उसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। मुझे हमेशा लालच होता रहता था कि वह मेरी कमजोरी का फायदा उठा सकती है। किन्तु उसकी आँखें अब भी मुझे टटोल रही थी कि मैं निराश तो नहीं करूँगा? ... क्योंकि पहली उनकी पहल के बाद भी वह आश्वस्त नहीं हो पाई थी कि उनकी चाहना किस हद तक मदमस्त हो पाई है।

एक बार फिर उनकी पहल जबरदस्त दबाव... उत्पन्न करने लगी थी। क्योंकि अब उनकी देह प्राइवेट नहीं रही थी... मेरी निगाहों में उसने पता नहीं क्या आँका कि वह मदहोश हो गयी...

छत के ऊपर बादल थे हलके और साफ। एक धुंध छाती जा रही थी। बाहर भीतर दोनों जगह बादल घिर आयें थे और उसी के साथ अँधेरा भी... बादल बरसने लगे।

सफेद घरेलू बिल्ली एकाएक लाल जंगली में बदल गयी और उसने खरगोश को अपने आगोश में जकड़ लिया। उसकी आवाजें हिंसक नहीं थीं, परंतु निःसंदेह कामुकता से सिंचित थी। एकाएक वह पिल पड़ी। उसने मुझे अपने में समेट लिया। उनकी धारा में बहता चला गया। कुछ ही पलों में दोनों सफ़ेद एकसार हो गए और निस्पंद पड़े थे।

बाहर और भीतर दोनों जगह बरसात बंद हो गयी। सब कुछ धुला धुला-सा था। वह सहसा धीमे से वापस आ गयी। निढाल-सी पसर गयी। मैं निश्चित होकर बैठ जाता हूँ। पंखे की हवा पसीने को सुखा नहीं पाती है।

आसमान से कमरे में अँधेरा उतर आया था।

"अच्छा, अब मैं चलती हूँ।" यकायक वह उठी। उसने जल्दबाजी में अपने को दुरुस्त किया। वह बहुत जल्दी में थी। उसे काफी देर हो चुकी थी। लेकिन जब वह दरवाजा खोलकर नीचे उतरने वाली सीढ़ियों तक पहुँची तब उसने पीछे मुड़कर देखा। कमरे के अँधेरे में, मैं दिखाई नहीं पड़ा। वह फिर लौटी फिर मेरे पास आई. देखती रही जहाँ मेरी चमकती आँखें थीं, मेरा चेहरा था।

"सब ठीक होगा।" उसने दोनों हाथों से मेरा चेहरा सहलाया, थपथपाया ... "तुम चिंता मत करना।" यह कहकर वह मुस्करायी।, "सोने के समय सिर्फ मेरा ध्यान करना।" उसने बेताब इशारे से बताया कि वह ऐसे ही आती रहेगी। उनकी आँखों में अजीब तसल्ली थी, जैसे यह बात कहकर उसने स्वयं उसे तसल्ली दी है। मेरे चेहरे में कैप्टन का डर काफुर था और मैडम की चाट तारी थी ...!

वह आती रही मैं मिलता रहा। परंतु मेरा पार्क में टलहना बंद था। मुझे उसके घर जाने की जरूरत ना रही थी। वह कॉल करके आती और छा जाती।

फिर अचानक उसका आना बंद हो गया। मैं प्रतीक्षा करता। फोन करता। वह मना करती। किन्तु मुझे बुलाती। उसी पार्क के समय। मैं कई दिन नियमित पार्क गया जैसे पहले जाता था। वह नहीं मिली न कैप्टन। कुत्तों को खिलाना बंद था और बिल्ली का टहलाना भी। किन्तु घर खुला था। घर के भीतर काम-वाली को मैंने आते जाते देखा था, किन्तु उसके पास जाने का यथोचित कारण और हिम्मत जुटा नहीं पाया। मैं काफी देर बदहवास-सा आस-पास घूमता रहा।

एक दिन उसने बताया कि 'वह बीमार है।'

"क्या बीमारी है?" मैंने लापरवाही से पूछा।

"तुम नहीं समझोगे? तुम्हारे भी होगी! ।"

वह बीमारी-एक भेद, एक रहस्य। मुझे भी है किन्तु इल्म नहीं! लेकिन, अगर वह सचमुच बीमार है तो मुझे उससे मिलना चाहिए.

उसकी चाट के असह्य दबाव तले वह बेहद याद आती रही और मैं उदास दर उदास होता रहा और सहसा मैंने उसके घर के भीतर जाने का निर्णय किया। संभव है कि मैं गलत हूँ... लेकिन मुझे यह सोचकर हल्की तसल्ली होती कि जब भी मिलेंगे, वह वैसे ही होगी।

उसके घर के गेट पर मैं कुछ हिचका, मैं कमरे में जा रहा था लेकिन सीधे नहीं। फिर ठिठक रहा।वह बरामदे बैठी मुझे देख रही थी।

बिना कुछ कहे मैं पास वाली इजी चेयर पर बैठ गया। उनकी आँखों में गहरा-सा-विस्मय छलक आया और दबा-सा डर भी। उम्मीद के विपरीत मैं आया था। मुझे लगा कि वह, 'यह क्षण जी रही है अपने समूचे अस्तित्व की मिट्टी में मेरे व्यक्तित्व को दबोचे।'

चारों ओर उजड़ी शांति स्थापित थी। एक ऐसी शांति जो तूफान गुजर जाने के बाद होती है।

अचानक तूफान सामने आ खड़ा हुआ। उसके तेवर काफी खतरनाक से लगे। मेरे पास आकर वे ठिठक गए... कुछ पल वे मुझे देखते है। मेरी आँखें जमीन में जम-सी गई. जैसे उसकी क्रूरता को ठीक से देख नहीं पा रहा हूँ।

मैडम की आँखें अजीब-सी आतंक ग्रस्त हो जाती है। वह हड़बड़ाकर उठ बैठी और विमूढ़ भाव से उसे देखने लगीं... मैं प्रतीक्षा करता हूँ कि वह मुझे हिट करें... वह ऐसा कुछ भी नहीं करता है और हिकारत से देखता है। फिर वह बहुत ही मंद कदमों से चलता हुआ गेट से पार होता है और गेट के दोनों पल्ले झूलते रह जाते है।

जब वह अनुमानतः दूर हो चुका होता है। वह जोर से गेट बंद करती है।

वह गुस्से में टूट पड़ती हैं, "कहाँ रहे इतने दिन? कुछ परवाह है मेरी कि नहीं? आखिर कब तक एकतरफा...?"

एकाएक उसने मेरा दाहिना हाथ पकड़ लिया। लगभग घसीटते हुए बरामदे, ड्रॉइंग रूम पार करते हुए सोने वाले कमरे में लाकर गिरा दिया।

मादकता बेहद भूखी थी। वह हिंसक हो उठी थीं। उनका कुचल डालने का इरादा भांप कर, घायल होने पहले ही मेरे स्वर में याचना भरा आश्चर्य था।, लेकिन उसने मुझे अपनी बाँहों में बहुत सख्ती से जकड़ रखा था। हालांकि मैं जानता हूँ कि छूटना गलत है। किन्तु कैप्टन का डर, अब भी मुझ पर तारी था कि कहीं वह आ गया तो?

परंतु उसमें रियायत नहीं थी। शीघ्र ही वह मेरे ऊपर थी। मेरे शिथिल पड़ते ही। वह मुझे छोड़कर हट गईं। मैंने सिर उठाया हैरत से उसे देखा। फिर...

मैं हतप्रभ ...यह मैं लेटा हूँ, संज्ञाहीन नहीं फिर भी विचारशून्य, महीन चेतना की अंधी गली पर चिमगादड़-सा जमीन पर लिपटा हुआ। सोच करता हुआ उस विस्फोटन का जो चमत्कार से कम नहीं था। उस गहराती शाम को फिर मुझे लगा कि मैं उससे कृत्य में भी बहुत ही छोटा और अनजान हूँ ।

वह लौट आई. एकदम निकट। धीरे-धीरे मेरा सिर सहलाने लगती है। यह परिवर्तित रूप जैसे प्रेमिका से माँ भी उसे भाने लगा।

"सुनो।" उसने बहुत धीरे से कहा। "मैं जीना चाहती हूँ।"

"क्या?" मैंने अपना सिर उठाया। उसकी ओर देखा। वह कभी-कभी ऐसी भाषा बोलती है, जो मेरे समझ से परे होती है।

"तुमने कुछ कहा?" मेरी क्षीण-सी आवाज पर उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन वह कुछ सुनना नहीं चाहती थी। सिर्फ कुछ कहना चाहती थी।

"संभव है, मैं गलत हूँ... लेकिन जब रात को नींद नहीं आती है तो अक्सर मुझे यह सोचकर तसल्ली होती है कि तुम हो...! नहीं... नहीं अब मेरे आने की जरूरत नहीं है, हालांकि तुम्हारा घर ज्यादा दूर नहीं है। लेकिन..."

कुछ देर वह चुप रही फिर बोली, "अफसोस, अब तुम्हारे घर आना नहीं हो पाएगा। कई दोस्त हो गए है। जो पास में हैं। पड़ोस में है। उनके पास किसी समय कैप्टन से बचकर पहुँचना आसान है। परंतु वे यहाँ नहीं आ सकते किन्तु तुम आ सकते हो। कैप्टन साहब तुम्हें जानते है कि तुम अन्य जैसे नहीं हो!"

मुझे बुरा लगा था। बहुत बुरा लगा था। इतना बुरा लगा दिल चाहता था कि मैं उसका मुंह नोच लूँ, लगा कि और एक पल के लिए रुकना दूभर है... । किन्तु "बेवक्त, बेवजह, बेरुखी तेरी-फिर भी बेपनाह चाहना बेबसी मेरी।" एक बहुत ही अविश्वसनीय आतंक आँखों के जरिए जेहन में बैठ गया था।

मुझे लगा कि कैप्टन जी रहा है अपने समूचे अस्तित्व को मैडम के वजूद की मिट्टी में दबाये और मेरा वजूद भी कुछ ज्यादा अलग नहीं है...

एक लंबे समय तक यह काफी विचित्र-सा लगता रहा कि 'मै विशिष्ट नहीं था...किन्तु वह वैसी नहीं थी जैसी दिखती थी...,' मैंने सोचा।

एक अरसे बाद भी, वे-दिन अमिट अधूरी स्मृति समय के कुहासे में धुल नहीं पाई थी। रह गई केवल आकारहीन, अर्थ खोजते हुए उसके अस्तित्व की परिधि को अनुप्राणित करता एक अस्पष्ट धुंधला-सा दर्द-जो किसी के चंद अमिट लमहों के सान्निध्य की छाँव से उत्पन्न हुआ था।