गंगा मैया-11 / भैरवप्रसाद गुप्त

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ग्यारह

गोपी अपनी सजा काटकर जब छूटा, तो उसे और कैदियों की तरह वह खुशी न हुई, जो कैद से छूटने के वक़्त होती है। आज वह अपने घर की ओर जा रहा है। आख़िर उसे आज अपनी उस विधवा भाभी के सामने जाकर खड़ा होना ही पड़ेगा, उसे उस दशा में, अपनी इन आँखों से देखना ही पड़ेगा, जिसके लिए करीब पाँच वर्षों से भी वह पर्याप्त साहस नहीं बटोर सका है।

गाँव में जब वह घुसा, तो सन्ध्या की धुँधली छाया पृथ्वी पर झुकी आ रही थी। जाड़े के दिन थे। चारों ओर अभी सन्नाटा छा गया था। पोखरे से एकाध आदमियों के ही खाँसने-खँखारने की आवाज़ें आ रही थीं। घाट सूना था। गाँव के ऊपर जमे हुए धुएँ का बादल धीरे-धीरे नीचे सरका आ रहा था।

आगे बढक़र गोपी ने सोचा कि किसी से घर का समाचार पूछे। लेकिन फिर ठिठक गया। पास ही छोटा सा मन्दिर था। सोचा, पुजारी जी के पास ही क्यों न चले। भगवान् के दर्शन भी कर ले, पुजारी जी से समाचार भी पूछ ले। गोपी का दिल लरज रहा था। सालों दूर रहने से उसके मन में यह बात उठ रही थी कि जाने इस बीच क्या-क्या हो गया हो। उसे डर लग रहा था कि कहीं कोई उसे बुरी ख़बर न सुना दे।

मन्दिर उसे वीरान-सा दिखाई दिया। आश्चर्य हुआ कि ऐसा क्यों? यह भगवान् की आरती का समय है। फिर भी सन्नाटा क्यों छाया हुआ है? चबूतरे पर कोई बूढ़ा भिखमंगा अपनी गठरी रखे लिट्टी सेंकने के लिए अहरा सुलगा रहा था। उसने गोपी को खड़े देखा, तो पूछा, ‘‘का है, भैया?’’

‘‘मन्दिर बन्द क्यों है? पुजारीजी नहीं हैं क्या?’’ गोपी ने उसके पास जाकर पूछा।

भिखमंगा जोर से हँस पड़ा। दाँत न होने के कारण ढेर-सा थूक उसके होंठों से बह पड़ा। वह बोला, ‘‘तुम यहाँ के रहनेवाले नहीं हो क्या? अरे, पुजारी को भागे हुए तो आज तीन बरस के करीब हो गये। गाँव की एक बेवा के साथ पकड़ा गया था। उसे लेकर जाने कहाँ मुँह काला कर गया।’’ और वह फिर जोर से अट्टहास कर उठा।

गोपी के काँपते हाथ उसके कानों पर पहुँच गये। उसका दिल जोरों से धडक़ उठा। उससे एक क्षण भी वहाँ न ठहरा गया। असीम व्याकुलता मन में लिए वह सीधे अपने घर की ओर बढ़ा। एक आशंका उसके मन में काँप रही थी कि कहीं...

अपने घरों के सामने कौड़े के पास बैठे जिन-जिन लोगों ने उस दुख और व्याकुलता की मूर्ति को गुज़रते हुए देखा, वे चुपचाप उसके साथ हो लिये। मूक दृष्टि से कभी-कभी गोपी उनकी जुहार का उत्तर दे देता। न किसी से कुछ पूछने की मन:स्थिति उसकी थी, न लोगों की। लग रहा था, जैसे वे सब अपने किसी प्यारे की लाश जलाकर मौन और उदास लौट रहे हों।

घरवालों को तब तक किसी ने दौडक़र गोपी के आने की सूचना दे दी थी। गोपी अभी अपने घर से कुछ दूर ही था कि उसके कानों में अपने घर की दिशा से जोर-जोर से चीख़कर रोने की आवाज़ें आने लगीं। उसका दिल बैठने लगा। रोम-रोम व्याकुलता की तड़प से काँप उठा। पैरों में कँपकँपी छूटने लगी। आँखों के सामने अन्धकार-सा छा गया। दिमाग में चक्कर-सा आने लगा। उसके साथ-साथ चलने वाले लोगों से उसकी यह दशा छिपी न रही। कुछ ने बढक़र उसे सहारा दिया। एक के मुँह से यों ही निकल गया, ‘‘होश-हवास खो बैठा बेचारा! भीम की तरह भाई के मरने का दु:ख ही क्या कम था, जो विधाता ने इसकी औरत को भी छीन लिया!’’

गोपी के कानों में इसकी भनक पड़ी तो आँखें फाड़े वह पूछ बैठा, ‘‘क्या?’’

कइयों ने एक साथ ही कहा, ‘‘अब दु:ख करने से क्या होगा, भैया? उनका-तुम्हारा उतने ही दिन का सम्बन्ध लिखा था। अब जो रह गये हैं, उन्हीं को सँभालो। अब उन्हें तुम्हारा ही तो सहारा रह गया है।’’

गोपी को लगा, जैसे एक बिजली की तरह जलता शूल उसके दिल में कौंधकर उसके तन-मन को जलाता सन्न से निकल गया। वह गश खाकर सहारा देने वालों के हाथों में आ रहा।

उसे घर ले जाकर लोगों ने चारपाई पर लिटा दिया और पानी के छींटे दे उसे होश में लाने लगे। औरतों ने रोते-रोते, बेहाल हुई माँ और भाभी को, और बड़-बूढ़ों ने बिस्तर पर कूल्हते पिता को किसी तरह यह कहकर चुप कराया कि अगर बड़े होकर तुम्हीं इस तरह तड़प-तड़पकर जान दे दोगे, तो गोपी का क्या होगा?

दुख की घटा छायी रही उस घर पर महीनों। व्यथा के आँसू बरसते रहे सबकी आँखों से महीनों।

दुख की जितनी शक्ति है, उसे कहीं अधिक प्रकृति ने आदमी को सहनशक्ति दी है। जिस तरह दुख की कोई निश्चित सीमा नहीं, उसी तरह मनुष्य की सहन-शक्ति भी असीम है। जिस दुख की कल्पना-मात्र से मनुष्य की आत्मा की नींव तक काँप उठती है, वही दुख जब सहसा उसके सिर पर भहराकर आ गिरता है, तो जाने कहाँ से उसमें उसे सहन करने की शक्ति भी आ जाती है। उसे वह हँसकर या रोकर झेल ही लेता है। दुख की काली घटा के नीचे बैठकर वह तड़पता है, रोता है। रो-रोकर ही वह दुख को भुला देता है। वह घटा छँटती है, खुशी का प्रकाश चमकता है और आदमी हँस देता है। वह यह बात भी भूल जाता है कि कभी उस पर दुख की घटा छायी थी, कभी वह रोया और तड़पा भी था। यह बात कुछ असाधारण मनुष्यों पर भले ही लागू न हो, पर साधारण मनुष्यों के लिए सर्वथा सच है।

गोपी, उसके माता-पिता और भाभी साधारण ही मनुष्य थे। व्यथा के उमड़ते-घुमड़ते सागर में सालों दुख के थपेड़े खाकर धीरे-धीरे उन्हें लगने लगा कि वे व्यथा और दुख की गरजती लहरें कुछ करुण और कुछ मधुर स्मृतियों की मन्द-मन्द लहरियाँ बन-बन उनके व्यथित हृदयों को अपने कोमल करों से सहला-सहलाकर कुछ आशा, कुछ सुख के झीने-झीने जाल बुनने लगी हैं।

भाभी और देवर, दोनों एक ही तरह के दुर्भाग्य के शिकार थे। उनकी समझ में न आता कि वे कैसे एक-दूसरे को सान्त्वना दें। भाभी ने पूर्ववत् अपने को पूजा और घर के कामों में उलझा दिया था। वह यन्त्र की तरह सब-कुछ करती, जैसे वही-सब करने के लिए इस यन्त्र का निर्माण हुआ हो, जैसे यह यन्त्र एक ही रफ्तार से, इसी तरह चलता रहेगा, काम करता रहेगा, इसके नियम में कभी कोई परिवर्तन न होगा। हाँ, धीरे-धीरे, जैसे-जैसे इसके पुरजे घिसते जाएँगे, इसकी चाल में शिथिलता आती जाएगी, फिर एक दिन इसके पुरजे बिखर जाएँगे, यह एक यन्त्र टूट जाएगा हमेशा के लिए।

भाभी अब कहीं अधिक गम्भीर और चुप और उदास बन गयी थी। मानो अपनी पूजा और कामों के सिवा उसके जीवन में कुछ हो ही नहीं।

गोपी भाभी को देखता और उस निस्सीम उदासीनता, नीरसता और दुख में लिपटी हुई बीमार-सी पुतली को देखकर सोचता कि क्या वह ऐसे ही अपना जीवन बिता देगी? क्या वह सचमुच उसे ऐसे ही जीवन बिताने देगा? दुनिया के बाग में पतझड़ आता है, फिर बसन्त आता है। क्या भाभी के जीवन में एक बार पतझड़ आकर सदा बना रहेगा? क्या फिर उसमें बसन्त न आएगा? क्या फिर एक बार उसमें बसन्त लाया ही नहीं जा सकता? पतझड़ में चुप हुई बुलबुल क्या हमेशा के लिए ही चुप हो जाएगी? क्या उसकी चहक एक बार फिर न सुन सकेगा?

गोपी अपने समाज के रीति-रिवाज से परिचित है। वह जानता है कि उनकी बिरादरी की विधवा लकड़ी का वह कुन्दा है, जिसमें उसके पति की चिता की आग एक बार जो लग जाती है, तो वह जलता रहता है, तब तक जलता रहता है, जब तक जलकर राख नहीं हो जाता। उसे राख हो जाने के पहले किसी को छूने की हिम्मत नहीं होती, बुझाने की तो बात ही दूर। और गोपी सोचता कि क्या उसकी भाभी भी उसी तरह जलकर राख हो जाएगी? वह उस लगी आग को कभी न बुझा सकेगा? गोपी के मन की आँखों के सामने ये प्रश्न हर क्षण चक्कर लगाते रहते हैं। और वह सदा जैसे उन प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ निकालने में डूबा-सा रहता है। भाभी के सुख-दुख का स्थान यों भी उसके जीवन में कम नहीं रहा है, पर जब भाभी के जीवन में कभी भी ख़तम न होने वाली वीरानी आ गयी है, तो उसका स्थान उसके हृदय में और गहरा हो गया है। वह एक तरह से अपने विषय में कुछ न सोच, सदा भाभी के विषय में सोचा करता है कि कैसे वह अपनी स्नेहशील भाभी को फिर एक बार पहले ही की तरह चहकती हुई देखे।

दुनिया चाहे जिस परिस्थिति में रहे, बेटी वाले बापों को चैन कहाँ? गोपी के जेल से आने का पता जैसे ही उन्हें चला, फिर उन्होंने दौडऩा-धूपना शुरू कर दिया। गोपी के जेल से लौटने की ही तो पख थी। अब शादी पक्की करने में कोई उज्र नहीं होनी चाहिए। पिता उसे सीधे गोपी से बात करने को कह देते। अपंग आदमी ठहरे। सब-कुछ अब गोपी को ही तो करना-धरना है। वह जैसा मुनासिब समझे, करे।

गोपी उन्हें देखकर जल-भुन जाता है। उसकी समझ में नहीं आता कि भाभी के सामने वह कैसे ब्याह रचा सकता है? वह किन आँखों से उस खुशी के उत्सव को देखेगी, किन कानों से ब्याह के गीत सुनेगी, किस हृदय से वह सब सह सकेगी? नहीं-नहीं गोपी जले पर इस तरह नमक नहीं छिडक़ सकता! ऐसा करने से उसका दिल छलनी हो जाएगा।

उसके जी में आता है कि वह मेहमानों को फटकर बताकर कह दे, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसी बातें मुझसे कहते? कुछ नहीं तो कम-से-कम एक इन्सान होने के नाते ही मेरे दिल की हालत तो समझने की कोशिश करो। शादी की बात करके मेरे हरे ज़ख्मों पर इस तरह नमक तो न छिडक़ो।’’ लेकिन सौजन्यतावश वह शादी न करने की बात कहकर उन्हें टाल देता है। वे उसे उलझाने की कोशिश करते पूछते हैं, ‘‘आख़िर ऐसा तुम क्यों कहते हो?’’

गोपी चुप रहता है। वह कैसे बताए कि ऐसा क्यों कहता है?

‘‘आख़िर इस उम्र से ही तुम इस तरह कैसे रह सकते हो?’’ दूसरा सवाल फेंका जाता है।

गोपी का मन पूछना चाहता है कि भाभी की उम्र भी तो मेरी ही बराबर है, आख़िर वह कैसे रहेगी? लेकिन वह चुप ही रहता है।

तीसरा कम्पा लगाया जाता है, ‘‘एक-न-एक दिन तुम्हें घर बसाना ही पड़ेगा, बेटा!’’

और गोपी कहना चाहता है कि क्या यही बात भाभी से भी कही जा सकती है? लेकिन उसके मुँह से कोई बोल ही नहीं फूटता। अन्दर-ही-अन्दर एक गुस्सा उसमें घुमडऩे लगता है।

‘‘और नहीं तो क्या? कोई बाल-बच्चा होता, तो एक बात होती,’’ चौथी बार लासा लगाया जाता है। लडक़ा चुप है इसके मानी यह कि उस पर असर पड़ रहा है। शायद मान जाए।

भाभी के भी तो कोई बाल-बच्चा नहीं है। क्या उसे इसकी ज़रूरत नहीं? गोपी के दिल में एक मूक प्रश्न उठता है। उसके होंठ फिर भी नहीं हिलते। गुस्सा उभरा आ रहा है। नथुने फडक़ने लगे हैं।

‘‘खानदान का नाम-निशान चलाने के लिए...’’

और गोपी और ज्यादा कुछ सुनने की ताब न लाकर गरजते बादल की तरह कडक़ उठता है, ‘‘तुम्हें मेरे खानदान की चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं! तुम चले जाओ!’’

‘‘अजीब आदमी है! हम कैसे बातें कर रहे हैं और यह कैसे बोल रहा है!’’ अपमान का कड़वा घूँट पीकर मेहमान कहते, ‘‘दर दहेज की अगर कोई बात हो, तो...’’

‘‘कुछ नहीं। कुछ नहीं! मैं शादी नहीं करूँगा! नहीं करूँगा! नहीं करूँगा!’’ और वह खुद ही वहाँ से उठकर हट जाता।

पर यह सिलसिला टूटने को न आता। और अब तो वह किसी ऐसे मेहमान के आने की ख़बर सुनता है, तो पागल-सा हो जाता है। उसके हृदय का द्वन्द्व और भी तीव्र हो उठता है। वह जैसे अपने ही से मूक आवाज़ में पूछने लगता है, कैसे, कैसे? कैसे अपनी विधवा भाभी की वीरान आँखों के सामने ब्याह का रास-रंग रचाऊँ? कैसे अपने हृदय की तड़प की पुकार न सुनकर, मैं एक अबोध कन्या को लाकर अपना सुख संसार बसाऊँ? नहीं यह नहीं हो सकता!’’ और वह फूट-फूटकर रो पड़ता।