गुरुदत्त-वहीदा रहमान की कहानी एक प्यास / जयप्रकाश चौकसे

Gadya Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
गुरुदत्त-वहीदा रहमान की कहानी एक प्यास


मुन्नी नसरीन ने फिल्मवालों पर बहुत सी किताबें लिखीं हैं और सितारों से अपनी लंबी बातचीत को ही किताबों का आधार बनाया। उन्होंने ‘आवारा’ और ‘मुगले आजम’ की संपूर्ण पटकथा भी प्रकाशित की है। विगत दिनों स्वर आई कि वे वहीदा रहमान से लंबा साक्षात्कार लेकर पुस्तक लिखने जा रही हैं। क्या पाठक यह उम्मीद करें कि वहीदा रहमान के अंतरंग जीवन की झलक प्रगट होगी या उनका गुरुदत्त तथा दिलीप कुमार से गहरी मित्रता का वर्णन होगा? वहीदा रहमान एक अत्यंत गरिमापूर्ण खामोश व्यक्तित्व की हैं और एक भी अतिरिक्त शब्द वे नहीं बोलतीं इस तरह के संजीदे व्यक्तित्व के मन में झंकना या उनके अवचेतन को समझ पाना कठिन है। यह किताब कोई अंतरंगता का इतिहास नहीं हो सकती। वहीदा रहमान को अपने निजीत्व की रक्षा करना बखूबी आता है। सवालों की लहरें किनारे की खामोश चट्टान से टकराकर अपना माथा ही चूर करेगी। वहीदा रहमान एक आदर्श सितारा है जो व्यक्तिगत भावों को कभी सरेआम प्रगट नहीं कर सकती। यह उनका संस्कार नहीं है। अपने लंबे कॅरियर में कभी उन्होंने अपने शरीर को नहीं दिखाया। अगर विजय आनंद ‘गाइड’ में आप उनके कंधे देख रहे हैं सो यह आपकी भूल है। एक ङीना सा कपड़ा वे पहने हैं। जिस महिला ने कभी शरीर का प्रदर्शन नहीं किया, वह अपना मन उजागर करेगी। यह संभव नहीं है। बहरहाल, हैदराबाद के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में गुरुदत्त ने उन्हें पहली बार देखा। उन दिनों गुरुदत्त अपने जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ पर थे कि अब पहले की तरह अपराध कथाएं या सतही फिल्म नहीं बनाएंगे और अपनी अंतरात्मा की आवाज पर कार्य करेंगे। उनकी एक अपराध फिल्म उनके शागीर्द राजखोसला निर्देशित कर रहे थे और वहीदा रहमान को उसी फिल्म में अपराधी की बंदिनी की संक्षिप्त भूमिका दी गई जिसका गीत ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना..’ लोकप्रिय हुआ और उनके अफसाने को भी बयां कर गया। गुरुदत्त ने अनेक वर्ष पूर्व एक शायर की प्रेम-कथा समाज के खोखलेपन की पृष्ठभूमि पर लिखी थी और उसी ‘प्यासा’ में सेहत के कारण दिलीप कुमार के मना करने पर नायक की भूमिका उन्होंने की। उनके यूनिट में किसी को भी वहीदा रहमान पर भरोसा नहीं था और पहले दौर का रश प्रिंट भी यही साबित करता है। गुरुदत्त ने दोबारा शूटिंग की और वहीदा रहमान पर कलकत्ता में गाना फिल्माया जाने लगा। ‘क्या तूने कहा, जाने मैने क्या सुना पर बात बन ही गई..’ और सचमुच बात बन गई तथा वहीदा जी का स्वभाव भी यही था कि खामोशी ही बोलेगी, जबान नहीं, निगाहें बात बयां करेगी। ‘प्यासा’ की कामयाबी के बाद वहीदा रहमान सितारा बन गईं और ‘कागज के फूल’ को गुरुदत्त की आत्म-कथा मानने वालों ने उन दोनों के प्यार की अफवाहें फैलाई चूंकि गुरुदत्त तथा उनकी प्रतिभाशाली पत्‍नी के बीच पजेशन को लेकर तकरार होती रही, यहां तक कि गीतादत्त को नायिका लेकर बनाई जाने वाली ‘गौरी’ भी रद्द हो चुकी थी। दरअसल दोनों ही खामोश और संजीदा इंसान थे इसलिए गुरुदत्त और वहीदा के रुहानी रिश्ते को चलताऊ मोहब्बत मान लिया गया। उनका एक दूसरे को बिना कुछ बोले समङो जाने के रसायन को प्रेम मान लिया गया। ‘कागज के फूल’ का अठारह लाख का घाटा ‘चौदहनी का चांद’ ने पूरा किया और मीनाकुमारी की ‘साहब बीबी गुलाम’ में वहीदा ने समानांतर नायिका की छोटी भूमिका निबाही थी।

गुरुदत्त की आत्मकथा को वहीदा की तथा कथित बेवफाई से जोड़ना दोनों पर अन्याय करना है। गुरुदत्त जो ‘प्यासा’ में जमाने से अपनी नाराजगी का बयान कर चुके थे जिसे उनकी आत्महत्या के पहले लिखा सच मानना चाहिए। अगर यह दुनिया मिल भी जाए सो क्या है।

समाज के सांस्कृतिक शून्य को आत्महत्या का कारण दुनियादार लोग नहीं समझ सकते। सृजनशील व्यक्ति को कहीं से प्रेरणा प्राप्त होती है परंतु यह आवश्यक नहीं कि उनमें प्रेम भी हो और बात शारीरिक स्तर तक जा पहुंचे यह जरूरी नहीं। ‘गाइड’ बनाते समय विजय आनंद अपनी नायिका से प्रेम में आकंठ आलिप्त लगते हैं। गहन सघन प्रेम अनेक बार एकतरफा ही होते है। प्रेम में डूबे रहने का भाव मनुष्य को अपना श्रेष्ठतम प्रगट करने की प्रेरणा देता है। बहरहाल खामोश वहीदा ने ‘खामोशी’ नामक फिल्म भी की है। जिसमे दिमागी कमतरी के लोगों को वह प्रेम से चंगा कर देती है तथा इस तरह के प्रयोग ही पागल बना देते हैं। प्रेम और प्रेमहीनता दोनों में ही पागलपन की संभावना रहती है।

बहरहाल खामोश वहीदा ने ‘खामोशी’ नामक फिल्म भी की है। जिसमे दिमागी कमतरी के लोगों को वह प्रेम से चंगा कर देती है तथा इस तरह के प्रयोग उसे ही पागल बना देते हैं। प्रेम और प्रेमहीनता दोनों में ही पागलपन की संभावना रहती है।