ग्रामीण समाज / शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

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वेणी घोषाल ने मुखर्जी महाशय के घर में प्रवेश करते ही एक पौढ़ा स्त्री को देखा, तो उसे पहचानकर प्रमाण करता हुआ पूछने लगा, ‘‘मौसी, रमा कहां है ?’’ पूजा कर रही मौसी ने रसोईघर की ओर इशारा किया, तो वेणी उधर चल दिया द्वार पर पहुँचकर तथा रमा को देखकर उससे बोला, ‘‘रमा, तुमने कुछ करने का निश्चय तो ले लिया होगा ?’’ खौलते तेल की कढ़ाई को चूल्हे से उतारकर और नीचे रखकर रमा ने पूछा, ‘‘भैया, आप किस विषय में मेरे निर्णय लेने की पूछ रहे हैं ?’’

वेणी बोला, ‘‘मैं तारिणी चाचा के श्राद्ध के विषय में तुम्हारे विचार जानना चाहता था। रमेश तो कल यहां पहुंच गया है और सुना है कि वह पूरी धूमधाम से अपने पिता का श्राद्ध करना चाहता है। तुम जाओगी या नहीं ?’’ चकित हुई और आँखें फाड़कर देखती रमा बोली, ‘‘मैं तारिणी घोषाल के घर जाऊंगी तुमने सोच कैसे लिया ?’’

लज्जा का प्रदर्शन करता हुआ वेणी बोला, ‘‘बहिन, समझता तो मैं भी हूं कि तुम उधर किसी प्रकार नहीं जाओगी,, किन्तु सुना है कि वह स्वयं एक-एक घर जाकर लोगों को निमन्त्रण दे रहा है। दुष्टता में तो वह अपने बाप के भी कान काटता है, किन्तु यदि वह तुम्हारे पास आकर तुमसे अनुरोध करता है, तो तुम्हारा उत्तर क्या होगा ?’’

नाराज़गी के स्वर में रमा बोली, ‘‘मेरे मुंह खोलने की नौबत ही नहीं आयेगी दरबान बाहर से ही उसे चलता कर देगा।’’ पूजा में लगी मौसी ने सलाह-मशविरा करते वेणी और रमा को सुना तो पूजा छोड़कर दौड़ती हुई इधर ही आयी। अपने भानजे के मुंह से उसकी बात छीनकर गरजती-लरजती हुई वह बोली, ‘‘दरबान को यह ज़िम्मा क्यों दे रही हो बेटी ? क्या मैं मर गयी हूं ? उस पाजी शैतान को ऐसी खरी-खरी सुनाऊंगी की उसे छठी का दूध याद आ जाएगा और फिर कभी इस घर में पैर रखने का सपना भी नहीं ले सकेगा। तारिणी घोषाल का लड़का हमारे घर हमें निमन्त्रण देने आयेगा ? वेणी,

तुम यह कैसी अनहोनी बात कर रहे हो ? मैं बीती बातें कुछ भी नहीं भूलीं हूं। तारिणी हमारी रमा के साथ रमेश का विवाह यह सोचकर रचा रहा था कि बाप की इकलौती लड़की की सारी सम्पत्ति पर उनका अधिकार हो जायेगा। वस्तुतः उस समय तक यतीन्द्र का जन्म नहीं हुआ था। जब यदुनाथ मुखर्जी ने आचार्य घोषाल का प्रस्ताव ठुकरा दिया तो दुष्ट

तारिणी ने भैरव आचार्य से ऐसे अभिचार-परक अनुष्ठान, जप-तप, पूजा-पाठ, व्रत-उपवास तथा टोने–टोटके कराये कि फूल-सी मेरी लाड़ली छह महीने से भी पहले ही सुहागिनी से दुर्भागी हो गयी। उसकी हाथ की चूड़ियां टूट गयी और माथे का सिन्दूर पुंछ गया। देखो न, यह छोटी जाति का भड़वा अपनी औकात भूलकर ऊँची जाति वालों से सम्बन्ध जोड़ने चला था ! हरामजादे की मौत भी ऐसी हुई कि किसी का कन्धा तक नसीब नहीं हुआ। इन छोटी जाति वालों की हिम्मत तो देखो।’’ यह कहकर मौसी कुश्ती लड़ने से थके- हारे पहलवान की तरह हांफने लगी।, मौसी के मुंह से बार-बार तारिणी घोषाल की छोटी जाति का बताना सुनकर वाणी माधव अपने को लज्जित अनुभव करने लगा; क्योंकि तारिणी उसका सगा चाचा था और वह स्वयं भी घोषाल था। स्थिति को संभालती हुई रमा मौसी से बोला, ‘‘तुमने किसी जाति को बड़ा-छोटा बताने की क्या रट लगा रखी है ? क्या किसी जाति में उत्पन्न होना-न होना मनुष्य के अपने वश की बात है ‍? सत्य तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपनी जाति ऊंची है।’’

सकुचाता हुआ वेणी बोला, ‘‘रमा तुम्हारा कथन सही है। मौसी की बात में दम है। इतने ऊंचे परिवार की लड़की को बहू बनाने की सोचना, मेरे चाचा की ग़लती थी। यह उनकी नासमझी थी। यह कहते हुए मुझे जरा भी झिझक नहीं होती। जहां तक उनके द्वारा जादू-टोना किये जाने की बात है, उस पर भी मैं अविश्वास नहीं करता; क्योंकि वास्तविकता यह है कि ऐसा कोई अधम और निकृष्ट कार्य नहीं जिसके तारिणी चाचा द्वारा किये जाने को सम्भव न माना जा सके और फिर भैरव आचार्य भी तो परले दर्जे का गिरा हुआ नीच व्यक्ति है, वह तो पैसे के लिए किसी का भी अनिष्ट कर सकता हैं। आजकल वह दुष्ट भैरव रमेश का चमचा बना हुआ हैं।’’

मौसी ने पूछा, ‘‘वेणी, यह रमेश दस-बारह साल के बाद गांव लौटा है, अब तक यह कहां रहा है ?’’ वेणी माधव बोला, ‘‘मौसी, मै क्या जानूं ? चाचा के परिवार के साथ हमारा सम्बन्ध भी 36 का था। कोई कहता है कि रमेश इतने दिनों बम्बई में था, तो कोई किसी और नगर का नाम लेता है। किसी का ख़याल है कि वह वकालत पास कर आया है, तो कोई कहता है कि वह डॉक्टरी सीखकर आया है। कुछ लोग तो कहते हैं कि उसने कुछ भी नहीं किया है, खाली भाड़ झोंकता रहा है। साला बहुत बड़ा शराबी है। यहां आने पर उसकी आंखें जपाकुसुम के फूल की तरह सुर्ख़ थीं।’’ मौसी बोली, ‘‘यदि यह सत्य है, तो उसे घर में घुसने ही नहीं देना चाहिए।’’

वेणी ने प्रसन्न भाव से कहा, ‘‘मौसी, बिल्कुल ठीक कहती हो। उसकी तो सूरत देखना भी पाप है। रमा तुम रमेश को भूल तो नहीं गयीं, उसकी याद तो है न ?’’ रमेश के साथ अपने सम्बन्ध की चर्चा से भीतर-ही-भीतर लजाती हुई और बाहर से मुसकराती हुई रमा बोली, ‘‘अरे, इसमें भूलने की क्या बात है ? शीतल तल्ले वाली पाठशाला में हम दोनों साथ-साथ ही तो पढ़े हैं और फिर आयु में भी वह मुझ से कोई अधिक बड़े तो नहीं हैं। उनकी माँ मुझे बहुत प्यार करती थी, उसकी मृत्यु तो मुझे भली प्रकार से याद है ।’’

भड़क उठी मौसी बोली, ‘‘आग लगे उसके प्यार को। बेटी, यह प्यार कोरा सब दिखावा था। अपना काम निकालने की चाल थी। वे तो बस इसी फिराक़ में थे कि किसी प्रकार तुम उनके चंगुल में फंस जाओ।’’

मौसी के विचार का समर्थन करता हुआ वेणी बोला, ‘‘इसमें तो कोई सन्देह नहीं। वस्तुतः; छोटी चाची भी....।’’ वेणी के बात करने से पहले ही तिलमिलायी मौसी को सम्बोधित करती हुई रमा बोली, ‘‘मौसी, गड़े मुरदे उखाड़ने की आवश्यकता ही क्या है ?’’ रमेश के पिता के सम्बन्ध में अच्छी राय न रखने वाली रमा, रमेश की माँ के प्रति कोमल भाव एवं उदार दृष्टिकोण रखती थी। इसलिए वह उसकी निन्दा सुनने की स्थिति में नहीं थी

रमा की हां-में-हां मिलाता हुआ वेणी बोला, ‘‘इसमें कोई सन्देह नहीं कि चाची न केवल अच्छे परिवार की थी, अपितु स्वाभाव से भी काफी भली थी। आज भी उसकी चर्चा छिड़ने पर मां के लिए अपने आंसू रोकना कठिन हो जाता है।’’ वेणी ने अनुभव किया कि यहां तो सारा प्रसंग ही बदल गया है, अतः विषय को बदलने की इच्छा से वह बोला, ‘‘अच्छा बहिन, रमेश के यहां जाने के विषय में यह अन्तिम निर्णय है न ? इसमें कुछ हेर-फेर तो नहीं करोगी न ?’’

रमा हंसती हुई बोली, ‘‘भैया, बाबूजी कहा करते थे- आग, ऋण और शत्रु तीनों का सर्वनाश करने में बुद्धिमत्ता है। अपने जीते-जी तारिणी घोषाल ने हम लोगों को कम नहीं सताया। उसने तो बाबूजी को जेल भेजना चाहा था। भैया मैं कुछ नहीं भूली हूँ। वस्तुतः जीते-जी कुछ भुला पाना सम्भव भी नहीं। रमेश उसी सांप का सपोला है, इसलिए मेरा जाना तो किसी भी प्रकार से नहीं होगा। बाबूजी अपनी सम्पति हम दोनों में बांट अवश्य गये हैं, किन्तु उसकी संभाल और व्यवस्था मेरे ज़ि़म्मे है। हमारा जाना तो दूर रहा, हम अपने से जुड़े लोगों को भी जाने से रोकेंगे।’’ थोड़ी देर सोच में चुप रहने के बाद फिर बोली, ‘‘क्यों भाई, क्या तुम कोई ऐसी तिकड़म नहीं लगा सकते कि उसके घर कोई भी ब्राह्मण न जा सके ?’’

समीप खिसक आया वेणी रहस्यत्मक स्वर में बोला, ‘‘बहिन, मैं इसी प्रयत्न में तो जुटा हूं, यदि तुम मेरे साथ रहोगी, तो मुझे सफलता मिल सकती है। यदि बांस को झुकाना चाहती हो, तो यही अपयुक्त समय हैं। अवसर चूकने पर उसका पककर कठोर हो जाना निश्चित है। यदि मैंने रमेश को यथाशीघ्र इस कुआंपुर छोड़कर भागने पर विविश न कर दिया, तो मेरा भी वेणी घोषाल नाम नहीं। बस, फिर रह गया अकेला भैरव आचार्य। वह साला अपनी सहायता के लिए तारिणी घोषाल को तो बुला नहीं सकेगा, फिर उस दुष्ट को नाकों चने चबाऊंगा।’’

रमा बोली, ‘‘रमेश घोषाल ढाल बनकर भैरव को बचाएगा। हां, यह बात भी मत भूलो कि शत्रुता करने में भी उसका कोई सानी नहीं है’’ और भी अधिक समीप खिसक आया वेणी इधर-उधर नज़र घुमाकर चौखट के पास जमकर बैठ गया और बोला, ‘‘शत्रु को निर्मूल करने का इससे अधिक अच्छा अवसर फिर कभी नहीं मिलेगा। इसलिए हम दोनों को कभी यह नहीं भूलना होगा कि यह रमेश और कोई नहीं, तारिणी घोषाल का लड़का है।’’ रमा बोली, ‘‘बड़े भैया, क्या मैं यह सब भूल सकती हूं ?’’

चाटुकारिता करता हुआ वेणी बोला, ‘‘तुम्हारी समझ की दाद देनी पड़ती है। वस्तुतः विधाता तुम्हें लड़का बनाते-बनाते न जाने, कैसे लड़की बनाने की भूल कर बैठा ? तुम्हारी सूझ-बूझ के बारे में हम प्रायः आपस में कहा करते हैं कि तुम्हारे सामने तो बड़े-बड़े पढ़े-लिखे जज भी पानी भरते दिखते हैं। अच्छा, तो अब देर हो रही है, चलता हूं कल किसी समय आऊंगा।’’ कहता हुआ वेणी घोषाल उठ खड़ा हुआ।

अपनी प्रशंसा से फूली न समाती रमा भी उठ खड़ी हुई। वह अपनी विनम्रता और शालीनतावश कुछ कहना तो चाहती थी, किन्तु कह नहीं सकी; क्योंकि इस बीच आंगन में किसी अपरिचित स्वर सुनायी पड़ा, ‘‘रानी घर में हो या नहीं ?’’ रमेश की माँ लड़कपन में रमा को रानी कहकर पुकारती थी। इतने दिनों में रमा अपने लिए प्रयुक्त इस नाम को भूल चुकी थी। रमा ने वेणी की ओर देखा, तो उसका मुंह काला-स्याह हो गया था उसी क्षण रूखे सिर पर दुपट्टा बांधे नंगे पैर रमेश उसके सामने आ खड़ा हुआ। वेणी को देखते ही वह बोला, ‘‘अरे बड़े भैया, आप यहां, चलो अच्छा हुआ, आप मिल गये, आपने ही तो सब संभालना है। मैंने तो आपकी तलाश में पूरा गांव छान मारा है। रानी कहां है ?’’

धीरे-से आगे बढ़ता रमेश किवाड़ के पास आ पहुंचा। उस समय रमा का भागना छिपना न तो उपयुक्त था और न सम्भव ही था, अतः सामने आकर और सिर झुकाकर वहां चुपचाप खड़ी हो गयी। उसकी ओर देखकर आश्चर्य प्रकट करता हुआ रमेश बोला, ‘‘रमा, तुम तो बहुत बड़ी हो गयी हो, स्वस्थ-प्रसन्न तो हो न ?’’

रमा को पूर्णवत् सिर झुकाकर व चुप खड़ा देखकर रमेश बोला, ‘‘मुझे पहचानती हो न ! मैं तुम्हारा रमेश भैया हूं।’’ रमा ने फिर भी सिर उठाकर रमेश की ओर नहीं देखा। शिष्टाचार के रूख में पूछा, ‘‘आप कैसे हैं ?’’ ‘‘मैं ठीक हूं, किन्तु तुम मुझे आप कहती हो ?’’ इसके बाद वेणी की ओर देखता हुआ और फीकी हंसी हंसता हुआ रमेश बोला मुझे अच्छी तरह याद है कि जब मेरी मां मरी थी, तब यह रमा थी तो छोटी-सी, किन्तु फिर भी इसने मेरे आंसू पोंछकर मुझसे कहा था, ‘रमेश भैया, तुम रोना-धोना छोड़ो, मेरी माँ है न, हम दोनों उसे आधा-आधा बांट लेंगे।’ क्यों रमा, यह सब याद है या भूल गयी हो ? अच्छा, मेरी मां को तो तुम नहीं भूली होगी ?’’

यह सब सुनकर रमा ने लज्जा से अपना सिर और भी अधिक नीचे झुका लिया। वह किसी तरह यह भी न बता सकी कि ताईजी के बारे में वह कुछ भी नहीं भूली है। रमेश मूल विषय की चर्चा करता हुआ बोला, ‘‘अब श्राद्ध में अधिक समय नहीं बचा हैं। इसी अवधि में निपटाना है। तुम लोगों के सहयोग के बिना मुझ अकेले से तो कुछ होने का नहीं।’’

रमा को विशेष रूप से सुनाता हुआ रमेश बोला, ‘‘बहिन, मैं बिल्कुल निराश होकर और तुम लोगों के द्वार पर बहुत बड़ी आशा लेकर आया हूं। तुम लोगों द्वारा हाथ बंटाये बिना मेरा कुछ भी काम सिद्ध नहीं होगा। मुझे तुम लोगों का ही सहारा है। मौसी रमेश के पीछे आकर चुपचाप खड़ी हो गयी थी।, जब उसने रमा और वेणी को एकदम चुप्पी साधे देखा, तो वह रमेश के सामने आ खड़ी हुई और कठोर स्वर में बोली, ‘‘क्यों भैया, तुम तारिणी घोषाल के लड़के हो न ?’’

मौसी रमेश के गांव छोड़कर चले जाने के बाद रमा की माँ के बीमार होने पर यहां आई थी, रमेश उससे सर्वथा अपरिचित था, इसलिए वह हैरानी से उसके मुंह पर ताकने लगा। मौसी धृष्टता के स्वर में बोली, ‘‘तुम्हें यहां आया देखकर तो मुझे यह कहना पड़ता है कि तुम भी पूरे बाप पर गये हो, अन्यथा इस घर में घुसने की बेहयाई और बेवकूफ़ी हरगिज़ न करते। बिना अनुमति लिये बिना सांकल खटखटाये, एक भले परिवार के घर में घुसते हुए क्या तुम्हें जरा भी शर्म हया-सोच-विचार नहीं आया ?’

सुनकर रमेश हक्का-बक्का रह गया। अवसर देखकर वेणी भी ‘‘मैं चला’’ कहता हुआ निकल लिया। अपनी कोठरी में बैठी रमा मौसी को मीठी झिड़की देती हुई कहती हुई बोली ‘‘मौसी क्या तुम्हें और कोई काम नहीं, जो इनसे उलझ रही हो जाओ अपना काम देखो।’’

मौसी ने सोचा कि रमेश इस लड़की के इशारे को समझ गया हैं। इसलिए उसने अपनी वाणी को और भी अधिक विषैला बनाते बुए कहा, ‘‘देखो रमा अतः मुझे रोको मत। तुम मूर्ख लोग संकोच में पड़कर कुछ समझ नहीं पाते, अतः इन लोगों को खरी-खरी सुनानी ही पड़ती है। अच्छा, तुमने वेणी को क्यों जाने दिया ? उसके मुंह से पहले इस बेशर्म को यह तो कहला देती कि न तो हम इसकी प्रजा हैं, और न ही नौकर हैं, जो अपना काम-धन्धा छोड़कर तुम्हारे घर भागे आयेंगे। सच पूछो, तो तारिणी के मरने से सारे गांव को ठण्डक पहुँच गयी, सबने चैन की सांस ली, सत्य को कहने का भार मुझ पर डालकर वह ससुरा दुम दबाकर भाग गया।’’

रमेश को ऐसा लगा मानो एक सपना देखता हुआ वह जाग पड़ा हो उसके भीतर से एक लम्बा-ठण्डा सांस निकला। किवाड़ की ओट में खड़ी होकर तमाशा देखती रमा को सुनाता हुआ रमेश बोला ‘‘ठीक है, जब तुम लोगों का मेरे यहां आना हो ही नहीं सकता, तो फिर क्या किया जा सकता है ? मुझे इन सब बातों की कोई जानकारी नहीं थी अन्यथा तुम लोगों को कदापि परेशान न करता। रमेश यह सब कहकर चल दिया, उसे कोठरी के भीतर से किसी हलचल का आभास नहीं हुआ। उसे तो यह भी पता नहीं कि जिसके प्रति खेद प्रकट कर रहा था, वह सुन भी रही थी या नहीं ? रमेश के खिसकते ही वेणी भीतर आ गया। वह कहीं गया नहीं था, ओट में छिपकर खड़ा सारी बातचीत सुन रहा था। उसे मौसी द्वारा रमेश के प्रति ऐसे कठोर व्यवहार के किये जाने का स्वप्न में भी अनुमान नहीं था। मौसी की प्रशंसा करता हुआ वेणी बोला, ‘‘मौसी, तुमने कमाल कर दिया, ऐसी बातें तो हम अपने मुंह से निकाल भी नहीं सकते। रमा, क्या यह सब कहना किसी नौकर या दरबान के वश में था ? मैं तो ओट में खड़ा आनन्द ले रहा था, कैसी रोनी सूरत बनाकर बच्चू को निकलना पड़ा है।’’

मौसी ने अंहकार भरे स्वर में कहा, ‘‘कहने को तो मैंने कह दिया किन्तु चूहे की तरह भाग न जाते और अपने मुंह से यह सब कहते, तो मैं समझती हूं कि और अधिक बढ़िया होता। कह नहीं सकते, तो भी खड़े रहते और सब सुनते, अपनी आँखों से उसकी दुगर्ति देखते। यहां से तुम्हारे जाने को मैं अच्छा नहीं समझती।’’ मौसी के कठोर व्यवहार ने वेणी के चेहरे की हँसी छून ली। वह समझ नहीं पा रहा था कि अपनी सफ़ाई में क्या कहे ? तब तक चुप बैठी रमा ने मुंह खोला, तो वेणी की जान में जान आयी रमा बोली, ‘‘मौसी, तुमने जिस तीखे स्वर में यह कह-सुनाया है, जिस तरह से विष घोला जाता है, वह किसी और के वश का कहां था ? मौसी तुम्हारा तो कोई जवाब ही नहीं।’’ रमा की बात सुनकर मौसी और वेणी दोनों ही हक्का-बक्का रह गये। पूरी बात समझकर मौसी बोली, ‘‘ऐ छोकरी, क्या कहा तूने ?’’ ‘‘मौसी मैं क्या कह सकती हूं, पूजा करती तुम सात बार उठी हो, तुम्हारे पेट में गड़बड हो रही थी, अब चैन पडी हो, तो जाकर अधूरी पूजा पूरी कर लो। आज कुछ खाना भी बनेगा या नहीं ? यह कहती हुई रमा बिना किसी से कुछ और बोले बरामदे वाली कोठरी में चली गयी। वेणी ने उदास स्वर से पूछा, ‘‘मौसी, यह कैसा व्यवहार है ?’’ मौसी बोली, ‘‘भैया, मैं क्या जानू, राजरानी के व्यवहार को समझना क्या आसान काम है ?’’ कहती हुई मौसी के चेहरे का रंग उड़ गया। वह निराश होकर पूजा-गृह में चल दी और आसन पर बैठकर नित्य-कर्म निपटाने लगी। अकेला पड़ा वेणी भी चुपके से अपने घर को चल दिया। 2 कुआंपुर गांव की अर्जित सम्पत्ति की कहानी यह है कि आज से लगभग सौ वर्ष पहले उच्च जातीय बलराम मुखर्जी अपने मित्र बलराम घोषाल के साथ विक्रमपुर गांव से आकर यहां बस गया। मुखर्जी कुलीन होने के साथ बुद्धिमान भी थे। उन्होंने इस गांव में आकर विवाह किया, सरकारी नौकरी की और न जाने कौन-कौन से अन्याय धन्धे करके अपना विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया इधर बलराम घोषाल ने विवाह करके बच्चे तो पैदा किये, किन्तु सम्पत्ति जमा कर न सके इसलिए उसका जीवन अभाव और दुःखमय बीत रहा था।

विवाह के सम्बन्ध में दोनों मित्रों में कुछ ऐसा मनमुटाव हो गया कि एक ही गाँव में रहते हुए भी उन दोनों को बीस वर्षों तक एक-दूसरे का मुंह देखना भी गवारा न हुआ, यहाँ तक कि मुखर्जी के देहावसान वाले दिन भी घोषाल ने शोक प्रकट करने और मित्र के परिवार से मिलने की शिष्टता नहीं दिखाई, किन्तु मुखर्जी की मृत्यु के बाद एक विलक्षण अप्रत्याशित एवं अविश्वासनीय बात यह सुनने को मिली की दिवंगत मुखर्जी महाशय अपनी सम्पत्ति को दो बराबर भागों में बांटकर एक भाग अपने पुत्र को और दूसरा भाग अपने पुराने मित्र घोषाल के पुत्रों को दे गये ! तभी से कुंआपुर गांव की सम्पत्ति मुखर्जी और घोषाल परिवार के वंशघरों के नाम चली आ रही है। इस बात पर ये दोनों परिवार तो अभिमान करते ही है, गांव के दूसरे लोग भी इसे सच्ची मित्रता की अनूठी मिसाल मानकर उसकी प्रशंसा करते नहीं अघाते।

हम उन की चर्चा कर रहे हैं, जब घोषाल परिवार दो भागों में बंट चुका था। उस परिवार की छोटी शाखा से सम्बन्ध रखने वाले तारिणी बाबू दो-चार मुक़द्दमों के सिलसिले में कचहरी गये हुए थे कि अचानक बड़ी अदालत का बुलावा आ गया और वह भगवान् को प्यारे हो हो गये। उनकी मृत्यु से कुआंपुर गांव और उसके आस-पास के इलाक़े में तो कोहराम मच गया किन्तु इसी परिवार की बड़ी शाखा से सम्बन्ध रखने वाले घोषाल की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था।

उसे लगता था कि अब वह शान्ति और निश्चिन्तता का जीवन जी सकेगा। इतनी ही नहीं, चाचा की मृत्यु से वह तो इस प्रयत्न में जुट गया कि चाचा की श्राद्ध भी ठीक तरह से न हो सके, कोई ऐसा जुगाड़ किया जाये कि श्राद्ध के दिन ख़ून-ख़राबा नहीं, तो बहुत बड़ा हो-हल्ला खड़ा हो जाये, जिससे रंग में भंग पड़ जाये। वैसे भी दस वर्षों से चाचा-भतीजे ने एक-दूसरे की सूरत तक नहीं देखी थी। दस वर्ष पहले तारिणी की स्त्री स्वर्ग सिधार गयी थी और तारिणी ने अपने बेटे रमेश को उसके मामा के यहाँ भेज दिया था। स्वर्ग सूने घर के भीतर नौकर-नौकरानियों के साथ दिन बिताया था। वैसे उसका सारा समय मसालों-मुक़दमों में घर से बाहर ही बीतता था। रुड़की कॉलेज में पढ़ रहा था रमेश अपने पिता की मृत्यु का समाचार पाकर दुखी हुआ। पिता के अन्तिम क्रियाकर्म को सम्पन्न करने के लिए वह कल तीसरे पहर अपने सूने घर में आया है।

यह रचना गद्यकोश मे अभी अधूरी है।
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