ग्राम्शी इज माइ फ्रर्स्ट क्रश यार / विनीत कुमार

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"वाउ! निखिल देख न ग्राम्शी पर जो बुक मैं पिछले दो साल से खोज रही थी न, मिल गई."

"दिखा तो कौन-सी?"

"अच्छी है न, तू अपनी जेब में क्या खोजने लग गया, वॉलेट? तू पे कर रहा है क्या इसकी कीमत?"

"नहीं नीलिमा, मैं मोबाईल निकाल रहा हूं ताकि पाउंड को रुपये में कन्वर्ट करके इसकी कीमत निकाल सकूं?"

"ओके"

"करीब सोलह सौ रुपये. नीलिमा, तुम सोलह सौ रुपये की एक किताब खरीदोगी? कुछ ज्यादा नहीं हो जाएगा तुम्हारा किताब प्रेम?"

"अरे नहीं निखिल, प्रेम में कुछ भी ज्यादा-कम,जायज-नाजायज नहीं होता. चाहे प्रेम इस किताब से हो या फिर तुमसे. ही ही ही ही, खी खी खी खी.."

"वो तो ठीक है पर..."

"पर क्या? तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकता... और फिर मैं तुझे पे करने भी कहां कह रही हूं? मैं तो बस तुमसे इजाजत ले रही हूं कि खरीद लूं इसे? मेरा मतलब है कन्विंस कर रही हूं.

"इजाजत? नीलिमा, कितना अन्तर्विरोध है तुम्हारी बातों में? एक तरफ तो तुम ग्राम्शी पढ़ती हो, पढ़ना चाहती हो और दूसरी तरफ इसके लिए मुझसे इजाजत लेना चाहती हो?"

"तू फिर पड़ गया बौद्धिक बहसों में. बोल न खरीदूं कि छोड़ दूं? मैं अपने पैसे से ले रही हूं."

"बात पैसे की नहीं है, वो चाहे मैं दूं या फिर तुम लेकिन तुम फोटोकॉपी करवाकर भी तो पढ़ सकती हो न? पैसे बचेंगे तो आगे काम आएंगे..."

"आगे काम आएंगे मतलब? तू मेरे से दहेज लेगा नहीं, मैं जिंदगी में कभी जूलरी खरीदूंगी नहीं. बहुत हुआ तो कभी-कभार फैब इंडिया की वुड वर्क की एंटिक झुमके ले लूंगी... क्या करना है पैसे का? फिर हम सिर्फ किताब कहां खरीद रहे हैं, हम तो एस्सेट खरीद रहे हैं जिसकी आगे जाकर कीमतें और बढ़ेगी ही."

"हां, पर तुम एक मिनट के लिए सोचो न. इतने ही पैसे से रेणु, नागार्जुन, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल और यहां तक कि नामवर सिंह पर लिखी कितनी सारी किताबें खरीद सकती हो."

"निखिल! माना कि हमने लो-बजट का प्यार किया है, पांच रुपये की मदर डेयरी वाली कैंडी खाकर ही उछलने लग जाते हैं, 30 रुपये प्लेट की वेज मोमोज में ही जश्न मनाने लग जाते हैं. ब्रांडेड कपड़ों की स्टिकरवाली जींस और शर्ट पहनकर काम चला लेते हैं जिनमें स्पेलिंग ही तो थोड़ी बहुत इधर-उधर होती है. कोई प्रूफ रीडर उसे गलत मानकर खारिज कर दे लेकिन अपना तो काम चल जाता है... लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है न कि हम लिखने-पढ़ने के मामले भी इसी तरह से सोचना चाहिए.. फिर ज्ञान सिर्फ नागार्जुन, मुक्तिबोध और अपने यहां के लेखकों तक सीमित नहीं है न. नहीं क्या, अगर हम इसी तरह से पढ़ना चाहें तो ग्लोबली कभी रिक्नाइज हो पाएंगे?"

"क्यों फोटोकॉपी किताबें पढ़कर नहीं हो सकते?"

"हो सकते हैं डियर पर अब डीयू में पूरी किताब की फोटो कॉपी कौन करेगा, तुम्हारे डगमगपुरवाले फूफ्फा? और सोच न, अपने पास इस तरह की किताबें होगी और लोकसभा टीवी, दूरदर्शन के लोग भविष्य में इंटरव्यू लेगें अपनी तो बैग्ग्राउंड में कितना सुंदर लगेगा न? हमारी भी अशोक वाजपेयी टाइप की फुटेज बनेगी. ऐ निखिल! लेने देने न. वैसे भी ग्राम्शी इज माइ फर्स्ट क्रश यार, प्लीज"