जंगल में जीवन / एक्वेरियम / ममता व्यास

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गलत...गलत...गलत, हमेशा ग़लत बात ही करोगे जब भी करोगे।

"जीवन जंगल में है और जंगल से है। नदी उस जीवन की अभिव्यक्ति।" यही कहा था न तुमने उस दिन?

जबकि बात तो इससे बिलकुल उलट ही है। दरअसल नदी अभिव्यक्ति है, जंगल नहीं।

देखो, जब भी हम सुख से भरे होते हैं। हमारी देह में, हमारे मन में, हमारी रगों में सुख बहने लगता है। लहू बनकर ठीक? ये तो हुई भीतरी बात लेकिन संसार में ऐसा क्या है जो सिर्फ़ भीतर ही भीतर संचालित हो (बाहर अभिव्यक्त ही न हो) । इसलिए क्षण भर पहले मन में उठे भाव अगले ही पल देह के माध्यम से व्यक्त होने लगते हैं। मन में बहता प्रेम, उमंग, खुशी या उल्लास देह में दिखने लगता है।

हम हंसते हैं, मुस्काते हैं, दौड़ते हैं, चिल्लाते हैं, यही तो अभिव्यक्ति है सुख की और इसके विपरीत जब दु: ख बहता है, मन के भीतर पीड़ा धधकती है मन में, तो मन मथता है धीरे-धीरे खुद को, सांसें घुटने लगती हैं तब क्या होता है? हमारी देह इस दु: ख को बाहर फेंकती है। आंसू बनकर, रोकर, चीत्कार करती है, कराहने लगती है चीखने लगती है। हम दीवार पर सर मारते हैं या खुद को खत्म कर देना चाहते हैं। ये अभिव्यक्ति ही तो है भीतर उठे दु: ख की; है न? यानी जो दिखता है, प्रतीत होता है, प्रकट होता है वह अभिव्यक्ति है और जो भीतर-भीतर महसूस किया जा रहा है वह अनुभूति।

"सहमत?"

अब सुनो! जब नदी पहाड़ों से गिरती है और धरती पर फैल जाती है। वह सींचती है, नम करती है बरसों से सूखी पड़ी हुई मिट्टी को। वह सुनती है सदियों से मिट्टी में दबे उन बीजों की कराह को, क्रन्दन को।

जो बीज खुद को लगभग बांझ घोषित कर चुके थे। वह सुनती है उन सूक्ष्म बीजों के रुदन को जिनमें वटवृक्ष हो जाने की उम्मीद शेष है। वह महसूस करती है मिट्टी की परतों में रची-बची उस अद्भुत सुगंध की प्रतीक्षा को और उसे कोमल स्पर्श देकर पूर्ण करती है। वह जानती है मिट्टी की शुष्कता, खुरदुरेपन और कठोर कणों के ठीक बगल में ही कोमलता रहती है।

नदी के स्पर्श से कैसे पलभर में सब जीवित हो उठते हैं।

बीज खुश हो जाते हैं मिट्टी के भीतर टूट जाने को, चटकने को। मिट्टी नम होकर संसार में अपनी अदïï्भुत सुगंध से महक जाती है, बेकल होकर फैल जाती है।

"हाँ, तो? तुम कहना क्या चाहती हो? कभी सीधी बात करोगी।"

" सीधी बात ही तो कह रही हूँ। देखते-देखते सारी धरती घना जंगल बन जाती है। नदी के छूते ही, हरियाली ही हरियाली। जीवन ही जीवन मुस्काने लगता है

हरसू। ये हरापन, ये सुगंध, ये यौवन सब इसी धरती में छिपा था। इसी जंगल में छिपा था। बस नदी ने उसे बहुत प्यार और समर्पण से छुआ था और देखो जीवन बहने लगा। हरा रंग बनकर जैसे कोई प्रेम से किसी को छूता है, तो प्रेम बहने लगता है देह में, मन में जीवन बनकर।

तुम समझ रहे हो न मैं क्या कह रही हूँ? "

"नहीं, तुम्हारी उलझी बातें मेरी समझ में नहीं आतीं।"

" अरे पागल...ये जंगल, ये जीवन, ये सुंदर रंग और खुशबू ये सब अभिव्यक्ति हैं। नदी अभिव्यक्ति नहीं, जंगल अभिव्यक्ति है। जंगल बोल है, आवाज है, मुस्कान है, सुगंध है, हरापन है और जीवन है। जीवन समझते हो न तुम?

ये सूरजमुखी कैसे मुस्काता है सूरज को देख और रातों को रजनीगंधा कैसे मदहोश करती है। ये घास, कांस, बांस सब अभिव्यक्ति ही तो हैं।

जैसे जब-जब भी तुम मुझे मिलते हो। कैसे कई कविता रच देते हो न। हजारों मुक्तक, छंद और नज़्म ये सब जंगल ही तो है तुम्हारे दर्द का जंगल। तुम्हारे अवसाद का जंगल, तुम्हारे अव्यक्त प्रेम का घना जंगल।

जैसे मेरे भीतर बहता है तुम्हारा प्रेम और मेरी देह पर उभरते हैं तुम्हारे चिह्न।