ज़िद्दी / इस्मत चुग़ताई / पृष्ठ 1

Gadya Kosh से
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पूरन

पानी जान तोड़ कर बरस रहा था। मालूम होता था, आसमान में सूराख हो गए हैं। सच भी है कब से तना खड़ा है, सड़ गल कर सूराख हो जाना क्या तअज्जुब ? कई रात बरसता रहा और सुबह से बरस रहा था। जोर-जोर से गोया भर-भर समन्दर पानी को कोई पूरी ताकत से जमीन पर पटख रहा हो। दीवारों के घर तो कभी के पानी के तमाँचों से बेदम होकर बैठ गए। छप्पर गीली दाढ़ियों की तरह बाँसों और बल्लियों से झूल पड़े और घर वाले पेड़ों के नीचे दुबक बैठे। मगर पानी जैसे उनसे छेड़ कर रहा था। कोई पेड़ भी पत्थर के सायबान तो न थे, जो पानी पत्तों को चीर फाड़ कर सरों पर न गिरता। वैसे भी जैसे कोई चुल्लू भर-भर कर पेड़ों के भी नीचे उलीच रहा था। परनालों की वावेला से और भी होशो-हवास गुम थे, और फिर रात आ रही थी। घटाटोप सियाही गाढ़ी होती जा रही थी। गटर तेजी से लुढ़क रहे थे।

आशा माँ को आखिरी घूँट पानी के देने की कोशिश कर रही थी। माँ तो जाने कब मर गई थी, पर यह नानी ही माँ-बाप सभी कुछ थी, अब नानी भी चल-चलाव पर तुली थी, और बाप बेकार निखट्टू-सा था। एक दिन स्टेशन के पास मरा हुआ पड़ा मिला। नानी बहुत कुछ उसे देती थी, पर अब वह भी बूढ़ी हो चली थी। बात ये थी कि वह राजा साहब की खिलाई1 रह चुकी थी, और राजा साहब के बाद उनके बेटों को भी इन्हीं सूखे-मारे घुटनों पर वही सड़ी-पुरानी लोरियाँ दी थीं जो वह उनके बाप को दे चुकी थी। पर वह खर्राच थी और फिर कोई जागीर थोड़े ही मिल गई थी। जेवर थोड़ा-थोड़ा करके खाया, बर्तन रखने की जरूरत ही कौन सी थी। उम्र भर राजा साहब के यहाँ रही और बुढ़ापे में कौन सोने के थाल लगाता है। कई साल से महल के कोने में पड़ी सड़ रही थी। राजा साहब ने अज़राहे-हमदर्दी उसे पेंशन देकर गाँव भेज दिया। कुछ भी था, उसे सुकून था कि वह अपने गाँव में मर रही थी। अपना गाँव कहाँ, गाँव तो राजा का ही था।

‘‘नहीं आया, अभी नहीं आया’’ आशा समझी, बुढ़िया यमदूत को याद कर रही है, मगर वह पूरन के बारे में सोच रही थी। पूरन राजा साहब का सबसे छोटा लड़का था। वह अच्छा-खासा, सात बरस का हो चुका था, तब भी बूढ़ी अम्मा के साथ ही सोता था और हर इतवार को गाँव बड़े भाई के साथ आया करता था। और आज तो इतवार था। बुढ़िया जाने क्यों, उसका इंतज़ार कर रही थी और इसीलिए ठहरी हुई थी वरना इसे कायदे से तो बहुत पहले मर जाना चाहिए था।

‘‘रंजी की माँ कहाँ है। गई ?’’ बुढ़िया फिर जागी।

‘‘हाँ अम्मा ! क्या बुला लाऊं। मींह बहुत पड़ रहा है, नहीं...पर है बड़ी...वह...ऐसे...छोड़ गई।’’

साँस घुटी जा रही थी। ‘‘क्या मींह बहुत पड़ रहा है।’’


बुढ़िया को फ़िक्र हुई कि अब जलाई कैसे जाएगी !

‘‘हाँ, आशा सहमी हुई धोती का किनारा मरोड़ रही थी।

‘‘और जाने रंजी की माँ कहाँ मर गई’’ न जाने रंजी की माँ पर इतनी ममता क्यों आ रही थी। रंजी वैसे तो रंजीत, और सिंह बनियापन छिपाने को लगाया गया था मगर कहलाते ‘अबे रंजी’ थे। और यह वालिदा साहिब खिरया की दुल्हन मोती की बहू और राम भरोसे की बीवी और न मालूम कितनी जगहें बदल चुकी थीं। पर सब कमबख़्त मर-खप गए और उनमें से किसी एक की यादगार रंजी थे। समाज में उनकी हैसियत भी थूर के दरख़्त की सी थी, ज़्यादा कारआमद बनने का उनमें जज़्बा ही नहीं था। कमसिनी में कुछ दिनों हीजड़ों की टोली में जा घुसे और रंजी की माँ को सारा दिन मुहल्ले वालों को गालियाँ तक़सीम करने में गुज़र जाता। न जाने क्यों, वह बज़िद थीं कि हीजड़ों की टोली में नहीं बल्कि नौटंकी में गया है जो छोटा-मोटा थियेटर होता है। कुछ भी हो रंजी की निभी नहीं और वह पिट कर भाग आये और अब गाँव भर में नग्मा सराई के लिए मशहूर थे और एकदम बाग़ियना ख़यालात कुजा1 हीजड़ों में थे और कुजा अब अव्वल नंबर के गुंडों में शुमार किए जाते थे। कुछ भी था मगर वालिदा साहिबा तो सर उठा कर चलती थीं।


1. बच्चों को खिलाने वाली औरत, धाय


1. कहाँ, कभी