जेपी दत्ता : ग्यारह वर्ष बाद फिल्म निर्माण / जयप्रकाश चौकसे

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जेपी दत्ता : ग्यारह वर्ष बाद फिल्म निर्माण
प्रकाशन तिथि :28 जून 2017


फिल्मकार जेपी दत्ता अपने वनवास से लौट रहे हैं और वे 'पलटन' नाम फिल्म बनाने जा रहे हैं। उनके कॅरिअर की एकमात्र सफल फिल्म थी 'बॉर्डर' जिसमें सनी देओल, अक्षय खन्ना, सुनील शेट्‌टी, कुलभूषण खरबंदा इत्यादि अनेक कलाकारों ने काम किया था। उन्होंने दर्जनों नामी कलाकारों के साथ 'एलओसी' बनाई थी, जिसकी असफलता ने भूकंप की तरह असर डाला था। इसके बाद युद्ध फिल्मों का रास्ता छोड़कर उन्होंने 'उमराव जान' नामक हादसा रचा। मुजफ्फर अली की रेखा अभिनीत 'उमराव जान' अविस्मरणीय फिल्म है।

बहरहाल, लंबे अरसे तक जेपी दत्ता इंग्लैंड में रहे, जहां उनका शानदार बंगला भी है। कुछ समय पूर्व उन्होंने अपनी सुपुत्री निधि को सितारा लेकर फिल्म बनाने का इरादा किया परंतु संभवत: पूंजी निवेशक नहीं मिला। अब लंबी खामोशी के बाद वे 'पलटन' बनाने जा रहे हैं। इसमें उनकी सुपुत्री निधि उनकी सहायक निर्देशक हैं। युद्ध विषयक फिल्म में अनेक सितारों को लिया जा सकता है और इसी कारण पूंजी मिलना संभव होता है। रक्षा मंत्रालय से पटकथा पर रजामंदी मिलने के बाद शूटिंग के लिए अनेक सुविधाएं सरकार जुटा देती हैं। इस तरह की फिल्मों में सरकार कमोबेश सहनिर्माता बन जाती है परंतु मुनाफे में हिस्सेदार नहीं होती। रिचर्ड एटनबरो की 'गांधी' भी सरकार के सहयोग से बनी थी परंतु मुनाफे के बंटवारे को सजगता से नहीं संभाला गया। स्वयं रिचर्ड एटनबरो ने मुनाफे का अंश नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन को दिया था और शर्त यह थी कि यह धन बीमार पड़े या वृद्ध हो गए तकनीशियनों को दी जाएगी। यथार्थ में क्या हुआ यह बताना कठिन है।

अंग्रेजी भाषा में 'प्लाटून' नामक फिल्म बनी थी। संभव: है यही जेपी दत्ता की प्रेरणा भी हो। जेपी दत्ता के भाई लड़ाकू विमान के पायलट थे। उनकी मृत्यु जहाज दुर्घटना में हुई परंतु यह उड़ान एक अभ्यास का हिस्सा थी, न कि युद्ध के समय की। कहा जाता है कि जेपी दत्ता को अपने भाई की लिखी डायरी मिली, जिसमें उपलब्ध सामग्री का इस्तेमाल 'बॉर्डर' में किया गया है। ज्ञातव्य है कि जेपी दत्ता के पिता ओपी दत्ता ने फिल्में बनाई थीं और अपने पुत्र की सभी फिल्मों के संवाद उन्होंने लिखे थे। वे अत्यंत मिलनसार और विद्वान व्यक्ति थे। वे नाश्ते एवं भोजन के पश्चात सिगरेट जरूर पीते थे परंतु जेपी दत्ता शाकाहारी हैं और शराबनोशी उन्हें सख्त नापसंद है। जेपी दत्ता ने अभिनेत्री बिंदिया गोस्वामी से विवाह किया है। फिल्मकार कमाल अमरोही के सुपुत्र जेपी दत्ता के अभिन्न मित्र हैं और एक दौर में जेपी दत्ता ने 'आखरी मुगल' नामक फिल्म की घोषणा की थी जिसकी प्रेरणा उन्हें कमाल साहब के कुछ नोट्स से मिली थी परंतु अल्प सामग्री पर फिल्म नहीं बनाई जा सकती। अत: यह निरस्त कर दी गई। जेपी दत्ता उस समय राजकपूर के सहायक बने जब 'बॉबी' निर्माण के अंतिम चरण में थी। बाद में वे रणधीर कपूर के सहायक बने जब वे अपनी दूसरी फिल्म 'धरम-करम' बना रहे थे। जेपी दत्ता कुछ परम्पराओं का आदर करते रहे हैं, जैसे अपनी हर फिल्म का पहला ट्रायल वे रणधीर कपूर को दिखाते हैं।

जेपी दत्ता की विनोद खन्ना से गहरी मित्रता थी। उनकी पहली फिल्म 'सरहद' में विनोद खन्ना नायक थे और आचार्य रजनीश के साथ विनोद खन्ना के अमेरिका जाने के कारण 'सरहद' नहीं बन पाई। जेपी दत्ता की 'एलओसी' का पहला संस्करण चार घंटे का था। उनके पास 'एलओसी', 'बॉर्डर' व 'सरहद' के कुछ अंश अवश्य होंगे, जिनका इस्तेमाल वे 'पलटन' में कर सकते हैं। आज फिल्म टेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो गई है कि कठिनतम कल्पना को भी फिल्म में साकार किया जा सकता है। आज टेक्नोलॉजी मनुष्य की कल्पना करने की शक्ति को चुनौती देती है कि वह ऐसी कोई कल्पना नहीं कर सकता जो सिनेमा के परदे पर प्रस्तुत नहीं की जा सके।

'मुगल-ए-आजम' के बाद के. आसिफ ने दास्तां-ए-लैला मजनू को 'लव एंड गॉड' के नाम से शुरू किया। उनके नायक गुरुदत्त की मृत्यु के बाद उन्होंने संजीव कुमार के साथ कुछ दिन शूटिंग की परंतु के. आसिफ के निधन के बाद उस आधी-अधूरी फिल्म को जैसे-तैसे पूरा करके प्रदर्शित किया गया। के. आसिफ के आकल्पन में मृत्यु के पश्चत लैला व मजनू जन्नत में मिलते हैं, जिसकी सात सतह का आकल्पन किया गया था। हमारे आख्यानों में भी नर्क के विविध का आकल्पन है, जिनमें रौरव नर्क है। हर धर्म में स्वर्ग व नर्क के आकल्पन हैं परंतु संभवत: वे दोनों ही धरती पर मौजूद हैं। बकौल शैलेन्द्र के 'तू आदमी है, आदमी की जीत पर यकीन कर, अगर कही है स्वर्ग तो उतार ला जमीं पर'।