डेढ़ हज़ार झीलों में झिलमिलाता स्विट्ज़रलैंड का सौंदर्य / संतोष श्रीवास्तव

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जर्मनी से बिदा ले हम स्विट्ज़रलैंड की ओर रवाना हुए। ट्रुबा पीछे छूट रहा था जहाँ मैं एक महीना भी गुज़ारती तो कम था। स्विट्ज़रलैंड के लिए कहा जाता है कि वह दुनिया की जन्नत है। इसलिए नहीं कि वैसी प्राकृतिक सुंदरता विश्व में है ही नहीं। वैसी प्राकृतिक सुंदरता कई देशों में है पर वहाँ के लोगों की शक्ल के साथ-साथ दिल भी सुंदर है। सीधे सादे लोग, मेहनतकश... देश को समृद्धि के अंतिम छोर तक पहुँचाने वाले और ज़िन्दगी को खुलकर जीने वाले... उनके दिलों में पर्यटकों की आवभगत करने की भावना है। पर्यटकों को सड़क पार करते देख चलती गाड़ियाँ रुक जाती हैं। पहले सड़क पार करने देती हैं। तब चलती हैं। लम्बे-लम्बे घास के चरागाहों की ढलानों पर मोटी-मोटी पेड़ के तनों की फेंसिंग देख मुझे नर्सरी की अंग्रेज़ी किताबों में छपी तस्वीरें याद आ गईं। बड़ा ही सुहावना मंज़र था। दूर ऊँचे पहाड़ पर स्कीईंग जंप ट्रेनिंग सेंटर था। एक खूबसूरत रास्ता नन्हे-नन्हे पीले बैंगनी फूलों वाला। बिल्कुल पगडंडीनुमा स्कीईंग सेंटर की ओर जा रहा था। नौजवानों का दल उस रास्ते से पहाड़ चढ़ रहा था... ऐसा लग रहा था जैसे क़िला फ़तह करने के मकसद से सैनिक जा रहे हों... हर पल जागरूक रहने वाला देश... प्रकृतिभी जागरूक, ख़ूब खिली... घने पेड़ों से लदे पर्वत और उन पर झुके बादल...

स्विट्ज़रलैंड की आबादी साढ़ेछै: मिलियन है। राजधानी बर्न है। देश तेईस प्रदेशों में बँटा है जिसे स्विस भाषा में केतॉन कहते हैं। राष्ट्रीयझंडालाल रंग का जिस पर सफेद क्रॉस बना है। लेकिन हर एक केलॉन के अलग-अलग झंडे हैं। कारों में गाड़ियों में नाम पट्टी के एक तरफ़ राष्ट्रीय झंडा और दूसरी तरफ़ प्रदेश विशेष का झंडा बना होता है। उत्तरी स्विट्ज़रलैंड में जर्मन भाषा, दक्षिण में इटेलियन, पश्चिम में फ्रेंच भाषा बोली जाती है। मातृभाषा रोमाश है जो अधिकतर अब गाँवों में बोली जाती है। करेंसी स्विस डॉलर है। देश की सुरक्षा की भावना इतनी अधिक है कि लड़के जब 18 वर्ष के हो जाते हैं तो उनके लिए मिलिट्री ट्रेनिंग लेना कंपल्सरी है। उसके बाद वे अपने घरों में मिलिट्री यूनिफॉर्म और हथियार रखते हैं ताकि आवश्यकता पड़ने पर तुरन्त सैन्य एक्शन ले सकें। ख़तरा मंडराने पर 48 घंटे के अंदर कंट्री ब्लॉक कर देते हैं। न वहाँ सांप्रदायिक झगड़े हैं न आतंकवाद। एक शान्त, सहज जीवन जी रहे और देश के लिए मर मिटने को तत्पर वहाँ का हर निवासी बेमिसाल है। हर घर में बेसमेंट होना आवश्यक है ताकि युद्ध के समय उसमें सुरक्षित रहा जा सके।

यहाँका मुख्य व्यवसाय दूध उत्पादन है। इसीलिये यहाँ चॉकलेट आइस्क्रीम, चीज वगैरह मिल्क प्रोडक्ट सस्ते और बहुतायत से हैं। मैंने लम्बे-लम्बे चरागाहों में चरती गायों को देखा जिनके गले में पड़ी घंटियाँ टुनटुन बज रही थीं। हर एक घंटी की अलग-अलग आवाज़। इन घंटियों से ही मालिक अपनी गायों की पहचान करते हैं। ये घंटियाँ अब शॉपिंग सेंटर से पर्यटक खरीदकर ले जाते हैं बतौर सोविनियर। बर्फ़बारी में जब चारा नहीं मिलता उस वक़्त के लिये ये बहारों के मौसम में घास काटकर उनके बंडल बनाकर प्लास्टिक से रैप करके तहखानों में सुरक्षित रख लेते हैं। यहाँ मुख्य रूप से अंगूर की खेती होती है। अंगूरों की लताओं के ग्रीन हाउस तमाम रास्तों के दायें बायें बने हैं और हैं गेहूँ, सरसों, पालक, सलाद के खेत। सब्जियाँ भी तरह-तरह की ओर उम्दा क्वालिटी की उगाई जाती हैं। पूरे देश में डेढ़ हज़ार झीलें हैं।

शाफ़ हाऊसन शहर पहुँचकर कोच ऊँचाई पर पार्क की गई और हम 'राइन फॉल्स' के लिए वैली की राह उतरने लगे। यह यूरोप का सबसे बड़ा जल प्रपात है जिसकी गूँज मीलों दूर तक सुनाई देती है। रिमझिममेह बरस रहे थे। ठंड के कारण मैंने जर्सी पहन रखी थी। पहाड़ी से नीचे गिरता झरना दूर से सफेद गाढ़े धुएँ जैसा दिख रहा था। जब हम रेलिंग के सहारे खड़े हुए तो नन्ही-नन्ही बूँदें हवा संग बह आई, बालों पर मोती-सी टँक गई। ठंड बेतहाशा थी झुरझुरी बदन पर छा गई। कुछ पर्यटक बोट से उस पार तक गये। मैंनहीं गई। मैंने चार डॉलर का फ़ोन कार्ड खरीदा और रमेश और प्रमिला को फ़ोन करने टेलीफोन बूथ की ओर चल दी।

मैंने"दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे" फ़िल्म में ज्यूरिख के दृश्य देखे थे। ज्यूरिख शहर में प्रवेश करते ही फ़िल्म याद आ गई। ज्यूरिख पहाड़ों की गोद में बसा बेमिसाल खूबसूरती बिखेरता शांत शहर है। इतने शांत शहर को वित्तीय राजधानी होने की वज़ह से देश की धड़कन कहा जाता है सुनकर अटपटा लगा। पर यह अपने शानदार कसीनो, भव्य नाइट क्लबों, उन्नीसवीं सदी की शैली में बनी इमारतों और सबसे बड़े बिजनेस सेंटरहोने के कारण अपना अलग ही स्थान रखता है। यहाँ की सबसे बड़ी सड़क बानहॉफस्त्रासा पर कोच से उतरकर हम रात के आठ बजे चमकते सूरज की गुनगुनी सेंक लेते टहलते रहे। सड़कें वीरान... मगर चकाचौंध से भरी... सारे स्विस बैंक आदि इसी सड़क पर हैं। जिसमें विश्व भर के खाते खुले हैं। मज़े की बात ये है कि स्विस बैंक ब्याज नहीं देता उल्टे पैसा जमा करने पर किराया लेता है।

कम आबादी ज्यूरिख को एक ख़ास लुक देती है। सभी कार यात्री या साईकल यात्री। सड़कों पर साईकलों के अलग ट्रैक बने हैं। अगर कोई पर्यटक साईकल से सैर करना चाहे तो रेल्वे स्टेशनों पर स्विस ट्रैवल सिस्टम की साईकलें किराए पर मिल जाती हैं।

प्रदूषणके प्रति जागरूक इस देश में साईकल यहाँ के रहने वालों की पहली पसंद है। मेरे लिए यह सूनी सड़क किसी जन्नत से कम नहीं थी। स्विस नेशनल म्यूज़ियम, दुकानें, पोलिस हेडक्वार्टर, सेंट पीटर्सचर्च जो 13वीं सदी में बना है और जिस पर यूरोप की सबसे बड़ी यूरोपा वॉच है सिनेमा की रील की तरह कोच में बैठते ही नज़रों के सामने से गुज़रने लगे। एक तरफ़ बहती लेमेत नदी जिस पर पुल बना है जो सड़क के लेव्हल का है। ट्रामचल रही थी। राथ हाउस यानी मेन टाउन हॉल, दोचर्च भी थे... एक जो छोटा चर्च था उसे फ्रा मोस्टर कहते हैं और जो लम्बा चर्च था उसे ग्रॉ मोस्टर। फ्रॉ यानी स्त्री, ग्रॉ यानी पुरुष। मुझे लग रहा था जैसे मैं जलपरी-सी पानी में से गुज़र रही हूँ। सड़क के एक ओर लेमेत नदी तो दूसरी ओर ज्यूरिख लेक... लेक पर प्लास्टिक से ढँकी बोट खड़ी थी। बारिश न हो तो बोट पर आकर लोग नहाते हैं। लेक के बीचोंबीच फाउंटेन चल रहा था। एक डबल डेकर क्रूज़ भी सतह पर तैर रहा था। अब हम शहर के मेयर के ऑफ़िस के सामने थे। जो सिटी टाउनहॉल में था। बीचोंबीचफ़ाउंटेन और मूर्तियाँ, आसपास बैंगनी फूल खिले थे क्यारियों में।

ज्यूरिख पीछे छूटता गया। मेपल दरख्तों से घिरी सड़क सीधे एंगिलबर्ग की ओर। एंगिल बर्ग पंद्रह सौ की आबादी वाला शहर है। ज्यादातर होटल ही हैं यहाँ। ज्यूरिख में पर्यटकों को होटल एंगिलबर्ग की बनिस्बत-महँगे पड़ते हैं। हमारे रुकने की व्यवस्था होटल टेरेस में की गई जो पहले यहाँ के राजा का महल था। महल एक पहाड़ी पर था। हम घास के ढलवाँ मैदानों को पार करते चरागाहों को जिसमें नीले, पीले रंग की गायों की मूर्तियाँ इस बात का सबूत थी कि ये चारागाह सिर्फ़ गायों के लिए ही हैं पार करते वैली में पहुँच चुके थे। कोच नीचे ही पार्क की गई। हमें दो डिब्बों की खिलौना ट्रेन से टैरेस तकपहुँचना था। इस ट्रेन का कोई ड्राइवर नहीं होता। कुल तीस सवारियों को लेकर ऊपर पहुँचाने वाली इस ट्रेन के दरवाज़े निर्धारित समय पर अपने आप खुलते बंद होते हैं। अपनी बारी आने पर हमने ट्रेन से खड़ी चढ़ाई पार की। हमारा लगेज पहले ही पहुँच चुका था। महल जैसे होटल के बाहर बड़े-बड़े काले सफेद मोहरों वाली शतरंज की बिसात बिछी थी। राजा के समय शायद मोहरों की जगह दासियाँ होंगी।

हमारा स्वागत वेलकम ड्रिंक गरमागर्म चाय से किया गया। कमरे एलॉट हुए। मुझे फाइव स्टार की सुविधाओं से युक्त दूसरी मंज़िल पर कमरा मिला। खिड़की का परदा हटाते ही सामने था माउंट टिटलिस का खूबसूरत व्यू। ढलते सूरज की लालिमा ने बर्फ़ की चोटी को सोने से मढ़ दिया था। डिनर के बाद गरम बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद आ गई।

18 मई की सुबह ठंडी बर्फ़ीली हवा में होटल के आरामदायक कमरे से निकलना बड़ा जानलेवा था। रात भर बर्फ़ गिरी थी और खिड़की के शीशों पर उसकी परतें अब उगते सूरज की किरनों से पिघलकर खूबसूरत कोलाज बना रही थी। नाश्ते के बाद हम ल्युसर्नजाने वाले थे जो ल्युसर्न नामक झील के पश्चिमी किनारे पर बसा हुआ है। ल्युसर्न कम आबादी वाला खूबसूरत शहर है। साईकलें अधिक चलती हैं। 1333 में लकड़ी का बना चैपल, जिस्विट चर्च, बॉनहॉप रेल्वे स्टेशन पार करते हम ल्युसर्न झील की ओर बढ़ रहे थे।

"इस स्टेशन का नाम बॉनहॉप नहीं है बल्कि स्विस भाषा में रेल्वे स्टेशन को बॉनहॉप कहते हैं। यह पाँच साल पहले जल गया था। नया बना है। पर मेन गेट को इस घटना की स्मृति में जली हालत में ही रखा गया है।" अजय के बताने पर मैं सोचने लगी कि स्विस अपनी गलतियों को किस क़दर याद रखते हैं। यही वज़ह है इसकी तरक्क़ी की।

ल्युसर्न झील पर लकड़ी का ऐतिहासिक पुल बना है जो लकड़ी की गोलाकार छत से ढँका है और इस पुल से जुड़ा चैपल है जो पुराने स्थापत्य की याद दिलाता है। ल्युसर्न झील 38 मील लम्बी है। चर्च तेरहवीं सदी का बना है। अब उसमें प्रवेश निषेध है। स्पेशल इलाके के लोग ही जा सकते हैं। नज़दीक ही आईमैक्स म्यूज़ियम है जहाँ से हमें हॉट बलूनिंग करनी थी। बादलों को घिरते देख लगा कहीं बरसकर मज़ा किरकिरा न कर दें। बारिश में बलूनिंग कैंसिल हो जाती है। हम झटपट क्यू में आकर खड़े हो गये। अजय टिकट ले आये। एक बड़े से चबूतरे पर तमाम रस्सियों से बँधा 38 मीटर की लम्बाई और 22 वाइड वाला विशाल गुब्बारा देख मैं ख़ुशी से भर उठी। गुब्बारे में एक साथ पच्चीस लोग खड़े हो सकते हैं। चालक ने बताया "हम 160 मीटर की ऊँचाई पर उड़ेंगे। अगर आपका दिल घबराए, चक्कर आए तो बता दें हम गुब्बारा नीच ले आयेंगे।"

धीरे धीरे गति पकड़ता गुब्बारा हमें लिए आसमान में उड़ने लगा। जैसे अलीबाबा चालीस चोर वाला युग हो जब टोकरियों में, गलीचे पर लोग उड़ा करते थे। मैं रानी की तरह तनकर ल्युसर्न शहर के क्यू का भरपूर मज़ा लेने लगी। सड़कों पर दौड़ती कारें, ट्रेन, ट्राम, घर पूरा शहर मानो एक बड़ी थाली में सजा हो। इतनी स्थिर गति से गुब्बारा उड़ रहा था जैसे उड़ते-उड़ते पंखों को समेट परिंदे शून्य में तैरते हैं।

नीचे आकर कॉफी की तलब कॉफी शॉप तक खींच लाई जहाँ कॉफी ख़ुद बनानी पड़ती है। कॉफीफिल्टर से गर्म पानी लो। पेमेंट करने पर दूध, कॉफी और शक्कर के सैशे मिल जाते हैं। मग थामे मैं कुर्सी पर आ बैठी। सामने कतार से पीले झंडे फहरा रहे थे। लेक पर से होती हुई हवा गीली-गीली थी। कॉफी ख़त्म कर जब तक काफ़िला म्यूजियम पार करता हलकी-हलकी बारिश शुरू हो गई। सड़क के दोनों ओर लगे पॉपुलर के दरख़्त हवा में झुमने लगे। मैंने अपना छाता खोला तो मेरे दल के सदस्य ईर्ष्यासे मुझे देखने लगे। उनके कैप वर्षा से बचाव में असमर्थ थे। एक बड़े से लोहे के गेट के अंदर हमने प्रवेश किया। सामने एक चौकोर जलाशय था जिससे लगी-सी स्टोन की सफेद दीवार में बीचोंबीच एक बड़ा आला बनाकर उसमें एक लेटे हुए शेर की मूर्ति है। शेर को चाकू का ज़ख़्म लगा है और उसकेचेहरे पर दुख, उदासी, पीड़ा की छाप है। 10 अगस्त 1792 में जब फ्रांस की क्रांति हुई थी। उस समय राजा रानी का सिर कटवा कर प्रजा ने क्रांति कर दी थी। राजा रानी के अंगरक्षक स्विस थे। वे जब शहीद हुए तो उनकी स्मृति में यह लायन मॉन्यूमेंट लोवेन डैंक्माल के नाम से बनाया गया। जितने भी ऑफीसर शहीद हुए उन सभी 26 ऑफीसरों के नाम शेर की मूर्ति के नीचे खुदे हुए हैं। कहते हैं शेर अंतिम साँस तक संघर्ष करता है ख़ुद को बचाने के लिए। वहबहादुरी का प्रतीक है। इसीलिए यह प्रतीकात्मक स्मारक बनवाया गया। आँखें झुक गईं, हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गये।

बारिशकी तेज़ी के कारण हमने एक चर्च में शरण ली। थोड़ी ही देर में धूप निकल आई। वहाँ से स्विस घड़ियों की शॉपिंग के लिए सभी को गुबलिन शॉप में लाया गया। घड़ियाँ बेहतरीन थीं पर बेहद कीमती। मैंने 72 डॉलर की एक घड़ी खरीदी। शॉप के सामने लाईन से दुकानें हैं। एक दुकान में छोटी-छोटी सस्ती चीजें मिलती हैं और इस दुकान पर कई देशों के झंडे लगे हैं। कई लोगों ने काऊबेल खरीदी। मैं बाहर खड़ी एक ट्रॉली पर रखे पिक्चर पोस्ट कार्ड देखती रही।

वहाँसे अजय हमें क्रूज़ की सैर कराने ले आये। क्रूज़ डबल डेकर था। लकड़ी का शानदार... हर कुर्सी टेबल पर गुलदस्ता... सीढ़ियों पर हरे भरे गमले... लाइट से जगमगा रहा था सब कुछ। पूरे फ़र्श पर ग़लीचा बिछा था। क्रूज़ की एक घंटे की सैर में मैं खिड़की की काँच से देख रही थी नेशनल होटल, कसीनो, पैलेस, चैपल, आर्ट म्यूज़ियम, लिस्बिन चर्च, लेक का हरा जल, हरे पेड़ों के झुरमुट, खड़ी दीवार पर ईसा मसीह, लाइट हाउस और तमाम घर। इस यादगार सफ़र को अनिल (सहयात्री) ने रंगत दे दी अपने हास्य गीत से... पांडे कलई करा लो... अन्य देशों के यात्रियों ने भी इस गीत का ख़ूब मज़ा लिया।

माउंट टिटलिस पर्वत दस हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर है जो मध्य स्विट्ज़रलैंड की सबसे ऊँची चोटी है। कोच हमें इंगलबर्ग ले आई। इंगलबर्ग टॉय ट्रेन का स्टेशन है जो पहाड़ों पर आहिस्ता-आहिस्ता चलती है। ऊँचे पर्वत, मीलों गहरी वैली, बर्फका दूर-दूर फैला साम्राज्य और उस सबसे गुज़रते हुए बूँद-सा हमारा अस्तित्व... लेकिन इस बर्फ़ीले साम्राज्य में भी जीव है... ख़ूब गदबदा बर्फ़ में ही रहने वाला भालू, बर्फ़ को खोद-खोद कर भोजन की तलाश करता उनका झुंड और हमें चकित हो देखते हिरन... ट्रेन ने हमें जिस स्टेशन पर उतारा उसका उच्चारण बड़ा कठिन था। वहाँ से केबिल कार लेकर हम द्रुब्सी उतरे। इस केबिल कारमें 80 मुसाफ़िर खड़े हो सकते हैं। द्रुब्सी से स्टेट्जिंग एग स्टेशन के लिए रोटेटिंग केबल कार थी। विश्व में पहली बार 1992 में इतनी बड़ी केबिल कार बनाई स्विट्ज़रलैंड ने, बताया बीचोंबीच खड़े स्विस कमेंटेटर ने। वह बेहद हँसमुख और कई भाषाओं क़ा जानकार था। केबिल कार में हम भारतीयों की तादाद ज़्यादा देख वह बीच-बीच में हिन्दी भी बोल रहा था। उसने बताया–"आप जहाँ खड़े हैं देखिए नज़ारे घूम-घूम कर आपको दर्शन दे रहे हैं। माउंट टिटलिसपहुँचने के लिए 200 केबिल कारें है जिनमें विभिन्न देशों के झंडे लगे हैं। तिहत्तर नंबर की कार पर भारतीय तिरंगा लगा है।" सुनकरहम सबने नारा लगाया मेरा भारत महान, आईलव माईइंडिया। स्टेटजिंगएग आ गया था। कमेंटेटर ने नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़े... मैं उसकी आवभगत की अदा पर मुग्ध हो गई।

एक लम्बा बर्फ़ीला रास्ता हमने पैदल चलकर पार किया। सब एक दूसरे पर बर्फ़ के गोले बना-बनाकर फ्रंक रहे थे। आइसफ़्लायर पर बैठने तक हनीमून कपल कभी लिपटकर कभी बर्फ़ में गुत्थमगुत्था हो एक दूसरे को चूमते हुए फोटो खिंचवा रहे थे। अनिल मज़े ले-लेकर उनकी फोटो खींच रहा था। आइसफ्लायर एक ऐसी बेंचनुमा ट्रॉली है जो सामने से खुली है। इसमें छै: मुसाफिर एक साथ बैठ सकते हैं। मुसाफिर के बैठते ही एक लोहे की रॉड सामने आकर फ़िट हो जाती है ताकि हम गिरें नहीं। अगरगिरें तो हज़ारों फ़ीटगहरी वैली में हड्डी तक का पता नहीं चलेगा। बैठते ही नज़रेंगहरी वैली पर टिक गईं... दिल ने मानो धड़कना बंद कर दिया। प्रकृति से ऐसा साक्षात्कार कल्पनातीत था। ख़ुद का अस्तित्व एक बिंदु मात्र... वह पाँच मिनिट का सफ़र मेरे लिए एक अद्भुत एहसास का सफ़र था। मुझे लगा आत्मा परमात्मा का मिलन शायद इसी को कहते हैं। इसी परम क्षण की खोज में ऋषिमुनि ताउम्र जंगलों पर्वतों में बिता देते थे।

माउंट टिटलिस पहुँचते ही कड़कड़ाती ठंड और तीखी हवा की चुभन से यूँ लगा जैसे एवरेस्ट पर आ गये हों। धूप से आँखें चौंधिया रही थी। चारों ओर बर्फ़ ही बर्फ़, पैर धँस-धँस जाते थे। एक पैर निकालो तो दूसरा और गहरे धँस जाता। आँखों पर लगे काले चश्मे का काँच भी ठंड में ठिठुर रहा था। बार-बार पोंछना पड़ता। कुछ लोग ट्रक के टायर के समान ट्यूब में बैठकर बर्फ़ की ढलान पर फ़िसल रहे थे। यह जोखिम भरा था, जब तक प्रैक्टिस न हो। कुछ लोग फोटो खिंचवाने के उद्देश्य से ट्यूब में बैठ रहे थे। लोग खुशियाँ ढूँढने के नकली बहानों को आज़माने से भी नहीं चूकते। वहाँ एक घंटा पलक झपकते बीत गया। हम आइस फ्लायर से स्टेटजिंग एग आ गये। वहाँ लकड़ी के विशाल कमरों में यात्रियों के बैठने की सुविधा है। छोटी-सी शॉप है जहाँ पिक्चर पोस्टकार्ड वगैरह मिलते हैं। शॉप का नाम है 'नोस्टोलॉजी फोटो शॉप' ... स्विस ड्रेस में वहाँ फोटो भी खिंचा सकते हैं। कमरा गर्म था। हम लोग लिफ्ट से तीसरी मंज़िल पर बने सेल्फ़ सर्विस रेस्तरां में गये। सुंदर सजावटवाला रेस्तरां... मैं आराम से हीटर लगे गर्म सोफ़े पर बैठकर सामने टी.वी. पर टिटलिस का लाइव टेलीकास्ट देख रही थी। इस समय यहाँ का तापमानमाइनस थ्री डिग्री देख कर होश उड़ गये। बदन पर पहना स्वेटर, विंड चीटर, दस्ताने, कन टोप सब बर्फ़ जैसे ठंडे लग रहे थे। अधिक ठंड और ठंडी हवा में मेरी कमर दुखने लगती है। वैसे भी एक पूरा का पूरा स्वेटर हिफ़ाजत के लिए मैंने कमर में लपेट रखा था। ठंडी हवा और हल्के-हल्के स्नोफ़ॉल ने कँपा दिया था। कैसे रहे होंगे स्वामी विवेकानंद हिमालय की तराई में बगैर कपड़ों के। सचमुचसाधना का विचार ही सुध बुध भुला देता है। हम सांसारिक पचड़ों में पड़े जीव क्या समझें।

लंच के लिए बाजू की सीढ़ियों से ऊपर जाना था। कुछफ़िल्मी कलाकार घूम रहे थे। रहमान और रानी मुखर्जी को मैं पहचान पाई। छोटे कद की साँवली अति साधारण छवि की दिख रही थी रानी। हम लंच के लिए ऊपर आ गये। गरमागरम सूप ने राहत दी।

मेरी सदा से राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय के समान पर्यटन करने की इच्छा रही है। निर्द्वन्द... बिना किसी दबाव या समय सारिणी के पर अब वह ज़माना नहीं रहा। पहले से हर घंटा हर मिनिट तय कर लेना पड़ता है। लिहाज़ा तयशुदा समय सारिणी के हिसाब से आज 20 मई की सुबह अजय हमें ले आए माँक माउंटेन पर बने युंगफ्राउयॉक पर... जो 3454 मीटर की ऊँचाई पर है और टॉप ऑफ द यूरोप कहलाता है। स्विस भाषा में युंग जिसे कई लोग जुंग भी कहते हैं का अर्थ है वर्जिन यानी अनछुई बर्फ... माइनस थ्री डिग्री तापमान पर पहाड़ की चोटी पर जमी बर्फ़ वर्जिन तो होगी ही। हम इंटरलाकन ओस्ट में थे जहाँ के लॉटरब्रूनेन स्टेशन से हमने ट्रेन ली। लालगद्दियाँ लगी हुई चेन वाली ट्रेन जो पहाड़ों पर आसानी से चढ़ सकती है। बीच में टनल भी थीं। ट्रेन तीन स्टेशनों पर रुकी। टनलमें पाँच छै: सीनरीपॉइंट थे। जहाँउतर-उतरकर पर्यटक पहाड़ों, नीचे झील में छलकते पानी और नुकीले पत्तों वाले पेड़ों को कैमरे में क़ैद कर लेते थे। इन पॉइंट्स पर ट्रेन पाँच मिनट रूकती थी। टनलकी दीवारों पर काँच के डायमंड शेप के शो केस में स्विस घड़ियों के इश्तहार थे। ट्रेन ने हमें युंगफ्राउयॉक पहुँचा दिया। जहाँ से लिफ्ट लेकर हम बॉलीवुड रेस्तरां गये। वहाँभी फ़िल्मी हस्तियाँ मौजूद थीं। बड़ा अच्छा लग रहा था इस पर्वतीय बर्फीले इलाके में नाम, चेहरे और भारतीय भोजन के रूप में अपने भारत को पाकर। भोजन के स्वाद से मन आश्चर्यजनक रूप से तृप्त था। इस ऊँचाई पर राशन पानी पहुँचाना, निरंतर अति पर्यटकों की भीड़ को शाही भोजन का परोसादेना कोई हँसीखेल नहीं है। भारतीयों ने यह कर दिखाया। भोजन के बाद हम आइस पैलेस गये लेकिन यह पैलेस राजा का नहीं था बल्कि जानवरों का था। जीते जागते जानवर नहीं बर्फ़ के थे सब। कहने को पैलेस, पर थी गुफ़ा... बर्फ़ से निर्मित गुफ़ा में बर्फ़ के बने जानवर हैं जिनके लिए खूबसूरत लोहे की रेलिंग लगे घर हैं। हम रेलिंग पकड़कर उन्हं देख सकते हैं। गुफ़ा का फ़र्श भी चिकने बर्फ़ का। अगरजूते-चमड़े के पहने हैं तो निश्चय ही स्लिप हो जायेंगे। एक और गुफ़ा थी जिसमें दो आदमी एक साथ जा सकते थे। अँधेरा था वहाँ। पतली सँकरी गुफ़ा में जब मैंने प्रवेश किया तो दम घुटने लगा। फौरन ही बाहर आ गई। पानी की बोतल निकालने केलिए बैग में हाथ डाला तो चश्मे का केस खाली खाली-सा हाथ में आया। चश्मा नदारद। अरे चश्मा कहाँ गया?

"खाना खाते समय तो आप लगाईं थीं। फिर मैंने आपको चश्मे में नहीं देखा। चलिए, देखते हैं।" अजय साथ हो लिए। बॉलीवुड में सफ़ाई हो रही थी। मेरे पूछने पर सफ़ाई कर्मचारियों और काउंटर पर बैठी लड़की ने अनभिज्ञता जताई। मैं बुझे मन से 'बॉलीवुड' सेबाहर निकली। मुझे उदास देख अजय कॉफी लेने चले गये। मैं हीटर लगे गर्म सोफ़े पर बैठ गई। तभी कुछ गड़ा-"अरे मेरा चश्मा। न टूटा, न गुमा। ताज्जुब है। सोफ़े से उठकर मैं तेज कदमों से अजय के पास पहुँच गई," लगता है मिल गया। "

"यस... अब मैं स्फिंक्स टैरेस और ऑब्ज़रवेटरी के नज़ारों का मज़ा ले सकती हूँ।"

वहाँ से लिफ्ट लेकर हम स्फ़िक्सटैरेस आए। टैरेसपरपूरे में लोहे की जाली बिछी थी और उस पर बर्फ़, तेज़ हवा ने हिलाकर रख दिया। तीनों ओर मज़बूत रेलिंग से टिककर पहाड़ों, घाटियों और एकदम हथेली बराबर दिखती झीलों के अद्वितीय सौंदर्य ने मन मोह लिया। शून्य तापमान, तेज़ बर्फ़ीली हवाएँ... इतनी तेज़ कि न कपड़े सम्हल रहे थे न शरीर... हमएस्कीमो जैसे सर से पाँव तक ढंके, मुँदे, थरथराती देह... हनीमून कपल फिर भी एक दूसरे पर बर्फ़ के गोले फेंके जा रहे थे। स्फिंक्स टैरेस वादियों की ओर खुलती एक ऐसी बाल्कनी है जिसकी रेलिंग को कसकर पकड़ना पड़ता है वरना हवा पटक देती है। नीचे पारदर्शी पानी की शीशे-सी चमकती झील और आसपास अनछुई बर्फ़... मुलायम, रेशमी... लेकिन प्रकृति का अपार सौन्दर्य कभी-कभी भयभीत भी कर देता है। मैंने कसकर आँखें मींच ली।

इतनीऊँचाई पर लिफ्ट की सुविधा से मैं चकित थी। स्फिंक्स टैरेस से हम फिर लिफ्ट से आइस पैलेस तक उतरे और वहाँ से दूसरी लिफ्ट लेकर स्फिनेक्स व्यू पॉइंट यानी ऑब्ज़रवेटरी आए। तारों को देखने के लिए बनाई गई यह ऑब्ज़रवेटरी किसी राजा के महल जैसी दिखती है। गोल गुंबद... नीला सफेद रंग और वहाँ लहराता सफेद क्रॉस वाला स्विट्ज़रलैंड का राष्ट्रीय लाल झंडा। समय होता तो रात तक रूककर तारे देखते पर हमें तो निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही चलना है।

मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया ऐसी बर्फ़ीली हज़ारों मीटर की ऊँचाई पर बने रेल्वे स्टेशन और वहाँ की वाइन शॉप ने जहाँ कोन्याक, रम सब कुछ मिलता है। साथ ही कॉफी शॉप, सोविनियर शॉप, अलागाड नामक रेस्तरां जो लोकल लोगों के लिए बना है। फोन, ईमेल, दुनिया भर में किसी को भी ईमेल कर सकते हैं। पोस्टऑफिस... पिक्चर पोस्टकार्ड खरीदकर उतनी ऊँचाई से अपने प्रियजनों को पत्र लिखकर पोस्ट करना एक अलग ही रोमांच देता है। वहाँ भी बर्फीला टैरेस था लेकिन थोड़ा फिसलन भरा। फिर भी रस्सियों की रेलिंग पकड़ कर चढ़ा जा सकता था। मैं थोड़ी दूर गई फिर पैर फिसलने लगा, लौट आई। इन जगहों पर संगी साथी बहुत याद आते हैं।

धूप हलकी हो रही थी। शामके पाँच बज चुके थे और हमें इंटरलाकन भी घूमना था। लिहाज़ा उसी तरह कॉग व्हील ट्रेन द्वारा हम इंटरलाकन आए और कोच में बैठकर सिटी टूर पर निकल गये। इंटरलाकनब्रीज़ और थुन झीलों के बीच बसा बेहद खूबसूरत और मशहूर पर्यटक केन्द्र है। यहाँ पैराग्लाइडिंग, रिवर राफ्टिंग और नाईट स्लेजिंग जैसे एडवेंचर्स से पर्यटक अपना मनोरंजन करते हैं। नौजवानोंमें सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है पैराग्लाइडिंग। जाँबाज रिवर राफ्टिंग का मज़ा लेते हैं। मैं तो यह देख-देख कर अघाती न थी कि नन्हे-नन्हे पौधे भी फूलों के भार से लदे रहते हैं। इतनी ठंड में इतने फूल! जब हम गोमुख ग्लेशियर (भारत का तीर्थ) गये थे तो भोजबासा के बाद भोजपत्र के जंगल भी समाप्त हो गये थे। चारों ओर बर्फ़ ही बर्फ़ थी। कहीं हरियाली का नामोनिशान नहीं था। पर यहाँ बर्फ़ ही बर्फ़, फूल ही फूल। अद्भुत। इन्टरलाकन में और भी झीलें है। नहर भी हैं जो ब्रोनिंग इलाके में होने के कारण ब्रोनिंग कहलाती है। खूबसूरत घरों में खिड़कियाँ ही खिड़कियाँ। अजय ने बताया कि जब बर्फबारी होती है तो हवा के लिए ये खिड़कियाँ खोल दी जाती है। सभी खिड़कियों पर रंग बिरंगे फूलों वाले पौधों के गमले थे। लंगूननामक झील पानी से छलछला रही थी लेकिन सर्दियों में सभी झीलों का पानी जमजाता है और उस पर स्केटिंग करते हैं। इंटरलाकन में मात्र 2500 की आबादी है। छोटे से खूबसूरत शहर को घूमकर हम फ्यूजियामारेस्टॉरेंट के सामने फुटपाथ पर कुर्सी टेबल रखी थीं जिन पर बैठे लोग वाइन, कोन्याक, कॉफी वगैरह का आनंद ले रहे थे। दाहिनी ओर कसीनो की झिलमिलाती रोशनी थी और सामने फूलों से भरा पार्क था। सभी शॉपिंग के लिए चले गये थे। मुझे और अजय को शॉपिंग नहीं करनी थी। हमथोड़ी देर पार्क में टहलते रहे, पैराड्राइविंग देखते रहे फिर रेस्टॉरेंट के बाईं ओर से अंदर की तरफ़ गये जहाँ हरे भरे खुले मैदान में तिरपाल लगे थे और दसियों स्टॉल थे, खाने पीने की तमाम चीजों से भरे जिन्हें बेचने वाले सींगदार टोपियों पहने थे। अजीबोगरीब दृश्य था।

"आज यहाँ कार्निवाल है, बच्चों की तो मौज है। इस कार्निवाल की स्पेशल डिश है अदरक की आइस्क्रीम। खाएँगी?" कहते हुए अजय आइस्क्रीम के स्टॉल कीओर मुड़ा। थोड़ी ही देर में उसके हाथों में आइस्क्रीम के दो कौन थे। आइस्क्रीम बेहद स्वादिष्ट थी। कार्निवाल घूमकर मैं तीखी ठंडी हवा से बचाव के लिए एक बैंच पर जा बैठी। अजयलैंपपोस्ट के नीचे खड़ा हमारे साथियों का इंतज़ार करने लगा। एक गुजराती महिला पास आकर बतियाने लगी कि वह अपने बहू बेटे के साथ हफ्ते भर के लिए यहाँ आई है। एक बंगला किराए पर लिया है। खाना भी वह ख़ुद ही पकाती है। और भी ढेर सारी बातें। हमारी कोच आ गई थी और तमाम साथी भी। सूरज डूब चुका था और रात के बढ़ते कदमों के संग-संग हम भी होटल लौट आए।

इक्कीस मई को जब हमने सुबह के नाश्ते के बाद होटल टैरेस से विदा ली तो रिमझिम बारिश हो रही थी। सामान पहले ही ट्रॉली से भेज दिया गया था। हमें आज माउन्ट पिलाटस देखते हुए ऑस्ट्रिया के इन्सब्रुक शहर जाना था। सातहजार पाँच सौ फीट की ऊँचाई पर पिलाटस जाने के लिए क्रेन्स स्टेशन आये। टिकट प्रवेश चक्र में इन्सर्ट करके और ग्रीन सिग्नल होने पर चक्र खुलते ही हमने स्टेशन के अंदर प्रवेश किया। क्रेन्स इन्डस्ट्रियल एरिया है जहाँ से केबल कार से हम क्रेन्सरेग स्टेशन गये जो बर्फ़ीले पहाड़ पर बना है। पिलेटस बर्फ़ीले पहाड़ की चोटी पर बना है। इतनी अधिक ऊँचाई होने पर अक्सर वहाँ स्नोफॉल होता रहता है। क्रेन्सरेग स्टेशन से हम फ्रेक्मन्टेन आए। वहाँ बड़ी केबल कार में बैठकर पिलाटस गये। पूरा पहाड़ी रास्ता इतना खूबसूरत था, कितना अजब लगता है जब नुकीली पत्तियों वाले चीड़ देवदार की जड़ों से सफ़र शुरू हो और दरख़्त की ऊपरी फुनगी को पार करते हुए सारे के सारे दरख़्त थोड़ी ही देर में एकदम बौने नज़र आने लगें। वादियों में उछलते हिरन, पहाड़ी भालू, कुत्तों को पीछे छोड़ते हम उस चोटी पर पहुँच गये जहाँ दूर-दूर तक बस बर्फ ही बर्फ का विस्तार था। केबल कार से उतरकर हम एक बड़े गोलाकार हॉल में आए। इतनी ऊँचाई पर इतना खूबसूरत हॉल काबिले तारीफ़ था। बैठने के लिए जो बैंचें रखी थीं उनके नीचे बिजली के हीटर लगे थे जो कड़कड़ाती ठंड में शरीर को बड़े आरामदायक सुखद लगे। उसके पहले हम एक वुड म्यूज़ियम में गये थे। जहाँ लकड़ी के टुकड़ों पर मानव शक्लें उभारी गई थीं। दीवार पर उभरा हुआ पिलाटस पर्वत था और उस पर ट्रैकिंग करता एक लकड़ी का आदमी... एक हेलिकॉप्टर और उसके पास खड़ा लाल ड्रेस पहने एक आदमी। म्यूज़ियम से लम्बी गैलरी पार कर हम ऊपर हॉल में आए। हॉल के आगे दूर तलक लम्बाई में जाता सन टैरेस था जहाँ बर्फ़ ही बर्फ़ बिछी थी। टैरेस पर रखी टेबिलकुर्सियोंपर भी बर्फ़थी। इतने में स्नोफॉल होने लगा। लोगबर्फ़में मस्ती कर रहे थे। टैरेस पर बने कॉफी शॉप से कॉफीखरीद कर पी रहे थे। एक लड़का शम्मीकपूर की स्टाईल 'याहू, चाहे कोई मुझे जंगली कहे' गाता हुआ उछल कूद कर रहा था। मन तो मेरा भी टैरेस पर जाने का हुआ पर कमरदर्द के भय ने रोक दिया। मैं अपना मन बँटाने को हॉल के दाहिनी ओर खड़ी बड़ी-सी बग्घी को देखने लगी जो निश्चय ही किसी राजा की होगी। अचानक नज़र दूर माउंट टिटलिस और माउंट युगफ्राउयॉक को पहचान गईं। बर्फ़ का गिरना रुक ही नहीं रहा था। हम गिरती बर्फ़ में टैरेस के अंतिम छोर पर बने रेस्तरां की ओर जब जाने लगे तो जाने कहाँ से ढेर सारी पीली चोंच वाली काली चिड़ियाँ टैरेस पर आकर फुदकने लगीं। कुछ जापानी सैलानी उनके संग खेलने लगे। रेस्तरां लकड़ी की खूबसूरत बनावट वाला गर्म तापमान का था। बैठना अच्छा लगा। वेटर स्विस लड़के लड़कियाँ थे। पहले गर्मागर्म टमाटर सूप फिर मिक्स्ड वेजीटेबल और चावल। चावल कच्चे थे। वेटरों में भाग दौड़ मच गई। जब तक वे दोबारा चावल पकाकरलाए तब तक हमारा पेट सूप, सब्जी और फ्रूट सलाद से भर चुका था। मैनेजर खेद प्रगट करने लगा। हमें खिला न सकने का पछतावा उसके चेहरे पर साफ़ दिखाई दे रहा था जिसकी भरपाई उसने हमें बड़ी-बड़ी चॉकलेट खिलाकर की।

हमक्रेन्स वापिस लौटकर ऑस्ट्रिया जाने के लिए अपनी कोच में आ बैठे। इन्सब्रुक 350 मील दूर था। सफ़र शुरू हुआ। कोच चलते ही साथी पर्यटक खर्राटे भरने लगे पर मेरी आँखों में नींद कहाँ? मैं सब कुछ अपने दिमाग़ में अक्स कर लेना चाहती थी। बरसों से दबाकर रखी यूरोप यात्रा की चाह ने सिर उठाना शुरू कर दिया था। मेरा बरसों का ख्वाब... ऐन आँखों के सम्मुख था। घुमावदार पहाड़ी रास्ते, चीड़, देवदार, पॉपुलर के ऊँचे-ऊँचे दरख्तों से भरे जंगल ये सब दार्जिलिंग, शिमला, नैनीताल, मसूरी और काश्मीर में भी देख चुकी हूँ। लेकिन सड़क पर इतना सधा हुआ ट्रैफिक, पहाड़ी रास्तों पर सिग्नल। यह मैंने पहली बार देखा। सिग्नल एक रुकावट-सा बनकर आगे आ जाता था जिससे यातायात सुचारू हो जाता था। कहीं बारिश तो कहीं छिटकी हुई धूप, झील, टनल, पुल, सीधे सतर पेड़। कई छोटे-छोटे गाँव पड़े। स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रिया की सीमा के बीचोंबीच एक अद्भुत देश मिला लिंचस्टाइन। इसे कंट्री ऑफ प्रिंस्पिलिटीकहते हैं। प्रिंस एडम यहाँ राज करते हैं। यहाँ की करेंसी स्विस फ्रेंक है और पूरे देश की आबादी तीस हज़ार है। टैक्स फ्री है यहाँ। राजधानी वडूस है। यहाँ की गाड़ियों पर FL लिखा होता है जिसका अर्थ है फेडरल लिंचस्टाइन। मैं इस छोटे से देश को देखकर सुखद आश्चर्य से भर गई। टैक्स फ्री कंट्री होने के नाते यहाँ के बॉर्डर पर स्विट्ज़रलैंड से खरीदे गये सामान का बिल दिखाने पर सात परसेंट पैसा वापस मिल जाता है।