दानी / कृश्न चन्दर

Gadya Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दानी लंबा और बदसूरत था। इस की टांगों और बाँहों पर बाल कसरत से थे और बेहद खुरदुरे थे। सुब्ह-सवेरे चारक रोड के हाईड्रेंट पर नहाते हुए वो दूर से देखने वालों को बिलकुल भैंस का एक बच्चा मालूम होता था। इस के जिस्म में वाक़ई एक बैल की सी ताक़त थी। इस का सर बड़ा, माथा चौड़ा और खोपड़ी बड़ी मज़बूत थी। दिन-भर वो चारक रोड के नाके पर ईरानी रस्तोराँ में बड़ी मुस्तइद्दी से काम करता और रात को ठर्रा पी कर एक मेंढे की तरह सर नीचा कर के हर किसी ना-किसी से कहता। आओ मेरे सर पर टक्कर मॉरो। मगर यार लोग हंसकर तरह दे जाते थे। क्योंकि दानी का सर ही नहीं उस का जिस्म भी बेहद मज़बूत था। दो तीन बार थूगा लेन और डोरा गली के चंद कसरती नौजवानों ने इस का चैलेंज मंज़ूर करते हुए उसे नुक्कड़ पर घेरा था और नतीजा में अपने सर फड़वा कर चले गए थे। फिर किसी में हिम्मत ना हुई कि दानी के सर से टक्कर ले सके।

ग़ालिबन दानी के सर में हड्डी के सिवा कुछ ना था। अगर मग़ज़ का गूदा होता तो वो बाआसानी थोड़ी सी अक़ल सर्फ कर के बंबई का दादा बन सकता था। इस से कम डीलडौल और ताक़त वाले नौजवान अपने अपने इलाक़ों के ज़ी असर दादा बन चुके थे और ग़ुंडों की पल्टनों पर हुकूमत करते थे। शराब स्मगल करते थे। सट्टा खिलाते थे। सिनेमा के टिकट ब्लैक में बेचते थे। रन्डीयों के कोठे चलाते थे और इलैक्शन के मौके़ पर अपने इलाक़े के वोट बेचते थे।

मगर शायद दानी की खोपड़ी में भेजा ना था। क्योंकि उसे इस किस्म के तमाम कामों से उलझन सी होती थी। जब कोई उसे इस किस्म का मश्वरा देता तो उस के चेहरे पर शदीद बेज़ारी के असरात नुमायां हो जाते और वो कहने वाले की तरफ़ अपनी छोटी छोटी आँखें और भी छोड़ी कर के, होंट भेंच कर सर झुका के। कंधे सुकेड़ के एक हमला करने वाले मेंढे की तरह ख़तरनाक पोज़ लेकर कहता। फिर बोला तो टक्कर मार दूँगा।

और मश्वरा देने वाला खिसिया कर हंसकर परे हट जाता।

दानी को पढ़ने से नफ़रत थी। वो तालीम-ए-याफ़ता आदमीयों को बड़ी हक़ारत से देखता था। दानी को शौहरत से नफ़रत थी। जब कभी किसी बड़े और मशहूर आदमी का जलूस चारक पार्क से गुज़रता और इस अज़ीमुश्शान हस्ती को फूलों में लदे हुए, एक खुली कार में बैठे हुए दो-रूया हुजूम की सलामी लेता हुआ देखता तो कहता :

वाह, क्या सजा हुआ मेंढा है। इस से पूछो, मेरे सर से टक्कर लेगा?

वाक़ई ज़रा ग़ौर करो तो सिर्फ जंग-ए-आज़ादी के दिनों में दुबले पतले लीडर आते थे। आजकल जूँ-जूँ अवाम की हालत पतली होती जाती है, लीडर मोटे होते जाते हैं। इस क़दर लहीमो शहीम और मोटे ताज़े दस्तयाब होते हैं। आजकल कि उन पर बाआसानी किसी मेंढे या नागौरी बेल का शुबा किया जा सकता है।

दानी को सियासत से भी सख़्त नफ़रत थी। ऊंची सियासत तो ख़ैर उस के पल्ले ही ना पड़ती थी। लेकिन वो जो एक सियासत होती है, गली, मुहल्ले, बाज़ार और रस्तो रान की, वो भी इस की समझ में ना आती थी। बस उसे सिर्फ काम करना पसंद था। हालाँकि दानी मुसलसल सोला घंटे काम करने के लिए तैयार था। मगर रस्तो रान का मालिक भी किया करे, वो क़ानून के हाथों मजबूर था और दानी अपनी फ़ित्रत के हाथों, इस लिए वो सुब्ह-सवेरे सबसे पहले रस्तो रान में आता और सब नौकरों के बाद जाता और दिन-भर खड़े खड़े इंतिहाई चौकसी से सब काम सबसे पहले करता और जब रस्तो रान बंद हो जाता और दिन-भर की मशक़्क़त से भी दानी का जिस्म ना थकता तो वो इंतिहाई बेज़ार हो कर ठर्रा पी लेता और फुट-पाथ पर खड़ा हो कर अपने दोस्तों से टक्करें लड़ाने को कहता और जब कोई तैयार ना होता तो वो मायूस हो कर अपना बदन ढीला छोड़ देता और फुट-पाथ पर गिर कर सो जाता। बस यही उस की ज़िंदगी थी।

कमो बेश यही उस के दूसरे साथीयों की ज़िंदगी थी, जो उस के साथ रस्तो रान में काम करते थे और इसी फ़ुट-पाथ पर सोते थे। जो चारक चौक के रस्तो रान के बिलकुल सामने सड़क पार कर के चारक चर्च के सामने वाक़्य है। चारक चर्च एक छोटे से मैदान में एक तरफ़ नीले पत्थरों का बना हुआ एक ख़ूबसूरत गराटो है। जिसमें मुक़द्दस माँ का बुत है। एक तरफ़ गुल महर के दो पेड़ हैं। जिनका साया दिन में फिट-पाथ के इस हिस्से को ठंडा रखता है। इन पेड़ों की छाओं में ग़रीब ईसाई, मोमी शमएँ, यसवा मसीह और मर्यम के मोमी बुत और गेंदे के हार बेचते नज़र आते हैं। दो भिकारी दिन में भीक मांगते हैं और रात को कहीं ग़ायब हो जाते हैं। फुट-पाथ पर सड़क के किनारे छत्ते हुए बस-स्टॉप में, जहां बस का कियु लगाने वालों के इलावा आस-पास के नौजवानों का भी मजमा रहता है। क्योंकि ये बस-स्टॉप मुसाफ़िरों के वेटिंग रुम ही नहीं, आशिक़ों के मुलाक़ात घर भी हैं। पाँच बजे डी स्टप पर मिल जाना, रोज़ी गिरजा से निकलते हुए, दुज़-दीदा निगाहों से अपने आशिक़ विक्टर को देखती हुई आहिस्ता से कहती है और फिर अपनी ख़ौफ़नाक अम्मां के साथ घबरा कर आगे बढ़ जाती है और फिर विक्टर या जेम्स या चार्ल्स धड़कते हुए दिल से और बेचैन निगाहों से कभी घड़ी देखता हुआ, कभी अपनी पीटी कसता हुआ रोज़ी का इंतिज़ार करता है, साढे़ चार बजे ही से। और देखता है कि जोज़फ़ अपनी डेज़ी को लेकर गया और टॉम अपनी इज़ाबेल को लेकर भागा और शीला, फौजा सिंह के साथ चली गई। इस साली शीला को कोई ईसाई पसंद ही नहीं आता। बलडी शट! और ये लारा भी गई इस यहूदी छोकरे के साथ, जिसका जाने क्या नाम है। लेकिन जो हर-रोज़ पाँच बजे अपनी मोटर साईकल यहीं खड़ी करता है। अब साढे़ पाँच हो गए। अब पौने छः हो गए। अब अगर रोज़ी नहीं आई तो वो लोग गुण आफ़ नो-वारिद देखकर क्या करेगा। सन आफ़ अगन, छः बज गए। रोज़ी नहीं आई। वो नहीं आएगी। शायद वो फ्रांसिस के साथ चली गई। जिसके साथ उस की माँ, उस की शादी करना चाहती है। बलडी स्वाईन। वो फ्रांसिस को गोलीमार देगा। रोज़ी को भी गोलीमार देगा और इस की मनहूस माँ को जो हरवक़त साय की तरह रोज़ी के साथ लगी रहती है। वो बरगाईन फ़ैमिली के हर फ़र्द को गोली से मार देगा और फिर ख़ुद भी गोलीमार कर मर जाएगा। यकायक विक्टर ने दूर से रोज़ी को हल्के लेमन रंग के ताफ़ीता फ़्राक में फूलों की एक शाख़ की तरह झूलते देखा और इस के दिल से गोली मारने का ख़्याल एक दम निकल गया और इस का चेहरा मुसर्रत से खुल उठा और वो बे-इख़्तियार रोज़ी की तरफ़ भागा और भागते भागते एक दौड़ती हुई लारी के नीचे आने से बाल बाल बच गया। रोज़ी के मुँह से ख़ौफ़ की एक चीख़ निकली। मगर दूसरे लम्हे में विक्टर का हाथ उस की कमर में था और वो उसे दौड़ाते हुए लारियों, गाड़ीयों, टैक्सियों की भीड़ से निकालते हुए डी बस-स्टॉप प्रले गया। बस चल चुकी थी। मगर दोनों ने दौड़ कर उसे पकड़ लिया। चंद लम्हों के लिए रोज़ी का लेमन रंग फ़्राक का गोल घेरा तमाशाइयों की निगाहों में घूमा। फिर वो दोनों फूली हुई साँसों में हंसते हुए एक दूसरे को बाज़ू से पकड़े हुए डी बस की ऊपर की मंज़िल में चले गए। जहां से आसमान नज़र आता है और हुआ ताज़ा होती है और नीचे सड़क पर मर्द, औरतें, बच्चे संगीत के सुरों की तरह बिखरते हुए दिखाई देते हैं। कौन कहता है मुहब्बत करने के लिए पहलगाम, नैनीताल यादार जुलुंग जाना ज़रूरी है। मुहब्बत करने वाले तो किसी बस-स्टॉप पर खड़े हो कर भी अपनी जान पर खेल कर मुहब्बत कर जाते हैं।

मगर दानी को औरतों से भी दिलचस्पी ना थी। इस लिए जिस रात उसने सरिया को ग़ुंडों के हाथों बचाया, उस के दिल में सरिया से या किसी औरत से भी मुहब्बत करने का कोई ख़्याल तक पैदा ना हुआ था। पीछे मुड़ कर दूर दूर तक जब वो नज़र डालता तो उसे अपनी ज़िंदगी में कोई औरत दिखाई ना देती। बहुत दूर बचपन में उसे एक ज़र्द-रू मायूस चेहरा दिखाई दिया था। जिसने उसे एक झोंपड़े से बाहर निकाल कर उस के चचा के हवाले कर दिया था। इस से ज़्यादा उस के दिल में अपनी माँ की कोई याद ना थी। फिर उस के ज़हन में एक ख़ौफ़नाक चची की सूरत थी, जो मुतवातिर चार बरस तक उसे पीटती रही थी। ज़रा बड़ा होने पर वो फ़ौरन ही अपनी चची के घर से भाग खड़ा हुआ था और जब से वो आज़ाद था। मगर हमेशा वो अपनी भूक के हाथों आजिज़ रहा, उसे बहुत भूक लगती थी। इसी वजह से इस की माँ ने उसे उस के चचा के हवाले कर दिया था। क्योंकि वो फ़ाक़ों से अपने बेटे का पेट नहीं भर सकती थी और आज दानी कह सकता था कि इस की चची भी कोई ना-मेहरबान औरत ना थी। हरगिज़ कोई ज़ालिम औरत ना थी। मगर उस के अपने पाँच बच्चे थे और दानी की भूक इतनी वसीअ और अरीज़, जय्यद और मज़बूत, बुलंद और देव ज़ाद थी कि चची ने इस के बार-बार खाना मांगने पर मजबूर हो कर उसे पीटना शुरू कर दिया था। वो दानी को नहीं पीटती थी। वो उस की भूक को पीटती थी और आज भी कितनी ही बीवीयां और शौहर, माएं और बेटे और बहूएं और ननदें और भावजें और चचेरे भाई और ख़लीरे भाई और दोस्त और यार और दल के प्यारे और जिगर के टुकड़े हैं जो इस भूक की ख़ातिर एक दूसरे को पीटते हैं, धोका देते हैं। बेवफ़ाई करते हैं, जान लेते हैं, फांसी चढ़ जाते हैं। मगर कोई इस ज़ालिम देव ज़ाद ख़ौफ़नाक भूक को फांसी नहीं देता। जिसके मनहूस वजूद से इस दुनिया में कोई इन्सानी रिश्ता और कोई तहज़ीब क़ायम नहीं है।

दानी यहां तक तो ना सोच सकता था। वो जब भी सोचने की कोशिश करता था। इस के ज़हन में एक बहुत बड़ी ख़ौफ़नाक भूक का ख़्याल आता था। जिसकी वजह से इस की माँ ने तंग आ के उसे उस के चचा के हवाले कर दिया। जिसकी वजह से इस की चची उसे दिन रात चार साल तक मारती पीटती रही और जिसकी वजह से वो आगे जा कर अपनी ज़िंदगी में बार-बार मुख़्तलिफ़ हाथों से पिटा और मुख़्तलिफ़ घरों से निकाला गया। इस लिए उस के ज़हन में औरत की मुहब्बत, बाप की शफ़क़त, दोस्त की रिफ़ाक़त, किसी का कोई एहसास ना था। एक मुसलसल तिश्ना, तरसी हुई नाआसूदा भूक का एहसास था जो बचपन से जवानी तक उस के साथ चला आया था। चूँकि उस का बदन दूसरों से दुगना लंबा और बड़ा था। इस लिए वो दूसरों के मुक़ाबले में दुगुनी ख़ुराक का तालिब था। दानी को ज़िंदगी-भर एक ही अरमान रहा। कोई उसे पेट भर कर खाना दे दे और फिर चाहे इस से चौबीस घंटे मशक़्क़त किराए। मगर दानी का ये ख़राब चारक रोड के ईरानी रस्तो रान ही में आ के पूरा हुआ। ईरानी रस्तो रान का मालिक इस से चार आदमीयों के बराबर मशक़्क़त कराता था। मगर पेट भर के खाना देता था और बीस रुपय तनख़्वाह देता था जिससे ठर्रा पीता था और पेट भर के खाना खा के और ठर्रा पी कर वो फ़िट-पाथ पर सौ जाता था और उसे दौलत और सियासत और शौहरत और औरत वग़ैरा किसी चीज़ की परवाह ना थी। अब वो दुनिया का ख़ुश-क़िस्मत तरीन ज़िंदा इन्सान था।

जिस रात सरिया को उसने ग़ुंडों के हाथों से बचाया तो इस रोज़ भी इस के दोस्त अली अकबर ने उसे बहुत मना किया था। तीन चार गुंडे मिलकर सरिया को एक टैक्सी में भगाने की कोशिश कर रहे थे जो चर्च के आहनी जंगले से बाहर फ़ुट-पाथ के किनारे खड़ी थी। चौक का सिपाही ऐसे मौक़ा पर कहीं गशत लगाने चला गया था। जैसा कि ऐसे मौक़ा पर अक्सर होता है। सरिया ख़ौफ़ और दहश्त से चला रही थी और मदद के लिए पुकार रही थी और अली अकबर ने दानी को बहुत समझाया था। ये बंबई है। ऐसे मौक़ों पर यहां कोई किसी की मदद नहीं करता। ऐसे मौक़ा पर सब लोग कान लपेट कर सो जाते हैं। हमाक़त मत करो। मगर दानी अपने कानों में उंगलियां देने के बावजूद सरिया की चीख़ों की ताब ना ला सका और अपनी जगह से उठकर टैक्सी की जानिब भागा। ग़ुंडों के क़रीब जा के उसने उनसे कोई बातचीत नहीं की। उसने सर नीचा कर के एक गुंडे के सर में टक्कर मारी। फिर दूसरे के, फिर पलट के तीसरे के। अगले चंद लम्हों में तीनों गुंडे फ़र्श पर पड़े थे और उनके सर फट गए थे। फिर पलट कर दानी ने चौथे गुंडे की तरफ़ देखा तो वो जल्दी से सरिया को फिट-पाथ पर छोड़कर टैक्सी के अंदर कूद गया और टैक्सी वाला गाड़ी स्टार्ट कर के ये जा वो जा। दानी मेंढे की तरह सर नीचा कर के टैक्सी के पीछे भागा। मगर मोटर का पहिया बहुत तेज़-रफ़्तार होता है। इस लिए दानी मायूस हो कर पलट आया और वापिस आकर सरिया से पूछने लगा। ये लोग कौन थे?

एक तो मेरा भाई था। सरिया ने सिसकते सिसकते कहा।

तुम्हारा भाई था? दानी ने पूछा।

हाँ ! सरिया ने सर हिला कर कहा। वो मुझे उन ग़ुंडों के हाथ फ़रोख़त कर रहा था।

कितने रूपों में?

तीन सौ रूपों में। सरिया ने जवाब दिया।

फिर-फिर में नहीं मानी।

तुम क्यों नहीं मानी?

मैं छः सौ माँगती थी।

तुम छः सौ माँगती थीं? दानी ने हैरत से पूछा। वो क्यों?

मेरा भाई तीन सौ रुपये ले जाता तो मुझे क्या मिलता, में जो बिक रही थी तो मुझे भी कुछ मिलना चाहिए था। सरिया ने दानी को समझाया।

दानी ख़फ़ा हो के बोला: वाह! जो चीज़ बेची जाती है, उसे क्या मिलता है?ऐसा दस्तूर तो हमने ज़िंदगी में कहीं नहीं देखा ना सुना। हमारी दूकान से जो गाहक चार आने का खारा बिस्कुट ख़रीदता है। उसे चार आने के इव्ज़ खारा बिस्कुट मिलता है। दूकानदार को चार आना मिलता है। मगर खारा बिस्कुट को क्या मिलता है? ईं?

मैं खारा बिस्कुट नहीं हूँ। सरिया ग़ुस्से से बोली।

दानी ने सर से पांव तक सरिया को देखा, तेज़ और तीखी और नुकीली और साँवली। बोला :

मगर बिलकुल खारा बिस्कुट की तरह लगती हो।

सरिया मुस्कुराई, कुछ शरमाई। अगर वो साड़ी पहने होती तो ज़रूर उस वक़्त उस का पल्लू अपने सीने पर ले लेती कि ऐसे मौक़ों पर औरतों की ये एक पेटैंट अदा होती है। मगर इस बेचारी ने तो स्याह बलाउज़ पहन रखा था। इस लिए उसने सिर्फ गर्दन झुकाने पर इकतिफ़ा की।

दानी पलट कर फुट-पाथ पर अपनी जगह पर आ गया और बोला: अच्छा अब जाओ, कहीं दफ़ा हो जाओ। सरिया उस के पीछे पीछे आते हुए बोली: मुझे भूक लग रही है।

ईरानी रस्तो रान तो बंद हो चुका था। इस लिए दानी उस के लिए डोरा गली के एक चाए-ख़ाने से, चाय और आमलेट उधार लाया और जिस तरह से सरिया ने उसे खाया, इस से मालूम होता था कि इस की भूक में भी दानी का स्टाइल झलकता है। दो लुक़्मों में वो चार स्लाइस खा गई। एक लुक़्मे में आमलेट। फिर उसने एक ही घूँट में सारी चाय अपने हलक़ से नीचे उतार दी। दानी उस की इस हरकत पर बेहद ख़ुश हुआ। यकायक उसे ऐसा महसूस हुआ, जैसे उसे एक जिगरी दोस्त मिल गया। बोला :

तुम्हें बहुत भूक लगती है ?

बहुत !

तुम्हारा नाम किया है?दानी ने अब पहली बार इस से नाम पूछा।

सरिया यानी सवसिंह!सरिया झिजकते झिजकते बोली।

मैं दानी हूँ। दानी अपने सीने पर उंगली रखते हुए बोला। यानी डेनियल!

फिर वो दोनों हैरत से एक दूसरे को देखने लगे और यकायक पहली बार उन्हें आसमान बहुत साफ़ दिखाई दिया और दूर समुंद्र से नग़मे की सदा आने लगी और मीठी गुदाज़ रात गुल महर के फूल पहने उनके तरसे हुए जिस्मों के क़रीब से गुज़रती गई।

रोज़ रात को फिट-पाथ पर दानी और सरिया का झगड़ा होता था। क्योंकि दानी ने सरिया को ईरानी रस्तो रान के किचन में नौकर करा दिया था। पहले तो उसने कई दिन तक सरिया को फिट-पाथ से भगाने की कोशिश की। वो मेंढे की तरह सर झुका कर जब सरिया की जानिब रुख़ करता तो सरिया वहां से भाग जाती और दानी के सौ जाने के बाद वापिस उसी फ़ुट-पाथ पर चली आती और हौले हौले उस के पांव दाबने लगती और जब सुब्ह-सवेरे दानी उठता तो उसे अपना बदन बहुत हल्का और उम्दा और मज़बूत मालूम होता और वो देखता कि किसी ने इस की बिनयान धो दी है और क़मीज़ और पतलून भी। तो पहली बार उसे ज़िंदगी में ऐसा मालूम हुआ, जैसे वो अपने घर में आ गया हो। पहली बार उसने सरिया की उंगलीयों को अजीब अनोखे अंदाज़ में देखा। वो देर तक उस के हाथ पर अपना हाथ फेरता रहा। फिर रातों को उसे फ़ुट-पाथ पर अपना बिस्तर और तकिया लगा हुआ मिलने लगा और वो जगह भी साफ़ सुथरी और मुसलसल झाड़ पोंछ से चमकती हुई महसूस होने लगी जहां वो हर-रोज़ सोता था और वो सरिया के वजूद का आदी होता गया। मगर अब भी हर-रोज़ खाने के वक़्त रात को फिट-पाथ पर दोनों की लड़ाई होती थी। क्योंकि सरिया भी बहुत खाती थी और दानी भी। दोनों रात का खाना रस्तो रान से ले आते थे और मिलकर खाते थे और दोनों की कोशिश ये होती थी कि कौन किस से ज़्यादा खाता है। अक्सर औक़ात दानी कामयाब रहता था। लेकिन जिस दिन सरिया ज़्यादा खाने में कामयाब हो जाती थी उस दिन वो दानी के हाथों ज़रूर पटती थी।

एक दिन सरिया ने दानी से कहा।

अब तुम मुझे मत पीटा करो।

क्यों?

क्योंकि अब मेरे बच्चा होने वाला है। सरिया ने उसे समझाया।

दानी ने यकायक खाते खाते हाथ खींच लिया। वो हैरत से सरिया को सर से पांव तक देखने लगा, फिर बोला।

बच्चा !

हाँ ! सरिया ख़ुश होकर बोली।

वो भी खाएगा? दानी की आवाज़ में ख़ुशी के साथ साथ ख़फ़ीफ़ सी मायूसी भी थी।

हाँ वो भी खाएगा। सरिया ने उसे समझाया। पहले तो में एक थी, अब दो हूँ। एक में, एक मेरा बच्चा, तुम्हारा बच्चा, पेट में। अब हम दो हैं। हम दोनों को ज़्यादा रोटी मिलनी चाहिए।

दानी ने अपने सामने फ़र्श पर पड़े हुए काग़ज़ात के टुकड़े पर खाने को देखा। फिर उसने सरिया को देखा। फिर उसने अपना मुँह बड़ी सख़्ती से बंद किया और दोनों जबड़ों को हिला कर इस तरह जुंबिश की, जैसे वो मायूसी का एक बहुत बड़ा लुक़मा निगलने जा रहा हो। फिर उसने आहिस्ता से काग़ज़ का टुकड़ा सरिया की जानिब बढ़ा कर कहा।

लो खाओ।

नहीं, तुम भी खाओ, तुमने कुछ खाया ही नहीं। सरिया ने कहा।

नहीं, पहले तुम खा लो, बाद में जो बचेगा वो में खालों गा। दानी ने एक अजीब मलामत से कहा।

पहले दिन तो सरिया सब चिट कर गई। इस ज़ोर की भूक लगी थी उसे। दूसरे दिन उसने कुछ थोड़ा सा छोड़ा दानी के लिए। फिर वो आहिस्ता-आहिस्ता दानी के लिए ज़्यादा खाना छोड़ने लगी। फिर भी जो बाक़ी बचता था वो दानी के लिए इस क़दर कम होता था कि इस की आधी भूक तिश्ना हो कर रह जाती थी। लेकिन अब उसने ख़ाली पेट या आधे पेट रात को भूके सो जाना सीख लिया था। पुरानी आदत को वापिस बुलाना इस क़दर मुश्किल नहीं होता। जिस क़दर नई आदत को पालना। हौले हौले उसने शराब पीना छोड़ दिया। क्योंकि बच्चे को ख़ुराक चाहीए और कपड़े भी और सरिया ने अभी से अपने बच्चे के लिए कपड़े सीने शुरू कर दिए थे। छोटे से मुन्ने से गड्डे के कपड़े। रंगदार और मुलाइम और रेशमी जिन पर हाथ फेरने से दानी के जिस्म और रूह में मुसर्रत और शादमानी की फुरैरियां सी घूमने लगती थीं।

हमें ज़्यादा से ज़्यादा बचाना चाहिए। कई दिनों की सोच बिचार के बाद दानी इस नतीजा पर पहुंचा।

रात के बारह बजे थे और अब वो दोनों फ़ुट-पाथ पर एक दूसरे के क़रीब लेटे थे और सरगोशियों में बातें कर रहे थे।

मुझे अपने बचपन और लड़कपन में कोई दिन ऐसा याद नहीं आता, जिस दिन में भूका नहीं रहा। दानी बोला।

मैं कोई रात ऐसी याद नहीं कर सकती, जब मैं खाने चुराने के इल्ज़ाम में ना पट्टी हूँ। सरिया बोली।

मगर हमारा बच्चा भूका नहीं रहेगा। दानी ने फ़ैसलाकुन लहजे में कहा।

इस के पास सब कुछ होगा। सरिया ने पर-उम्मीद लहजे में कहा।

पेट भरने के लिए रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा। दानी ख़्वाब-नाक लहजे में बोला।

और रहने के लिए घर! सरिया बोली।

घर! दानी ने चौंक कर पूछा।

क्या अपने बच्चे को घर ना दोगे? सरिया ने शिकायत के लहजे में पूछा: क्या वो इसी फ़ुट-पाथ पर रहेगा?

मगर घर कैसे मिल सकता है? दानी ने पूछा। मैंने सब मालूम कर लिया है। सरिया ने समझाया। चर्च के पीछे नूरा मेंशन बन रही है। इस में पाँच कमरे वाले फ़्लैट होंगे और चार कमरे वाले और तीन कमरे वाले और दो कमरे वाले और दस फ़्लैट एक कमरे वाले भी होंगे जिनका किराया सतरह रुपय होगा और पगड़ी सात सौ रुपये।

मगर सात सौ रुपये हम कहाँ से देंगे? दानी ने पूछा।

अब तुमको सेठ तीस रुपये देता है, मुझको पच्चीस रुपये देता है। अगर हम हर महीना पच्चास रुपये नूरा मेंशन के मालिक को दें तो चौदह महीने में एक कमरा का फ़्लैट हमको मिल सकता है।

बहुत देर तक दानी सोचता रहा। सरिया का हाथ दानी के हाथ में था। यकायक दानी को ऐसा महसूस हुआ, जैसे एक हाथ में एक नन्हे बच्चे का हाथ भी आ गया है। इस का दिल अजीब तरीक़े से पिघलने लगा। घुलने लगा, उस की आँखों में ख़ुद बख़ुद आँसू आ गए और उसने अपनी भीगी हुई आँखें सरिया के हाथ की पुश्त पर रख दें और रुँधे हुए गले से बोला :

हाँ मेरे बच्चे का घर होगा, ज़रूर होगा। मैं सोचता हूँ सरिया। मैं तीन घंटे के लिए डोरा गली के चाए-ख़ाने में रात के ग्यारह बच्चे से दो बजे तक काम कर लूं। जब तो अपना रस्तो रान भी बंद हो जाता है, ग्यारह बजे। फिर ग्यारह बजे से दो बजे तक चाए-ख़ाने में काम करने में क्या हर्ज है। चाए-ख़ाने का सेठ दस रुपय पगार देने को बोलता था। मगर मेरे ख़्याल में वो बारह पंद्रह रुपय तक दे देगा।

जब तो हम जल्दी घर ले सकेंगे। सरिया ने ख़ुश हो कर कहा।

और अगर ईरानी सेठ उधार रुपय दे तो शायद अपने घर पर ही बच्चा पैदा होगा। दानी का चेहरा ख़ुश आइन्दा उम्मीद की रोशनी से चमकने लगा। यकायक उसने सरिया का हाथ ज़ोर से दबा कर कहा। आओ दुआ करें। वो दोनों उठकर गिरजा के आहनी जंगले को पकड़ को दो ज़ानू हो गए। जालीदार आहनी सलाख़ों के दरमयान गिरजा के वसीअ सेहन के वस्त में यसवा मसीह का बुत सलीब पर आवेज़ां था और एक तरफ़ नीले पत्थरों के गराटो में मर्यम ने मुक़द्दस बच्चे को गोद में उठा रखा था और गराटो में मोमी शमएँ रोशन थीं और गुल महर की नाज़ुक पत्तियाँ हुआ के झोंकों से टूट टूट कर चारों तरफ़ गिर रही थीं और मुक़द्दस मर्यम की गोद में एक छोटा सा बचा था, जैसा बच्चा हर माँ के तसव्वुर में होता है और ये रात मर्यम के लिबादे की तरह मेहरबान थी और किसी नींद में डूबे हुए यसवा के ख़ाब की तरह मासूम ।

दुआ पढ़ कर दानी ने सरिया से पूछा।

ये पादरी आज बार-बार अपने वाज़ में आज़ादी, रोटी और कल्चर की बात कर रहा था। आज़ादी और रोटी तो ख़ैर समझ में आती हैं, मगर ये कल्चर क्या होता है?

मेरे ख़्याल में कोई मीठा केक होगा। सरिया सोच सोच कर बोली।

और वो दुनिया में अमन की बात भी करता था&. दानी बोला: मगर हमेशा तो मेरे पेट में ऐसी जंग होती है कि समझ में नहीं आता। ये पेट की जंग कैसे बंद होगी। ओ ख़ुदा कैसी भयानक जंग होती है मेरे पेट में.

मैं जानती हूँ, मेरी माँ भी जानती थी। मेरी बहनें भी, मेरे भाई भी और हम सब का बाप भी। सरिया तास्सुफ़ अंगेज़ लहजे में बोली: और मेरे बाप का बाप भी. बेचारा बूढ्ढा. कोई रिश्ता हमसे इस क़दर क़रीब नहीं रहा, जिस क़दर भूक का।

ख़ुदा करे हमारा बेटा भूका ना रहे।

पेट में अमन, और दुनिया में अमन, जैसा कि वो पादरी कहता था. आमीन!

एक दिन सरिया जिस ग़ैर मुतवक़्क़े तरीक़े से आई थी, इसी तरह वहां से चली गई। ख़बर सुनते ही दानी भागा भागा रात के डेढ़ बजे डोरा गली के चाए-ख़ाने से फुट-पाथ पर आया तो उसने देखा कि लोगों का एक अज़दहाम है और पुलिस के बहुत से सिपाही सड़क पर और फुट-पाथ के आस-पास खड़े हैं और एक ट्रक फ़ुट-पाथ पर चढ़ा हुआ है और इस का इंजन गिरजा के आहनी जंगले को मूढ़ता हुआ गुल महर के पेट से टकरा गया। पिछले पहीयों पर सरिया और अली अकबर की लाशें रखी हैं। क्योंकि यही दो लोग फ़ुट-पाथ पर सोए हुए ट्रक की ज़द में आ गए थे। अगर दानी भी सोया होता तो उस वक़्त उस की लाश भी यहीं पड़ी होती। कभी कभी रात की तारीकी में तेज़ी से गुज़रते हुए या एक दूसरे से रेस करते हुए ट्रक फ़ुट-पाथ पर चढ़ जाते हैं। बड़े शहरों में अक्सर ऐसा होता रहता है।

दानी एक अहमक़ की तरह ख़ून में लत-पत सरिया की लाश पर झुका रहा। फिर वो फटी फटी निगाहों से मजमा की तरफ़ देखने लगा और काँपते हुए लहजे में कहने लगा :

मगर अभी तो वो ज़िंदा थी।

दो घंटे पहले उसने और मैंने अपनी जगह पर खाना खाया था।

वो बिलकुल ज़िंदा और तंदरुस्त थी।

इसकी उम्र सिर्फ सतरह साल थी।

इसके पेट में मेरा बच्चा था।

छह महीने का बच्चा।

मेरा बच्चा।

किसने मारा उन्हें? यका-य़क दानी दोनों हाथों की मुट्ठियाँ कसते हुए ज़ोर से चीख़ा।

एक तमाशाई ने ट्रक की तरफ़ इशारा किया। फ़ौरन पुलिस के दो संतरियों ने दानी को पकड़ा। मगर दानी ने घूँसे मार कर दोनों संतरियों से अपने आपको आज़ाद करा लिया। इस अरसा में दोनों संतरी इस से कश्मकश करते हुए उसे ट्रक से दूर घसीट कर ले गए थे। दानी उनसे आज़ाद हो कर ट्रक की जानिब लपका। इस की आँखें सुर्ख़ हो गईं। बदन झुक गया, और फिर एक मेंढे की तरह तन गया। इस के होंटों से जानवर नुमा एक भिंची हुई सी गुर्राहट निकली। वो अपने सर को एक ख़ौफ़नाक तरीक़े से आगे बढ़ाए और झुकाए तेज़ी से ट्रक पर हमला-आवर हो गया. पूरे छह माह वो हस्पताल में रहा। क्योंकि इस का सर खुल गया था। वो बच तो गया था मगर उसके दिमाग़ का हिस्सा तक़रीबन नाकारा हो चुका था और अब उसका सर पेंडूलम की तरह हौले हौले आप ही हिलता था और इसका वहशी मेंढे की तरह पिला हुआ मज़बूत जिस्म सूखे हुए बाँस की तरह दुबला हो गया था और उसे सब कुछ याद था और बहुत कुछ याद भी नहीं था और अब वो कोई काम नहीं कर सकता था क्योंकि अगर गाहक इस से चाय मांगता तो वो उस के सामने पानी ला कर रख देता और अगर कोई आमलेट मांगता तो वो उस के सामने माचिस की डिबिया रख देता। इस लिए ईरानी रस्तो रान के मालिक ने मजबूर हो कर उसे मुलाज़मत से अलग कर दिया था मगर वो अभी तक फिट-पाथ पर उसी जगह सोता था जहां सरिया सोता थी और उसने अपने बच्चे के कपड़े गिरजा के आहनी जंगले के कोने में छिपा कर रख दिए थे और रात के सन्नाटे में वो अक्सर उन्हें निकाल कर बिजली के खम्बे के नीचे बैठ कृतिका करता था और फुट-पाथ पर हजामत करने वाला रामू नाई अक्सर इस से पूछता।

ये किस के कपड़े हैं?

मेरे बच्चे के हैं।

तेरा बच्चा कहाँ है? थागोलीन के चाय-ख़ाने का क़ासिम इससे पूछता।

वो मेरी सरिया के पास है।

तेरी सरिया कहाँ है?

वो मैके गई है।

वहां से कब लौटेगी? गोपी जेब-कतरा इससे पूछता।

जब मेरा घर बन जाएगा। दानी इंतिहाई मासूमियत से जवाब देता।

ये जून सुनकर मज़ाक़ करने वालों के चेहरे फ़क़ हो जाते और वो वहीं बैठे-बैठे ख़लाओं में तकने लगते। जैसे दूर से किसी ट्रक को अपनी तरफ़ आते हुए देख रहे हूँ और हल ना सकते हूँ। फुट-पाथ पर रहने वाले अपनी मजबूरी समझते हैं। वो जानते हैं कि वो फ़िट-पाथ से अपना बिस्तर तो ता कर सकते हैं लेकिन फिट-पाथ कोता नहीं कर सकते। अभी तक कोई ऐसा तरीक़ा ईजाद नहीं हुआ है, इस लिए दानी के घर का तख़य्युल एक बहुत बड़ा मज़ाक़ मालूम हुआ।

दूसरे दिन दानी बड़े इन्हिमाक से अपना घर बनाने में मसरूफ़ नज़र आया। कहीं से दो तीन ईंटें उठा लाया था और अब वो एक ईंट पर दूसरी ईंट रखकर इस पर तीसरी ईंट लगाने में मसरूफ़ था कि क़ासिम ने इस से पूछा। दानी! ये कितना बड़ा घर होगा?

दानी की आँखें ख़ुशी से चमकने लगीं।

ये एक बहुत बड़ा घर होगा। वो बोला: और मैंने फ़ैसला किया है कि मैं उसे चारक रोड के ऐन बीच में तामीर करूँगा। इस के दस माले होंगे, हर माले में बत्तीस फ़्लैट होंगे। हर फ़्लैट में तीन कमरे होंगे।

तीन कमरे किसके लिए? गोपी जेब कतरे ने पूछा।

एक मियां के लिए, एक बीवी के लिए, एक बच्चे के लिए।

मुझे भी इस घर में जगह दोगे? रामू हज्जाम ने पूछा। मेरी बीवी, मेरे दो बच्चे हैं और वो तीनों मेरे गांव में हैं, क्योंकि यहां मेरे पास कोई घर नहीं है और मेरी माँ बूढ़ी है।

गोपी बोला: और मेरे पास कोई काम नहीं, सिवाए जीप काटने के और में तीन दफ़ा जेल काट चुका हूँ और मुझे तुम अपने घर का चौकीदार रख लेना और रहने के लिए सिर्फ एक कमरा दे देना।

ये एक बहुत बड़ा घर होगा। दानी इंतिहाई ख़ुलूस से बोला और शिद्दत-ए-जज़्बात से इस की चमकती हुई आँखें बाहर निकली पड़ती थीं। और इस में तुम सब के लिए जगह होगी, क़ासिम के लिए और रामू के लिए और गोपी के लिए और धीरज के लिए और वासंत के लिए, और पायल के लिए और रंगाचारी के लिए और थागोलीन और डोर अगली के फुट-पाथ पर सोने वालों के लिए भी जगह होगी। मेरा ख़्याल है, में उसे बीस माले का बनाऊँगा। हर माले में तीस फ़्लैट होंगे, हर फ़्लैट में चार कमरे होंगे, हर कमरे के साथ बाथरूम होगा. फ्लश और शाइर।

मोज़ेक का फ़र्श। क़ासिम बोला।

और खिड़कियाँ समन्दर की तरफ़ खुलती हुईं। गोपी ने लुक़मा दिया।

यकायक एक लम्हे के लिए इन सबने बावर कर लिया। यक़ीन कर लिया, एक लम्हा के लिए उन्होंने चारक रोड के चौक पर इस बड़े घर को तामीर होते हुए, बुलंद होते हुए, आसमान से बातें करते हुए देख लिया। दूसरे लम्हे में एक बहुत बड़ा ट्रक घूं घूं करता हुआ उनके क़रीब से गुज़र गया और वो सहम कर चुप हो गए।

इस के बाद कई माह तक दानी वो घर बनाता रहा। ईंटें तो उस के पास वही तीन थीं। मगर घर का नक़्शा हर-रोज़ बदलता था। वो अब पच्चास मंज़िल का एक महल था, जिसमें सिर्फ फ़ुट-पाथ पर रहने वाले दाख़िल हो सकते थे। इस महल में ज़िंदगी की हर सहूलत और आसाइश मुहय्या थी। बिजली की लिफ़्ट और टेलीफ़ोन। एक छोटा सा सिनेमा और नर्सरी स्कूल और छत पर ख़ूबसूरत फूल वाला गार्डन। दीवार गीर रोशनीयां, और मद्धम मद्धम रंगों वाले ग़ालीचे और ख़ूबसूरत, तितलीयों की तरह आहिस्ता ख़िराम औरतें और बच्चे और धीमे धीमे बजते हुए अर्ग़नूं और मुहज़्ज़ब मर्द मुस्कुराते हुए सिगरेट पीते हुए, एक दूसरे से जाम टकराते हुए और उनके कपड़े भी उम्दा और ख़ुशबूदार और जेबें सिक्कों से भरी हुई और वो सब कुछ जो ग़रीब लोग सिनेमा में देखते हैं और अमीर अपने घर पर रखते हैं। वो सब कुछ इस घर में मौजूद था, बल्कि इस से भी ज़्यादा बुलंद, ख़ूबसूरत, दरख़शां, आलीशान। वो घर इतना ही ख़ूबसूरत था जितना किसी बे-घर का तख़य्युल हो सकता है।

और फिर जब कई माह की काविश के बाद वो घर मुकम्मल हो गया तो रात के ग्यारह बजे से एक बजे तक दानी टीन का एक डिब्बा पीटते हुए चारक रोड के दोनों फ़ुट-पाथ और घोगा लेन के फुट-पाथ और डोरा गली बल्कि क्रास बाज़ार और चारक पार्क के फुट पाथियों को इस नए घर में आने की दावत देता फिरा। ज़ाहिर है कि इस के पास वही तीन ईंटें थीं मगर अब उसने तीन ईंटों को चारक चौक के ट्रैफ़िक आईलैंड के अंदर रख दिया था और इस तरह अपना महल तामीर कर लिया था और अब वो सारे फ़ुट पाथियों को अपने बीवी बच्चों समेत घर में आने की दावत दे रहा था।

डोरा गली के पायल ने रोक कर कहा। लेकिन मेरे तो सात बच्चे हैं और हम सब के सब इस खुले फ़ुट-पाथ पर बड़े आराम से सोते हैं। तुम्हारे तीन कमरों वाले फ़्लैट से हमारा क्या होगा?

मैं तुम्हें सात कमरों वाला फ़्लैट दूँगा। दानी ने टीन पीटते हुए चिल्ला कर कहा।

कब आएं हम लोग। पायल की बीवी ने अपनी मुस्कुराहट को साड़ी के पल्लू में छिपा कर इस से पूछा। इस की हंसी रुकी नहीं पड़ती थी।

कल सुबह जब सरिया बच्चे को लेकर मैके से आ जाएगी। मैं अपने घर के दरवाज़े सब लोगों के लिए खोल दूँगा। दरवाज़े पर हैंड होगा। रंगा-रंग झंडियां होंगी और बंधन दारें और मैं पादरी को घर के मुहूर्त के लिए बुलाऊँगा और वो बाइबल सुनाएगा और गिरजा के घंटे बजींगे और इस वक़्त तुम सब लोग मेरे घर में दाख़िल होगे।

दानी की काँपती हुई आवाज़ में इंतिहाई ख़ुलूस था। इस का दुबला चेहरा ज़र्द और बुख़ार ज़दा दिखाई देता था। इस की आँखें सुर्ख़ और बेचैन थीं और मुतवातिर चलाने से इस के होंटों पर कफ़ आ चला था और इस के रूखे सूखे बालों की लटों में फिट-पाथ की ख़ाक चमक रही थी।


दूसरे दिन दानी बलोगराटो के बाहर मुक़द्दस मर्यम के क़दमों में मुर्दा पाया गया। इस की आँखें खुली थीं और नीले आसमान में किसी ना-मुकम्मल सपने को तक रही थीं। इस के कपड़े फटे चीथड़े और तार-तार थे और इस के सीने पर वही तीन ईंटें रखी थीं और उसने मुक़द्दस मर्यम के क़दमों के फ़र्श पर अपना सर मार मार कर तोड़ दिया था। गिरिजा खोल दो।


और घंटे बजाओ।

देखो यसवा मसीह जा रहा है।

अपने सीने पर ईंटों की सलीब लिए हुए।

अब जन्नत के दरवाज़े ग़रीबों के लिए खुल गए हैं।

क्योंकि एक ऊंट सूई के नाके से नहीं गुज़र सकता। लेकिन एक अमीर क़ानून के हर नाके से गुज़र सकता है।

और अब इस धरती के मालिक ग़रीब होंगे।

और ग़रीबों के मालिक अमीर होंगे।

देखो वो यसवा मसीह जा रहा है।

आओ इसे संगसार करें ।