देहाती समाज / अध्याय 3 / शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

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'ताई जी!' - रमेश ने पुकारा।

उस समय वे भण्डार में थीं। आवाज सुनते ही बाहर निकल आई। वेणी को देखते हुए उनकी उम्र पचास साल के करीब होनी चाहिए। वैसे उनके गठे शरीर को देख कर तो वे चालीस के लगभग जान पड़ती थीं। आज उनका रंग साफ और गोरा था। उनकी जवानी में, उनकी सुंदरता की दूर-दूर तक चर्चा थी और वह सौंदर्य आज भी, शरीर के गठन के साथ बना हुआ था। बाल उनके विधावाओं की तरह कटे हुए थे, जिनकी छोटी -छोटी घुँघराली लटें माथे पर आ कर उनकी सुंदरता को बढ़ा रही थीं। अंग-प्रत्यंग, चिबुक, होंठ, कपोल, सारे के सारे उनकी सुंदरता के प्रमाण बने थे। उनकी आँखें तो मानो रस में डूबी हुई थीं। रमेश उनकी छवि की तरफ एकटक देखता रहा।

ताई जी और रमेश की माँ में बड़ी घनिष्ठता थी। काफी दिनों तक दोनों के कोई संतान नहीं हुई थी। सास-ननद के तानों से तंग आ कर दोनों साथ बैठ कर रोई थीं और तभी पहली बार, एक ही दुख से दुखी होने के नाते, दोनों में प्रेम का सूत्रपात हो गया, जो अंत तक बना रहा। रमेश को भी वह विशेषतः प्यार करती थी।

आज एक अरसे के बाद जब रमेश की माँ अपनी देवरानी के भण्डार में गई, तभी से अपने हाथ से सँजो कर रखे गए सामान को देख, देवरानी की याद आ गई और उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

दोनों के घर में आपसी मनमुटाव काफी दिनों पहले से चला आ रहा था। यहाँ तक कि मुकदमेबाजी तक की नौबत आ जाती थी और वही मनमुटाव अब तक भी न टूटा था।

रमेश की आवाज सुन कर, वे अपनी गीली आँखें पोंछ, बाहर निकलीं। उस समय उनकी आँखें लाल हो रही थीं और उनमें विषाद की आभा झलक रही थी, जिसे देख रमेश चकित-सा खड़े रह गया। ताई जी का दिल भी रमेश के लिए भर आया - जिसके न माता थी न पिता। पर अपने को संयत रख हँसते हुए बोलीं - 'पहचान लिया मुझे, बेटा रमेश?'

जब रमेश की माँ का देहांत हो गया था, तब इन्हीं ताई जी ने उसे अपनी छाती से लगा कर पाला था और जब तक वह अपने मामा के घर नहीं गया था, तब तक इन्हीं के प्यार में उसका शरीर बढ़ा था, पर कल जब वह इन्हीं ताई जी के घर मिलने गया, तो उन्होंने 'घर पर नहीं हैं' कह कर टलवा दिया था और उसके बाद मौसी ने वेणी के सामने और उसके पीछे भी, उसका घोर अपमान किया था। तब उसके टूटे दिल से एक आह निकली थी - 'मेरा यहाँ कोई नहीं है!' पर आज उन्हीं ताई जी को अपने आप आ कर भण्डार की कुंजी सम्हालते देख, वे विस्मय से चित्र लिखे-से खड़ा उनकी तरफ देखते रहे।

उनको इस तरह खड़ा देख कर विश्वेश्वरी ताई जी ने कहा -'बेटा! ऐसे मौकों पर दिल कमजोर करने से काम नहीं चलता।'

विश्वेश्वरी के स्वर में उन्हें कोमलता का तनिक आभास नहीं मिला। वे कल के उनके व्यवहार से उनका प्यार उमड़ता देख, रूठने का-सा उपक्रम कर रहे थे। पर तुरंत ही उन्होंने अनुभव कर लिया कि यहाँ इससे काम नहीं चलने का। जहाँ किसी को किसी पर रूठने का अधिकार होता है, वहाँ निभाव भी होता है। अन्यथा और विशेष कष्ट ही होता है। उसने जरा तुनक कर कहा - 'मेरा जी कमजोर नहीं, ताई जी! मैं तो तब जो बन पड़ता, आप ही कर लेता - फिर तुम्हारे आने की क्या जरूरत थी?'

वे फिर मृदु हँसी हँस पड़ीं। बोलीं - तुम मुझे बुला कर लाए होते, तो तुम्हारे सवाल का जवाब देती! सो, तुम तो बुला कर लाए नहीं! वैसे यह सुन लो कि जब तक सारा काम नहीं हो जाता, अंदर के सब काम मेरे ऊपर रहेंगे। भण्डार से भी सब चीजें यों ही नहीं निकलेंगी। रोज जाते समय, उसमें ताला डाल कर ताली तुम्हें सहेज जाया करूँगी और आते समय ले लूँगी, रोज-समझे? अच्छा! क्या उस रोज वेणी से मुलाकात हुई थी?'

रमेश को इस प्रश्‍न ने अजीब असमंजस में डाल दिया। क्या जवाब दे, उसने सोचा। पता नहीं, इनको अपने पुत्र के व्यवहार का पता है या नहीं। फिर बात को टाल कर बोला - 'उस समय वे घर पर मिले नहीं!'

रमेश ने ताई जी के मुख पर झलकती प्रश्‍न की व्यग्रता को अनुभव किया। रमेश के उत्तर से उनका खिंचाव ढीला पड़ा और मंद मुस्कान उनके होंठों पर खेलने लगी। बोलीं - 'वाह-वाह! एक बार नहीं मिला, तो दूसरी बार जाते! मैं जानती हूँ कि वह तुम लोगों से नाराज है, पर तुम्हें तो अपना कर्तव्य निभाना ही चाहिए! वह तुम्हारा बड़ा भाई है और इस समय तो हर किसी से, विनती-अनुरोध से अपने सारे झगड़े मिटा लेने चाहिए! मैं सोचती हूँ कि इस समय वह घर पर ही होगा! जाओ, मेरे बेटे, इस समय उससे मिल आओ!'

रमेश के मन में जो संदेह काम कर रहा था, उसका समाधान अभी तक नहीं हुआ था, और न उसके इस आग्रह का ही कारण उसे समझ पड़ा। वह उसी के समझने में असमंजस में पड़ा था तभी विश्वेश्वरी ने तनिक उसके और नजदीक आ कर धीरे से कहा - 'तुम तो अभी कल आए हो, क्या जानो ये लोग कैसे हैं? जो सब बाहर बैठे बातें बना रहे हैं, कहीं इनकी बातों में मत आ जाना! तुम अब जरा अपने बड़े भैया के पास, मेरे साथ चलो!'

रमेश ने भी दृढ़ता से कहा - 'ताई जी, बाहर जो लोग इस समय बैठे हैं, वे कैसे भी हों पर इस समय तो वे मेरे अपने ही हैं!'

रमेश की बात सुनते ही ताई जी के चेहरे का भाव अजीब तरह से परिवर्तित हो गया, जिसे देख रमेश की आगे की बात मुँह में ही रह गई और वे ताज्जुब से उनकी तरफ देखते रहे। उनका चेहरा एकदम फक्क पड़ गया था। थोड़ी देर उसी अवस्था में रह कर ताई जी ने लंबी-सी ठंडी साँस खींच कर कहा - 'जैसी तुम्हारी मर्जी! नहीं जाना चाहते उसके पास, तो फिर तुमसे कुछ कहना ही व्यर्थ है। पर इतना तो कहे ही देती हूँ कि चिंता मत करना तुम, किसी बात की! मैं फिर सबेरे ही आ जाऊँगी।' कह कर वे अपनी नौकरानी को बुला कर, उसके साथ पीछे की खिड़की के बाहर चली गई। रमेश को वेणी से मिलने में अन्यमनस्क देख कर उन्होंने समझ लिया कि वह वेणी से मिल चुका है, और निश्‍चय ही उससे कोई बात हो गई है। कुछ देर तक तो रमेश उस ओर ही देखता रहा, जिधर से वे गईं फिर उदास चेहरे सहित बाहर निकल कर आया, तो तुरंत ही उनसे गोविंद ने उद्विग्न हो पूछा - 'बड़ी माता जी आई थीं क्या?'

'हाँ!'

'सुना है, भण्डार की ताली भी अपने साथ लेती गई हैं।'

रमेश ने बिना बोले ही सिर हिला कर उसका उत्तर दे दिया। वैसे तो उन्होंने ताली दे कर जाने को कहा था, पर चलते समय न जाने क्यों अपने साथ ही लेती गई।

'क्यों धर्मदास, क्या कहा था न मैंने! सच ही निकली मेरी बात! रमेश भैया, तुम समझे इसका मतलब?' - गोविंद बोले।

रमेश को गोविंद की बात बुरी लगी, पर समय का विचार कर कुछ कहना ठीक नहीं समझा। दीनू भट्टाचार्य अभी तक मौजूद थे। वे अजीब भोंदू किस्म के आदमी थे, तभी तो बिना लिहाज के, मय बालगोपालों के, भरपेट मिठाई चढ़ा गए थे। वे आशीर्वाद देने का अवसर पाए बिना जा कैसे सकते थे। अब अवसर पा कर बोले - 'इसका मतलब समझना क्या मुश्किल है? वे रंग-ढंग समझती हैं, तभी ताली अपने साथ लेती गई हैं।'

दीनू की इस बात ने गोविंद के आग लगा दी। तुनक कर बोले - 'तुम बिना समझे-सोचे हर बात में टाँग क्यों अड़ा दिया करते हो? क्या समझो तुम, इन सब बातों को?'

गोविंद की डाँट से वह और मुँहफट हो कर बोले - 'वाह, बात ही ऐसी कौन-सी टेढ़ी है इसमें, जो समझ में न आए! सीधी-सी तो बात है कि बड़ी माता जी आ कर, भण्डार का ताला बंद कर, ताली बंद कर, ताली अपने साथ लेती गई हैं।'

'तुम्हारे आने का काम तो पूरा हो गया - अब तुम घर जाओ, बस! अब तो घर भर ने मिल कर खूब भरपेट खा भी लिया और खूब बाँध भी लिया, अब और क्या काम बाकी है तुम्हारा? रहा खीरमोहन, सो अब उसे परसों ही खाना। अब और कुछ नहीं मिलने का!' - गोविंद ने कहा।

रमेश को अब गुस्सा आ गया था और बेचारे दीनू तो मारे लज्जा के और भी दीन हुए जा रहे थे।

रमेश ने गोविंद को रोक दिया, नहीं तो और भी जाने क्या-क्या उनकी जुबान से निकल सकता था। जरा तेज स्वर में बोला - 'हर किसी का बेकार अपमान करने की आपकी यह क्या आदत है गांगुली जी!'

गोविंद चौंक पड़े और तुरंत ही संयम में हो, जबरदस्ती की हँसी हँसते हुए बोले - 'अपमान तो मैंने भैया किसी का नहीं किया। जो कहा है, वह सच कहा है। कोई सवा हाथ तो मैं डेढ़ हाथ! अरे तुम्हीं देखो धर्मदास भैया, इस ब्राह्मण की गुस्ताखी!'

गोविंद की इस ढिठाई पर रमेश दंग रह गया। उसके उस चेहरे की तरफ देख कर दीनू ने स्वयं ही कहा - 'रमेश भैया! जग जाहिर है कि मेरे पास न खेत है न मकान। गरीब ब्राह्मण हूँ। भिक्षावृत्ति पर ही जीवन चलता है, मेरा व मेरे परिवार का। कभी-कभी ऐसा अवसर मिलता है कि बच्चों को अच्छी चीज खिला सकूँ, जब कभी बड़े आदमियों के यहाँ कोई बड़ा काम होता है। तारिणी भैया का तो नियम ही था, हम लोगों को खिलाने-पिलाने का - और मैं निश्‍चित कह सकता हूँ कि हम लोगों के भरपेट खाने से उनकी आत्मा को खुशी होगी!' कहते-कहते उनके दीन नेत्रों में आँसू भर आए। अपने मैले दुपट्टे के छोर से आँसू पोंछ कर वे आगे बोले - 'भैया, मैं नहीं, मुझ जैसे सभी आस-पास के जितने भी गरीब हैं, कभी तारिणी भैया के दरवाजे से खाली हाथ नहीं लौटे! किसी को कानो-कान भी खबर न हो पाती थी। यहाँ तक कि उनका बायाँ हाथ भी उसे नहीं जान पाता था। अच्छा, अब चला - आप लोगों का समय अब और नष्ट न करूँगा। मुनिया! ओ हरिधान! चलो, अब घर चलें। कल सवेरे फिर आएँगे। भैया! तुमसे कुछ कहने लायक तो हूँ ही क्या, पर सदैव मेरा यह आशीर्वाद है कि अपने पिता ही की तरह होओ - और खूब लंबी उमर हो तुम्हारी!'

रमेश उनके साथ काफी दूर तक गया और रास्ते में बोला - 'दया बनाए रखिएगा भट्टाचार्य जी मेरे ऊपर जरा...कहते संकोच-सा मालूम होता है, पर अगर मेरे घर में हरिधान की माँ के चरण पड़ते, तो मैं अपने को धन्य समझता!'

दीनू ने एकदम रमेश के दोनों हाथ थाम लिए और कोमल स्वर में बोला - 'रमेश भैया! नाहक मुझे क्यों लज्जित करते हो! मैं दीन ब्राह्मण हूँ किस योग्य!'

और वे अपने सब बालगोपालों के साथ घर चले गए। रमेश भी लौट कर आ गया। जाते समय वह गोविंद से कुछ कटु शब्द कह गए थे, उनकी याद आते ही वह कुछ कहना चाहता था, पर गोविंद ने बीच में ही कहना शुरू कर दिया। बोले - 'भैया रमेश! तुम हमें जब बुलाते तभी हम आते और सारा काम आप ही करते। अपना ही काम है यह तो!'

धर्मदास, जो अब तक हुक्का ही गड़गड़ा रहे थे, अब लाठी के सहारे खड़े हो कर खाँसते-खाँसते बोले - 'वेणी नहीं हैं हम लोग कि जिसकी पैदाइश का ही नहीं पता! समझे कि नहीं?'

रमेश को धर्मदास की इस भोंडी-गंदी बात ने तिलमिला दिया, पर कुछ कहा नहीं उसने। अब तक वह यह अच्छी तरह से समझ चुका था कि अशिक्षित होने के कारण ही, जो मुँह में आता है, बिना सोचे-समझे ये लोग बक देते हैं।

जब सब चले गए, तो रमेश ने वेणी बाबू के पास जाने की सोची। ताई जी का आग्रह अब तक उसके मन में घुमड़ रहा था। वेणी बाबू के चंडी मंडप में जब वे पहुँचे, तब रात के आठ बजे थे। अंदर से, किसी बात पर घोर विवाद की आवाज सुनाई पड़ रही थी। सबसे तीव्र स्वर गोविंद गांगुली का था। वे पूरे दावे के साथ कह रहे थे - 'वेणी बाबू, मुझे अच्छी तरह मालूम है कि मरते समय तारिणी बाबू ने एक पैसा भी नहीं छोड़ा था और यह जो इतना ठाठ-बाट हो रहा है, तो निश्‍चय जानो कि रमेश ने नंदी की कोठी से, कुछ नहीं तो तीन हजार रुपए तो कर्ज काढ़ा ही है! देखना, हम सबके देखते-ही-देखते, चार दिन में सारी शान न किरकिरी हो जाए तो कहना! भई, जितनी चादर हो, उतना ही पैर पसारना चाहिए, नहीं तो बदन तो उघरेगा ही!'

'गोविंद चाचा, तो फिर पक्का पता लगाना चाहिए इस बात का।' - वेणी के स्वर में उत्साह था।

'देखते चलो! इस बार उस घर में अच्छी तरह मैं स्थान तो बना लूँ, तब फिर...बाहर कौन खड़ा है? रमेश भैया? अरे वाह, इतनी रात गए बाहर? हम सब मर गए थे क्या?'

रमेश ने उनको तो कुछ उत्तर दिया नहीं, आगे बढ़ कर वेणी से कहा - 'मैं आपके ही पास आया हूँ, बड़े भैया!'

वेणी तो हक्का-बक्का हो गए, बोल ही न सके। गोविंद ने ही तुरंत उत्तर दिया - 'हम तो इसीलिए इनको समझाने आए थे कि भाई, तारिणी भैया का झगड़ा उनके साथ रहा, सो वह उनके साथ ही खतम हो गया - अब तो मेल हो जाए तुम दोनों में, तो हम सबको वह शुभ घड़ी देख कर आँखें ठण्डी करने का अवसर मिले! हमें तो आशा थी कि तुम आओगे ही! बड़े भाई भी तो पिता के समान होते हैं...हालदार मामा, तुम्हारी क्या राय है?...पर आप खड़े क्यों हैं अभी तक? बैठिए न, अरे है कोई, एक कम्बल या आसन ला कर बिछा दे यहाँ? वेणी बाबू, आप बड़े भाई लगते है, आप ही इस तरह अलग -अलग रहेंगे, तो फिर काम नहीं चलने का! और फिर अब तो बड़ी माता जी भी वहाँ हो आई हैं, फिर आपको अब क्या...?'

सहसा वेणी चकित रह गए, पूछा - 'अम्मा गई थीं क्या वहाँ?'

गोविंद तो चाहते ही थे कि वे चौंकें। अपनी बात का ठीक असर देख प्रसन्न हुए, पर उस भाव को छिपा कर विस्तार से बोले - 'गई ही नहीं हैं, बल्कि भीतर का सारा काम-धंधा और भण्डार का चार्ज भी ले लिया है उन्होंने। और न लेतीं, तो और कौन आता सम्हालने, भाई?'

किसी ने कुछ भी नहीं कहा। गोविंद ने ही दीर्घ नि:श्‍वास लेकर कहा - 'गाँव भर में उन जैसा तो कोई है नहीं! और न यही आशा है कि कभी हो भी सकेगा। कहोगे कि ठकुरसुहाती कह रहा हूँ - पर बात सच है कि बड़ी माँ जी लक्ष्मी हैं पूरी! सबको ऐसी माँ मिलने का सौभाग्य नहीं होता।' और दीर्घ नि:श्‍वास छोड़ शांत हो गए।

कुछ देर तक सब लोग मौन रहे, फिर वेणी बाबू ने धीरे से कहा - 'अच्छा!'

तपाक से गोविंद फिर उन पर अपनी बात का रद्दा रखते हुए बोले - 'नहीं वेणी बाबू! केवल 'अच्छा' भर कह देने से काम नहीं चलने का। सारा काम आपका इंतजार कर रहा है, चल कर सब सम्हालिए! हाँ भाई, सभी तो यहाँ पर हो, किस-किसको निमंत्रण दिया जाएगा, अभी यहीं बैठे-बैठे क्यों न बना लिया जाए! रमेश भैया, क्या कहते हो - हालदार मामा, धर्मदास भैया, बोलो न! क्या राय है तुम सबकी? आप लोग तो बता सकेंगे कि किसको बुलाया जाए किसको नहीं?'

रमेश ने अनुरोध के स्वर में कहा - 'मेरा परम सौभाग्य होता, बड़े भैया - यदि आप एक बार मेरे घर...'

'जब अम्मा हो आई हैं, तब मैं जाऊँ या न जाऊँ - गोविंद चाचा, क्या राय है तुम्हारी?'

रमेश ने गोविंद को कुछ कहने का अवसर न दे कर कहा - 'मैं आपको अधिक कष्ट तो नहीं देना चाहता भैया! सिर्फ एक बार, अगर विशेष कष्ट न हो, तो देख-भाल आइएगा!'

गोविंद कुछ कहना चाहते थे। पर बिना कुछ सुने ही रमेश वहाँ से चल दिया। उनके जाने के बाद गोविंद ने बाहर जा कर देख लिया कि दरअसल वह चले गए कि नहीं, फिर आ कर बोले - 'देखा आपने, ढंग-डौल, वेणी बाबू?'

वेणी उस समय कुछ और ही सोच रहे थे। गोविंद को उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।

गोविंद की पहली बातें भी रमेश ने सुन ली थीं और उसके पहुँचने पर उसने जो बातों का रुख पलटा था - वह भी देखा था, तभी उनका मन मारे घृणा के भर उठा था। जाते समय यही सोचते हुए वह अब आधी दूर निकल आया, तब वह वहाँ से फिर लिया। उस समय भी वहाँ खूब जोर से बातें चल रही थीं। पर अब के वहाँ खड़े हो कर सुनने की इच्छा न हुई। सीधे अंदर घुसते चले गए और अंदर जा कर ताई जी को पुकारा।

उस समय ताई जी अकेली, चुपचाप, अँधेरे में, सामनेवाले बरामदे में बैठी थीं। रमेश की आवाज ने उन्हें चौंका दिया, बोलीं - 'इतनी रात को कैसे, बेटा?'

रमेश पास पहुँच गया तो उन्होंने कहा - 'रुको, मैं किसी से रोशनी लाने को कह दूँ!' पर रमेश दीया लाने को मना कर, वहीं बैठ गया।

ताई जी ने फिर अपना प्रश्‍न उठाया - 'इतनी रात में कैसे आए, बेटा!'

रमेश ने सहज सरल स्वर में कहा - 'निमंत्रण नहीं दिया है अभी तक किसी को, उसी बारे में पूछने आया हूँ।'

'यह तो बड़ा विकट काम है। अच्छा! गोविंद वगैरह सब लोग क्या कहते हैं?'

'मैं तो आज जो आप कहेंगी सो करूँगा! न मैं जानता हूँ और न जानना ही चाहता हूँ कि वे लोग क्या कहते हैं?'

रमेश के स्वर ने उन्हें विस्मय में डाल दिया, कुछ देर बाद बोलीं - 'तब तो कहते थे कि इस समय यही तुम्हारे सब कुछ हैं। खैर, छोड़ो, उस बात को! हम औरतों की भला उस मामले में क्या चलेगी? यहाँ तो सभी जगह यही खटराग है कि यह वहाँ नहीं खाता, तो वह यहाँ नहीं खाता! यही सबसे बड़ी मुश्किल अटका करती है, हर काम के समय।'

रमेश ने भी दो-चार दिन में ही जान लिया था कि कैसी-कैसी बातें उठती हैं यहाँ पर। पूछा उन्होंने - 'ऐसा क्यों होता है, ताई जी?'

'यहाँ रहने पर सब समझ लोगे! यहाँ बात-बात में झूठे-सच्चे दावेदार बन कर अदालत-कचहरी तक होती है। यही राग चलता रहता है, बेटा! अगर मैं पहले से तुम्हारे यहाँ पहुँच जाती, तो कभी इतना तूल न करने देती। अब तो यही चिंता है कि श्राद्ध के दिन क्या होगा!'

रमेश ताई जी का मंतव्य समझ न पाया, उद्विग्न हो बोला - 'पर मुझे इन दलबंदियों से क्या मतलब? अभी कल तो मैं आया हूँ, यहाँ मेरी किसी से क्या दुश्मनी है? इसलिए मैं इन दलबंदियों का विचार न कर, सभी ब्राह्मणों और गरीब शूद्रों को न्यौता दूँगा। पर आपकी आज्ञा तो लेनी होगी।'

कुछ देर तक सोचते रहने के बाद ताई जी ने कहा - 'मैं तो कुछ भी नहीं कह सकती इस तरह से! कहूँ भी तो बड़ी हाय-तौबा मच जाएगी। पर इसके ये मानी नहीं कि तुम गलत कहते हो! तुम्हारा कहना भी ठीक है, पर इतने भर से ही काम नहीं चल सकता। जिसे समाज ने अपने से अलग कर दिया है, तो उसे नहीं बुलाया जा सकता। समाज का किया - चाहे गलत ही हो - मानना होगा! न मानने से तो समाज चल ही नहीं सकता!'

इस समाज के कर्णधारों की उच्चता का परिचय रमेश को अभी-अभी बाहर की घृणास्पद बातों से मिल चुका था, जो उन्हें विशेष ग्लानि से अभिभूत कर रहा था। उन्हों उसी आवेश में कहा - 'यहाँ के समाज के कर्णधार यदि धर्मदास और गोविंद ही हैं, तो उसमें सचमुच ही किसी तरह की शक्ति न रहे, तभी अच्छा है!'

उनके आवेश को देख कर ताई जी ने संयत-शांत स्वर में कहा - 'इनके अलावा, तुम्हारे बड़े भाई भी उसी समाज के प्रमुख अंग हैं।'

रमेश ने इसका कोई उत्तर न दिया। ताई जी ही बोलीं - 'इन लोगों की राय से काम करना ही ठीक होगा, रमेश!'

उन्होंने तो अपने जाने काफी दूर की बात सोच कर ही कही थी, पर रमेश अपने आवेश में उसे समझ नहीं सका। बोले - 'मेरा यहाँ किसी से भी, किसी प्रकार का द्वेष भाव नहीं है। अभी आप ही ने कहा कि यहाँ दलबंदियाँ हैं, जिनका मेरी समझ में मुख्य कारण व्यक्तिगत द्वेष ही है। फिर भला मैं कैसे किसी को न्यौते से अलग कर सकता हूँ?'

ताई जी ने जरा हँसते हुए स्वर में कहा - 'मैं भी तो कुछ तेरी भलाई सोच कर ही कह रही हूँ। तेरी माँ की जगह हूँ मैं! मेरी बात न मानना भी तो ठीक नहीं!'

'पर मैं तो सभी को बुलाने का निश्‍चय कर चुका हूँ।'

ताई जी ने खिन्न होकर कहा - 'तब तो फिर मेरी आज्ञा लेने नहीं आए, सिर्फ मुँह-दिखावा ही करने आए हो!'

रमेश ने उनके स्वर से समझ लिया कि वे खिन्न हो गई हैं। पर अपना निश्‍चय नहीं छोड़ा उन्होंने। बोला - 'मुझे तो आशा थी कि मेरा जो काम ठीक होगा उसे आपका आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होगा पर...।'

बीच में ही ताई जी ने कहा - 'पर तुम्हें यह भी तो सोचना चाहिए था कि मैं अपनी संतान का विरोध नहीं कर सकती!'

रमेश इस चोट से विह्‍वल हो उठा। कल से वह ताई को हर मायने में अपनी माँ ही मानने लगा था, पर यह सत्य है कि उससे पहले और अधिक गहरा स्थान उनकी संतान ने उनके हृदय में बना रखा है और यह विचार उसकी आशा पर आघात करने लगा। थोड़ी देर मौन रह कर, उठ कर खड़े होते हुए उन्होंने कहा - 'मैं यह जानता था, तभी कहा था कि मेरे किए जो कुछ हो सकेगा, अपने ही आप कर लूँगा! आप कष्ट न करें! आपको बुलाने का दुस्साहस नहीं किया था मैंने।'

ताई जी सुन कर मौन रहीं। जब रमेश उठ कर जाने लगा तब बोलीं, 'तो फिर अपने भण्डार की ताली भी लेते जाओ, बेटा!'

और ताली ला कर उन्होंने रमेश के पैरों पर फेंक दी। रमेश स्तब्ध खड़ा देखता रहा। थोड़ी ही देर बाद ताली उठा कर धीरे-धीरे बाहर चले गए। कुछ घण्टे पहले ही उनके दिल ने कहा था - 'अब किसी बात का डर नहीं, ताई जी सब सम्हाल लेंगी!' पर एक रात न बीती कि उसी दिल को एक ठण्डी आह भर कर कहने पर विवश होना पड़ा - 'नहीं, नितांत अकेला हूँ मैं! कोई नहीं है इस संसार में मेरा! ताई जी भी नहीं!!!'