देह-दंश / दयानंद पाण्डेय

Gadya Kosh से
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प्यार के पहले पहर में भी मनुहार की नायिका नहीं थी वह।

क्योंकि देह भी वह राजनीति ही की राग में भोगता था। वह नहीं जानता था कि देह के देश में एक तार हमेशा ही अपरिभाषित होता है। लेकिन बजता है सितार की तरह, सारंगी की तरह, वीणा, बैंजो और गिटार की तरह। मन के कोने में कहीं संतूर की सी मिठास की तरह, भीमसेन जोशी के किसी आलाप की तरह नेह का कोई धागा कहीं गुंथता है, कहीं गूंजता है तब ही देह, देह होती है, देह का संगीत बजता है।

जो तार इस देह संगीत को सुर में बांधता है उसे हम सिर्फ प्यार नहीं कहेंगे। देह का नेह और दुलार भी नहीं कहेंगे। कोई मौन सा, मनुहार सा शब्द भी इस देह संगीत के नेह को नमस्कार कह देगा जो हम इस अपरिभाषित तार को परिभाषित कर दें, कोई शब्द दे दें। जिस दिन दे दिए कोई शब्द, दे दी कोई परिभाषा तार टूट जाएगा, देह संगीत थम जाएगा। देह का नेह नत होता जाएगा। और फिर मेघ नहीं बरसेगा।

मन का मेघ।

राजनीति के जिस गलियारे से वह गुजरता हुआ मुझ तक, मेरी देह तक पहुंचा था यह उस का कोई पहला पड़ाव नहीं था। उस के लिए देह का अर्थ देह नहीं था, मन का मेघ नहीं था, वह नहीं जानता था देह संगीत। तो क्या उस अपरिभाषित तार का कोई तंतु भी उस के मन में नहीं था?

भला कहां समाता?

देह तो उस ने बहुतेरी देखी थी । वह कहता, ‘राजनीति का बियाबान बिना देह के धांगा जा सकता है क्या? आख़िर दिन भर की सारी थकान कहां उतारी जाए? सिर्फ दारू पर? नहीं। दारू और देह दोनों ही चाहिए। नियमित नहीं, न सही, अकसर तो चाहिए ही। पर क्या यह देह, दारू का संयोग सभी राजनीतिज्ञों के नसीब में है? अरे नहीं!’ वह कहता और ठहाके लगाता।

वह दारू के दो चार ख़ुराक लगाता, मेरी देह ‘धांगता’, ठीक अपनी राजनीति की तरह और ध्वस्त हो जाता अपनी थकान मिटाता हुआ, मेरी थकन की परवाह किए बिना। थकन जो कभी बुझती नहीं। वह तार जो कभी बजता नहीं।

वह अपने गले का हार छूती है। सोचती है क्या इसे भी वह फेंक दे जैसे सुबह कूड़े में उस के गले के फूलों वाले हार फेंक देती है कभी कभार। पर वह अपने इस हार का क्या करे। इस थकन और इस हार का क्या करे जो उस की देह में बजा ही नहीं, मन में बसा ही नहीं, किसी बरसात में बजा ही नहीं, बसा ही नहीं। बरसा ही नहीं वह आकुल मेघ जो वह व्याकुल धरती की तरह समेट लेती, अपनी देह में दबोच लेती। वह तो दो देशों में बंट गई थी, जैसे धरती किसी और देश में हो, मेघ किसी और देश में। दोनों ही जब भी उस से मिले परदेस के पांव छूते मिले। राजनीति और कला की तरह।

जाने किस घड़ी में उस ने वह वंदना गाई। क्या वह वंदना ही छल थी? या कि मेरी गायकी ही, गायकी का नेह ही, गायकी में बरसता मेह ही मुझे छल गया? कि मेरा रूप, रंग और लावण्य ही इतना छलक गया कि मुझे छल गया? कि छल गई भातखंडे की पढ़ाई? न पढ़ती, न वंदना गाती, न छली जाती। और फिर क्या देह का संगीत भी जान पाती? और उस तार को? उस अपरिभाषित तार को जो देह में कभी बजता है तो कभी डोलता है!

हां, अब तो डोलता है, बजता नहीं। नहीं बजता वह अपरिभाषित तार। नहीं धड़कता दिल। और नहीं बोलती यह देह भी। बाजे बिन बोले कैसे?

बोला था उस दिन वह। कार्यक्रम का उद्घाटन भाषण राष्ट्रपति अंगरेजी में पढ़ चुके थे। हिंदी अनुवाद चल रहा था। राष्ट्रीय संग्रहालय के उस समारोह में हम लड़कियां भी जैसे संग्रहीत हो गई थीं। सारी पुरुष आंखें हमारी लाल बार्डर वाली सिल्क साड़ियों को जैसे भस्म कर देह की एक-एक देहरी देख लेना चाहती थीं कुछ ऐसी भी आंखें थीं जो सिर्फ हमें देख कर आंखों में यूरिया भरते रहे थे और बाहर जा कर आह भी भरी। पर वह बाहर नहीं गया। उस आई॰ए॰एस॰ अफसर के साथ आया जो सांस्कृतिक कार्य विभाग का निदेशक था। हमें इस समारोह में समारोह पूर्वक बुला लाया था। इस विधुर निदेशक के अपने कई किस्से थे पर फिलहाल वह मुझे किस्सा बनाने पर आमादा था। उस ने बताया, ‘यह विधायक जी हैं।’ किसी राजनीतिक से इस तरह यह मेरा पहला व्यावहारिक परिचय था। वह मिश्रा था और मैं पाठक। बात उसे कुछ जम गई और मैं नहीं जान पाई। भातखंडे वापस आ कर ‘‘हम होंगे कामयाब एक दिन’’ के रिहर्सल में समा गई। वह मेरे डॉक्टर पिता से मिला। अकसर मिलता रहा। दो चार महीने इलाज का फितूर बांधे रहा। और मैं रिहर्सल में जूझती रही, ‘या कुंदेंदु तुषार हार धवला। या शुभ्र वस्त्रवृता....। या वीणा वरदंड मंडित करा या श्वेत पद्मासना....’ तब क्या ख़बर थी कि वीणा तो अब बंधने वाली है। तब तो गजल का सुरूर था, ‘क्यों इशारों से बात करते हो साफ कह दो कि हम तुम्हारे हैं।’ ताल की निबद्धता इतनी नीरवता में नचाएगी, नहीं जानती थी। नहीं जानती थी, ‘आंखों ने तो काम किया है काजल क्यों बदनाम हुआ है।’ को बांचना अब बाउर हो जाएगा। और सच उस ने ऐसा बाउंस मारा कि क्षण भर को तो मैं बउरा ही गई। और पिता? पिता क्या घर में सभी बउराए हुए बता रहे थे, ‘मिनिस्टर बनने वाला है।’ मैं ने भी तभी जमा लिया मन में कि, सांस्कृतिक मंत्री। तब क्या पता था उसे संस्कृति से भी सरोकार नहीं था। सांस्कृतिक होना तो बहुत दूर की कौड़ी थी। वह तो जुलूसों, रैलियों, पोस्टरों परचियों का मारा था। भाषणों का भूखा, मिनिस्टरी की मनौती में मरता वह कितनों को राजनीतिक मौत सुला चुका था इस का भाष्य बताता, वह मुझे बाहों में भरता नहीं था, दबोचता था। वह मुझे समेटता नहीं, धांगता था। धांगता और दुत्कार देता। दारू में धुत्त धुन देता। अकसर नहीं, कभी-कभी। एक रोज उसे ज्यादा नहीं चढ़ी थी, शायद बीयर में था और खीझा हुआ भी। बोला, ‘तुम्हारे पिता प्रमथ नाथ पाठक अगर डॉक्टर नहीं पटवारी होते तो?’

‘तो क्या? मुझे नहीं किसी और को धांगते। बांध लाते रूप से सराबोर किसी विष बाला को और बदल देते उसे हिम बाला में।’

‘ज्वाला नहीं बनो मेरी कोकिला।’ वह बोला, ‘पहली बात पर आओ पटवारी पुत्री। पहली बात पर।’

‘बोलो भाषण बिहारी।’

‘पटवारी पुत्री होती न तुम, तब भी तुम्हें मैं धांगता। धांगता ख़ूब धांगता, पर बांधता नहीं क्यों कि मेरी कुंडली में तुम लिख गई थी। आंखों की कुंडली में तुम बिंध गई थी....। फिर उस ने उस रोज विस्तार दिया था अपनी आंखों की कुंडली का, ब्यौरा दिया था कि कितनी देह देहरियां उस ने लांघीं, धांगी पर बांधीं नहीं। यह सब बताते हुए वह यह भी बताता गया, आज की राजनीति की राह में यह रंग भी जरूरी है। नहीं कैसे कटेगा जीवन?’

उसी रोज उस ने फैसला किया था और उस से कह दिया था कि, ‘मुख मैथुन अब बंद! आख़िर जो देह इतनी धुरियों में नाची हो वह मेरी देह में कैसे डोलेगी?’ उस ने कहा था, ‘मुख में तो कतई मंजूर नहीं।’

‘चल हट्ट।’ वह बोला था और बाहर जा कर पी॰डब्ल्यू॰डी॰ के किसी ठेकेदार से टेंडर-वेंडर करने लगा था। उस की बातों में कहीं देह गंध भी तिरने लगी थी। फिर थोड़ी देर बाद कार स्टार्ट होने की आवाज आई।

आवाज तो यहां इस देह में भी गुनगुनाई। पर गूंजी नहीं। कुनमुनाई। वह तार बिन झंकार के झांय-झांय करता रहा। सुबह नहीं भोर के सन्नाटे में वह पलटा पर बेसुध हो कर अक-बक बड़बड़ाता हुआ। बखान करता हुआ जिस का मुंह मार कर वह आया था। बखिया उधेड़ता हुआ मेरी कि, ‘बड़ी पवित्रा बनती है साली पति से ही। कलाकार क्या अइसे ही बन गई होगी? हुंह! मुंह में नहीं....। कहती है साली। पटवारी की पोती! पोतड़े बांध के आई है। हरामजादी!’

बाबा उस के पटवारी रहे थे।

सुबह उस के खर्राटे चल रहे थे और एक पत्रकार परची पर परची भीतर खोंसे जा रहा था। नहीं माना इंटरकाम पर जूझ गया हम से, भाई साहब ने हमें ख़ुद बुलाया था। बिलकुल सुबह। अब तो आठ बज रहे हैं। वह बोला, ‘हाऊस नहीं जाएंगे क्या? अरे, बहुत जरूरी बात थी।’

पत्रकार की आकुलता बूझ कर बाहर आ गई। क्या ख़बर थी कि यह वही होगा जो यूनिवर्सिटी में साइकिल दौड़ाए लड़कियों से फोटुएं मांगता रहता था, विचार पूछता रहता था और हबड़-तबड़ में नोट कर हांफता हुआ किसी और के पीछे भाग लेता था यह कहता हुआ, ‘जब छपेगा तो बताऊंगा।’

धीरे-धीरे वह लंबा परिचर्चाकार हो गया।

फिर भातखंडे संगीत महाविद्यालय में वह एक रोज अचानक अवतरित हुआ, ‘पहचाना नहीं?’ कहते हुए बोला, ‘पुलिस लाइन में आप का परफार्मेंस बहुत अच्छा लगा था। तभी सोचा आप से बात करूं। संकोच कर गया। पर कल टी॰ वी॰ पर राष्ट्रीय कार्यक्रम में आप छा गईं। मजा आ गया। एक बढ़िया इंटरव्यू करना चाहता हूं। दो तीन रोज वह आता रहा इंटरव्यू के ब्यौरे बतियाने। गायकी के गांव से कोई नाता तो दिखा नहीं उस का, उस की बातचीत में पर बात वह शऊर से करता रहा तो बतियाती रही। सितार वाली सरोज बोली थी, ‘वह संगीत नहीं संगत चाहता है तेरी।’ ‘जी नहीं, आंखों को बस यूरिया ही मिलती रहे बहुत है अपने लिए।’ कह कर वह चला गया।

फिर नहीं आया। इंटरव्यू भी जो वह ले गया, फोटो भी, कुछ भी कहीं नहीं छपा। नहीं आया फिर अपनी आंखों को खाद देने, अपनी आंखों में यूरिया समेटने।

ढेर सारे कागज समेटे वह आया तो फिर विधायक/चेयरमैन निवास ही में। और विधायक जी समय दे कर सो रहे थे। मुंह बाए।

क्या किसी महिला मुंह की आस में?

पत्रकार मुझे यहां देख कर चकराया। चकराया मेरी गदराई देह-देख कर। चकराया उस बिन छपे इंटरव्यू के संकोच को सोच कर। चकराया वह मेरी उनींदी आंखें देख कर। वह चौन्हाया मेरी यहां उपस्थिति पा कर। यूरिया के यूज में नहीं पोटाश की पिनक में, पांव से अपनी चप्पलों की उधड़ी सीवनें ढांपता हुआ, मेरी देह की सीवनों को झांकता और आंखों में बांटता हुआ। गोया कोई अपराध कर दिया हो उस ने। बोला, ‘शर्मिंदा हूं। वह इंटरव्यू न छप पाने पर। तब के संपादक ने छपने नहीं दिया था।’ कह कर जैसे वह कहीं छुप जाने की जगह खोजने लगा। और मैं ने देखा वह छुप गया विधायक जी की बाहों में। विधायक जी की नींद टूट गई थी। और वह कुम्हलाया-कुम्हलाया सा पत्रकार हरियरा गया था। मेरी उपस्थिति को वह बेशर्मी के एक ही घोंटे में पी गया था।

‘भाई साहब।’ वह बोल रहा था, ‘बड़ी देर से दर्शन के लिए बैठा था।’

‘बैठे तो बहुत हैं बाहर लॉन में। पर आप आज चलो। फिर बताएंगे।’

‘और वह ख़बर? भाई साहब हाऊस में हंगामा न करवा दूं तो कहिएगा।’

‘कौन सी ख़बर?’

‘अरे वही पी॰ डब्ल्यू॰ डी॰ वाली भाई साहब।’

‘ऐसा है। इसे आप जाओ भूल। मेरे एक आदमी का काम एक तो बन गया है दूसरे, पी॰ डब्ल्यू॰ डी॰ मिनिस्टर भी अब अपने यार हैं। सो आप इस को तो छोड़ दो।’

‘लेकिन भाई साहब!’

‘देखो भाई आप मेरे शुभचिंतक तो हो ना। हो ना। तो क्या चाहते हो जिंदगी भर इस टुटपुंजिए कारपोरेशन की चेयरमैनी में गुजार दूं। चुनाव जीत कर आया हूं तो चेयरमैनी नहीं मिनिस्टरी का मन बना कर आया हूं। आप भी जाओ माहौल बनाओ एक्सपेंशन होने वाला है। आप ही को सिर्फ पता है। स्कूप है स्कूप। जाओ आज यही छाप मारो।’

‘पर भाई साहब! यह तो आज के एक अख़बार में छप गया है।’

‘तो आप फालो-अप करिए जी। अंदाजा लगाइए कौन-कौन मंत्री! मेरा भी नाम। समझे।’

‘जी भाई साहब।’ पत्रकार चहका।

‘हां भाई, मुख्यमंत्री खुद फोन पर थे। रात दो बजे। कोई पी॰ ए॰, सी॰ ए॰ नाहीं।’

‘तब तो परफेक्ट ख़बर है भाई साहेब।’

‘तब?’

पत्रकार विधायक जी से हाथ मिला कर चला गया। मुझ से कोई औपचारिकता भी वह भूल गया। खिड़की से देखा वह खटारा साइकिल पर नहीं स्कूटर पर था।

स्कूटर नई थी।

पर रात दो बजे मुख्यमंत्री के फोन वाली बात? यह तो रात दो बजे किसी के मुंह में रहा होगा। फिर मुख्यमंत्री का फोन?

यह कोई नई बात नहीं थी उस के लिए।

‘जल्दी ही दौरा बना रहे हैं....

‘जी नेता जी बड़ा जरूरी हो गया है।’

‘घबराइए नहीं राय साहब आप के स्कूल के अनुदान वाली फाइल भी करवा दी है....।’

‘लेकिन विधायक जी वो मिट्टी वाला ठेकवा....।’

‘अब जाइए भी राय साहब मिट्टी का ठेका! अरे स्कूल का ठेका कम पड़ रहा है। क्यों?’

‘अरे नहीं लेकिन त।’

‘त जाइए भी।’

‘विधायक जी थानेदार बड़ा सरकस आ गया है। हटाना पड़ेगा। और अबही तो चलना ही पड़ेगा। ब्लाक प्रमुख यादव जी को धर लिया है। छुड़ाना नितांत जरूरी है।’

‘अरे थाने-थाने ही हम को घुमाते रहना चाहते हैं। अइसे ही आप लोग हमारा पत्ता कटवा देंगे। जानते नहीं हैं एक्सपेंशन की हवा है। और मुख्यमंत्रिया हम को रेतने पर लगा है। हम इहां गोट बिठा रहे हैं अउर आप थाने में ही पिट पिटा रहे हैं। अरे जाइए सचिवालय। कुछ लाबिंग वाबिंग करिए। हवा बनाइए। हम को भी अभी हाऊस जाना है। नहाना धोना है।’

यह प्रातः दर्शन था।

आया नहाया, धोया। नींबू पानी ले फिर मुंह बा गया। पी॰ ए॰ ने बताया, ‘सर हाऊस।’ तो गुर्राया, ‘स्साला ई हाऊस नहीं तो क्या जहन्नुम है। अरे लंच बाद देख लेंगे हाऊस भी। आज कारपोरेशन नहीं जाएंगे। समझा!’ कह कर वह मुंह बा गया।

फोन घनघनाया।

‘सर आप सदन आ जाते। मंत्री जी चाहते थे।’ ‘अरे भाई तिवारी तुम तो जानते हो जीरो आवर्स की जमात का जवान हूं। बजट विद्वान नहीं। विद्वानों को बजट बजड़ने दो। आ जाएंगे देर-सवेर हम भी। दस्तखत तो करि जाएंगे। सोने दो भई अभी । रात बड़ी देर क्षेत्र से आया हूं और मुंह बा गया।

नाक बज गई।

पर देह नहीं।

पर इधर दिन में ही देह में संगीत सिर उठाए पड़ा है। किसी पोर में बांस बजता है तो किसी कोर में तसला। बांस का संगीत बांसुरी का गीत नहीं बन पाता।

तसले का संगीत वह ताव, वह तेवर नहीं बीन पाता जो देह से बिसर गया है, देह के गांव से बिछड़ गया है। दूर हो गया है। बहुत दूर। ठीक वैसे ही जैसे उस से उस की मिनिस्टरी और मुझ से मेरी गायकी। उस की मिनिस्टरी का मान और मेरी गायकी की राह क्या एक नहीं हो सकती। सज नहीं सकती उन राहों के रंग में हम दोनों की देह देहरी। तसले बांस का रूपक, वीणा, बांसुरी का क्षेपक, सारंगी, सितार और संतूर का शहद हमारी देह पर काहें नहीं गिरता। बैंजो, गिटार की बिजली आख़िर कब गिरेगी हमारे मन पर कि दोनों के नेह बटुर जाएं और परोस जाएं एक अप्रतिम संगीत। रच जाएं कोई अविस्मरणीय गीत। गीत जो मन गा सके। संगीत जो देह बजा सके। पर वह तो देह का दंगल ही जानता है। संगीत के किसी सिरे की समझ भी नहीं सिसकती, थिरकती उस के मन के किसी कोर में, देह के किसी पोर में। वह तो बस पसर जाता है तो पसर जाता है कला और राजनीति के जंगल में मुंह बाए, मुंह की तलब में तैर जाता है वह और उस का मन।

वह सोचती है जीवन का रंग इतना बदरंग क्यों है? वह भी बहना चाहती है इस रंग में। क्या? हां। देह की दाहकता दूह लेती है। सारा देह संगीत और देह दंगल में कूद लेती है वह भी। देह के गांव से वह देह के देश में आ कर धंस जाती है पर कहीं किसी बांस की फुनगी पर, कहीं किसी वीणा के तार पर, बांसुरी की राग पर, सितार, सारंगी और संतूर के किसी भाग पर तबला तल्ख़ हो गया है। हारमोनियम हार गई है। बैंजो और गिटार गीत गाना बिसार गए हैं। तसले का संगीत सिर्फ बाकी है सच, मन बड़ा एकाकी है। लेकिन बांस की फुनगी उसे फाड़ रही है। और वह है कि देह को निभा रही है, दंगल में दौड़ रही है, दौड़ा रही है। देह के देश में है अब वह। देह की दुनिया में जाग रही है। पीपल के पत्तों की तरह, प्याज की परतों की तरह, किसी अख़बार में छपे कोलाज की तरह वह अपनी ही देह में भाग रही है। अनथक। देह संगीत बिसार वह देह का बिगुल बजा रही है। ‘विधायक जी!’ वह बुदबुदा रही है कि, ‘वह अपरिभाषित तार अभी भी अपरिभाषित है। नेह और मन के मेघ के मनुहार में मूर्छित। मान मर्दित मुंह की सांस में आहत आंखों की आस में गदराई देह के वनवास में। राजनीति और कला के जाल जंजाल रूपी फांस में।’

लेकिन उसे तो जाल नहीं लंगर चाहिए। ऐसा लंगर जो मंत्री पद की ठांव में उस की नाव बांध सके। लेकिन मंत्री बनाने वाला मुख्यमंत्री ही उस की फांस बना पड़ा है। क्या वह मुख्यमंत्री पद की ही लड़ाई शुरू कर दे? कि मुख्यमंत्री ही को गिराने की लड़ाई लड़नी होगी उसे। मुख्यमंत्री मान गया तो मान गया नहीं, कुछ तो करना ही पड़ेगा। कारपोरेशन की चेयरमैनी की ऐसी-तैसी। इस्तीफा दे दे क्या? सक्रिय राजनीति की मुहर मार ले? पर जो असंतुष्ट घोषित कर दें सब तो? तो मंत्री पद तो गया बूझिए।

‘सबर से, समझ से काम लें श्रीमान।’ कोई सलाह दे रहा है, ‘घबराने से तो कार्य चलता नहीं। धीरज-धीरज।’ वह बता रहा है। बता रहा है टेलीफोन से। नहीं यहीं बंगले के ताड़ वाले पेड़ पर लटका देता साले को श्रीमान धीरज रखिए, धीरज को।

हद है चेयरमैनी के चांस पर यह बंगला कब तक कब्जे में रहेगा भाई। बंगले को रोकने ही के लिए सही मंत्री पद तो अवश्य। अवश्य। नहीं तो असंतुष्टई से काम नहीं चलने वाला। ई कला साहित्य तो है नहीं कि राग रचना है, रचना करनी है। राजनीति है, राजनीति। राज करना है, रचना नहीं। रचना ही जो कुछ है तो ब्यूह कि मुख्यमंत्री साला फंसे, चाहे मरे। दिल्ली से आई सूची में हम को भी समझ ले। समझ ले नहीं साले की ख़ैर नहीं। स्कूप पर स्कूप प्लांट करूंगा। साला पट्ट हो जाएगा। और जो पट जाए तो बात ही क्या। हम मंत्री ऊ मुख्यमंत्री। फीता उहो काटेगा और हम भी। ऊ बड़ा फीता, हम थोड़ा छोटा। अध्यक्षता हम, उद्घाटन ऊ। पत्थर पर नाम दोनों का। कमीशन उस का, टेंडर हमारा। बंगला हमारा। नहीं तो झेलेगा साला बाउंस हमारा।

विधायक जी सोच रहे हैं। सोच रहे हैं और विधान सभा जा रहे हैं। विचार यह भी गूढ़ है कि वह पहले सदन में जाएं कि एनेक्सी में ही मुख्यमंत्री को नमस्कार कर लें। और जो मुख्यमंत्री विधान सभा में हुए तो? हुंह! वहां कौन क्या करेगा। ऊ तो साला बजट बड़बड़ाएगा। बड़बड़ाएगा बढ़िया बजट। बढ़िया मंत्रिमंडल नहीं बताएगा। हम जो नहीं हैं मंत्रिपरिषद में। तो मंत्री तो बनना ही पड़ेगा। बढ़िया मंत्रिमंडल सदन में कह सकें मुख्यमंत्री, सो शपथ तो स्वीकारनी ही पड़ेगी। पर क्या स्वीकारेंगे वह भी मुझे मंत्री परिषद में? महामहिम की शपथ वाली सूची में नाम होगा हमारा? कट तो नहीं जाएगा जातियों, घटकों के गठजोड़ में। गांठ नहीं पड़ जाएगी। इस से तो अच्छा होता संसद की ही सीट लड़वाए होते। ऐसे ही मारे-मारे फिरते रहते। पी॰ एम॰ हाऊस से फोन आता, ‘पी॰ एम॰ मिलना चाहते हैं।’ वह सोचते हैं और जोड़ते हैं, ‘पी॰ एम॰ भोज भी तो देते रहते हैं। और यहां?’

यहां तो खुद ही चौखटा दिखाओ। दांत निपोरो। चले आओ। वहां फोन आता है, ‘पी॰ एम॰ मिलना चाहते हैं। यहां हमहीं फोन करते हैं, ‘हम मिलना चाहते हैं।’ ससुरा कोई सुनगुने नहीं देता है।

उल्लू का पट्ठा साला।

वह सोच रहे हैं। सोच रहे हैं कि जब खुद मुख्यमंत्री बन जाएंगे तो सभी विधायकों को फोन पर खुद बताया करेंगे, ‘हम मिलना चाहते हैं।’

पर कब होंगे मुख्यमंत्री?

‘अभी तो मंत्री पद ही में मार-पीट पसारे पड़े हैं ससुरे जाहिल।’ वह ख़ुद ही से कहते हैं।

देह और राजनीति के दोआबे का यह निवासी नत है मंत्री पद के आगे। और देह की दाहकता में दग्ध गायिका बालिका? उस का तो मन तीर बन गया है और देह धनुष। धनुष सी खिंच गई है वह। पर तीर है कि चल नहीं रहा है। सध नहीं रहा है। वह साध्वी भी तो नहीं है कि सध ही जाए। वह तो तीर भी है, धनुष भी, खुद में ही बिंधी हुई, विंध्याचल बनी खुद को बेधती हुई। बिदकती हुई। देह तृष्णा में निष्णात। नैवेद्य बन कर वह चढ़ना चाहती है किसी पुरुष रथ पर। पूरे मनोयोग से हांकना चाहती है वह पुरुष रथ! रथ के रंज वह खुशी के रंग में डुबो देना चाहती है। रंग ही देना चाहती है कबीर के रंगरेजवा की तरह। बीन ही देना चाहती है प्यार की झीनी-झीनी चदरिया। फिर वह ख़ुद ही से पूछ भी लेती है, ‘कहीं’ देह की तो नहीं?’

नहीं।

वह झीनी-झीनी बीनी चदरिया गुनगुनाती है बिलकुल मन के स्तर पर। फिर बुदबुदाती है। रंगरेजवा से रंगवानी तो पड़ेगी। और जो कहीं रंग सुर्ख़ चटक हुआ तो देह पर जरा देर डाल लेगी तो कबीर का क्या बिगड़ जाएगा। देह के किसी पोर का चोर उस के मन की कोर क्यों रह-रह चीर देता है। चीरता रहता है। देह भी धागा क्यों नहीं बन जाती, बन जाती तो तन मन दोनों ही बीन डालती। वह गुनगुनाती जा रही है, ‘झीनी-झीनी’ बिलकुल ‘झनक-झनक’ की तर्ज् पर, ‘झनक झनक तोरी बाजे पायलिया।’ उस का संत्रास ही यही है कि वह बाजती नहीं है। उस की देह में संगीत के सुर क्यों नहीं फूटते। क्यों नहीं रिझते उस के मन के फूल देह के भगोने में। आकुल मन, व्याकुल तन के तार क्यों नहीं एकमेव बन लेते? शार्ट शर्किट का ख़तरा है क्या? इस लिए? पर हियरा में क्या कम आग लगी है जो शार्ट शर्किट का डर दबोचे बैठा है। तो क्या राजनीति और देह के तारों में शार्ट शर्किट के योग नहीं बनते? बनते तो वह विधायक कैसे बनता। बनता कैसे कारपोरेशन चेयरमैन। पर मंत्री क्यों नहीं बन पा रहा? क्या शार्ट शर्किट हो गया है। देह और राजनीति का द्वंद्व मुखर हो गया है?

शायद नहीं।

यह तो अपने मन को समझाने की बात करती है तू। ‘झीनी-झीनी’ भी ‘झनक-झनक’ में झाड़ देती है। झाड़ देना चाहती है ‘झीनी-झीनी।’ मिल वाली चदरिया ज्यादा मुफीद पड़ने लगी है। तो यह गायकी और जीवन का गैप भर नहीं है। यथार्थ है यह। झीनी-झीनी गाने के लिए ठीक है पर बिछाने-ओढ़ने के लिए मिल वाली ही ठीक है। चदरिया!

पर झीनी-झीनी अकारथ में तो नहीं गाती वह। देह और मन के तार ही नहीं झुलसाती। झुलसती देह को शांति मिलती है ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ गा कर। पर यहीं वह बेबस भी हो जाती है। निर्वस्त्र बेबसी। झुलसती देह फिर सुलग जाती है। कबीर भी तो भगवान ही से मिलने के लिए यह गाते बजाते, बताते थे। पर तू किस से मिलना चाहती है?

किसी पुरुष रथ से?

पुरुष रथ, जिस के तार इतने दग्ध हों और खुले कि शार्ट शर्किट हो जाए। शार्ट शर्किट हो जाए और आग लग जाए। आग इतनी लग जाए की भीतर की आग समाहित हो जाए। और हांक दे पुरुष रथ। शांत हो जाए तन भी, मन भी। फिर चलें कबीर साहब के दरबार में ‘झनक-झनक’ को झटक कर। झीनी-झीनी को बीन कर। कहें कि चल कबीर चलें भगवान के पास, तेरे साहिब के पास, तेरे राम-रहीम के पास।

पर कबीर काहें जल रहा है?

कबीर भी जल रहा है। यह सोच कर वह उन्मादित हो जाती है, क्या मुझे पाने के लिए? कि अपनी मां की मर्दित देह का भाष्य जानने ख़ातिर जल रहा है, जला रहा है पूरी दुनिया को। भाष्य भाखता है भगवान का साहिब का, भूख भाखता है देह का, पेट का और पावन बन जाता है। भूल जाता है किसी देह की आग ने, किसी शार्ट शर्किट ने ही उसे जना था और जनाजा निकाल दिया था तालाब में। लहरतारा के तालाब में।

पर क्या कबीर के पुरखों के जमाने में भी शार्ट शर्किट होता था? शार्ट शर्किट देह का। शार्ट शर्किट मन का, भगवान का, उन के भाष्य का, स्त्री की मर्दित भावनाओं का, पुरुष जनित इच्छाओं, आकांक्षाओं और आह्लादित अत्याचारों का। चरम पर पहुंची देह के दुआबे का, किसी घर के दरवाजे का, किसी रथ के पहचाने जाने का, पस्त पर मुकम्मल बयान। बयान देह की भट्ठी का। बयान मन के मुर्छाने, फिर मर जाने का। तब स्वर फूटता है, ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया।’ फिर कथा शुरू होती है मन के चरम, मन के मरम को भरमने भरमाने की।

मन का वह अपरिभाषित तार फिर भी अपरिभाषित रहता है, भाष्य नहीं मिलता। मिलती है तो गूंज।

उस तार की गूंज जो मन में बाजता है, देह में कौंधता है, काटता है शार्ट शर्किट। काट देता है शार्ट शर्किट। पर वह अपरिभाषित तार राजनीति के तंतुओं में क्यों नहीं जीता। क्यों नहीं जागता राजनीति की उन दग्ध शिराओं में जो देश को देह बना मुख मैथुन में रत हैं। रत हैं रतजगे के रंग और राग में। रात जगते हैं, दिन जागते हैं। तो सोते कब हैं? वह पूछती है। फिर ख़ुद बताती है सुबह। सुबह मुंह बाए।’

क्या किसी महिला मुंह की आस में?

नहीं।

मंत्री पद की आस में।

रोज ही थोड़े महिला मुंह की मार बर्दाश्त है इन्हें। यह तो शगल है। शतरंज है। शह और मात है। देह के दंगल का एक दांव है।

पर मंत्री पद?

मंत्री पद तो बिसात है। देश को देह में बदलने की बिसात। देह के देश में विचरने की बिसात। इन्हें महिला मुंह नहीं, अब देश का मुंह चाहिए मुख मैथुन ख़ातिर। योजनाओं, उद्घाटनों से, ठेकों, सूखा और बाढ़ से बजबजाता मुंह।

उस की देह पर एक दाना है।

अकस्मात उग आया है यह दाना। कहीं उसे एड्स तो नहीं हो गया? जाने कितनी पामेलाओं का मुंह भोगता आता है घर, अबलाओं के देह भोगता आता है घर, घर जिस में हम को बांधता है। देह को साधता है, गोया देह सुख नहीं घुड़सवारी सुख में हांफा जा रहा हो। हां, घुड़सवारी देह पर, मेरी देह पर, देह की एक-एक पोर, एक-एक छोर पर नीला, काला आसमान रचता हुआ। स्त्री रथ हांकता हुआ। पुरुष रथ मैं नहीं हांक पाती और वह मुंह बा जाता। राजनीति और देह के दोआबा का यह दुभाषिया, मेरी देह की भाषा नहीं बांच पाता। लिखित शब्दों को भी वह मुश्किल ही से बांचता है। यह तो फिर भी देह की भाषा है, देह की भूख की नहीं देह संगीत की भाषा। और इस ही का कोई भाष्य नहीं है उस पुरुष रथ के पास। झीनी-झीनी बीनी नहीं बांच पाता। बांचना नहीं जानता, कि बांचना नहीं चाहता। उस का चातुर्य कुछ समझने नहीं देता उसे। उस की गायकी उसे गाने नहीं देती। मन भरमाने नहीं देता कि, ‘वादियों में खो जाएं हम तुम।’ ‘देह की वादियों में कि देह संगीत की वादियों में?’ वह पूछती है खुद से।

यह भी कहीं अपरिभाषित है। उस तार की तरह जो शार्ट शर्किट के शोर में सन्न कर देता है। पर यह भी क्यों होता है कि आग कैसे भी लगी हो आंख मूंद कर बता देते हैं, ‘शार्ट शर्किट से।’ जिन तारों में करंट ही न हो वहां भी शार्ट शर्किट कैसे हो जाता है और जहां तार भी न हो वहां भी कैसे शार्ट शार्किट हो जाता है। यह भी अबूझ परिभाषा है, पहेली है, अकेली अकुलाई है। औंधे गिर पड़ी है बरास्ता शार्ट शर्किट।

शार्ट शर्किट का संत्रास राजनीति के बियाबान में भी बज रहा है। मुख्यमंत्री और उस के बीच जो पनप रहा है, अंकुआ रहा है, असमय पक रहा है, फसल नहीं फोड़े की तरह। वह क्या है? शार्ट शर्किट ही तो है, शार्ट कट से। पर शॉट लग गया है। उस की देह की तरह उस की राजनीति भी धनुष हो गई है। पर लक्ष्य दो हैं। वह देह संगीत साधना चाहती है, तीर का भी संगीत साधना चाहती है। और यह मंत्री पद को बेध कर, भेद कर बंधना चाहता है। लक्ष्य स्पष्ट है। यह अर्जुन है, वह अर्जुन नहीं है। इस के पास सुभद्रा, द्रौपदी, कृष्ण, गांडीव है, होम करने के लिए अभिमन्यु है। और उस के पास? द्रौपदी होती हुई भी सारे पांडव उस के पास नहीं हैं। वह तो अर्जुन के पाश में बंधी बिंधी, व्याकुल आकुल अपना एकांत, अपना सुख, अपना चैन चर रही है। किसी मकलाई भैंस की तरह, किसी बउराए बांस की तरह, किसी शार्ट शर्किट की तरह, किसी बाल मुड़ाए श्रीमान की तरह। झीनी-झीनी की लगन, झनक-झनक की राग और झटकार की तरह। भटकाव को भेंट रही है, लगाव को लपेटे, देह को समेटे उस की दुनिया सिकुड़ रही है, राजनीति में सिसक रही है, वह, उस की गायकी, ‘या कुंदेंदु तुषार हार धवला, या शुभ्र वस्त्रवृता या वीणा वरदंड मंडित करा या श्वेत पद्मासना....।’ वह नहीं उच्चार रही है। वह नहीं गा रही है, ‘झीनी रे झीनी बीनी चदरिया।’

नहीं गा रही है। पर जा रही है अपने रंगरेजवा के पास। वह राज भवन जा रही है। सुर्ख चटक लाल बार्डर वाली क्रीम कलर की उसी सिल्क साड़ी में। रंगरेजवा के पास। रंगरेजवा राजभवन में बैठा है। मंत्री पद की शपथ स्वीकारने।

हां, देश अब देह में तब्दील है।

और गायकी?

कहा न अर्जुन वह है, यह नहीं। यह मछली है, खौलते कड़ाहे पर लटकने के लिए। द्रौपदी ख़ातिर लक्ष्य बन बिंध जाने के लिए। वह ही द्रौपदी भी है, वह ही देह, वह ही देश है। वही मछली भी। लक्ष्य द्रौपदी ही थी, मछली तो निशाना थी। वह मंत्री बन गया है, उस की द्रौपदी उसे मिल गई है। द्रौपदी, जुए में हारने के लिए, महाभारत जीतने के लिए। मछली तो मर गई है। पर द्रौपदी जिंदा है। देह, देश, द्रौपदी और वह।

लेकिन देह का दंश?

देह का दंश तो उसे अब भी डाहता है। देह संगीत में उस का मन कहीं अब भी कुनमुनाता है, ‘देह सब जूठी पड़ी है, प्राण फिर भी अनछुए हैं’ के अर्थ में वह अब भी डोलती है। इस समारोह में, उस समारोह में। पर अब वह गाती नहीं, गीत सुनती है।

और संगीत?

सिहर उठती है वह संगीत से।

वंदना गाती लड़कियों को देखते ही वह डर जाती है कि बेचारी जाने किस आंख की यूरिया बन जाएं। बंध जाएं। भूल जाएं संगीत, देह संगीत, आत्मा का गीत और उस से प्रीति करना भूल जाएं। देह डोले, देह संगीत बोले। आकुल व्याकुल अपने ही को बिसारते। जैसे मैं जी रही हूं। हुंह! जी रही हूं! जी रही हूं और फीते काट रही हूं। पुरस्कार बांट रही हूं। मुसकुराती हुई। आज फोटो छपी है अख़बार में। समझ नहीं आता पुरस्कार बांट रही हूं कि खुद को बांट रही हूं। तो क्या मैं राजनीति में जा रही हूं। मैं भी?

मैं भी?

राजनीति का रेशा रेशम तो नहीं ही होता। खद्दर भी पैमाना नहीं। अब पैमाना है तो सिर्फ यह कि कौन किस के लिए कैसी खंदक खोदता है। खोदने के नाम पर सिर्फ खरोंच भर मार पाने वाले बकचोंच नेताओं ही ने नाश किया है राजरंग का? पर राजनेताओं की नेत्रियों, पत्नियों, पुत्रों, पुत्रियों, पतियों, पति जनों की पहचान किस वस्त्र में होती है?

का फटहे वस्त्र में राज का रंग समा पाता है। यह भी बता जाइए कि इन के वस्त्र इतने गमकते क्यों हैं। महकते क्यों है? भरमाने के लिए कि भरमने के लिए। महकने के लिए, मनाने के लिए कि किसी पर मर जाने के लिए।

मर तो मैं भी रही हूं महक तो मैं भी रहीं हूं मचल तो मैं भी रही हूं। प्यार में नहीं, देह राग में नहीं, किसी दुर्निवार अंगार में नहीं। मैं तो आकुल हूं कि मुख्य अतिथि हमारी ओर एक भरपूर नजर डाल लें। मुख्य अतिथि बनवाया ही था मुख्यमंत्री जी को इसी लिए कि वह हमारी भी उपस्थिति दर्ज कर लें। गलती बस यही हो गई, मैं मंच पर बैठ गई। नीचे बैठना चाहिए था। मंच पर वह पलट कर देखें भी तो कैसे। कैसे वह पूछें कि मैं कैसी हूं। पर दांत निपोरे कलूटे भैंसे विधायक से तो वह पीछे पलट-पलट कर बतिया ले रहे हैं, उसे डांट भी दे रहे हैं। और डांट खा कर भी वह कलमुहा खींसें निपोर रहा है। मैं सुन रही हूं मुख्यमंत्री उस से दो बार कह चुके हैं, बिलकुल दुत्कार कर कह चुके हैं, ‘नीचे चलो, बाद में मिलना।’ पर वह है कि दो-तीन दरख्वास्तों पर अभी, बिलकुल अभी आदेश पा लेना चाहता है। चाहता है कि इंजीनियर वाले आवेदन का निपटारा तो अभी ही हो जाए। मुख्यमंत्री उसे टटोलते हुए फुंफकारते भी हैं कि, ‘क्या एडवांस ले लिया है?’ वह बता रहा है, ‘जी नहीं भाई साहब। यह तो ख़ास रिश्तेदार हैं।’

‘कितने रिश्तेदार तुम्हारे इंजीनियर हैं?’ मुख्यमंत्री उसे खा जाने वाली नजरों से देखते हुए कहते हैं, ‘अभी परसों एक आई॰ ए॰ एस॰ को तुम रिश्तेदार बता रहे थे। और वह दारोगा भी तुम्हारा रिश्तेदार ही है। जब इतने खाते-पीते रिश्तेदार हैं तुम्हारे, फिर भी तुम हरदम भुखाए रहते हो। काहें भाई। काहें।’ कहते जाते हैं मुख्यमंत्री और वह हीहियाता जा रहा है। हिहिया रहा है, रिरिया रहा है और आंख भी मार रहा है। फोटोग्राफर को कि वह फोटो खींच ले। और मुख्यमंत्री के कान में निहुरे-निहुरे घुसा जा रहा है। क्या सब लोग यह सब देख नहीं रहे हैं? निश्चय ही देख रहे होंगे।

पर मेरा सवाल तो यह नहीं है। मेरा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री हमारी ओर क्यों नहीं देख रहे हैं? वह पछता रही है कि कार्यक्रम की संचालिका ही बन गई होती तो अच्छा था। तब तो वह देख ही लेते। देख लेते तो कुछ कहती। पर संचालिका का वजूद क्या उस के ‘वजन’ को सूट करता? संचालिका तो सलीका होती है, वजूद नहीं, वजन नहीं। पर एक वहम होती है वह जो हटाए नहीं हटती। माइक पर रहना उस की जरूरत नहीं फितरत होती है। पर यह फितूर उस के दिमाग में फुसफुसा ही क्यों रहा है। फोड़ा क्यों बना जा रहा है। मंच की गरिमा को क्या वह कोई गंध नहीं दे पा रही। कि वंदना गाने की गमक उस में हिचकोले भर रही है। कि यूरिया बनने की लचक में वह लहराने को बेताब हो रही है। तो क्या वह यूरिया होती, वह वंदना गायिकाओं के कोरस का प्रमुख स्वर होती तो मुख्यमंत्री उस ओर, उस की ओर निहारते। नहीं निहारते तब भी। वह कलूटा विधायक बेइज्जती की हद तक तब भी लिपटता रहता उन से। तो? क्या वह इस विधायक को उतरवा दे मंच से। कि उस के लिए भी एक कुर्सी धरवा दे मंच पर।

उस ने सोचा।

सोचा और संयोजिका को संकेत दिया। कुर्सी मंच पर अतिरिक्त लग गई। विधायक फिर भी नहीं बैठा। कहने पर भी नहीं बैठा। उस के आवेदन पर आदेश नहीं हुए थे, मुख्यमंत्री के। मुख्यमंत्री और विधायक की इस मुहब्बत में समूचा कल्चरल माहौल, एग्रीकल्चरल बन गया था। पर मसला फिर भी जस का तस था. मुख्यमंत्री हमारी ओर नहीं देख रहे थे।

वहशते दिल, वहशी देह और वायलिन सा वेग उसे जैसे हिला गया था। मुख्यमंत्री उठ खड़े हुए। भाषण दिया और जाने लगे। मजलिस बिगड़ गई थी। वह लपकी। भारी स्तनों का जतन भूल गई और लपकी। मुसकान फेंकी भरी-भरी। और बुदबुदाई, ‘शुक्रिया! बहुत-बहुत शुक्रिया!’ वह शुक्रिया कह रही थी, और देह पर अगल-बगल से भार बढ़ता जा रहा था। पीछे नितंबों की ख़ैर नहीं थी। दबाव कुछ ज्यादा ही था। अशिष्ट और अर्थपूर्ण दबाव। क्षण भर को वह तिलमिलाई पर बोल रही थी, ‘शुक्रिया!’

वह बिलबिलाई भी पर बोली, ‘बहुत-बहुत शुक्रिया।’ उसे लगा जैसे वह नंगी ही आई है इस समारोह में। अपने इस नंगेपन का एहसास अशिष्ट भीड़ के अर्थपूर्ण दबाव में वह नहीं जान पाई थी, भीड़ ने तो बस यही जताया था कि अब उस की साड़ी खुल जाएगी, केश छिटक जाएगा। पर नहीं खुली साड़ी, केश नहीं छिटके। वह ही छिटक गई मुख्यमंत्री के बगल से। भीड़ अपना काम कर रही थी और मुख्यमंत्री भीड़ में अपना अर्थ बता रहे थे, हाथ जोड़ रहे थे, हाथ उठा रहे थे, हाथ गिरा रहे थे। जब वह शुक्रिया कहती हुई उन की ओर लपकी थी तो उन के उठे हाथ ऊपर से नीचे आ रहे थे। उस के उरोज उन की उंगलियों को छू गए कि उंगलियां उन की उस के उरोजों पर अनायास ही पड़ गईं वह ठीक-ठीक समझ नहीं पाई। पर जब एकाधिक बार ऐसा हुआ तब वह समझी कि सब कुछ अनायास ही नहीं घट रहा। अनायास के रंग में सायास उंगलियां घुली मिली हैं। मुख्यमंत्री की उंगलियां उस के उरोजों को छू नहीं कुरेद रही थीं, खोद रही थीं। जैसे कुछ हेर रही थीं। वह पीछे हटना चाहती थी। पर नितंबों पर भीड़, उरोजों पर मुख्यमंत्री। मुश्किल में वह, अपमान की आंधी में बह रही थी, बिफर रही थी।

मुख्यमंत्री मुसकुरा रहे थे। अपना हाथ अब वह जांघों तक पहुंचा रहे थे, फिरा रहे थे। भीड़ का भाड़ वह मेरी जांघों ही पर जुगाड़ रहे थे।

वह अब धीरे, बहुत धीरे चल रहे थे। एक हाथ हवा में दूसरी मेरी जांघों पर हिला रहे थे। दबाव जब ज्यादा दरिद्र हो गया, देह जब ज्यादा अपमानित हो गई और लगा कि भीड़ साड़ी खोले न खोले यह मुख्यमंत्री मेरा पेटीकोट जरूर खोल देगा, मैं छिटकी। उस की बगल से, बड़े वेग से छिटकी। छिटकी तो छुटकारा मिला उन सर्पीले हाथों से। नगाड़ा बन गए नितंब पर बढ़ते दबावों से। मुख्यमंत्री के साथ भीड़ भी आगे निकल गई थी। मैं ने देखा उस के सर्पीले हाथ अब जुड़ गए थे।

पर देवी जी जब वह हाथ सर्पीले थे, आंखें इतनी गिरी हुई थीं तो आख़िर आप दुबली ही क्यों हो रही थीं कि ‘मुख्यमंत्री हमारी ओर देख नहीं रहे हैं? क्या तब के क्षणों में आप गीली थीं और अब के क्षणों में सूख गईं?

भई वाह इतनी जल्दी राजनीति सीख गईं?

वह पूछ रही हैं अपने ही से किसी पुरुष की तरह, किसी लुकिंग लंदन, ताकिंग टोकियो सी आंखों वाले पत्रकार, परिवार और आचार्य की तरह। वह मन ही मन मसोस रही हैं। मसोस रही हैं कि काहें गाया था, ‘मोहिं चाकर राखो जी।’ मीरा का विष उस के गीतों को सताता था, यह तो वह जानती थी पर क्या जानती थी कि मीरा के गीत गाने वालियों को भी वह विष इस तरह, इस तरह सताएगा। ‘मोहिं चाकर राखो जी!’ जो उस ने नहीं गाया होता तो शायद आज सा दरिद्र दिन वह नहीं देखती, अपमान की आंधी में वह इस तरह नहीं उजड़ती। नहीं उखड़ती इस तरह अपने ही ताने तंबुओं के खंभों की तरह। रस्सियों से बंधे, जालियों में फंसे खंभों की तरह। वह भी खूंटा बन जाती, वह छोटा खूंटा, बांस का बना खूंटा जो तंबुओं का आधार होते हैं। आधारशिला बन जाते हैं तंबुओं के। तंबू उखड़ता है तो वह भी उखाड़ लिए जाते हैं। छुट्टा नहीं छोड़ दिए जाते अपमानित होने के लिए। अपमानित हो कर किसी को घाव देने के लिए। हरे बांस के खूंटे हों या सूखे बांस के खूंटे, वह चले जाते हैं अपने तंबुओं के साथ, अपने लंबुओं के साथ। वह घूम-घूम नहीं गाते, ‘मोहिं चाकर राखो जी!’

तब जैसे मैं गाती थी, मीरा को गुनगुनाती थी। मीरा के इसी गीत ने आज से दस बरस पहले मुझे इनाम दिलवाया था संगीत नाटक अकादमी का। यही मुख्यमंत्री था तब के दिनों में भी। इन्हीं हाथों से पुरस्कार पा पुलकित हो गई थी। उस पुलक का ही प्रताप था कि मंच पर बैठी बार-बार यही जोहती रही कि, ‘मुख्यमंत्री हमें देख लें।’ पहचान लें कि वही लड़की हूं, ‘मोहिं चाकर राखो जी’ को पूरी तन्मयता के साथ जो कभी गाती थी, मीरा के इस विष बुझे गीत को पावन बनाती थी, पागल बना देती थी, सुनने वालों को, भक्ति में भर देती थी, वही लड़की हूं।

मुझे देखो और हलो कहो मुख्यमंत्री! इसी आस में सुलगती रही कि, मुख्यमंत्री हमें क्यों नहीं देख रहे हैं? क्या ख़बर थी मुख्यमंत्री देख रहा है मुझे, मेरी देह को देख रहा था। यूरिया, पोटाश, सल्फेट सब फेंट रहा है, नहीं देख रहा है उस लड़की को जिस को उस ने पुरस्कृत किया था। नहीं देख रहा है उस लड़की को जिस से ‘मोहिं चाकर राखो जी’ सुन कर वह झूम गया था और अपने भाषण में इस का लालित्य लटका गया था। वह लालित्य जिसे, इस औरत बन चुकी उस लड़की ने मन में कहीं टांक कर रखा था, अभी-अभी उधड़ गया है।

अभी, बिलकुल अभी उस की सीवनें उधड़ी हैं। सर्पीले हाथों ने लाज के लालित्य को ललकार दिया है, दुत्कार दिया है, ‘मोहिं चाकर राखो जी’ के नेह और मनुहार को। देह के दारिद्रय में डुबो दिया है। लालित्य गीत का, मन का, गीत और मीरा का, मीरा के विष का, भक्ति का, उस भाव को जो उस लड़की ने कभी भरा था, इस औरत ने जिसे अभी तक भर कर रखा था। अभी-अभी रीती है उस की भक्ति। मुख्यमंत्री के सर्पीले हाथों ने उड़ेल दिया है विष उस के उरोजों पर, उस की जांघों पर। यह विष मीरा के हिस्से का नहीं, उसी के हिस्से का है। मीरा ने पी लिया था तब, पर वह नहीं पिएगी अब। इसी लिए वह छिटक गई है। विष को बटोरे छिटक गई है। भीड़ छंट गई है। पर बाकी भीड़ भी सनकी हुई है।

क्या यह सनक सेंट की है, संकोच की है, इस शहर की है, कि शेम-शेम की।

शेम-शेम की इस राजनीति के कोलाज कई हैं। कोई कोलंबस भी कंप्यूटर ले कर लग जाए, इन सारे कोलाजों का ब्यौरा नहीं ढूंढ सकेगा। अगर ढूंढ़ लिया तो समझिए कि वह कोलाज शेम-शेम की राजनीति के असली कोलाज नहीं हैं। वह कोलाज जो कोलबंस ने ढूंढे़ हैं। दरअसल राजनीतिज्ञों के ही कुछ धड़ों ने उन्हें इस लिए थमा दिए हैं कि कोलंबस का वर्चस्व बना रहे, उस की बेइज्जती नहीं हो, रोटी दाल उस की चलती रहे सो कुछ ‘सो-सो’ वाले कोलाज थमा दिए महोदय कोलंबस को कि तीसरी दुनिया तो आप ने खोजी थी, अब लीजिए भोगिए चौथी दुनिया। चौथी दुनिया और उस के कोलाज। हम तो नाम कमा रहे हैं आप भी नाम कमाइए। स्कूप मार कर, एक्सक्लिसिव मान कर।

सक्सेना साहब आज ऐसा ही एक एक्सक्लिसिव पा कर लौटे हैं। फोटो भी उन को फीड है पर संपादक थोड़ा घबरा रहे हैं। बता रहे हैं कि, ‘मसला पॉलिटिकल है। तो भइया सक्सेना सोच समझ कर।’ ‘नहीं भाई साहब। स्टोरी न भी जाए तो फोटो कैप्शन से ही काम चल क्या पूरा-पूरा बन रहा है।’ जोड़ रहे हैं जनाब माथुर और सक्सेना की काट रहे हैं, उन की स्टोरी साफ कर रहे हैं। मकसद माथुर का इस स्टोरी ही को रोकना है। फोटो तो वह भी जानते हैं, छपने वाली नहीं है। जो अख़बार माताएं बहनें पढ़ती हैं उस में जो ऐसी फोटो छपी तो अनर्थ नहीं हो जाएगा? माथुर यह जानते हैं सो संपादक साले की पिद्दी सोच में इस फोटो ही को फ्लैश करना है, इस फोटो को ही बार-बार फीड करना है ताकि उसे लगे कि यह ख़बर नहीं है, ख़बर से ज्यादा नारी जाति का अपमान है और फिर इस से भी बढ़ कर जब सुबह-सुबह अख़बार घर में पहुंचेगा, वह कहीं बच्चों ही के हाथ पड़ गया तो? छोटी बहन देख ले तो? और जो अम्मा पिता जी देखेंगे तो वह क्या कहेंगे? संपादक ऐसे ही सोचता है। यह माथुर को मालूम है कि संपादक साला ऐसे इफ बट में ही जीता है, मक्खनबाजों, महिलाओं और दरबारियों में जीता है। ख़बर में नहीं। सरोकार ही नहीं हैं जब समझ से तो ख़बर की खलिस का विस्तार वह क्या जाने?

कैसे जाने भला?

वह जानता है खुंदकी ख़बरों का खुलासा। बशर्ते ख़बर की प्लांटिंग में वह भी इस्तेमाल हो। उस ख़बर से उसे सरोकार हो जाता है। जहां स्कॉच, चिली और उपहार का व्यवहार हो। व्यवहार हो दलाली की दाल में पत्थर पचाने का, संबंध कोयला कराने का तो इस ख़बर से सरोकार है उसे। बुश कुवैत को ठढ़िया देने की ठौर में हैं, बेनजीर बर्खास्त हो गई हैं। ऐसी ख़बरों का उसे वजन नहीं मालूम, इन का असर नहीं मालूम। उस को यह भी नहीं मालूम पेरेज द क्वयार क्या कहते हैं, क्या करते हैं। वह तो पूछता है ई पेरेज द क्वयार कौन है? बताने पर ‘अच्छा अच्छा वो है’ कहता हुआ कमीज के बटन पकड़ चल देगा। गोया पेरेज द क्वयार, उस के क्लासफेलो रहे हों। फुटबाल को अंगरेजी में सॉकर कहते हैं उसे नहीं मालूम। वह तो सासर कहता है। और इस अर्थ में कहता है जैसे खेल दुनिया में भी उस का ख़ासा दखल है!

हां, उस का इस में दखल जरूर है कि फलां आई॰ ए॰ एस॰ की बेटी किस क्लास में किस नंबर से पास हो रही है। और जाहिर है आई॰ ए॰ एस॰ की बेटी है तो वह टॉप भी करेगी ही। कैसे टॉप कर गई वह। क्या बाप के असर से? जी हां, ऐसी ख़बरें वह ख़ुद ब्रीफ करता है रिपोर्टरों को कि, ‘कैसे-कैसे’ ऐसे-ऐसे....हूं....।’ पर यह नहीं ब्रीफ करता कि इसी आई॰ ए॰ एस॰ ने पिछले साल पांच इंजीनियरों के तबादले ख़ातिर इस की सिफारिश सिरे से ठुकरा दी थी। ठुकरा दी थी तो भुगत रहा है, चुका रहा है पत्रकार से टकराने की कीमत। पत्रकार को यह भी पता लग गया है कि कैसे उस की बीवी ने उस की कुर्सी का फायदा उठाया, संस्था बनाई और अनुदान झटक लिया। पचास हजार रुपए का अनुदान। पत्रकार के पास ख़बर है और आई॰ ए॰ एस॰ के पास तबादले का पावर। मतलब दोनों टक्कर में हैं एक-दूसरे से दोनों का अच्छा पाला पड़ा है। लगता यही है कि असर उस का फिर काम आएगा और यह ख़बर रुकवा लेगा। आसार इस के भी बुरे नहीं है। लगता है इंजीनियरों का तबादला हो जाएगा। तबादला हो जाएगा तो बयाना तो बच जाएगा। नहीं साले जान खाए हुए हैं, ‘भाई साहब, भाई साहब। भाई साहब कुछ करिए।’

भाई साहब कुछ करना चाहते हैं। उस फोटो का। फोटो जो सक्सेना लाए हैं, भाई साहब पूछ रहे हैं, ‘कहां से मार लाए सक्सेना साहब?’ ‘बस मिल गई भाई साहब।’ सक्सेना स्रोत बताने में संकोच खा रहे हैं। वह सोख लेते हैं संपादक का सवाल, ‘बड़ी मुश्किल से मिली है।’ वह जोड़ते हैं, ‘पी॰ एम॰ हाऊस भी भेजी गई है वहां लोग देख सकते हैं तो हमारे पाठक क्यों नहीं देख सकते। क्यों नहीं देख सकते अपनी निर्वाचित विधायिका की निर्वस्त्र देह, दारू में धुत्त देह। जिसे वह आख़िर कहीं तो दिखा ही रही हैं। दिखातीं नहीं तो फोटो कैसे खिंचती। बस फोटोग्राफर साला चूतिया था। लगता है प्रोफेशनल नहीं था। विधायिका की टांगों में टंगा रह गया वह, उस का कैमरा, कैमरे का लेंस। टांगें मुड़ी हुई, जांघें खुली हुई। जांघों के बीच ठहरी हुई उस माया ही को समेटने में ही खर्च हो गया साला। खर्च हो गई उस की फोटोग्राफी। नंग धड़ंग बेसुध पड़ी विधायिका के सिरहाने एरिस्ट्रोकेट प्रीमियम की आधी ख़ाली पड़ी बोतल को फ्लैश करने में। क्लोज-अप वह जांघों और जांघों के बीच बसे उस हिमालयी हिम टापू का ही लेता रह गया, गल गया उस का कैमरा उस निर्वस्त्र बेशर्म, विधायिका की हिमालयी देह के गिरे तापमान में। भूल गया कि इन जांघों का क्लोज-अप चेहरे के क्लोज-अप के साथ ही अर्थवान बनेगा। चेहरा जांघों से भी ज्यादा स्पष्ट होना चाहिए था। पर वह तो साला चेहरे और जांघ का जैसे कोलाज रच रहा था। फोटो स्कूप नहीं।

क्या वह जो आधी ख़ाली एरिस्टोक्रेट प्रीमियम की बोतल माननीया विधायिका जी के सिरहाने पड़ी दीख रही है उस को ख़ाली करने में यह फोटोग्राफर भी तो चीयर्स, चीयर्स नहीं कर गया था, कि उस के कैमरे में जांघ समा गई, चेहरा कठिन हो गया। कि उसे शर्म आ गई थी क्लिक करते हुए। कि नारी जाति के अपमान के बोध में बंध गया था वह। या कि उस नारी देह को उसे भोगने नहीं दिया गया था। जांघों का क्लोज अप बताता तो यही था कि इन जिन जाघों को वह देह से नहीं भोग पाया उसे और उसी देह की जांघ को वह कैमरे से भोग रहा है। भोग रहा है एक क्लिक में।

पर क्या एक ही क्लिक में वह फोटो फिनिश कर पाया होगा?

या कि उसे जल्दी थी, कि फोटो जल्दी करो, कहीं होश में न आ जाएं माननीया विधायिका। और वह चेहरे का चिन्ह नहीं ले पाया क्लोज-अप में। बिलकुल अंगूठे की तरह क्लोज शॉट नहीं हो पाया, लांग शॉट हो गया चेहरे का किसी दस्तख़त की तरह। दस्तख़त जो वह विधायिका जी की देह पर नहीं कर पाया अपने पौरुष, अपनी भूख, अपनी वहशी देह की दस्तख़त। आंखों की सिगनेचर से ही उसे बस करना पड़ा, कैमरे की आंख से वह भी। नहीं आंखों की दस्तख़त तो जब तब जो जब चाहे जिस पर कर ले। इस पर कोई संवैधानिक बंधन नहीं, कानूनी बंधन नहीं, सामाजिक बंधन भी बह ही जाते हैं। आंखों, की दस्तख़त, आंखों की मुहर में। पर आंखों की दस्तख़त निर्वस्त्र देहों पर भी कभी कारगर कहां होती है। आंख तो तब जब देह पर वस्त्र पड़े, हां, तब ही दस्तख़त का सुकून पाती है, संयम सोचती है तब देह, जब उस देह पर भी वस्त्र हो। पर जब निर्वस्त्र हो वह देह तब यह भुखाई देह भी दस्तख़त की दरख़्वास्त देती है, दस्तक दे देती है उस देह पर। दहकती देह पर मेह बरसा देती है।

और इन विधायिका जी की भी देह तो निर्वस्त्र थी। वश में ही नहीं थीं वह, उन की वहशी देह। उस वहशी देह को फोटोग्राफर भी जो अपने वहशीपन से नहला देता तो विधायिका जी का क्या बिगड़ जाता। बिगड़ जाता तो वह जांघ खोले, टांग मोड़े एक ख़ास एंगिल में, आमंत्रित सी करती वह उन की देह, उन का जंघा प्रदेश पुकार क्यों रहा था?

लेकिन अगर फोटोग्राफर भी वहां उस कमरे में फागुन हो गया होता, गीला हो गया होता तो विधायिका जी का बिगड़ जाता थोड़ा बहुत। जांघों को, उन के जंघा प्रदेश को भोगने के बाद जांघ को ही सिर्फ क्लोज शॉट में नहीं भरता चेहरे का भी क्लोज-अप कर लेता वह फोटोग्राफर। जांघ ही और जांघ का बीच ही उस की आंख में उस के कैमरे में नहीं उतरती। नहीं उतरता विधायिका जी का छितराया हुआ छाते सा तना हुआ जंघा प्रदेश उस के कैमरे में, इस फोटो में, हो यह भी सकता था कि विधायिका जी की देह भोगने के बाद वह कुछ सहज हो जाता और एक सामान्य सी, सपाट सी फोटो मार देता। जंघा प्रदेश ही नहीं गूंजता उस के कैमरे में और वह फोटो इतनी विराट नहीं बन पाई होती। हो यह भी सकता था कि ‘कृतज्ञता वश’ वह यह फोटो ही नहीं खींचता!

लेकिन क्या पता फोटो खींचने के बाद, कैमरे की किन्हीं छोटी सी क्लिक के बाद फोटोग्राफर ने जगा दिया हो उन अलमस्त सोई हुई, छाते की तरह तनी हुई जांघों को। विधायिका जी की जांघों को जगा दिया हो। जाघों में बसे उस महादेश को जगा दिया हो, नाप ली हो उस की गहराई, भिगो दिया हो वह समुद्र तल मेघों की फुहार से, वहशी देह से, वहशी मेह को मिला दिया हो, ‘गा दिया हो, नदी मिले सागर से’, गुनगुना दिया हो, ‘कोई जाने ना।’

यह और ऐसी सारी संभावनाओं पर सिरे से सोचे जा रहे हैं। बंधू सक्सेना, रिपोर्टर सक्सेना, बुद्धू सक्सेना कि, यह होता तो ऐसे होता, ऐसे नहीं होता तो कैसे होता।

और वह जो विधायिका ही नहीं होतीं तो?

और फोटोग्राफर?

फोटोग्राफर जो वह नहीं होता तो कोई और होता और रिपोर्टर जो मैं नहीं होता तो कोई और होता।

कहीं ऐसा तो नहीं और भी रिपोर्टरों को यह फोटो फीड हुई हो? सक्सेना सोचते हैं।

सक्सेना फिर फोटोग्राफर की सोचते हैं कि कहीं फोटो देने ही वाला फोटोग्राफर भी नहीं है? नहीं फोटो इतनी कच्ची नहीं होती। वह विचार रहे हैं कि मौके पर इस देह विरुदावली की, इस देह गाथा की, इस देह भाषा का भाष्य लिखने के लिए, रिपोर्टिंग करने के लिए सच को सच कहने के लिए वह भी वहां क्यों नहीं थे?

वह विचार रहे हैं इस संभावना पर भी कि कहीं यह फोटो पुरानी तो नहीं है। यह देह जब विधायिका नहीं बनी थी, जब और जवान थी और महान थी, तब की तो फोटो नहीं है यह। सत्ता का स्वाद चखने के बाद कुछ शऊर तो आ ही जाता है, देह को भी, नारी देह को भी। क्यों कि नेह तो चुक ही जाता है न? राजरंग सोख लेता है नेह। बाकी रह जाता है सिर्फ मेह जो कभी कभार देह में बरसता है, कभी देह पर बरसता है। सड़क भींज जाती है, ख़बरें भींज जाती हैं इतनी कि छप नहीं पाती हैं। क्या तो गीली-पीली हैं।

गीली हो कर भी नहीं भींजती देह। काहें कि देह से नेह ख़ारिज है। मेह से नेह भाग गया है। कि बिला गया है। कि सड़क भींज जाती है, ख़बर भींज जाती है, देह नहीं भींजती। नहीं भींजती।

क्यों नहीं भींजती?

सोच-सोच कर आंखें मींच लेते हैं सक्सेना। रिपोर्टर सक्सेना। वह सब सोचते हैं, सारा पक्ष सोच लेते हैं। नहीं सोच पाते तो सिर्फ अपना पक्ष कि वह यह फोटो ले ही क्यों आए? ले ही आए जो फोटो तो ख़बर लिखने ही पर क्यों आमादा हैं। आमादा क्यों हैं कि यह फोटो छपे ही। क्या सिर्फ इस लिए कि फोटो देने वाले को वह वादा दे आए हैं कि, ‘जरूर छपेगी।’ जब कि देने वाला भी कह रहा था, जोर दे-दे कर कह रहा था कि, ‘नहीं छपेगी। नहीं छाप पाएंगे बंधु सक्सेना। यह फोटो नहीं छाप पाएंगे आप। आप के अख़बारों में दम ही नहीं है। लंदन के अख़बार ही छाप सकते हैं यह स्कूप। हमारे अख़बार आजाद नहीं हैं।’ वह कहता रहा सक्सेना से कि, ‘पामेला के संबंध जो हिंदुस्तानी नेताओं से रहे होते तो क्या वह यहां ठीक वैसे ही कह सकती थी कि, ‘संसद हिला दूंगी, सरकार गिरा दूंगी।’ अरे नौबत ही नहीं आती हिंदुस्तान में। पहले ख़बर छपी तब पामेला बोली, ‘हिला दूंगी।’

वह कहता रहा, ‘यहां ख़बर ही नहीं छपती। वह संसद क्या हिलाती, सरकार क्या खा कर गिराने को बोलती बंधु। बोलिए बंधु सक्सेना। यहां तो पामेला को पामेला बनने के लिए परदेस जाना पड़ता है। पामेला सिंह से पामेला बोर्डस बनना पड़ता है तब बनती है पामेला।’ ‘क्यों?’ ‘क्यों कि यहां तो प्रेस को बात-बात में सुबूत चाहिए। गोया अख़बार नहीं कचहरी हो। लीजिए दे रहा हूं सुबूत भी। पर जानता हूं नहीं छपेगी फिर भी यह फोटो। सत्ता के सिरहाने डोलने वाली है यह विधायिका।’ उस ने जोड़ा, ‘समझे के नहीं बंधु।’

सक्सेना बुदबुदा देते हैं, ‘छपेगी भाई साहब। जरूर छपेगी।’

सक्सेना अपना वादा विचार रहे हैं। विचार रहे हैं एक बार फिर कि कहीं यह फोटो विधायिका बनने के पहले की तो नहीं है? हो सकता है विधान सभा का टिकट पाने के लिए बेचारी इस लाचारगी में लटक गई हो, फोटो खिंच गई हो। क्या पता। कुछ भी हो सकता है। सत्ता के गलियारे में कुछ भी गूंज सकता है जैसे उस की देह कैमरे में गूंज गई है। गूंज गया है विधायिका की देह में कैमरा। कि कैमरे में कूद गई है माननीया की देह।

विचार रहे हैं सक्सेना। फोटो फिर-फिर देख रहे हैं। वह देख रहे हैं। एरिस्टोक्रेट प्रीमियम बोतल के बगल में रखा फोन, फर्नीचर और कमरे का रंग। कि है तो विधायक निवास ही का कमरा। वही सज्जा है, वही फर्नीचर है। वैसे ही मेज पर फोन रखा है जैसे विधायक निवासों के कमरों में मेज पर फोन होता है। है तो विधायक निवास ही। बस फोन के बगल में एरिस्टोक्रेट की बोतल ऐसे आधी ख़ाली पड़ी नहीं होती। वह विचार रहे हैं। पर यह भी कि ऐसी निर्वस्त्र और धुत देह क्या होती है कैमरे के सामने विधायक निवासों में?

होती होगी।

आख़िर विधायक निवास है।

यह विचारते ही उन्हें ख़बर का इंट्रो भी मिल गया है। हेडिंग भी और ख़बर का वजन भी, ‘मंत्री बनने के लिए देह दान।’ बिलकुल सात्विक शीर्षक। फोटो कैप्शन पर सिर्फ वह एक टिप्पणी जड़ना चाहते हैं। क्या लिखें, ‘देह दुर्दशा, देह अपमान, देह दरिंदगी कि देह की दरिद्रता?’ वह विचार रहे हैं और बुदबुदा रहे हैं, नहीं कैप्शन भी सात्विक ही चाहिए। नहीं बिना कैप्शन के ही फोटो फहरा देंगे। पर पहली चिंता अब भी जस की तस है, ‘फोटो छप जाएगी कल?’ और फोटो नहीं छपेगी तो ख़बर का क्या ठिकाना? भाई साहब यह भी रोक दें। चपरासी बता भी रहा है कि, ‘संपादक जी बुला रहे हैं।’

सक्सेना सीट से उठ रहे हैं और सोच रहे हैं, ‘ख़बर तो लगता है मर गई है।’ वह ख़ुद ही को टोकते है बुदबुदाते हैं, ‘नहीं, ख़बर मर रही है।’ पर क्यों मर रही है ख़बर!

किसी खोज में, किसी की ख़ैर में कि किसी खुन्नस में?

खुन्नस ही में हैं मुख्यमंत्री भी। रात का यह रंग उन्हें उकता-उकता रहा है। वह भोज में हैं पर बिस्तर का ‘व्यसन’ उन्हें बौराए हुए है। वह बिगड़े पड़े हैं कुछ अधिकारियों पर। जिस-तिस को वह डपट रहे हैं। वह बउराए हुए हैं। वह बउराए हुए हैं कि बाउंसर बाउंस हो गया है। उस की देह गंध अभी भी उन के नथुनों में फुरक रही है। वह सोच रहे हैं एक छींक ही आ जाती कि यह गंध, उस गदराई देह की गंध गुजर जाती इन नथुनों से जो बस गई है, कहीं बिसर जाती। वह अमराई जो उन के दिल में, उन की देह में अंकुआई थी अभी-अभी इसी शाम, जिस यौवना की अंगड़ाई में वह अलसाए थे इस शाम, जिस ने बार-बार उन की ओर कातर निगाहों से निहारा था, निहुरे-निहुरे उन के मन का महुआ बीना था, इसी शाम उसी बाला के बालों में तो वह आज समाना चाहते थे।

वह नहाना चाहते थे उस के साथ आज रात बाथ टब में। ठीक वैसे ही जैसे बिल क्लिंटन सारी सुरक्षा को धता बताते हुए रात के अंधरे में अपनी पत्नी को ले कर उतर गए थे स्वीमिंग पूल में। वह भरना चाहते थे, साबुनी झागों के झकोरों सहित उसे अपनी बाहों में, बाहों में भर कर उसे चूमना चाहते थे फेनिल जल में। बाथ टब के जल में। फेनिल जल में जल तरंग बजाना चाहते थे उस की देह पर। देह की पोर-पोर पर। जल तरंग। बज जो जाता जल तरंग तो वह उसे कुछ तो अर्पित कर ही देते। किसी कारपोरेशन की चेयरमैनी। किसी कमेटी में डाल देते। परदेस घुमवा देते। कहती तो आई॰ ए॰ एस॰ नामनी करवा देते। विधान परिषद में बइठवा देते। परफार्मेंस ठीक देती तो मंत्री भी।

पर कैसे भाई?

वह तो मन ही मार गई। अब कोई लौंडे तो हैं नहीं कि आप छिटकीं, छमक कर छिटकीं तो हम भी कदमताल कर लें। भीड़ को भाड़ में डालें छौंक दें अपनी कुर्सी, होम कर दें सत्ता फिर आप की देह तापें, आप को जापें। नहीं भाई नहीं। हमारी भी एक मर्यादा है!

हम कैसे क्या करें?

अउर जो इतने सती साध्वी थीं तो मंच पर बइठे-बइठे काहें सनका रहीं थीं। किसी बिरहिणी सी आंखों की कोटरें काहें बा-बा बो रही थीं, तन मन में आग। हम तो अपने कलुआ विधायक से बतिया रहे थे। आप ही ने कुर्सी लगवाई, मैं देख रहा था। आप के उठते-बैठते उरोजों को भी देख रहा था। साफ देख रहा था आप का निमंत्रण। महुए सा महकता निमंत्रण, पलाश सा दहकता निमंत्रण, बेला, चमेली, रात रानी सा खिलता महकता निमंत्रण। आम की बौरों को देख कर हमारा जी भी जो बउरा गया तो मेरा क्या कुसूर। मैं तो फिर भी जबह किए रहा अपने जंगल को, अपने जंगल की आग को। पर देवी जी आप दौड़ी आईं॰ हांफती-डांफती हुई आईं तो किस हनक में आईं?

सिर्फ शुक्रिया का शहद चटाने?

कि देह की हनक में, शहद से मीठे होंठों का हठ तोड़ने आई थीं। तोड़ने आई थीं भरी भीड़ में मेरा भरोसा, अपनी कोपलों सी नर्म बांहों में आख़िर क्या भरने आप दौड़ी भागती आई थीं। मेरे हाथ जब कुनमुनाए तभी क्यों नहीं छिटक गईं आप। तब तो मैं ने देखा आप सिहर रही थीं। सिहर रही थीं आप तब भी, जब मैं ने आप के कटि प्रदेश का स्पर्श किया। आप के स्पर्श सुख का शहद सोखते हुए एक बार मैं ने अपनी गरिमा को भी गरल की भेंट कर दिया। नहीं परवाह की जनता जनार्दन की, नहीं परवाह की पास भटक रहे कैमरा साधे फोटोग्राफरों, पत्रकारों और टी॰वी॰ वीडियो वालों की। पर आप तो ऐसे छिटकीं कि जैसे किसी बिछुआ का डंक लगा हो, किसी सर्प का दंश चढ़ा हो, ऐसे छिटक गईं कि पांव शोलों पर चढ़ गए हों। छिटक गईं और हमें छितरा गईं। मेरा दिल धक रह गया। भला हो भीड़ का जो मर्यादा बचा ली। नहीं मुझे तो ले ही डूबी हैं, मेरी जीवन भर की कमाई भी ले डूबतीं आप। फिर क्या आप को ले कर माला जपता। और आप फिर भी कह पातीं, ‘शुक्रिया’ उसी तरह हाफंती-डांफती, देह में डंक मारती, आंखों में नहीं बांहों और जांघों में आग लिए अकुलाती दौड़ती आतीं मुझे व्याकुल बनाने? वइसे ही मछली सी तड़फड़ाती आतीं भला मुझ से मछुआरे के मन के द्वार, तन के तार बजाने।

देह गीत गाने।

गाती जैसे गिरिजा देवी गाती हैं, ‘सेजिया चढ़त डर लागे।’ वही खटका, वही मुरकी देतीं, मन को भी, जो गिरिजा देवी पंडित हनुमान प्रसाद मिश्रा के साथ जुगलबंदी में देती हैं। मिश्रा जी की सारंगी और गिरिजा देवी के गायन की जुगलबंदी। जुगलबंदी चल रही है....डर लागे....लागे डर लागे....डर लागे.... सेजिया चढ़त....चढ़त डर लागे ला....गे। सेजिया चढ़त डर लागे।’....सेजिया चढ़त डर लागे। पंडित जी मगन हैं। मगन हैं गिरिजा देवी की मुरकियों पर। पर मुख्यमंत्री जी?

मुख्यमंत्री जी भी आलाप रहे हैं, अमवा बउरेलैं। पिया नाहीं अइलैं, नाहीं अइलैं हो रामा....अमवा बउरलैं।’ वह आलाप रहे हैं। बिना लय ताल, बिना खटके मुरकी के मन ही मन आलाप रहे हैं बेरोक टोक आलाप रहे हैं, ‘पिया नहीं अइलैं।’

काहें नाहीं अइलैं पिया?

इहां त पिया अइलैं। बकिर परेशान। पिया यहां परेशान हैं। मुख्यमंत्री के जलसे में जो भी कुछ घटा, रिपोर्ट पिया के पास आ गई है। पिया आज पीये हुए भी नहीं है। पर नींबू पानी लिए हुए हैं। कला में किलोल कूचती वह अपनी परकीया हो चुकी नायिका से कुछ कहना चाहते हैं। कहना चाहते हैं मेरी नाक पर नींबू रगड़ लो पर अपनी देह जिस-तिस के साथ नहीं रगड़ो। मुझ से घर में ही जितना झगड़ना हो झगड़ लो, रगड़ना हो रगड़ लो पर मुख्यमंत्री से अपनी देह मत रगड़वाओ। रगड़वाओगी तो न अपनी कोई वकत रखोगी, न मेरी रहने दोगी। मेरी नजर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है। ऐसा ही शौक है रगड़वाने का मुख्यमंत्री से तो मेरी मदद करो, मुझे मुख्यमंत्री बनवाने में। फिर जितना कहोगी उतना रगड़ दूंगा, भीतर बाहर सब रगड़ दूंगा। पर इस से तो मत रगड़वाओ। यह तो साला गिद्ध है, गिद्ध। जिस भी देह पर बैठा है, बिला गई है वह देह।

देह की आकृति बदल दी है। अरे, उस से मिलना ही था, शुक्रिया कहना ही था तो पहले यह बताती कि मैं मिसेज मिश्रा। आप के मंत्रिमंडल वाले मिश्रा जी की पत्नी। फिर शुक्रिया कहती न कहती, यह दिन, यह दरिद्र दरिंदगी नहीं देखती। कोई और होती, राजनीति नहीं जानती, नेताओं को नहीं जानती तो बात और थी। पर तुम तो मिसराइन सब जानती थी। जानती थी मिसरी का मीठापन, मीठे शहद का संकरापन। वह सर्रे से सब कुछ कह देना चाहते हैं, मिसेज मिश्रा से।

पर दिक्कत यह है कि वह अब तेज बोल नहीं सकते। घर में लोगों से ज्यादा संतरी रहते हैं और धीरे से बोलने के लिए खुसफुसा कर कहने के लिए तल्ख़ हो कर खुसफुसाने के लिए दो चार पेग तो चाहिए-चाहिए होता है और अभी-अभी वह संभव नहीं है। वह अपनी पत्नी को सक्रिय भी देखना चाहते हैं। मंचों पर बैठे देखना भी चाहते हैं। पर इस उस की रगड़ से भी बचाना चाहते हैं। लेकिन इस के लिए भी रगड़घिस्स जरूरी नहीं मानते। सोचते हैं फिर कभी समझा लेंगे, अभी तो भीड़ है। तरह-तरह की भीड़। उन्हों ने यह भी देख लिया है कि मिसेज मिश्रा की आंखें आहत हैं, वह कुछ उगलना चाहती हैं, बिफरना, बिसूरना चाहती हैं। पर वह भी क्या करें भीड़ बहुत है।

लेकिन जब वह इस शाम रगड़ी गईं तो क्या भीड़ नहीं थी? ओह! तब तो भीड़ की भगदड़ थी। भगदड़ ही में तो वह रगड़ी गईं। भीड़ ने रगड़ा, मुख्यमंत्री ने रगड़ा, और अब वह खुद को रगड़ रही हैं।

रगड़ रही हैं बाथ टब में डूबी अपनी देह। जैसे सारा अपमान इस शाम को, रगड़-रगड़ कर धो देना चाहती हैं मैडम मिश्रा। उन के शहद से मीठे, पतले होंठ बार-बार कुछ बुदबुदा रहे हैं। बुदबुदा रहे हैं शायद, हरामी, कुत्ता, पिल्ला, कमीना, लंपट, बास्टर्ड, नानसेंस....। उन की डिक्शनरी में शायद यही, इतनी ही गालियां हैं। और बताइए चली हैं राजनीति करने!

मंच वाली राजनीति!

बताइए भी भला चल पाएगी इन और इतनी ही गालियों के बूते इन से देश की राजनीति। राजरंग में कैसे समा पाएंगी यह। जी नहीं पाएंगी अगर यही हाल रहा। हज़ामत बनाने वाले पग-पग पर हैं, देह पर दस्तक देने वाले, जब तब रगड़ देने वाले हर पायदान पर हैं और पाए की गालियां तक नहीं हैं आप के पास?

तो कर चुकीं राजनीति!

आज शाम जब आप रगड़ी गईं, अपमानित की गईं तभी जो शुरुआत ही में कोई गाली उच्चार दी होती, बाथरूम में जो उच्चार क्या बुदबुदा रही हैं, वहीं इन्हीं गालियों को सही, ले कर बर्रा पड़ी होतीं तो मजाल थी किसी की जो आप के नितंबों पर दस्तक देता। बार-बार अर्थपूर्ण दबाव नहीं झेलती आप की समूची देह। और जो मुख्यमंत्री पियानो की तरह आप को इस छोर से उस छोर तक छकते मथते रहे, रगड़ने की हद तक उतर आए, नहीं आ पाए होते। जो आप संकोच की शिला हटा, इन्हीं गालियों हरामी, कुत्ता पिल्ला ही कह कर पिल पड़ी होतीं।

पर आप तो देवी जी अहिल्या की मानिंद डटी रहीं। सेक्स शिला बन कर डटीं रहीं कि कोई तो राम आएगा सेक्स शिला से नारी बनाएगा ‘यत्रा नार्यस्तु पूज्यंते’ वाली नारी। तो देवी जी भूल गईं आप की कि आप अहिल्या नहीं सेक्स शिला हैं और भीड़ की भगदड़ में हैं। और कि आप त्रोता में नहीं कलयुग में हैं। उस कलयुग में जहां राम भी जो आ जाते उस भगदड़ में तो, इस सेक्स शिला का पहले तो वह स्वाद ही चखते। ‘नारी’ आप को बनाते भी तो बाद में, पहले वह पुरुष ही बनते। और क्या पता बनाते भी कि नहीं बनाते। सेक्स शिला के स्वाद ही में कहीं जो रम जाते तो?

आख़िर मुख्यमंत्री जी कौन थे?

आज के राम ही तो थे।

क्या नहीं किया उन्हों ने। वास्तव में ज्ञान तो मुख्यमंत्री ही ने दिया कि ‘तुम केवल सेक्स शिला हो।’ किंचित उन्हों ने ही देवी की देह में अपमान का साबुन रगड़ा। इतना रगड़ा कि झाग के मानिंद उसे छिटकना पड़ा। मरती हुई मछली की मानिंद फुदकना पड़ा। पर फजीहत करा कर। देह में अंगार की, अपमान की फांस लगा कर।

छिछोरई की इंतिहा थी यह।

वह सोच रही हैं इस बुढ़ौती में भी मुख्यमंत्री की उंगलियां नहीं शरमाईं। अपनी टोपी की भी लाज नहीं जान पाए वह। मान नहीं रख पाए वह। वह सोच रही हैं। और पूछ रही हैं, क्या इस को भी शार्ट शर्किट कहते हैं?

खुद ही से पूछ रही हैं वह।

पूछ तो कन्हैया जी भी रहे हैं, ‘कहो, अइसे ही मंत्री बने हैं मिश्रा जी? मिसराइन के पेटीकोट के बूते!’ मछरी की बोटी भकोस रहे हैं और खींच रहे हैं रम। खींच रहे है रम और ज्ञान दे रहे हैं, ‘पेटीकोट बहादुर मिश्रा, अइसे बने हैं मंत्री। न हो, परभाकर जी।’

अब क्या कहें प्रभाकर जी। कैसे कहें जब कुछ बूझ ही नहीं रहे हैं।

न हो परभाकर, न हो परभाकर, जब ज्यादा हो जाता है तो पूछ लेते हैं प्रभाकर जी भी, ‘का पहेली बुझा रहे हैं, का कनई में मछरी मार रहे हैं। किलियर-किलियर बताइए बात क्या है। पेटीकोट क्या है। किस का पेटीकोट कहां से आ गया? साफ-साफ बताइए। जो भी लाया होगा उस को अभिये बाहर भगा देंगे। हमारे कमरे में ई सब नहीं चलेगा। हम को ऐसी बदनामी मंजूर नहीं है।’ कहते हैं एक सांस में प्रभाकर जी।

कहते हुए बिगड़ते हैं।

‘चढ़ि जादा गई है का। अरे हम मंत्री जी की बात कह रहे हैं। जानते तो हम भी हैं कि इहां महिला नहीं रहती। आप का काम लौंडों से ही चल जाता है। पर हम तो विधायक जी, मिसिर मंत्री के मिसराइन का पेटीकोट बता रहे थे। काहें से कि मुख्यमंत्री जी का तंबू वोहीं गिरा है इन दिनों....।’ ‘का?’

प्रभाकर जी की चेतना कुछ चैतन्य हो गई है, ‘का कह रहे हैं आप। भाई! जरा धीरे बोलिए बगल के हाल में कार्यकर्ता लोग हैं, क्षेत्र के लोग हैं। धीरे बोलिए भाई।’ खुसफुसा रहे हैं और आंख मार रहे हैं कि कन्हैया जी दीजिए अब पूरा ब्यौरा। कन्हैया जी ब्यौरा क्या देते, कैसे देते, ‘जवाब क्या देते खो गए सवालों में।’ वह गुनगुनाने लगे। लगे भौंचक ताकने उसे निपट देहाती जवान को। जो दांत भींचे, नथुना फुलाए, अगियाया हुआ खड़ा था, बोल कुछ नहीं रहा था गोया मार कर भाग जाएगा। कन्हैया जी को तो कुछ सूझा नहीं, प्रभाकर जी को खोदिया दिया। देख तो उसे वह भी रहे थे पर अनदेखा किया। रम में डूबे रहे। कन्हैया जी ने खोदियाया तो वह कुछ बोलते-बोलते अटके, आ-आ किया और उंगलियां मुंह में धुसेड़ दीं उ हूं हूं कहते हुए।

‘का हुआ भाई कांटा गड़ गया का प्रभाकर जी।’ पूछ रहे हैं कन्हैया जी।

‘कांटा नहीं गड़ेगा।’, जवाब दे रहे हैं जवान जी, दरवाजे में भिड़े, कुछ-कुछ उठंगे हुए से टेक लिए हुए से, ‘अकेले-अकेले मछरी भकोस रहे हैं, शराब ढकेल रहे हैं। जनता का चूतिया बना रहे हैं। हम को चार दिन हो गया। न काम करा रहे हैं न खिया रहे हैं। दुई जून से हम भुखाए हैं। लेकिन दरवाजा बंद कर के अपने मुर्ग मोसल्लम उड़ा रहे हैं, मछरी भकोस रहे हैं। अरे हमहूं से कब्बो एको बेर झुठहूं पूछे हैं, का हो खइबा। भुलाऊ के नाहीं। दलाल ले के बइठ गए हैं। भकोस रहे हैं।’

‘त करें का? बोल! करजा खाएं हैं का तोर।’ बोल रहे हैं विधायक प्रभाकर जी। कुछ-कुछ तल्ख़ी में, कुछ-कुछ नरमी में।’

‘नाहीं करजा त हम खाए हैं न वोट दियाने का। बूथ बटोरवाने का। आइएगा अब की क्षेत्र में। फइसला होई जाएगा कि कवन किस का करजा खाया है। बुझा जाएगा अब की जो एक्को वोट हमरे जवार से पा जाएं।’ बिगड़ रहा है जवान।

‘ठीक है। ठीक है। जो भाग इहां से। वोटवे नाई देबे। मत दीहे, जन दियइहे। भाग भोंसड़ी के इहां से। मार सारे के भगाव इहां से। ससुर! अब रोज पचास जने यहां आते हैं। सब को खिलइबै करेंगे। भाग इहां से। भगाव इस को भाई।’ बमक रहे हैं विधायक जी बिलकुल ‘बम-बम’ स्टाइल में।

जवान का भी धीरज टूट गया है। फूट पड़ा है। लगभग रोने लगा है। रोने लगा है और दहाड़ रहा है, ‘हां हां गाल मीजवा लिए हुए होते वोह रात। जो मउगई कर रहे थे चुपचाप करने दिए होते। चूमने चाटने दिए होते तब खियाते। अरे कहता हूं, फिर कहता हूं आइएगा। फिन ओट मांगने। तब बताऊंगा। तब हम बताऊंगा। बूझते का हैं अपने आप को। क्षेत्रा में शकल नाई देखाने पाइएगा। तब बूझिएगा। बूझिएगा तब।’

पूरे हाल की भीड़ इस बमचिक में बटुर आई है। प्रभाकर जी की रम रंगे हाथ पकड़ ली गई है। कन्हैया जी को मछरी अब माहुर जान पड़ रही है। पर प्रभाकर जी का आत्मबल कहीं से फिर बहिराता है, वह खड़े हो गए हैं। कुर्ते की बांह मोड़ी है, गरियाया है जवान को। कहा है, ‘गांडू साले!’ दिए हैं खींच कर इस कनपटी, उस कनपटी को थप्पड़ और गरजे हैं, ‘भोंसड़ी के भाग जाओ। नहीं मार लेंगे तुम्हारी यहीं पटक कर। भगाओ साले को यहां से।’ भीड़ को ललकार दिया है प्रभाकर जी ने। और भीड़ जुट गई है, गाली, लात-मुक्का और जवान का कोलाज बनाने में। कोलाज बन रहा है और कोहराम मच रहा है, आधी रात को। एकाध खिड़कियां, दरवाजे भी खुलने लगे हैं, खिड़कियों से दिख रही है, कुछ फ्लैटों में बत्तियां भी जलने लगी हैं।

कन्हैया जी समझ गए हैं, गड़बड़ जादे हो गई है। पर रम कम है सो वह नजाकत भी समझते हैं। एक लंबा पेग बनाते हैं, खटाक से उतारते हैं और बाहर आ जाते हैं। बोल पड़ते हैं, ‘चोर है, चोर है, चोर है।’ बस भीड़, कोलाज बनाती भीड़ को एक नारा भी मिल गया है, ‘चोर है, चोर है।’

शोर धीरे-धीरे थम रहा है। राय साहब भीतर ही भीतर अफना रहे हैं, लगता है जैसे वह बहुत बड़ा दांव हार गए हैं। मुंह बा कर जम्हाई लेते हैं, बोलते हैं, ‘हे राम, हे राम!’

‘का बाति है राय साहब,’ पूछ रहे हैं समुझ यादव, ‘कुछ बिला गया है का। कि कुछ चोरी हो गया है आप का भी?’

‘का हो गया है यादव। तुम को भी क्या मजाक सूझ रहा है। हमारे पास है ही क्या जो चोरी हो जाएगा?’ कहते हुए वह पहले धोती के फेंटे में बंधा रुपया टोह लेते हैं फिर सिरहाने रखे सिल्क के कुरते को सहेज लेते हैं। भर नजर।

‘नाहीं कुछ तो चोरी हो गया है। राय साहब।’

‘का मतलब है तुम्हारा यादव?’

‘यही कि लौंडा चिक्कन था!’

‘हां चिक्क्न तो था।’ लंबी सांस भरते हैं राय साहब, ‘और एहीं हमरे बगलिए में ससुरा दुई दिन सोया। का बताएं हमें का मालूम था, ससुरा एह तर नींद उड़ा ले जाएगा।’ कह रहे हैं राय साहब। कह रहे हैं और पछता रहे हैं। पछता रहे हैं कि काहें न एक बार उन्हों ने भी ट्राई कर लिया।

यादव जी ढाढस बंधा रहे हैं राय साहब को, ‘जादा पछिताएं नहीं। कल जा के जमानत करवा दीजिए उस का। फिर आप और ऊ। ऊ अवर आप।’

‘का पुलिस ले गई सारे को।’ पूछ रहे हैं राय साहब और बेकल हो गए हैं, ‘पुलिस वाले भी छोड़ेंगे नहीं साले को। काम लगा देंगे। साला सोया रहता तो का बिगड़ जाता। मछरी खाने गया था, खुदै मछरी बन गया....गोल्टू साला।’ कहते हैं राय साहब और एक टांग उठा कर हवा ख़ारिज करते हैं। तेज-तेज।

विधायक निवास के इस कक्ष के इस हाल में दरी पर लाइन से पसरे लोग अपनी नाकें दाबने लगते हैं। गोया लेटे-लेटे प्राणायाम कर रहे हों।

‘का खाए थे आज राय साहब।’

‘कवनो और बम त नाई बाकी है।’

‘चलो भाई सोने दो साइरन बज गया है।’

‘बत्ती बंद करो।’

तरह-तरह की मिली-जुली आवाजें हैं। बत्ती बंद हो जाती है।

पर एक आवाज अभी भी बुदबुदा रही है। वह है राय साहब की आह भरी आवाज। रह-रह वह उच्चार रहे हैं, ‘हे राम, हरे राम।’ उन्हों ने अब फिर टांग उठा दी है। धीरे से और बड़ी सहजता से।

‘हद हो गई राय साहब।’ कोई सोए-सोए ही बिगड़ता है।

‘हद क्या हो गई? अरे भिनसहरा हो गया है।’ कह कर राय साहब समस्या का निदान बता रहे हैं कि कारण? समझना कठिन है।

‘कठिन था उस जवान को भोगना भी।’ बता रहे हैं प्रभाकर जी, कन्हैया जी को।

‘क्या सुपाड़ा धर दिया था?’ जिज्ञासा है कन्हैया जी की।

‘त का वइसे ही बउरा गया था भोंसड़ी का।’ बिफरते हैं प्रभाकर जी।

‘जानता हूं, जानता हूं परभाकर जी।’ कन्हैया जी की जिज्ञासा शांत हो गई है। पर क्या करें वह इस तलब का। रम की तलब का और रम ख़त्म हो गई है। कैसे शांत करें वह इस तलब को। वह घड़ी देखते हैं। पाते हैं कि तीन बज गए हैं। कहां मिलेगी अब? सोच कर वह लंबी सांस छोड़ते हैं। सो जाते हैं, सो जाते हैं कन्हैया।

पर प्रभाकर जी? वह नहीं सो पाते। नहीं सो पाते। सोचते हैं, सुबह अख़बार देख ही कर सोएंगे। अख़बार में संध्या जी की फोटो देख कर सोएंगे। संध्या सिंघल की निर्वस्त्र जांघों की और जांघों के बीच की फोटो। वैसे भी क्या नींद आए। रंग रम का उतर गया है। उतर गया है नशा। उतार गया है जवान। वह चिक्क्न जवान। यह ख़ुमारी उतरने वाली नहीं है। उतरेगी ख़ुमारी तो अब संध्या जी के अंग-प्रत्यंग देख ही कर। अख़बार में छपे अंग।

अख़बार छप गए हैं, सुबह हो गई है। पर पौ अभी नहीं फटी है। अख़बार नहीं बटे हैं अभी घर-घर। अभी एजेंटों, हांकरों के हाथों वह गिने-बीने जा रहे हैं। पर हाकर आज हकबक हैं। बीस-पचीस आदमी जाने कहां से अतिरिक्त आ गए हैं। हाकर हैं नहीं, एजेंट हैं नहीं, ख़रीददार भी नहीं हैं। कौन हैं यह लोग? यह कोई नहीं समझ पाता।

समझ नहीं पा रहे हैं प्रभाकर जी भी कि अभी तक अख़बार क्यों नहीं आया। उन का चिर प्रतिक्षित अख़बार। संध्या जी के सांगोपांग वर्णन वाला अख़बार। कहा तो श्रीवास्तव ने यही था कि, ‘पत्रकार जी को पूरा पंप कर दिया है भाई साहब। चित्र तो छपेगा मय वर्णन के।’ पूरी गारंटी के साथ कहा था श्रीवास्तव ने। तो चित्र तो छपेगा ही। छपेगा भी क्या छप गया होगा। निश्चिंत हैं प्रभाकर जी। पर अख़बार क्यों नहीं आया अभी तक। यह सोच कर किंचित बेचैन भी हैं।

इधर मिसिराइन सन्न हैं फोटो देख कर। वह बिफरते हुए पूछ रही हैं, ‘यह इतनी फूहड़ फोटो।’

‘फूहड़ प्रसंग करेंगी तो फूहड़ फोटो नहीं आएगी मिसेज मिश्रा। सर्द किंतु सख़्त स्वर में सनक रहे हैं मिश्रा जी, ‘वह तो कहो भला हो उस पत्रकार का जिस ने बता दिया था कि फोटो छप रही है। समय से मालूम हो गया नहीं आज तो आप मुझे भी गवइया बना देतीं। किस-किस से गाता फिरता, नहीं बात ऐसी नहीं है, वैसी है। वैसी नहीं, ऐसी है।’

‘आप को मालूम था कि फोटो छप रही है?’ पूछ रही हैं श्रीमती मिश्रा, श्रीमान मिश्रा से।

‘हां मालूम था।’

‘ओह!’

‘इसी लिए। इसी लिए तो छपने नहीं दिया।’

‘ओह।’

संक्षिप्त सा संवाद देती हैं श्रीमती मिश्रा। और चद्दर ओढ़ पसर जाती हैं, सिर पकड़े। मिश्रा जी बकबका रहे हैं, अभी तो रोक लिया है। ले लिया है निगेटिव भी। पर जो आज यह ख़बर बन गई कि मंत्री ने निगेटिव ख़रीदे तो समझती हैं इस का मतलब? इस का मतलब है मंत्री नहीं रहेंगे हम। मर्यादा नहीं रहेगी कोई हमारी। सारी राजनीतिक कमाई एक फोटो में फिट हो जाएगी गायिका जी। बड़ी गई थीं समारोह में। मुख्यमंत्री से रगड़वाने। रगड़वाने की फोटो खिंचवाने। देखिए कैसे तो मुख्यमंत्री से दुबक कर चिपक कर खर्ड़ी हैं। मुख्यमंत्री साले से भोंपू बजवाती गोया स्तनों को दबवा नहीं रही, उद्घाटन करवा रही हों।’ बड़बड़ाते हुए बाहर निकल जाते हैं मिश्रा जी।

कार स्टार्ट होने की आवाज। शायद मुख्यमंत्री के यहां जा रही है कार। कार और शायद मिश्रा जी भी। श्रीमती मिश्रा फिर बोल रही हैं, ‘ओह।’

‘ओह।’ बोल रहे हैं इधर प्रभाकर जी भी। पन्ने पर पन्ने पलटे जा रहे हैं। व्यापार और खेल तक के पन्नों में आंखें डाल दी हैं , बसा दी हैं दोनों पुतलियां एक-एक कालम, एक-एक लाइन, एक-एक पेज में। पर नहीं मिलती है फोटो। संध्या जी की फोटो। श्रीवास्तव भी साला निरा चूतिया बना गया। अब वह क्या जवाब देंगे दिल्ली में अंसारी साहब को। वह सोच रहे हैं और बोल रहे हैं, ‘ओह।’ बिगड़ रहे हैं अपने ही पर कि क्या जरूरत थी रात ही अंसारी साहब को जगा कर यह बताने की कि छप रही हैं संध्या जी। छप जाएंगी सुबह तक। उधड़ जाएगी उन की बुलंद देह, भारत की बुलंद तसवीर की तरह। काहें बताया था भाई। बरगलाया क्यों था भाई अंसारी साहब को। वह सोच रहे हैं निरंतर सोच रहे हैं, काहें, क्यों?

‘हे रमेसवा!’ वह चिघ्घाड़े हैं। हांफता, डांफता, भागता है रमेश विधायक जी के कमरे की ओर, ‘जी शाब।’

‘देखो दिल्ली से फोन आता है तो बताओ हम यहां नहीं हैं। दूसरे, श्रीवास्तव को घर से बुलवाओ। जल्द से जल्द।’

‘जी।’ और भागता है वह।

‘हे! सुन सारे, हई फोनवा तो उठा ले जो इहां से!’ निर्देशते हैं प्रभाकर जी रमेसवा को।

रमेश!

रमेश रंग है प्रभाकर जी का। रमेश राज है प्रभाकर जी का। प्रभाकर जी का राग है रमेश। दुख, सुख तन-मन में बसा है रमेश प्रभाकर जी के। दिन-रात सेवा करता है। दिन भर तो यहां-वहां दौड़ता भागता है। रात में भी जो प्रभाकर जी का तनाव बढ़ता है तो वह रमेसवा ही को बुलाते हैं, पैर दबाने के लिए और दाब देते हैं उसे। वह कभी ना नुकुर नहीं करता। नहीं करता आह ऊह। सदैव समर्पित। तेल पानी ले कर समर्पित। कभी सौतिया डाह भी नहीं उपजता रमेसवा के मन में। न ही वह दूसरों के दांव में आता है। यह कन्हैया जो अभी मुंह बाए नाक बजा रहा है, एक बार शौकिया गया। शौकिया गया पैर दबवाने के लिए। इसी कमरे में। रमेसवा आया निर्विकार पैर दबाता रहा ई कलमुहा कन्हैयवा जब उसे पलटने के फेर में चूमने-चाटने लगा तो एक ही झटके में परे कर दिया। बड़ी मान मनौव्वल की। नोट-सोट दिखाए। लेकिन रमेसवा राजी नहीं हुआ। कन्हैयवा कहता रहा अच्छा हाथ ही से कुछ कर करा दे, रमेसवा तिस पर भी तैयार नहीं हुआ। तैयार नहीं हुआ उस का ताव मिटाने को। लात मार खा लिया पर कन्हैयवा की आग नहीं बुझाई। यह सब कुछ एक झटके में सोच जाते हैं प्रभाकर जी।

रमेसवा प्रभाकर जी की देह का ही राज नहीं है, उन की राजनीति का भी राज है। उन को तो संभालता ही है, क्षेत्र से आए लोगों को भी संभालता है, चिट्ठी-पत्री, डील वील के भी हिसाब-किताब वही संभालता है। विधायक निवास के इस कक्ष का वही केयर टेकर है। इतने अनाचार के बावजूद पांव छूता है वह प्रभाकर जी का। क्यों पूजता है इतना प्रभाकर जी को यह रमेसवा?

चाकरी तो यहां करता है। कहने वाले कहते हैं यह प्रभाकर जी की एक लड़की पर मरता भी है। मर मिटा है उस बालिका पर। बालिका के बालपन पर । बिंध गया है उस का मन प्यार के उस तार की धार से। कि वह यह अनाचार भी सत्कार के स्वर में सहता है। सहता है और सिसकता है प्यार की पुकार में, परिताप में, पुरनम पापी प्यार के दुत्कार में, उस के दुलार में। क्या यह भी शार्ट शर्किट है? स्वार्थ है, साथ है, कि सांच है। क्या पता?

रमेसवा को भी नहीं पता।

देह के द्वैतवाद में दहलता वह तो प्यार के पाश में, प्यार की फांस में, प्यार की आस में अफनाया हुआ ख़ुद को दफना रहा है। किसी वीणा, किसी वायलिन के वेग की तरह नहीं, किसी पिया की सेज की तरह नहीं, रमेसवा की तरह, रमेश की तरह नहीं। तरहें बहुत हैं इस प्यार के तार की। तार के मनुहार, अनुराग और आन की। आन ही रखा रहा है अपने प्यार की वह। पर अपनी आन मिटा कर।

क्या प्यार इसी को कहते हैं?

कि पलाश वन ऐसे ही जलते हैं!

जलते हैं जो ऐसे कैसे जिंदा रहते हैं?

जलालत का जंगल उगा कर, शायद के सपनों में, संभव के सांचों में, सिसकियों के सींकचों में, सर्द सन्नाटों, संकोच की सिलवटों में सने सहमे, संशय की रात में लोग कैसे सोते हैं। पर क्या कीजिएगा रमेसवा जैसे लोग ऐसे ही जीते, ऐसे ही सोते हैं। पर क्या सचमुच सोते हैं? सो पाते हैं भला! प्रभाकर जी सोने देते हैं कहीं?

जीने देते हैं कहीं?

जीने नहीं देंगे मिश्रा जी भी अब मुख्यमंत्री महोदय को। मिसिराइन का अपमान उन के मस्तक पर सवार है। राजनीति नहीं करनी होती तो वह गोली मार देते मुख्यमंत्री माधरचोद साले को। पर क्या करें राजनीति भी करनी है और हिसाब भी बराबर करना है। यही सब वह सोच रहे हैं। सोच रहे हैं कार में। जा रहे हैं कहीं कार में। लालबत्ती वाली कार में।

क्या रेड लाइट एरिया जा रहे हैं मंत्री जी। नहीं, वह तो जब पढ़ते थे तब जाते थे। ठेकेदारी करते थे तब जाते थे। अब तो जब से राजनीति शुरू की है तब से बात ही कुछ और है।

शुरू-शुरू में महिला कार्यकर्ताओं ही में छांट बीन कर लेते थे। इस के चलते वह कई बार फजीहत फेज से भी गुजरे। दो बार तो पार्टी से निष्कासन झेलना पड़ा। कुछेक बार शर्मिंदगी। लंबी शर्मिंदगी। पर क्या करें, यहां-वहां मुंह मारने की उन की बान पड़ गई थी। छुड़ाए नहीं वह कभी यह आदत। न ही छूटी उन से कभी यह आदत।

पर वह मुख्यमंत्री की आदत छुड़ाने निकल पड़े हैं।

विवाहेतर संबंध उन के भी बहुतेरी सुंदरियों से हैं, फिल्म हीरोइनों तक से हैं। पर इस का मतलब यह थोड़े ही है कि वह सार्वजनिक तौर पर ही उन का मान मर्दन करते चलें। तो क्या उन की पत्नी के भी मुख्यमंत्री से विवाहेतर संबंध हैं?

क्या पता?

इन औरतों की इस मामले में कोई सीमा रेखा तो अब रही नहीं। संग रहती हैं किसी के, प्यार किसी से और ‘व्यवहार’ किसी से। उपभोक्ता संस्कृति की सब से ज्यादा शिकार औरतें ही तो हुई हैं। वह सोचते हैं और ‘शिकार’ शब्द पर जरा ज्यादा देर तक सोचते हैं।

सोचते हैं कहीं मुख्यमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल में इसी लिए तो नहीं ले लिया है कि वह मेरी पत्नी निर्मला मिश्रा के कायल हैं।

कायल हैं निर्मला मिश्रा के।

कि निर्मला पाठक के?

वह पछताते हैं। पछताते हैं अपने कई फैसलों पर।

अव्वल तो इस गायिका से शादी करने के फैसले पर। घर द्वार नाते-रिश्तेदार से झगड़ा मोल ले कर। दूसरे, निर्मला जी को शादी के बाद भी सार्वजनिक जीवन जीने देने का सम्मान दे कर, खुला जीवन जीने की रियायत दे कर।

वह पछताने लगते हैं। पछताने लगते हैं कि सुबह-सुबह वह मुख्यमंत्री के यहां क्यों जाने का फैसला कर बैठे।

बीच रास्ते ही में ड्राइवर को वह ‘काशन’ दे देते हैं, ‘वापस घर चलो।’ कहते हैं और सोचते हैं कि क्या सचमुच निर्मला, निर्मल नहीं है? मैल है क्या कहीं उस के मन में, कहीं उस के तन में, तन-मन के तंतुओं में, तंतुओं की शिराओं में, शिराओं की कोशिकाओं में, उपकोशिकाओं में भी?

लेकिन उस का निर्विकार टटकापन? खुलापन?

टोटका तो नहीं है?

क्या पता!

मिश्रा जी का मन बड़ा उद्विग्न है। मलिन है, खिन्न है। खिला-खिला मन अचानक कुम्हला गया है किसी कुम्हड़े की बतिया की तरह। बसिया गया है मन, बिलबिला गया है, जैसे कहीं कुछ महत्त्वपूर्ण बिला गया हो।

बुझ गए हैं वह।

इतना कि घर भी जाने का मन नहीं हो रहा उन का। फिर बीच रास्ते ही में ही ड्राइवर को ‘काशन’ दे देते हैं, ‘गेस्ट हाउस चलो।’ चल देता है ड्राइवर स्टेट गेस्ट हाउस।

सुबह अब सुनहरी हो रही है। पर यह सब है क्या? संत्रास, सांघातिक तनाव, शंका, शील, संकोच, सनक कि शेम-शेम?

आख़िर क्या घुमड़ रहा है मिश्रा जी के मन में कि फ्रूट चाट की तरह, मिक्स वेजीटेबिल की तरह यह सब कुछ एक साथ उमड़ रहा है, घुमड़ रहा है! समझना कुछ नहीं, बहुत कठिन है।

वह ख़ुद भी नहीं समझ पा रहे हैं। शायद इसी लिए वह मुख्यमंत्री के यहां जाते-जाते नहीं गए हैं। घर नहीं जा रहे हैं। स्टेट गेस्ट हाउस जा रहे हैं। आख़िर यह किस कूटनीति का कोलतार है, कोबरा है कि कोई कोलाज है।

यह कूतना भी कठिन है। किंचित कठिन है।

और निर्मला मिश्रा?

उन पर यह सुबह भारी है। और इस सुबह पर भी भारी है सितार। वह तारों को पूरे सुर में साधे हुई बजा रही हैं सितार और उच्चार रही हैं....‘या वीणा, वरदंड मंडित करा या श्वेत पद्मासना।’ पर सितार तो पूरे सुर में है लेकिन उन का स्वर मद्धम है। बहुत मद्धम है। हालां कि वह अपने आप से भीतर ही भीतर कहती भी जा रही हैं कि स्वर बहुत मद्धम है, इसे जरा जाहिर करिए। जाहिर करिए निर्मला मिश्रा। पर यह जाहिर करना शायद उन के हाथ में नहीं है। उन के वश में नहीं है। वह विवश हैं। वह तो सितार के तारों को सनका कर जैसे अपनी सुलगती सासों को सनका देना चाहती हैं। अपने आप को भस्म कर देना चाहती हैं। ऐसे में वह उच्चार क्या फुंफकार रही हैं, ‘या कुंदेंदु तुषार हार धवला....।’

सितार, संगीत और स्वयं को वह एकमेव कर देना चाहती हैं। अचानक ही वह ‘या कुंदेंदु....’ छोड़ कर ‘झीनी-झीनी, बीनी चदरिया’ पर आ गई हैं। पर वह पा रही हैं कि सितार तो उन से सध रहा है। पर स्वर नहीं साध पा रही हैं वह। आवाज उन की भर्रा गई है। पर टेर रही हैं, ‘घट-घट में पंछी डोलता, आप ही डंडी, आप तराजू, आप ही बैठा तोलता।’ वह उच्चारती जा रही हैं, ‘आप ही बगिया, आप ही माली, आप ही कलियां तोड़ता।’ बिलकुल किशोरी अमोनकर के से शास्त्रीय अंदाज में। हालां कि वह गाना चाहती हैं, ‘मोहि चाकर राखो जी।’ पर ‘सुर’ नहीं फूटता। वह सन्न हैं। बंगले के संतरी भी सन्न हैं। सन्नाटे में हैं कि आज मेम साहब को क्या हो गया है?

संतरी आपस में एक दूसरे को घूरते हैं। एक संतरी पैर से गमले को हिलाता है और अपनी राइफल ढीली छोड़ कहता है, ‘बरसै कंबल भीजे पानी।’ कह कर मुसकुराता है और बंगले में खड़े ताड़ वृक्ष को निहारने लगता है।

तो यह क्या है? देह का दंश है की दंश की देह?