दो कैमरों से बनती है फिल्म / जयप्रकाश चौकसे

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दो कैमरों से बनती है फिल्म
प्रकाशन तिथि :04 अक्तूबर 2017


आज फिल्म उद्योग में साधनों की कमी नहीं है परंतु कथा का अकाल है। एक प्रमुख चैनल ने कुछ छात्रों का चयन किया है और उन्हें अगले दो वर्ष तक प्रशिक्षित किया जाएगा। इन छात्रों को प्रशिक्षण के दौरान वेतन भी मिलेगा और कुछ समय तक वे केवल उस चैनल के लिए ही काम कर पाएंगे। चैनल पूंजी और परिश्रम का निवेश कर रहा है, अत: लाभ पर भी उसका अधिकार है। एक दौर में शरीर विज्ञान के छात्रों से भी अनुबंध किया जाता था कि वे अपनी सेवाएं गांव के अस्पतालों को देंगे परंतु हमारे यहां कागज का तो मोल है परंतु उस पर लिखे अनुबंध का मोल नहीं है। हर करेंसी नोट पर भी मूल्य का करार अंकित रहता है परंतु कोई मांगता नहीं। सारा खेल एक भरोसे पर चलता है। कभी-कभी करार तोड़ दिए जाते हैं, मुद्रा में परिवर्तन कर दिया जाता है। कतारों में खड़े लगभग दो सौ मनुष्य मर जाते हैं परंतु हुक्मरान के माथे पर बल नहीं पड़ता, क्योंकि 'मिट्‌टी का तो है मोल मगर इंसानों की कीमत कुछ भी नहीं।' उसकी लोकप्रियता उस विभाजन पर टिकी है, जो वह कर चुका है परंतु सरहदें अवाम को नज़र नहीं आ रही हैं। कई बार दिल के भीतर जमी काई से आंख देखी नहीं जा सकती। 'थम गया पानी, जम गई काई, बहती नदिया ही साफ कहलाई।'

पटकथा लेखन सिखाया जा सकता है और इस विधा पर अंग्रेजी भाषा में अनेक किताबें उपलब्ध हैं। कल्पनाशीलता विकसित की जा सकती है। बच्चों का खिलौना तोड़ना शुभ संकेत है। वह जानना चाहता है कि यह कैसे चल रहा है। जो बच्चा खिलौने सहेजकर रखें, उसके विषय में चिंता की जा सकती है। स्मरण आती है निदा फाज़ली की रचना, 'यह दुनिया जादू का खिलौना है, मिल जाए तो माटी है, खो जाए तो सोना है।'

सवाल यह है कि क्या कोई भी विधा केवल उसके गहन अध्ययन से सीखी जा सकती है या कुछ जन्म के साथ ही उपलब्ध हो जाती है। प्रतिभा और परम्परा का गहरा रिश्ता है। प्रतिभा परम्परा से प्रेरणा लेकर अपने निजी योगदान से उसे समृद्ध करती हुई आगे चलती है। हर मनुष्य एक कथा है, हर चेहरा एक अफसाना है। इस शाश्वत सत्य को अनदेखा करके, हमारे फिल्मकार और कथाकार विदेशी माल उड़ाने पर ही ध्यान देते हैं। कोरिया और ईरान जैसे छोटे देशों से फिल्में उठाई जा रही हैं।

इस समस्या का एक निदान यह है कि स्कूली पाठ्यक्रम में ही सिनेमा आस्वाद को शामिल कर लिया जाए, जिससे हमें प्रशिक्षित फिल्मकार और दर्शक दोनों ही मिलेंगे। दरअसल, हमने शिक्षक परम्परा को ही खो दिया है। शिक्षा के लिए भव्य भवन बना लिए, सारा तामझाम कर लिया है परंतु असल चीज खो दी।

जब गुरु द्रोणाचार्य कुरुवंश के बालकों के साथ जंगल पहुंचे तो उनसे पूछा गया कि उनका आश्रम कहां है? उन्होंने अपने छात्रों से परिश्रम कराकर अपना गुरुकुल गढ़ा। यह गुरुकुल गढ़ना ही उनके पाठ्यक्रम का अंग था। पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण सबक उन्होंने बाद में सिखाया जब शिक्षा पूरी होेने पर आश्रम को आग लगाने की आज्ञा दी। दुर्योधन ने विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि आखिरी पाठ यही है कि संपत्ति से मोह मत करो। एक ही पाठशाला और एक ही गुरु के छात्र कितनी विपरीत दिशाओं में गए। चैनल युवा वर्ग को फिल्म लिखना और बनाना सिखाने जा रहा है परंतु परम आवश्यकता यह है कि युवा अपने देश और उसकी संस्कृति को पहले समझने का प्रयास करें। आप जिस दर्शक के लिए फिल्म बनाना सिखा रहे हैं, पहले उस दर्शक के अवचेतन को समझने का प्रयास करें। मायथोलॉजी के रेशों से बुने हुए अवचेतन में आधुनिकता के साथ निरंतर संघर्ष चल रहा है। मायथोलॉजी के अंधेरे और आधुनिकता के उजाले ने मिल-जुलकर एक धुंध रच दी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 'बाहुबली' की सफलता है। 'बाहुबली' तर्कहीनता व कूपमंडुकता का उत्सव मनाती है और इसे अधिकतम लोगों ने पसंद किया है गोयाकि हम तर्कहीनता कभी नहीं त्यागेंगे। आधुनिकता आपके दरवाजे पर दस्तक दे रही है, आप भीतर की सांकल खोलना चाहते हैं परंतु कुरीतियों की जंजीर से आपके पैर बंधे हैं। भारत के इर्द-गिर्द एक तिलस्म है, जिसे तोड़ना आसान नहीं है। आधुनिकता कोई विद्रोह नहीं है। यह एक दृष्टिकोण है। धंुध के परे जाकर देखने का प्रयास है। प्रतिभा को मांजते रहना परम्परा का विरोध नहीं है।

ज्ञातव्य है कि सिनेमा के आविष्कार के बाद फ्रांस के दार्शनिक बर्गसन ने कहा था कि मनुष्य क मस्तिष्क की तरह ही कैमरा काम करता है। मनुष्य की आंखें इस कैमरे की लेंस हैं। अांखों से लिए गए चित्र याद के कक्ष में एकत्रित होते हैं और विचार की लहर इन स्थिर चित्रों को चलायमान करती है। मैकेनिकल कैमरा और मानवीय मस्तिष्क के कैमरे के बीच आत्मीय तादात्म्य बनने पर महान फिल्म का जन्म होता है।