नष्ट हो रहे फिल्मनीड़ की रक्षा? / जयप्रकाश चौकसे

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नष्ट हो रहे फिल्मनीड़ की रक्षा?
प्रकाशन तिथि : 13 सितम्बर 2014


शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर, जो अपने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वृतचित्र 'सेल्युलाइड मैन' के लिए प्रसिद्ध हैं, का कहना है कि हमारे उद्योग में मूक फिल्मों के दौर में 1700 फिल्में बनाई गई परंतु आज केवल सात के प्रिंट उपलब्ध हैं। इसी तरह हमारी पहली सवाक फिल्म 'आलम आरा' का प्रिंट भी नष्ट हो चुका है। भारत अपनी अधिकांश फिल्मों को खो चुका है आैर अनेक क्लासिक बुरी हालत में है आैर काल के विराट जबड़े में फंसी मदद की गुहार कर रही है। 'आवारा' की भी कुछ रीलों को नुकसान पहुंचा है। 'प्यासा' की भी कुछ रीलों ने अपना मौलिक स्वरूप खो दिया है। शिवेंद्र ने ही वर्ल्ड सिनेमा प्रोजेक्ट की सहायता से उदय शंकर की 'कल्पना' को सुरक्षित रखने का काम किया है। दुनिया के सभी फिल्म बनाने वाले देश अपनी फिल्म विरासत के प्रति संवेदनशील आैर संजीदा हैं तथा अनेक देशों ने अपनी सत्तर प्रतिशत विरासत बचा ली है। हम दिन दिन कंगाल होते जा रहे हैं।

हमने अपनी सांस्कृतिक विरासत काफी हद तक खो दी है, हमारे अनेक महान ग्रंथ काल कवलित हो गए हैं। हमारी कुछ इमारतों को हम बचा सकते थे। हम इतिहास को संभवत: गैर जरूरी समझते हैं आैर हमारी यह सभी मामलों की व्यापक लापरवाही का एक हिस्सा फिल्म विरासत के प्रति संवेदनहीन होना भी है। इस काम के लिए सरकारी प्रयास अफसरशाही का शिकार है। सन् 71-72 में ही भोपाल के सरकारी वाचनालय से गालिब की एक दुर्लभ किताब गुमशुदा हो गई आैर जब वह प्रति पाकिस्तान में किसी ने दो लाख रुपए में खरीदी तब हमें ज्ञात हुआ कि यह तो हमारे वाचनालय में थी। सांची दूध की तरह उसकी महान विरासत भी कुछ हद तक ही सही परंतु गायब तो हुई है। हमारे तमाम आकाशवाणी केंद्रों से महान शास्त्रीय संगीत के टेप नष्ट हो गए हैं, किताबें गायब हैं।

पूना का फिल्म आकाईव अब अस्त-व्यस्त हो चुका है। सेंसर द्वारा काटे दृश्य पूना संस्थान भेजे जाते रहे हैं, क्या वे सहेज कर रखे गए हैं। फिल्म प्रिंट के रेस्टोरेशन के विज्ञान एवं कला पर शिवेंद्र डूंगरपुर ने अपनी संस्था फिल्म हैरिटेज फाउंडेशन के तत्वाधान में मार्टिन स्कॉटसिस की संस्था तथा इटली की संस्था के सहयोग से 22 फरवरी 2015 से 28 फरवरी 15 तक मुंबई के पेडर रोड स्थित फिल्म डिवीजन के ऑडिटोरियम में एक कोर्स 'द फिल्म रेस्टोरेशन स्कूल ऑफ इंडिया' का आयोजन किया है आैर इस कला तथा विज्ञान पर ज्ञान देने के लिए स्वयं मार्टिन स्कॉटसिस मौजूद होंगे। फिल्म फाउंडेशन बोर्ड में वुडी एलेन, एंग ली, स्टीवन स्पिलबर्ग, जार्ज लूकास, रोबर्ट रेडफोर्ड, फ्रांसिस फोर्ड कपोला जैसे अनेक महान फिल्मकार सदस्य हैं। इस कोर्स में फिल्म को कैसे रिस्टोर किया जाता है इसका प्रशिक्षण दिया जाएगा। पूरे भारत से चालीस लोग चुने जाएंगे आैर चुने जाने के लिए 15 सितंबर से आवेदन पत्र लिए जाएंगे। इन्हें ऑन लाइन प्राप्त किया जा सकता है- www.filmheritagefoundation.com.in इसकी फीस पचास हजार रुपए हैं परंतु साक्षात्कार के समय योग्य व्यक्तियों को यथेष्ट सहायता दी जा सकती है। शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ने बताया कि कोर्स पूरे करने पर प्रमाण पत्र दिया जाएगा तथा जिन देशों में यह काम होता है, वहां अवसर भी मिल सकता है। यह संभव है कि भारत में ही यह कार्य इतनी प्रचुर मात्रा में किया जाएगा कि यहां भी अवसर बन सकते हैं। बहरहाल सरकार एवं उद्योग की संस्थाआें से भी फिल्म प्रिंट संरक्षण के कार्य के लिए प्रार्थना की जाएगी। यह भी संभव है कि भारत के ही सिनेमा प्रेमी पूंजी जुटा दें आैर फिल्म संस्कृति की रक्षा की जा सके।

दरअसल यह सारा कार्य अत्यंत कठिन है परंतु सरकार, संस्थाआें एवं दर्शकाें की मदद से किया जा सकता है। यह सचमुच प्रसन्नता की बात है कि शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर को इसका जुनून है आैर अब तक इस कार्य के लिए वे अपनी जेब से बहुत धन कर्म कर रहे हैं तथा धन से कही अधिक समय आैर ऊर्जा इसमें लग रही है। इस तरह का जुनून ही इस कार्य को संभव बनाएगा। दुनिया में जुनून ही महत्वपूर्ण है। आसिफ की लव एंड गॉड में दृश्य है कि बादशाह नमाज पढ़ रहे हैं। लैला की याद में खोया जुनूनी मजनू उनके सामने से गुजरता है। बादशाह खफा होकर कहते है कि मजनू तेरे यहां से जाने पर उनकी इबादत में खलल पड़ी है। जुनूनी मजनू का जवाब है कि "वह तो कहां जाता है, यह खबर नहीं परंतु आप कितने बेमन से नमाज अदा कर रहे थे कि आपको मैं नजर आया परंतु मुझे तो लैला के अतिरिक्त कुछनहीं दिखता। आपकी इबादत में खोट है, मेरे इश्क में नहीं"।