पथ प्रदर्शक / नीरजा हेमेन्द्र

Gadya Kosh से
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यह स्थान पहले छोटा-सा कस्बा रहा होगा। समय के साथ विकसित होता हुआ शनै:-शनैः शहर का रूप ले रहा था। यहाँ मिश्रित आबादी है। एक तरफ मध्यम वर्ग, निम्न मध्यम वर्ग के साथ ही अत्यन्त निर्धन वर्ग के लोग हैं, तो दूसरी तरफ नवधनाढ्य वर्ग के लोगों के बड़े-बड़े बंगलेनुमा मकानों से यह कस्बा पटता जा रहा है। इन नवधनाढ्य लोगों में अधिकतर व्यवसायी व नौकरीपेशा हैं। शहर के पूर्वी छोर पर विकसित हो रहे क्षेत्र में अनेक सरकारी कार्यालयों की बिल्डिगें हैं। यह क्षेत्र व्यवस्थित रूप से बसा है। उसे इस शहर में स्थानान्तरित हो कर आये हुए कुछ माह ही हुए हैं। वह इस शहर के सरकारी चिकित्सालय में चिकित्सक के पद पर कार्यरत है। चिकित्सालय के विस्तृत कैम्पस में चिकित्सकों के लिए बने मकानों में से एक उसे भी आवंटित हुआ है। ये मकान आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित हैं। वह अपने साथ कुछ कपड़े व रोजमर्रा की आवश्यकता की कुछ वस्तुओं को ले कर आयी थी। घर की अन्य सभी आवश्यक वस्तुओं को अपने घर से इतनी दूर लाने में उसे कठिनाइयाँ महसूस हो रही थीं। अतः उसने अन्य वस्तुएं यहीं क्रय करने की सोचीं।यूँ भी वह अकेली है और उसकी आवश्यकतायें कम हैं अतः उसके इस घर में चीजें कम जगह अधिक थी।

उसकी दिनचर्या में दिन तो मरीजों को देखने में व्यतीत हो जाता शाम को घर में आ कर घर को सुव्यवस्थित करने के प्रयास व अन्य कार्यों को करते-करते थक कर कब आँख लग जाती, पता ही नही चलता। सवेरा होते ही फिर वही व्यस्तता भरी भाग दौड़ प्रारम्भ हो जाती। ये व्यस्तता भरे सात माह कुछ पलों की मानिन्द व्यतीत हो गये।

आज रविवार का अवकाश है। घर के दैनिक कार्यों को निपटाने के पश्चात् कुछ ऊब-सी होने पर वह बालकनी में आ कर खड़ी हो गयी। इस छोटे-से शहर के शान्त वातावरण में विस्तृत प्रकृति का हरा-भरा मनोरम रूप उसे आकृष्ट करने लगा। वह कुछ देर और खड़ी हो कर इनमें खो जाना चाहती थी। बालकनी के ठीक सामने अस्पताल है तथा उसके पीछे फूलदार क्यारियों से सुसज्जित हरे घास का विशाल मैदान। इस समय थकान में यह हरियाली आँखों को अत्यन्त सुकून दे रही है। अभी तक नई जगह में बसने की भाग-दौड़ में उसने कभी ध्यान ही नही दिया कि इस नये घर की बालकनी से बाहर का दृश्य कितना मनोरम लगता है। श्रावण माह प्रारम्भ हो चुका है। इस माह में चलने वाली पुरवाई का स्पर्श यूँ भी एक सुखद एहसास देताा है, तिस पर आकश में तैरते श्वेत-श्याम बादल के टुकड़ों से आँख मिचैली करती धूप धरती पर स्वर्ण रश्मियाँ बिखेरती प्रतीत हो रही है। वह काफी देर तक बाहर के नैसर्गिक सौन्दर्य को निहारती रही। वह एक बड़े शहर से आयी थी, और बड़े श्हरों में ऐसा विस्तृत प्राकृतिक सौन्दर्य कंक्रीट के जंगलों में गुम हो चुका है। स्थानान्तरण के पश्चात् जब वह यहाँ आयी थी तो उसे थोड़ी घबराहट हुई थी कि इस अनजानी जगह में उसे अच्छा लगेगा या नहीं किन्तु धीरे-धीरे यहाँ के शान्त वातावरण और अच्छे लोगों के कारण उसका मन काम में लगने लगा।

थोड़ी देर में बालकनी से वह कमरे में आ गयी। आज अवकाश की वजह से व्यस्तता कुछ कम ही थी। फुर्सत के ये कुछ पल उसे स्मृतियों में ले जाने लगे और वह वर्तमान पलों की उंगली थामें स्मृतियों में कहीं गुम होने लगी। चन्द वर्षाें पूर्व की ही तो बात है। उसका अपना घर था जिसमें वह अपने माँ,पिता, भाई-बहन के साथ रहती थी। वो दिन जितने अच्छे थे उतनी ही तीव्र गति से व्यतीत हो रहे थे। वह मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने वाली थी। उसका छोटा भाई अपनी शिक्षा पूरी कर के जाॅब के लिए प्रयत्न कर रहा था। उसके पापा सरकारी कर्मचारी थे। उनकी सेवानिवृत्ति में कुछ वर्ष ही शेष बचे थे। उसकी मेडिकल की शिक्षा पूरी होने में अन्तिम वर्ष शेष था। उसके पिता को अपनी पुत्री के विवाह की चिन्ता होने लगी थी। वह उसके लिए पेशे से डाॅक्टर लड़का ढूँढ़ने के लिए प्रयत्नशील थे। इस आपाधपी में उसकी मेडिकल की शिक्षा पूरी हो गयी। वह नौकरी के लिए प्रयत्न करने लगी, किन्तु यह प्रयत्न अपूर्ण रह गया। क्यों कि उसका विवाह तय हो गया। माँ- पिता जी ढ़लती अवस्था में अपनी जिम्मेदारियों का बोझ हल्का करना चाहते थे। वह उनकी विवशता को समझती थी, अतः विवाह के लिये हाँ करने में विलम्ब न कर सकी। पिता की उसका विवाह कर के जिम्मेंदारियों से मुक्त होने की इच्छा तो पूर्ण हुई, किन्तु डाॅक्टर दामाद की इच्छा अपूर्ण रह गयी। रमन सम्पन्न घर के व्यवसायी थे। मनचाहे भाग्य का निमार्ण कोई नही कर सका है। प्रारम्भ में तो सब कुछ ठीक था, किन्तु कुछ समय पश्चात् ससुराल के लोगों में एक छटपटाहट दृष्टिगत् हाने लगी कि वह घर के बाहर निकल कर नौकरी न करने लगे। उसे हतोत्साहित करने के लिए छोटी-छोटी बातों पर प्रताडि़त किया जाने लगा। परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों समय का पहिया समान गति से आगे बढ़ता रहता है।मेरे विवाह को डेढ़ वर्ष हो गये।छोटी नव्या गोद में आ गई। नव्या ने मेरे व रमन के एकान्त के पलों का सूनापन तो दूर कर दिया किन्तु शनैः-शनैः मेरे जीवन से खुशी के क्षण विलुप्त होते गये। मुझे याद नही कि मैं मुस्कराई कब थी?

रमन का व्यवसाय भी किसी प्रकार चल रहा था। मुझे छोटी-छोटी आवश्यकताओं कर पूर्ति के लिए भी सास-ससुर की तरफ देखना पड़ता था। नव्या के आने से आवश्यकतायें बढ़ गई थीं। रमन इन परिस्थितयों के आगे विवश थे।वह स्वयं को असहाय अनुभव करने लगी थी। माता-पिता से अपनी विवशता बताने में डरती थी कि कहीं उनका वृद्ध व कमजोर हृदय उसके दुखों को सुन कर टूट न जाये। अपने जीवन में प्रकाश की कोई किरण न देख वह इस अँधेरे से स्वयं को बाहर निकलने का मार्ग ढूँढने का प्रयास करने लगी। इस प्रयास में उसने साधन बनाया अपनी शिक्षा को। इस बात को उसने हृदय की गहराइयों से महसूस किया कि शिक्षा कभी व्यर्थ नही जाती। कुछ माह के प्रयास के पश्चात् वह चिकित्सक के पद हेतु आयोजित परीक्षा में सम्मिलित हुई। अब उसकी नियुक्ति यहाँ पर हुई है। यह सफलता उसे मिली तो रमन उससे दूर होते गये। ससुराल के कुछ रिश्ते तो टूट-से गये।

नव्या तीन वर्ष की होने को है। वह मेरे माता-पिता के पास रह रही है। यहाँ नई जगह नौकरी करते हुए उसकी समुचित देख-भाल न हो पाती इसलिए उसे मम्मी-पापा के पास छोड़ना पड़ा। रमन भी दिन में कई बार फोन कर के नव्या का हाल पूछते हैं। नव्या को देखने की अदम्य इच्छा प्रकट करते हैं, किन्तु जब से वह यहाँ आई है, रमन आ न सके हैं। वह उसने सुना है कि जीवन में कुछ पाने के लिए कभी-कभी कुछ खोना भी पड़ता है। नव्या के जीवन में खुशियों के उन पलों के समावेश के लिए जिनके लिए वह दूसरों पर आश्रित थी, वह कुछ छोड़ कर यहाँ आयी है। यह “कुछ” छोड़ने का साहस उसे नव्या से मिला है। रमन यह साहस न जुटा सके हैं।

सहसा मोबाइल की घंटी बज उठती है। उसे आभास-सा होता है कि किंचित् यह रमन का फोन तो नही है। वह बालकनी से कमरे से आती है। यह फोन माँ का है। माँ उसका हाल पूछतीं हैं, और नव्या से बातें करवातीं हैं। उसकी तुतली बातें उसे बहुत सुकून देती हैं। नव्या से बातें कर के उसे लगा कि जिस मार्ग पर वह चल रही है वह सही मार्ग है, छोटी नव्या ही उसकी पथ-प्रर्दशक है। वह फोन रख कर पुनः घंटी बजने की प्रतीक्षा करने लगती है।