पश्चिमी दर्शन में संरचनावाद / शिवप्रिय

Gadya Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

साँचा:GKCatShodh संरचनावाद का स्वरूप

‘संरचना (structure) शब्द से अमूमन अभिप्राय किसी ठोस आकृति या अभिरचना से लिया जाता है। परंतु दार्शनिक पश्चिमी ज्ञान मीमांसा में यह शब्द एक लंबी, जटिल एवं बहुआयामी सैद्धांतिक थ्योरी के रूप में जाना जाता है। वैसे तो ‘संरचना’ (structure) शब्द जिस पारंपरिक अर्थ में जाना जाता है, उसका आशय किसी ठोस निर्मिति अर्थात (building) आदि से लिया जाता है। यह इस शब्द की भौतिक स्थिति को मूर्तता में व्यंजित करता है। वहीं संरचनावाद के संबंध में यह कहा जा सकता है, कि वाद के रूप में न तो इसकी कोई भौतिक उपस्थिति दिखाई जा सकती है और न मूर्त (concrete) रूप दिया जा सकता है। यह जरुर है कि संरचनावाद में व्यक्त संरचनाओं को मानसिक प्रतिमान के रूप में उपस्थित किया जा सकता है, भौतिक उपस्थिति के उपरांत, लेकिन इन भौतिक ठोस उपस्थिति को संरचनावादी खाँचे में समझने के लिए एक गहरी अन्तरदृष्टि की अनिवार्य माँग बनी रहती है।

संरचनावाद में यह तय स्थिति है संरचानाएँ भौतिक गौचरता एवं ठोस मूर्तता से अपना बचाव करती है अर्थात न जीवविज्ञानी स्वरूप को अपनाती है न अन्य वैज्ञानिक ज्ञानानुशासन को, तो फिर इसकी उपस्थिति को कहाँ देखा जाना चाहिए ?

इसकी उपस्थिति की तलाश का आधारभूत क्षेत्र पहले से उपलब्ध ज्ञान मीमांसा एवं तत्व मीमांसात्मक प्रदेयों को मानने से इनकार करते हुए अपने लिए नये पटलों को सामने लाता है उदाहरण के लिए सांस्कृतिक संबंधों (cultural realities) नातेदारी (kinship), कथाओं( Tales), मिथकों (myth) और भाषाओं (language) आदि। इन सबों में एक बात समान है कि इनकी निर्मिति में प्रकृति (nature) की भूमिका नगण्य है। ये सभी सांस्कृतिक प्रदेय के रूप में जाने जाते हैं। इन संरचनाओं एवं इनके आदर्श प्रतिमानों की अवास्त।विक उपस्थिति मानवीय मस्तिष्क में होती है, न कि चराचर जगत में। संरचनावाद का सैद्धांतिक आग्रह इस बात पर है कि विश्व व्यवस्था संबंधों के संजाल से संयोजित है। बिना संबंधों के किसी वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं होता है। इन अंर्तग्रंथित सांस्कृतिक संबंधों को समझे बिना संरचनावादी समझ का विकास अधूरा है।

"Further, the theoretical approach offered by structuralism emphasizes that elements of culture must be understand in term of their relationship to the entire system.

पुनः संस्कृति के तत्व स्वव्याख्यायित नहीं हैं और अपनी अर्थ संयोजित व्यवस्था में आवश्यक रूप से प्रस्तुत करते हैं। अपने विश्लेषणात्मक आदर्शीकृत रूप में ‘संरचनावाद’ मानव मस्तिष्क की वैश्विक सोच प्रक्रिया को, जो कि संस्कृति ग्रंथित अर्थ विन्यास के स्तर पर ‘गहरी संरचना deep structure की उपज मानता है। “…..Structuralism is a set of principles for studying the mental superstructure" अर्थात संरचनावाद सिद्धांतों का वह समुच्चय है जो कि मानसिक अधि-संरचनाओं का अध्ययन करता है।

संरचनावाद की आधारभूत प्रस्तावनाएं (Basic premises)

- संरचनावादी नृतत्वशास्त्री दृष्टांतों द्वारा यह प्रस्तावित है कि “संपूर्ण विश्व की संस्कृतियों में ‘मानव चिन्तन प्रणाली’ की एक समता देखी जा सकती है। साथ ही मानव मस्तिष्क कार्यप्रणाली में यह द्विचर-विरोधी (Binary oppositions) में विन्यस्त है। उदाहरण ठंडा-गर्म, पुरुष-स्त्री, प्रकृति-संस्कृति, कच्चा-पक्का।”

- नृतत्वशास्त्री नातेदारी (Kinship), मिथकों, भाषा आदि के अध्ययन से अन्तरभुक्त सोच सरणि की गवेषणा करते हैं।

- सभी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में एक खास किस्म की छुपी हुई सच्चाई समाविष्ट होती है।

- सांस्कृतिक कार्यो, रिवाज़ों के पीछे मानवीय सोच आस्था की अप्रकट स्थितियों को सामने लाना ही संरचनावादियों का लक्ष्य है।

- संस्कृति के तत्व अपने आपसी संबंधीकरण द्वारा संपूर्ण चेतना को संवादयुक्त किस प्रकार बनाते हैं।

मानव मस्तिष्क की सोच प्रक्रिया में (deep structure) गहरी संरचनाओं की भूमिका सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में अर्थवत्ता की तलाश संरचनावादी चिन्तन का प्रमुख लक्ष्य रहा है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में ही संरचनावाद की उपस्थित को प्रस्तुत किया जा सकता है।

संरचनावाद का इतिहास (History of Structuralism)

संरचनावाद बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में अकादमिक जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। यह लोकप्रिय विद्या के रूप में भाषा (Language), संस्कृति (culture) और समाज (society) जाना जाता है। ‘संरचनावाद’ (Structuralism) शब्द द्वारा इसका नामाकरण फ्रेंच नृतत्वशास्त्री क्लाउड लेवी स्ट्रोस के द्वारा उनके कार्यो में किया गया। इस परिभाषिक नामकरण के अतिरिक्त संरचनावाद “संरचनावादी आंदोलन” के रूप में भी जाना जाता है। इससे जुड़े चिंतकों में मिशेल फूको, लिविस अल्थूजर, मनोचिकित्सक जैक लकाँ साथ ही संरचनावादी मार्क्सवादी निकोस पौलनताज आदि को जाना जाता है। यह एक अजीब स्थिति है, इस आंदोलन के साथ जुड़ी है कि लगभग तथाकथित आंदोलन के सभी सदस्य स्वयं को इससे अलगाने की प्रक्रिया भी साथ-साथ चलाते रहे हैं। संरचनावाद का व्यापक फलक समाजशास्त्र एवं भाषिकी में देखने को मिलता है।

‘संरचनावाद’ : अर्थ-निर्मिति के संदर्भ में

प्लेटो से लेकर आज तक साहित्यिक कृतियों संरचनाओं के अस्तित्व को तलाशा जाता रहा है। प्रकृति और कलाकृति का विवाद हर युग में अपना बहस चलाती रही है। विद्वानों का तो यहाँ तक कहना है कि ‘गणित, भौतिकी, सामाजिक विज्ञान, तर्कशास्त्र एवं प्राणी विज्ञान तक में संरचना की संकल्पना को देखने की कोशिश की जाती रही है। परंतु इस संरचनात्मक उपस्थिति के बावजूद 20वीं सदी के पश्चात् इसका स्वरूप वैचारिक उथल-पुथल का कारण क्योंि बन सका। यह दर्शन सबकी धारणा का केन्द्रवती बिन्दु के रूप में एक नये आंदोलन के रूप में क्योंो उभर सका?

क्लाउड लेविस्ट्रॉस ने 1945 में अपने एक आलेख जो कि वर्ड (word) एवं अपने प्रसिद्ध पुस्तक ‘एन्थ्रॉपॉलाजी स्ट्रांक्चर’ पेरिस (1958) में प्रकाशित कर संरचनावाद को एक नये रूप दुनिया के सामने लाने का महती कार्य किया। इससे आगाज़ी चिंतन, दर्शन एवं मनन का नया मॉडल दुनिया के सामने था।

“According to Alison Assiter, there four common ideas regarding structuralism that from on 'intellectual trend’. Firstly, the structure is what determines the position of each element of a whole. Secondly, structuralists belive that every system has a strucutre thirdly structuralistis are interested in 'structural' laws that deal with Coexistence rather then changes, and finally structures are the 'real things' that lie beneath the surface or the appearance of meaning”.

अर्थात संरचनावाद मूलतः सत्यता-बोध का सिद्धांत है, अर्थात गोचरता या यर्थाथता या विश्व हमारी मानसिकता एवं बोध या ज्ञान का हिस्सा किस तरह बनाते हैं। हम पदार्थो के सत्य रूप को किस तरह से उदबुद्ध करते हैं। वहीं अर्थोत्पत्ति हमारी चेतना किस प्रकार करती है। अर्थोत्पत्ति की प्रक्रिया कैसे कार्य संपादन करती रहती है? संरचनावाद की मह्ती भूमिका का निर्वहन यर्थाथता बोध से लेकर अर्थोत्पत्ति की कार्यपद्धति को दृष्टिगोचर करना ही है।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि संरचनावाद में संरचनावाद की वैचारिकी सास्युर से गृहित है। जहाँ भाषा की संरचना से आशय भाषा के विभिन्न तत्वों के मध्य संबंधों के इस संजाल के आंदोलन से कार्य और अर्थ अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं। सास्यूर भाषिकी को एक व्यापक विज्ञान मानते है और उसे संकेत विज्ञान (Semology) के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। वहीं यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि संकेतविज्ञानियों के लिए सर्वाधिक आवश्यक क्षेत्र ‘संस्कृति’(Culture) हैं।

संस्कृति के पीछे अमूर्त संबंधों का एक अत्यंत क्रियाशील तंत्र System है, जिसके कारण अर्थोत्पति का कार्य अनवरत् जारी रहता है। यह सर्वविदित है कि भाषा संस्कृति के मध्यमान में स्थित सर्वाधिक क्रियाशील तत्व हैं। नाना-दादी के किस्से कहानियों, मिथकों, पुरा-आख्यान, दंत-कथाएँ, रीति-रिवाज, रिश्तेदारियाँ, रहन सहन, साज-सज्जा, खान-पान, शिष्टाचार, तौर-तरीके, पर्व-त्योहार, मेले, खेल-मनोरंजन एवं मान (प्रतिबंध) आदि सैकड़ों कार्य संस्कृति एंव भाषा के उपयोग से संपादित किये जाते हैं। इन सभी कार्य-कलापों के पीछे संबंधों का एक मजबूत संजाल होता है और इसकी गतिशीलता से अर्थ अपना आकार ग्रहण करती है। इसलिए तत्वों में संबंधों का संजाल जो बिलकुल ही अमूर्त स्थिति को प्राप्त रहता है जो कि संगति एवं विरोध के दोहरे कार्य का वाहक है और जिसके बिना अर्थ-सृजन की कल्पना संभव नहीं, वही संरचना कहलाता है। (धातव्य है कि संरचना का यह रूप नई संरचना की संरचना एंव विन्यास की अवधारणा से बिल्कुल ही भिन्न है तथा इसका समायोजन किसी भी रूप में अथवा ‘ढ़ाँचा’ नहीं हो सकता हैं।)

स्पष्ट रहे, कि संस्कृति, भाषा, साहित्य के किसी व्यंजक या वर्ग की संरचना से आशय उस व्यंजक या वर्ग के तत्वों के बीच अमूर्त संबंधों का संजाल है, जिसके कारण अर्थ आकार ग्रहण पाते हैं। संबंधों के इस तंत्र की खूबी इस बात में निहित है कि इसमें हर पल स्वनियमन और स्व-संगति की प्रक्रिया धाराप्रवाह रूप से चलती रहती है, और हर बदलाव एंव रूपांतर अथवा वृद्धि के उपरांत संरचना अपने मूल वृहद रूप को स्पंदित कर लेती है। यह प्रत्येक दृष्टांत में संपूर्ण और प्रभावोत्पादक होता है। यहाँ कहा जा सकता है कि संरचना हर (दृष्टांत) इतिहास के आंतरिक अंग होते हैं और स्वतंत्र भी।

संरचना की संकल्पना यद्यपि अमूर्त संकल्पना है अतः इसे उदाहरण से समझना सरल नहीं, फिर भी इसके मूल तत्वों को प्रस्तुत करने का प्रयत्न दो दृष्टांतों में निम्न है। यद्धपि यह प्रयास इस संकल्पना को विशिष्ट रूप से साधारण करने का प्रयास ही माना जाएगा। दृष्टांत (क) ट्रैफिक बत्ती में प्रयुक्त रंग (वर्ण)। दृष्टांत (ख) राजनैतिक पार्टी के झंडों में प्रयुक्त रंग (वर्ण)। ट्रैफिक-बत्ती में तीन रंग होते हैं हरा, लाल और पीला।

यहाँ विदित है कि हरा-बढ़िये, लाल-रुकिये पीले से देखकर जाइए, सर्तक रहिए का अभिप्राय ग्रहण करते हैं। वहीं दृष्टांत (ख) के अनुसार लाल से मार्क्सवादी झंडे का आशय ग्रहण करते हैं। दोनों ही दृष्टांतों में इन रंगों (वर्णो) का सामान्य अभिप्राय नहीं हैं। यूँ तो साधारणतया हरे से उर्वरता, लाल से सुदृढ़ता, पीले से मांगलिकता का बोध होता है। किन्तु यहाँ दृष्टांत (ख) में लाल-क्रांति, हरा-मुस्लिम समाज, पीला-हिन्दुत्ववादी विचार का प्रस्तोता हो उठता है। अब अगर विचार करें तो यह देखा जा सकता है कि इन रंगों का कोई अनिवार्य संबंध इन दोनों दृष्टांतों से स्थापित नहीं किया जा सकता है अर्थात कोई भी रंग निसर्गतः(प्राकृतिक रूप से) कोई अर्थ नहीं रखता है।

ये अर्थ वस्तुतः उस संबंध तंत्र से उपजे है जो कि भिन्न-भिन्न दृष्टांतों में स्थापित किये गये हैं। यह संबंध संगति का भी है और विरोध का भी। लाल, हरा, पीला दृष्टांत (ख) के दृष्टि से देखे तो स्पष्ट ही है कि ये सभी झंडे एक संबंध के अन्दर अस्तित्ववान है किन्तु तीनों एक दूसरे के विरोधी भी हैं। ‘हरे’(वर्ण) से लाल का आशय कतई नहीं क्योंकि यह हरा एंव पीले से अलग संरचनात्मक अर्थ की संदर्भात्मक उपस्थिति दर्ज करता है। इन तीनों वर्णो (रंगों) का पारस्परिक संबंध अमूर्तता में संरचनात्मकता अर्थ उत्पत्ति में सहायक तत्व होते हैं। इस प्रकार दृष्टांत बदलने से अर्थवता प्रभावित होती हैं एवं यह तथ्य सामने आता है कि इस संजाल में कोई भी ‘संकेत’ स्वतंत्ररूपेण अर्थ नहीं रखता बल्कि वही अर्थ प्रस्तुत करता है जो कि उस अर्थगत संजाल (लाल-मार्क्सवादी, हरा-इस्लाम, पीला- हिन्दुत्ववादी) के अन्दर उसे प्राप्त है अतः संकेत एवं अर्थ का अर्थ मनमाना अथवा यादृच्छिक है। यह तो सांस्कृतिक अनुकूलन तय करती है कि किस वर्ण का क्या ‘अर्थ” सीमित किया जाए। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि संकेत निसर्गतः अर्थ नहीं रखता है बल्कि जटिल संजाल में संबंधों के कारण अर्थवत्ता को प्राप्त करता है।

सरंचनावाद एवं वैचारिक क्रांति

शताब्दियों से भाषा की प्रकृति, कलाकार के स्वतत्व, अर्थनिर्माण प्रक्रिया और ययार्थबोध के संबंध में सहजबुद्धि आधारित संकल्पनाएँ प्रचलित थी, संरचनावाद ने उन पर गंभीर आरोप किए है और ऐसे मूलभूत प्रश्नोंक को जन्म दिया है जिसका जबाव प्रचलित सिद्धांतों के दायरे से बाहर है।

साहित्य संसार मे समान्यतः जिन संकल्पनाओं से काम चलाया जाता है जैसे कि साहित्य जीवन का दर्पण है, अथवा साहित्य जीवन का व्याख्यायित करता है, आदि सभी संकल्पनाएँ ‘सहज बुद्धि’ की संकल्पनाएँ कही जाती है। इसके पीछे का तर्क ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’ से सम्मत होती हैं। सामान्यतः इन्हेंा सहज बुद्धि स्वाभाविक रूप से निसर्गतः प्रदत्त मानती है। स्वीकार करती चलती आयी है। संरचनावादी चिंतन ने इन सभी पूर्व-प्रदत्त सैद्धांतिकी को प्रश्नांकित किया है। न सिर्फ सिद्धांतों को बल्कि सहज बुद्धि की सत्ता को खारिज करते हुए उसे एक विचारधारात्मक निर्मिति (Ideological construct) माना है जो कि ऐतिहासिक स्थितियों पर स्थिर है और सामाजिक कार्य व्यवहार में हिस्सा लेती है। दूसरे शब्दोंा में किसी वस्तु या पदार्थ का स्पष्ट या स्वाभाविक प्रतीत होना स्वतः स्थापित न होकर विशिष्ट स्थितियों में, विशिष्ट बात-व्यवहार एंव प्रचलन की अधिकता के कारण वह ऐसी बन गई है कि स्पष्ट या स्वाभाविक प्रतीत होती है। लेकिन जरूरी नहीं वह चीज, वस्तु वैसी ही हो जैसा की उसे प्रस्तुत किया जा रहा हो।

‘सहज बुद्धि’ सम्मत निर्णय इसलिए मान्यता प्राप्त करते है कि उनकी उपस्थिति सहज होती है, भाषा के अंदर ‘उपस्थिति’ सत्य जिसे हम वाक् प्रदान करते हैं। सस्युर या संरचनावादी चितंन ने सर्वप्रथम इसे ही संज्ञान में लिया है कि तथाकथित रूप से यह ज्ञात होता है परंतु वस्तुतः भाषा पारदर्शी माध्यम नहीं है या इसमें उपस्थित वंचना, छल, कपट अस्पष्टता को नही देखा जा सकता। वरन संरचनावादी चिंतन भाषा को माध्यम मानने से इंकार करता है। वह भाषा को सिर्फ और सिर्फ ‘रुप’ मानता है और जिसके आर-पार नहीं देखा जा सकता। भाषा एक ‘रुप’ है जो पदार्थो और मानवों के दुनिया को निर्मित करने की और वस्तुओं, पदार्थो को उसके विभेदात्मक संबंधों के माध्यम से जानने, पहचानने की संभावना भर रखती है। भाषा पदार्थो, वस्तुओं को अपना जामा पहनाती है। संरचनावादी चिंतन भाषा के पारदर्श होने की संकल्पना को इंद्रियभ्रम और भ्रांति के सिवा कुछ भी नहीं मानती। यहीं आ कर “लेखक की मृत्यु एंव पाठक का जन्म” होता है।

वहीं दूसरी तरफ साहित्य का सर्वाधिक चर्चित सिद्धांत यथार्थवाद माना जाता है। संरचनावाद ने सबसे अधिक इसी पर प्रश्न उठाये हैं। संरचनावादी विचारकों ने अपने-अपने तईं इस पूर्वाग्रह को भ्रांति साबित किया है कि ‘व्यक्तिता’ अर्थ निष्पादन का केन्द्रवत्ती स्रोत है अर्थात मानव मस्तिष्क अथवा व्यक्ति का निजत्व अर्थ-निर्माण का मूल बिन्दु है। इसके उद्घाटन के साथ हीं सदियों से निर्मित अवधारणाएँ कि रचना ‘ययार्थ’ को प्रस्तुत को करती है, या कलाकृति (रचना) निर्माता की रचयिता की अंतर्दृष्टि को सामने लाता है या फिर यह कि ‘व्यक्तिकता’ कलाकृति की एकमात्र एंव सत्ता समर्थित अर्थ का निर्धारण करती है, पुनः स्थिति निर्धारण करती है, पुनः स्थिति निर्धारण हेतु विमर्श का विषय बनकर उभरा। क्यों कि संरचनावादी विचारों के आलोक में जो दर्शन आया, उसके आधार पर पूर्वकल्पनाएँ स्वतः निरस्तिकरण की ओर बढ़ रहे थे। यह विचार लेखन की पूर्वस्थिति से च्यूत (अलगाना) कर उसे लिप्यांतरण में निर्वासित कर रहा था। अर्थ क स्वामित्व लेखक से विस्थापित कर पाठक में समर्पित किया जा रहा था। इस संदर्भ में रोला बार्थ का कथन देखा जा सकता है।

“The author' and 'the scriptor' are terms Barthes uses to describe different ways of thinking about the creators of texts."The author" is our traditional concept of the long genius creating a work of literature or offer piece of writing by the powers of his or her original imagination. For Barthes, such a figure is no longer viable. The insight offered by an array of modern thought; including the insights of surrealism have renderd the term obsolete. In place of the author, the modern word presents us with a figure Barthes calls the scripter, whose only power is to combine pre-existing test in new ways. Barthes believes that all writing draws on previous texts, norms and conventions and that these are the things to which we must turn to understand a text. As a way of asserting the relative unimportance of the writer's biography compared to these textual and generic conventions, Barthes says that the scriptor has no past, but is born with the test. He also argues that in the absence of the idea of an "author God" to control the meaning of a work interpretive horizons are opened up considerably for the active reader. As Barthes puts it the death of the author is the birth of the reader.”

संरचनावाद और लूइ अल्थूसर

विचारधारा के मसले को भी संरचनावादी सोच ने हिला कर रख दिया। पूर्व के प्रचलित सामान्य आस्थापरक सहज-सुबोध सैद्धांतिकी जो कि विचारधारा से अपना ताना-बाना बुनती थी उसे उलटकर सोचने समझने के लिए खोल कर रख दिया। अल्थूसर का बहुचर्चित निबंध (Ideology and ideological state apparatuses :Notes toward an investigation) के अनुसार “The essay establishes the concept of ideology. Althusser theory of ideology as well Marx as draw on Freud’s and Lucan’s concepts of the unconscious and mirror phase respectively and describes the structures and systems the enable the concept of the self these structures, for Althusser are both agents of repression and inevitable .it is impossible to escape ideology ; to not be subjected to it. The distinction between ideology and science or philosophy is not assured once and for all by the epistemological break this break is not a chronologically event, but a process. Instead of an assured victory, for Althusser there is a continuous struggle against ideology: "Ideology has no history."

उपरोक्त प्रकरण से स्पष्ट है कि मार्क्सवादी विचारक लूई अल्थूसर ने मार्क्स और फ्रायड तक के चिंतन (“वर्ग संघर्ष “और “साइकोएनालिसिस”) को लेकर epistemological break* के दायरे में लाकर उसे प्रश्नांकित कर दिया है। विचारधारा को अल्थूसर संरचनावादी तर्क से समान्य, सुबोध मानने से इन्कार किया। यह वह सामाजिक राजनितिक स्थिति है, जिसमें हम जीवन बीताते हैं और यह इरादतन न होकर बिना सोचे समझे स्वीकार की स्थिति जैसी है। अल्थूसर केन्द्रवती संरचना का विरोधी है इसलिए वह सामाजिक तंत्र के लिए सामाजिक संघटन का शब्दबंध प्रयोग में लाता है इसकी विशेषताओं में केन्द्रहीनता एंव संरचनात्मक होना है।

अल्थूसर की जिज्ञासा का विषय आम नागरिक के जीवन में खास विचारों मूल्यां एवं जीवनदृष्टियों को आत्मसात् करने की प्रवृत्ति का विश्लषेणात्मक अध्ययन करना था। कि कैसे किसी और का विचार हमारा अपना विचार बनता चला जाता है? कैसे वह स्थिति आती है जब हम शोषण से भरी व्यवस्था में जीते हुए भी लगातार अपनी अत्यांतिक सत्य से अनभिज्ञता जाहिर करते हैं? अपनी स्थिति का सत्यभास क्यों नहीं हो पाता? वह कौन सी प्रक्रिया कि व्यक्ति स्वयं के प्रति अजनबी हो उठता है? इन सवालों से टकराते हुए अल्थूसर सबसे पहले विचारधारा और विचारधाराओं के बीच फर्क को प्रस्तुत करते हैं। विचारधाराएँ विशिष्टतापूर्वक आवधारणाओं का संग्रहीकरण की प्रक्रिया है। इनका एक ऐतिहासिक संदर्भ होता है। उदाहरण के लिए हिन्दुत्व की विचारधारा, जनतंत्र की विचारधारा, दलित चेतना की विचारधारा। ये सब एक दूसरे से अलग अस्तित्व रखती हैं और इनका एक ऐतिहासिक सामाजिक संदर्भ है। परंतु जब ये विचारधारा की बात करते हैं तो उनका आशय समाज की संरचना से होता है। वे विचारधारा को अपने मूल रूप में हमेशा एक संरचनाबोध से है और इसलिए वह शाश्वत है। विचारधारा मात्र का अपना कोई इतिहास नहीं है। वह हमेशा से मौजूद रही है। क्योंवकि अल्थूसर, मार्क्स की विचारधारा की अवधारणा को सिर्फ अमूर्त अवधारणाओं का समुच्च्य मानने से इंकार करते हुए उसे विर्मश, बिम्ब एवं मिथक के प्रतिनिधित्व का वह तंत्र मानता है जो उन वास्तविक संबंध से संपृक्त है, जिसमें आम लोग जीवन व्यतीत करते हैं। विचारधारा जगत से वास्तविक संबंध भी रखता है और काल्पनिक भी, वास्तविक इसलिए कि यह प्रणाली है पद्धति है जिसके अन्तर्गत व्यक्ति उन संबंधों को वरन करते हैं, जीते हैं, जो वे उन सामाजिक संबंधों से रखते हैं जो उनके अस्तित्व की स्थितियों को तय करती हैं और काल्पनिक इसलिए कि समाज स्वयं अपने अस्तित्व की स्थितियों को पूर्णतया समझ नहीं सकता और न उन खास स्थितियों के गुलाम हैं। अल्थूसर का कहना है कि विचारधारा संकल्पनाओं का ऐसा तंत्र नहीं है, जिसे समाज अपने दिमाग में लिये घूमता रहे अथवा जिसका प्रकटन भौतिकवादी संबंधों के किसी उच्च स्तर पर होती हो, बल्कि ये सामाजिक स्तर के अंदर सामाजिकों के कर्म की आवश्यक उपस्थित पर आश्रित है।

अपने प्रसिद्ध आलेख "Idiolagy and ideological state apparatures" (1970) में अल्थूसर विचारधारा के द्वारा व्यक्ति को अनुकूलित किये जाने की प्रक्रिया पर बहस करता है। वह विचारधारात्मक कृतियों को सामाजिक संस्थाओं की उपज माना जाता है। अल्थूसर इन्हें (संस्थानों को) Ideological State Apparatures की संज्ञा से विभूषित करते हुए उन्हें राज्य के दमनकारी उपकरणों जैसे पुलिस, सेना, न्यायप्रणाली इत्यादि से अलगाता है। न सिर्फ अलगाता है, बल्कि विचारधात्मक कृतियाँ जिन सामाजिक संस्थानों में पैदा की जाती हैं उन्हें। वह बेहद चालाकी से भरा मानता है। इस क्रम में वह पूँजीवादी वातावरण में शिक्षातंत्र को केन्द्रीय स्थान पर मानता है, जिसके अन्तर्गत बच्चों में इतिहास, सामाजिक अध्ययनों एंव साहित्यिक प्रशिक्षण के प्रयोग से शुरुआती दौर से केवल उन मूल्यों को बैठा दिया जाता है, जिनकी समाज (राज्य) अनुमति देता है और जो समाज के तंत्र से अपना सामंजस्य रखते हैं। इस प्रयोगशाला के सहायक प्रभावी तत्वोंग में परिवार, कानून, मीडिया एवं कला का योगदान निरंतर्य को बनाये रखने की भरपूर कोशिश करते रहते हैं। ये सबके सब उन विश्वासों एवं मिथकों को प्रचलित करते रहते हैं और दृढ़ बनाते हैं, जिनके अनुसार उपस्थित सामाजिक संगठन के अंदर मानव कार्य प्रवृत होता है। विचारधारा का निवास स्थल वास्तविक रूप से व्यक्ति है अर्थात व्यापक समाज के अंदर और उसका मूलकार्य जनता को व्यक्ति के रूप में निर्मित करना है।

संरचनावादी चिंतन प्रणाली में विचारधारा और भाषा अपना एक विशिष्ट संबंध व्याख्यायित करता है। संरचनावाद विधारधारा को इलहामात्मक सच्चाई (आत्म सत्य) नहीं मानता, बल्कि वह इसे भाषा के उत्पाद रूवरूप विमर्श के अन्तर्गत प्रश्रय देता है। विमर्श से आशय वह तर्कयुक्त संवाद है जिसे बोलने वाला और सुनने वाले की मिली-जुली पूर्वधारणाओं पर रूपायित होता है। इस प्रकार भाषा के अन्दर विमर्श एक रणनीतिक स्थिति कही जा सकती है जो अपने पूर्वधारणाओं के गूंथन से विशिष्ट हैसियत को प्राप्त करती है। इस तरह जब कोई घटना प्रधान स्थिति का वर्णन प्रस्तुत किया जाए तो वह वर्णन विमर्श की स्थिति को प्राप्त कर पाती है। किन्तु जब वर्णन में ‘स्व’ अर्थात वक्ता की उपस्थिति हो, वर्णन करने वाला और सुनने वाले की मनःस्थिति विषय को प्रभावित करने लगे, लेखक, पाठक को आंदोलित करने लगे तो इस प्रकार का वर्णन सरसरी तौर पर विमर्श की स्थिति होती है।

“The possibility of an infinite regress of discourse that merely recede ito ever murkier depth of disguised assumptions. Ceratainly threatens his work and he dose his best to avoid it by striving for a discourse that is trying to operate a decentering that leaves no privilege to any center ….. it dose not set out to be a recollection of the original or a memory of the trueth on the contrary its task is to make differences …. It is continually making differences …it is a diagnosis.”  

इसी क्रम में यह कहना अनुचित न होगा कि पूर्व की सर्वसुबोध प्रचलित सिद्धांतों के चाहे जितने भी रूप सामने आये वे सभी सर्वग्राही Ecclectic स्वरूप की रही थीं, कारण बिल्कुल स्पष्ट था कि शताब्दियों से चली आ रही वे विचारधाराएँ एवं सिद्धांत जो कि सहज बुद्धि की उपज थीं। उनके प्रचलन का एकमात्र और अंतिम कारण उनकी बनावट एवं बुनावट की सहजता और स्वाभाविक एवं सही होना था। चाहे वो मानवतावाद हो या अनुभववाद, यथार्थवाद, रोमांटिसिज्म, अभिव्यक्तिक यथार्थवाद चाहे वह अनुभववात्मक- विचारात्मक विवेक पर निर्भर करते हो, ये सभी के सभी ‘सहज बुद्धि’ की निर्मितियाँ थी। इन सबों का संरचनावादी विचार सारणी के आलोक में खारिज हो जाना एवं प्रश्नांकित हो जाना लाजिम ही था। संरचनावादी चिंतन ने वर्षो तक परंपरा से सिद्ध इन सारे सिद्धांतों को चुनौती देते हुए, भाषा जीवन और साहित्य के चिंतन की प्रणाली को बदल दिया।

उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध और बीसवीं शती के पूर्वभाग में दर्शन के क्षेत्र में खासी बिखराव की स्थिति देखी जा सकती है। चिंतन प्रणालियों में विशेषज्ञता विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित होकर इस स्थिति तक पहुँचा कि उनमें किसी प्रकार की कोई सूत्रबद्धता नजर नहीं आती। मानविकी के आधार ‘दर्शन’ तक भाषा के खेल में बिखर रहा था। चाहे वह विट्गेंस्टाइन का भाषा-दर्शन हो या फिर यूरोपीय विचारक सार्त्र का अस्तित्वाद सभी के छिन्न-भिन्न की स्थिति देखी जा सकती है। सभी विज्ञान अलग-अलग पूर्वाग्रहों पर आधारित थे और न सिर्फ एक दूसरे की उपेक्षा करते थे, बल्कि एक-दूसरे की मूल स्थापनाओं के कट्टर-विरोधी भी थे।

इन स्थितियों में संरचनावाद को अधिकाधिक विद्वानों ने वैचारिक, प्रत्ययात्मक अस्तव्यस्तता में संगति बैठाने वाला बैद्धिक आंदोलन मानते हुए इसे आगे बढ़ाया। एक खास किस्म की आवश्यकता के निमित्त जो कि दर्शन के क्षेत्र में आस्थापरक ताल-मेल बिठा सके। संरचनावाद सिर्फ एक दार्शनिक सिद्धांत और एक कार्य-पद्धति है। कर्म-पद्धति के रूप में संरचनावाद की वैचारिकता एक खास तरह के दायरे में सारे ज्ञानानुशासन एवं विज्ञानों में सामंजस्यता का आग्रह करता है। चाहे वह मानव मस्तिष्क की गवेषणा (मनोविज्ञान) हो या गेस्टाल्ट मनोविज्ञान। या फिर क्वांटम सिद्धांत सभी के शोधों से यह तथ्य सामने आता कि दृश्य जगत वहाँ स्थित नहीं जहाँ वह अवस्थित दिखता है। दृश्य-प्रपंच के कारण यह जगत हमें ठोस आकार में दिखाई देता है, यह सत्य से काफी दूरी पर स्थित सत्य के समान है। ठीक यही बात संरचनावाद भी कहता है कि जगत स्वतंत्र पदार्थो से संचालित नहीं और भाषा, पदार्थों के नामाकरण का संजाल नहीं है। शब्द पदार्थ का संबंध अवास्तविक है वरन यह विश्व-संबंध संजाल के वृहत संयोजन का अंग है जो किसी भी स्थिति में दृष्टिगोचर नहीं।

संरचनावाद में सास्यूर का कार्य

सास्यूर स्वयं एक लेखक न होकर जिनीवा विश्वविद्यालय में शिक्षक के रूप में पढ़ाते हुए जो व्याख्यान दिये उन्हें शिष्यों से ग्रहण कर उनके मित्रों ने जो पुस्तक छपवाई उसे (The Course in General Linguistics) के नाम जाना जाता है। इन्हीं व्याख्यानों में संरचनावाद और उत्तर संरचनावाद की नींव डाली ऐसा माना जाता है, कि Ferdinand De Saussure का व्याख्यान संग्रह 1960 तक अंग्रेजी में आया फिर भी सास्यूर के भाषा चिंतन की पेचीदगियाँ अभी भी समझे जाने की दरकार रखती है। सास्यूर से पहले आम समझ में भाषा को नामकरण से जोड़ कर देखने की परंपरा थी और माना जाता है कि भाषा शब्दों का वह संग्रह है जो अलग-अलग अर्थ रखते हैं एवं उन्हें परिभाषित भी किया जा सकता है लेकिन सास्यूर ने भाषा की आम परिभाषा को संज्ञान में लेते हुए इसे खारिज कर भाषा की संबंधपरक व्यवस्था को सामने लाया। जहाँ भाषा में प्रयुक्त हर शब्द उस भाषा व्यवहार से अपने प्रगाढ़ संबंध तंत्र में बँधे रहते हैं।

भाषा व्यवस्था और भाषा प्रयोग

सास्यूर द्वारा प्रस्तावित यह सबसे अधिक चर्चित और चिंतन की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण युग्म है। सास्यूर ने भाषा के जिस रूप की अवधारणा दी है वह एक ओर सामाजिक वस्तु है और दूसरी ओर अपनी प्रकृति में वह सतत् परिवर्तनशील और गत्यात्मक है। सामाजिक होने के कारण उसका एक पक्ष संस्थागत है, जिसे सास्यूर ने भाषा व्यवस्था की संकल्पना के द्वारा प्रस्तुत किया है। हर पक्ष परिवर्तनकामी होने के कारण भाषा-भेद भाषा की अपनी नियति है। इस पक्ष को उन्हों ने भाषा व्यवस्था के दायरे में सीमित किया है। भाषा व्यवस्था को सास्यूर ‘लाँग’ और भाषा प्रयोग को ‘पॉरोल’ की संज्ञा से समाहित करता है।

सास्यूर के शब्दों में:- "But what all language (langue)?

It is not to be confused with human speech (language) of which it is only definite part, through certainly an essential one. It is both a social product of the faculty of speech and a collection of necessary conventions that have been adopted a social body to permit individuals to exercise that faculty. Taken as a whole, speech is many sided and hetero geneous, straddling several area simultaneously-physical, physiological and psychological-it belongs both to the individual and to society; we cannot put it in to any category of human facts, for we cannot discover its unity.”

यहाँ देखा जा सकता है कि भाषा व्यवस्था (लाँग) एक संस्थागत स्थिति को प्राप्त कर रही है। इसका कारण वस्तुतः इसके समूहगत अनुबंधों का परिणाम होती है। वही दूसरी तरफ भाषा-प्रयोग (पॉरोल) के संदर्भ में सास्यूर ने जो विचार रखते उसे भी देखना उचित होगा "But to understand clearly the role of the associative and coordinating faculty, we must have the individual act, which is only the embryo of speech and approach the social fact.. Neither is the psychological part of the circuit wholly responsible; the executive side is missing for execution is never carried out by the collectivity. Execution is always individual and the individual is always its master: I shall call the executive side speaking. (Parole)"

इस प्रकार सास्यूर ने भाषा के प्रश्नोंu को आम समझ से ऊपर उठा कर एक संरचनात्मक रूप देने के लिए उसे दो युग्मों (लाँग और पॉरोल में विभाजित कर ‘भाषा व्यवस्था’ (लाँग) को सामाजिक संस्थान की तरह एक सामाजिक यथार्थ का रूप प्रदान किया। भाषा स्वयं में एक प्रतीकीकृत सामाजिक यथार्थ का रूप प्रदान किया। भाषा स्वयं में एक प्रतीकीकृत सामाजिक वस्तु के रूप में व्यक्ति से अपना सरोकार रखकर भी अपनी सीमाओं से मुक्त अस्तित्व रखती है।

इस तथ्य को संदर्भ रूप में देखते हैं “भाषा व्यवस्था (लाँग) और भाषा व्यवहार (पॉरोल) की बात करते समय आज के वैज्ञानिक प्रायः यह बात भूल जाते हैं कि सास्यूर ने इन दोनों को भाषा के दो अभिन्न पक्षों के रूप में स्वीकार किया था। सास्यूर के अनुसार ‘भाषा-व्यवस्था’ के रूप में लाँग और भाषा ‘भाषा-व्यवस्था’ के रूप में ‘पॉरोल’ एक-दूसरे का संदर्भ लेकर ही परिभाषित किए जा सकते है। भाषा तभी जीवंत मानी जा सकती है जब ये दोनों पक्ष संस्थागत और वैयक्तिक द्वंद्वात्मक प्रक्रिया की स्थिति में हों। भाषा-व्यवस्था (लाँग) को ही व्यक्ति विविध संदर्भों में भाषा-व्यवहार (पॉरोल) के द्वारा मूर्तमान बनता है। दूसरी ओर ‘भाषा-व्यवहार की विशिष्ट और मूर्तमान घटनाओं को हीं समाज अपनी सामूहिक चेतना में निर्विशिष्ट और साधारणीकृत रूप में ग्रहण करता है। इसलिए ‘भाषा-व्यवस्था’ (लाँग) और भाषा-व्यवहार सापेक्ष संकल्पनाएँ हैं।” स्वयं सास्यूर के अनुसार “Language is a well define object in the hetrogeneous mass of speech facts . It can be localized in the limited segment of the speaking circuit where an auditory image becomes associated with a concept. It is the social side of speech, outside the individual who can never create nor modify it by himself, it exists only by virtue of a sort of contract signed by the members of a Community moreover, the individual must always

serve an apprenticeship in order to learn the functioning of language, a child assimililates it only gradually. It is such a district thing that a man deprived of the use of speaking retains it provided the he understands the vocal sings that he hears.”

लाँग और पॉरोल के इस संबंध को पुनः एक उदाहरण के रूप में सास्यूर रखते है:- “First a state of the set of chessmen corpsmen corresponds closely to a state of language……….

In the second place, the system is always momentary; its varies from one position to the next……. rules that are agreed upon once and for all exist in language to; they are the constant principles of semiology.

Finally, to pass form one state of equilibrium to the next, or …….. Form one synchrony to the next only one chess piece has to be moved………

In each play only one chess piece is moved; in the same way in language, changes effect only isolated element.”

इस उद्धरण का प्रयोग सास्यूर ने भाषा के प्रयोग में लाँग और पॉरोल की स्थिति को समझाने के लिए किया है। शंतरज की बिसात बिछने को लाँग और उसके हर मुहरे की चाल को ‘पॉरोल’ की हैसियत प्राप्त होती है। एकबारगी न तो सारी चालें चली जा सकती है, ठीक उसी तरह भाषा के तंग में भी भाषा की मौजूदगी ‘लाँग’ है,तथा प्रयोग ‘पॉरोल’। इस तंत्र में मुहरों की चालें की तरह ही हर शब्द और वाक्य का अर्थ तंत्र अपना काम करता रहता। एक के बाद एक भाषा का प्रयोग भाषा के इस खेल को संपूर्ण बनाता है। ‘लाँग’ का अर्मूत होना तथा ‘पॉरोल’ से उपस्थिति का अभास कराया जाता है।

पुनश्च रामचंद्र तिवारी के अनुसार “लाँग’ को अन्तरवैयक्तिक भाषा-व्यवस्था कह सकते है और दूसरा ‘पॉरोल’ को व्यक्ति-विशेष की भाषा कहा जा सकता है। ‘लाँग’ अन्तःसम्बन्धित प्रतीकों की ऐसी सामान्य व्यवस्था है, जो पूरे समाज में वैचारिक संप्रेषण संभव बनाती है। यह व्यवस्था भाषा समुदाय के सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है। ‘पॉरोल’ का क्षेत्र सीमित है। व्यक्ति-भेद से उसका रूप बदल जाता है। ‘क’ का परोल ‘ख’ से भिन्न होगा। ‘पॉरोल’ वैज्ञानिक होने के साथ ही स्वच्छंद और परिवर्तनशील भी है। ‘लाँग’ के नियमों से ‘पॉरोल’ नियंत्रित होता है। ‘पॉरोल’ वैज्ञानिक होने के साथ ही स्वच्छंद और परिवर्तनशील भी है। ‘लाँग’ के नियमों से ‘पॉरोल’ नियंत्रित होता है। ‘पॉरोल’ व्यक्ति भाषा के रूप में ही ‘लाँग’ खंडशः मूर्त्त होता है। ‘पॉरोल’ के आधार पर भाषा के नियमों का अनुसंधान ही ‘संरचना’ है। प्रसिद्ध नृतत्ववेता लेवीस्ट्रोस ने इसी सिद्धांत को मिथकों के अध्ययन पर लागू किया। उसके अनुसार मूल मिथकों के अध्ययन पर लागू किया। उसके अनुसार मूल मिथक ‘लाँग’ है, तो अलग-अलग अपना रूप ‘पॉरोल’। ‘संरचनावाद के अनुसार हमें साहित्यक कृतियों में एक विशिष्ट एकता से युक्त संपूर्ण संरचना के रूप में देखना चाहिए। यह संपूर्ण संरचना परत-दर-परत इतनी जटिल होती है कि इसे अंगभूत उपसंरचनाओं-ध्वनि, छन्द, बिम्ब, पदविन्यास आदि के गुंफ के रूप में देखा जा सकता है। कृति विशेष की जटिल संरचना के विश्लेषण से प्राप्त सिद्धांतों के आधार पर अंततः साहित्य मात्र की रचना के मूल सिद्धांतों का अन्वेषण ‘संरचनावाद’ का लक्ष्य है। इसके अतिरिक्त संरचनावादी उन मानसिक क्रियाओं का अन्वेषण भी करना चाहते हैं जो कृति विशेष के पहले समय को समझने के प्रयत्न में पाठकों के द्वारा (आमतौर पर अनजान हो) निष्पादित होती है। यह होने पर भी ‘संरचनावाद’ के लिए रचना केवल शाब्दिक या भाषिक संरचना ही है।” उपयुक्त उदाहरण का प्रयोग संरचनावाद के अन्दर छिपी हुई संरचना के तात्त्विक विश्लेषण हेतु किया गया है। इसके अतिरिक्त सास्यूर ने इस भाषिक संरचना के लिए कुछ अन्य परिभाषिकी भी ईजाद की हैं उसे क्रमवार ढंग से आगे प्रस्तुत किया गया है।

The Course in General Linguistics के अध्याय पाँच में सास्यूर ने “Syntagmatic (विन्यासक्रमी)” और “Associative relations (सहचारीक्रमी)” दो नये पारिभाषिक को जन्म देता है, तथा भाषा की प्रतीक व्यवस्था में उनके कार्य करने के तरीकों पर प्रकाश डालता है। उनके मतानुसार “The syntagmatic relation is in praesetia . It is based on two or more terms that occur in an effective series. Against this, the associative relation unites terms in absentia in a potential mnemonic series. From the associative and syntagmatic viewpoint a linguistic unit is like a fixed part of a building e.g.a Colum. On the one hand, the Colum has a certain relation to the architrave that it supports; the arrangement of the two units in space suggests the syntagmatic relation, on the order hand, it the column is done, it suggests a mental comparison of this style with others (lonic,Corinthian) although none of the elements is present in space : the relation is associative.”

Syntsgmatic विन्यासक्रमी भाषा सास्यूर के अनुसार दो या दो से अधिक पद के बीच एक प्रभावकारी रैखिक स्थिति में घटित होता है। विन्यासक्रम में वाक्य की स्थिति उसमें प्रयुक्त समय एवं स्थान के क्रम में अनावश्यक रूप से मौजूदगी की माँग करता है।

“विन्यासक्रम, भाषिक संबंधों का वह माध्यम है जो प्रतीकों के रेखीय संयोजन से बनता है.......इस संयोजन व्यवस्था में हर भाषिक प्रतीक अपना मूल्य अपने पूर्ववर्त्ती के विरोध में निर्मित करता है।” उदाहरण ‘सीता राम की पत्नी है।’ इस वाक्य के स्थानों को भंग करने से अर्थ क्रम में व्यवधान जगह नहीं रखा जा सकता है। साथ ही साथ सीता या राम शब्द का प्रयोग से एक महाकाव्यात्मक चरित्र की उपस्थिति अनिवार्य हो उठती है। सीता स्त्री प्रतीक, राम पुरुष प्रतीक और पत्नी शब्द का अर्थ संबंध निर्धारण के संबंध में प्रयुक्त हो रहा है।

“सहचारक्रम सहचारक्रम, संबंधों का वह आयाम है जो प्रतीकों की वर्गयुक्त संकल्पना को आधार बनाता है” अर्थात यहाँ भाषिक समाज के पूरे वर्ग को, उसके भाषिक प्रयोग के विस्तार क्षेत्र को देखना जरुरी होता है। क्योंसकि प्रयोग करने वाले एवं ग्रहण करने वाले जरुरी नहीं की समस्थिति पर हों। सहचारक्रम में किसी निश्चित शब्द क्रम की माँग सास्यूर नहीं करते। "In associative relation the word have no order of succession, and it is by a purely arbitrary act."

"Terms in an also ciative family occur neither in fixed number nor in definite order."

इन दोनों क्रम संबंधों में अगर ताल-मेल नहीं हो तो व्यक्ति मानसिक रूप से रुग्णता का शिकार होता है। अर्थात “मौखिक व्यवस्था का संरचनात्मक रूप वस्तुतः प्रतीकों के विन्यासक्रमी और सहचारक्रमी संबंधों की द्वंद्वात्मक स्थिति का ही परिणाम होता है।” इन दोनों क्रमों के सही अनुपातिक मिश्रण ही उच्चारण एवं संप्रेषण क्रमों का निर्वहन करता है।

संकेत, संकेतित, संकेतक (Sign, Signified, Signifier)

भाषा के प्रयोग के पहले से चली आ रही मान्यता की वह पदार्थों के नामाकरण की प्रक्रिया को इसे (Linguistic sign units) भाषिक संकेत ईकाई का नाम पद्धति से अलगाते हुए भाषा, मात्र नाम की व्यवस्था की संबद्धता को इनकारते हैं। अगर ऐसा होता तो किसी एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद, लिप्यांतरण आदि का कार्य अत्यंत सरल हो जाता। भाषिक प्रतीकों में पाई जाने वाली अर्थ-विस्तार एंव अर्थ-संकुचन की प्रक्रिया को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। सास्यूर की विशेषता यह कि न केवल उन्होंकने भाषिक प्रतीकों की यादृच्छिक और परंपरागत प्रकृति की वास्तविकता को बहाल रखा बल्कि अपने भाषा वैज्ञानिक सिद्धांतों के मूल में उसे स्थापित भी किया। सास्यूर के अनुसार "The bond between the signifier and the signified is arbitrary since I mean by sign that whole that results from the associating of the signifier with the signified , I can simply say the linguistic sing is arbitrary यहाँ सास्यूर ने भाषिक चिह्नों को यादृच्छिक मानते हैं ।

“Our definition of the linguistic sing poses an important question of terminology. I call the combination of a concept and sound-image a sine, but in current usage the term generally designates only a sound-image, a word for example (arbor) one tends to forget that arbor is called a sing only because it carries the concept "tree" with the result that the idea of the sensory part implies the idea of the whole"

संकेत व्यवस्था यानी नामाकरण की पद्धति को उन्होंrने अपने भाषिक चिंतन में Signifier और Signified को रूप में विभाजित कर जो चिंतन का नया स्वरूप प्रस्तुत किया उसे यहाँ रखा जा रहा है

25.पूर्व से चली आ रही भाषिक या शाब्दिक समय को सास्यूर इस प्रकार प्रस्तुत कर “ध्वनि चित्र” को किसी एक शब्द का रूप दिया है। लेकिन समस्या वहाँ शुरु होती जब ^^Tree** के लिए ^^arbor** के अतिरिक्त भी कई अन्य शब्दों् का प्रचलन हो, फिर किसी प्रकार इसे व्याख्यायित किया जाए। इसी व्याख्या क्रम में Signifier और Signified का जन्म होता पुनः सास्यूर कहते हैं।

"Ambiguity would disappear it the tree notion involved here was designated by three names, each suggesting and opposing the others. I propose to replace concept and sound-image respectively by signified and signifier the last two terms have the advantage of indicating the opposition that separates term from each other and from the whole of which they are parts. As regards sign, if I am satisfied with it , this is simply because I do not know of any word to replace it , the ordinary language suggesting no other

यहाँ अस्पष्टता और उलझाव से बचने के लिए सास्यूर ने sign को बचाते हुए उसमें प्रचलित समझ और घ्वनि- चित्रों को हटाते हुए क्रमशः संकेतित और संकेतक को प्रस्तुत करती है।

अर्थात

Sign = Signified

Signifier

संकेत = संकेतित

संकेतक

सिद्धांत रूप में एक-दूसरे के उलट और विभेदक रूप में सामने लाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार सास्यूर भाषा में संरचना एक बार फिर से महत्व स्थापित करने में सफल होते हैं। यहाँ महत्वपूर्ण है कि शब्द पदार्थ का सिद्धांत खारिज कर एक विशाल शब्द संबंध व्यवस्था की ओर इशारा करते है। जो कि इसके पूर्व अनुपस्थित था। यह ज्ञान की एक नयी शाखा की ओर एक महत्वपूर्ण कदम था। जिसे “Semiology” के रूप में, संकेतविज्ञान के रूप में सास्यूर ने प्रस्तावित किया था।

एककालिक और कालक्रामिक भाषिक संदर्भ (Synchronic Linguistics, Diachronic Linguistics)

सास्यूर ने भाषा के प्रयोग और उसमें आने वाले बदलावों को दो भिन्न-भिन्न संदर्भो में देखा है। “सास्यूर ने युक्तिपूर्वक यह सिद्ध किया है कि भाषा का अध्ययन केवल उसमें अव्यवों को लेकर या मात्र ऐतिहासिक दृष्टि से नहीं करना चाहिए (जैसा कि उस समय सामान्य चलन था, बल्कि उन संबंधों के आलोक में करना, जिनके कारण भाषा के अवयव परस्पर संबंध रखते हैं और क्रियान्वित होते हैं, यानी भाषा का अध्ययन एक विन्यस्त ‘एकिकतंत्र’ के रूप में करना चाहिए। उसी प्रकार चूँकि भाषा का ‘ऐकिकतंत्र’ समय के किसी एक स्तर पर ‘आत्मनिर्भर’ होता है (जिसको हम प्रतिदिन बरतते और अनुभव करते है) अतः भाषा का अध्ययन ‘उपस्थित समय’ के स्तर पर संभव है। उपस्थित समय के अध्ययन को सास्यूर ‘समकालीन’ अध्ययन कहता हैं। पुनः सिद्ध करता है कि इस उपस्थित समय का अध्ययन ही वैज्ञानिक अध्ययन हो सकता है।” वहीं दूसरी तरफ रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव के अनुसार “भाषिक व्यवस्था के अध्ययन-विश्लेषण के लिए अध्ययन का एककालिक संदर्भ और भाषा विकास अथवा परिवर्तन के अध्ययन-विश्लेषण के लिए अध्ययन का कालक्रमिक संदर्भ।... भाषा एक ऐतिहासिक इकाई है, और इसलिए उसमें परिवर्तन आना एक स्वाभाविक बात है।.... सास्यूर का तर्क है कि भाषावैज्ञानिक अघ्ययन का लक्ष्य ‘प्रतीकों के संबंधों की व्यवस्था’ है और भाषिक परिवर्तन हमेशा इस व्यवस्था के बाहर की चीज होती है।” सास्यूर के शब्दोंा में:-

"It is possible for a language to change hardly at all over a long span and then to undergo radical transformation within a few years of two languages that exist side by side during a given period one may involve drastically and other practically not at all; study would have to be diachronic in the former instance, synchronic in the latter"

इस उदाहरण से भी देखा जा सकता है कि सास्यूर ने एक ही समाज के द्वारा प्रयुक्त दो भाषाओं के परिवर्तन अवधि के आधार पर एककालिक एंव कार्यक्रमिक अवधारणाओं की संरचनात्मक स्थिति को प्रस्तुत किया है।

संरचनावाद के पूरे वैचारिक आधार को प्रस्तुत करने हेतु, संरचना के तत्वों को सामने लाने के लिए सास्यूर का आभार संपूर्ण वैचारिक जगत एंव खासकर भाषा-वैज्ञानिक समाज मानता है। भाषा के संबंध में इनके तीक्ष्ण दृष्टि ने मानव समाज को देखने का, उससे अर्थ प्राप्त करने का विकसित एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान किया है।

संरचनावाद एवं रोमन यॉकब्सन के साहित्यिक भाषा निष्पादन का सिद्धांत 

यॉकब्सन भाषा प्रयोग वैज्ञानिक एवं मानसिक आधारों पर पर्याप्त शोध परक ढंग से अपनी बात सामने रखते हैं। The metaphoric and metonymic poles (a) 

नामक निबंध में भाषा के व्यवहार में मानसिक स्थिति का उल्लेख करते है। यॉकब्सन के शब्दों में The varieties of aphasia are numerous and diverse, but all of them lie between the two polar types just described. Every form of aphasic disturbances consists in some impairment, more or less severe, either of the faculty for selection and substitution or for combination and contexture the former affliction involves a deterioration of metalinguistics operations, the hierarchy of linguistic units. the relation of similarity is suppressed in the former, the relation of contiguity in the latter type of aphasia Metaphor is alien to the similarity disorder and the Metonymy to contiguity disorder

यहाँ ऐफेजिआ के सहारे यॉकब्सन ने मनुष्य के मस्तिष्क में छिपे दो आधारभूत भाषिक प्रक्रिया को सामने लाने का कार्य जिसे वे 'Similarity Disorder और ‘Contiguity Disorder का नाम देते हैं। साथ ही साथ Metaphor का संबंध Similarity disorder’ से एवं Metonymy का संबंध Contiguity disorder से जोड़ते हैं। जिन मानवों में शब्द क्रम था वाक्य-क्रम अन्यथा समानार्थक शब्दों के चयन की समस्या होती है उसे इससे जोड़ कर देखा जा सकता है। इस शोध को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि-

In aphasia one or the other of these two processes is restricted or to tally blocked an effect which makes the study of aphasia particularly illuminating for the linguist In normal verbal behavior both processes are continually operative, but careful observation will reveal that under the influence of a cultural pattern personality, and verbal style, preference is given to one of the two processes over the other

अर्थात यॉकब्सन सपष्टतः घोषित करते हैं कि ‘ऐफेजिया’ का शिकार मस्तिष्क आवश्यक रूप से उपरोक्त वर्णित दोनों व्याघातों में से सिर्फ एक ही व्याघात से ग्रस्त होगा। क्षतिग्रस्त व्याघात पूर्णतः अपने कर्म को करने में नाकाबिल साबित होगा। दूसरे शब्दों में रोगी का या तो क्षैतिज क्रम का भाषा प्रयोग में नही होगा। अन्यथा ऊर्ध्वाधर पक्ष गौण होगा। यही अध्ययन भाषिकी या भाषा-वैज्ञानिकों के अध्ययन का पक्ष बनता है। यॉकब्सन आगे कहते हैं कि न सिर्फ रोगी बल्कि सामान्य जन जीवन में अगर गहरी छानबीन से देखा जाय तो संस्कृतिक प्रभावों के कारण यह व्यघातिक प्रभाव लोगों के व्यक्तित्व एवं भाषा-प्रयोग में भी देखा जा सकता है। इन दोनों व्याघातों में से कौन सा पक्ष किसी व्यक्ति या स्वभाव पर हावी है। इन्हीं शोधात्मक नतीजों को हम अगर-काव्य पर लागू करें तो साहित्यिक रचनाओं में कौन सा पक्ष हावी है अन्यथा कौन सा पक्ष गायब है, भाषिक आलोचना का विषय-वस्तु बनता है। इसे ‘सुर्ररिलिज्म’ के लेखकों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। हिन्दी साहित्य में खास तौर से ‘शमशेर बहादुर सिंह’ की काव्य रचना में यह काफी स्पष्ट उभार के साथ उपस्थित होता है।

“यॉकब्सन का कहना है कि यह अंतर अर्थात के इन दोनों पक्षों का व्यापार साहित्यिक रचनात्मक स्तर पर अत्यधिक महत्व का वाहक है और साहित्य के स्वरूप निर्धारण में मूलगामी भूमिका निभाता है। साहित्यिक कला कृतियों में पाठ की एक कड़ी से दूसरी कड़ी तक या तो ‘सहचारिता’ का संबंध होता है या ‘लाक्षणिकता’ का अर्थात अभिव्यक्ति का स्वरूप था तो सहचर्यात्मक/लाक्षणिक/ प्रतिकात्मक है या लाक्षणिकता के कारण विन्यासक्रमी व्याख्यात्मक इन आधारभूत विशेषताओं के आधार पर विभिन्न शैलियों की अभिव्यक्तिपरक वरीयताओं का निर्धारण किया जा सकता है।....प्रमाण में वृद्धि करते हुए यॉकब्सन कहता है कि शब्द-प्रयोग का यह अंतर ऐतिहासिक कालखण्डों साहित्यिक संप्रदायों और आंदोलनों तक में मिलता है।”

संरचनावाद और रोमन यॉकब्सन

भाषिकी को वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता प्रदान करने का श्रेय यॉकब्सन को ही है। “सॉस्यूर ने भाषा की विशेषताएँ बताते हुए वाक्य के क्षैतिज पक्ष (Horizontal Aspect) और उर्ध्वाधर पक्ष (Vertical Aspect) का उल्लेख एक मूलगामी संकल्पना के रूप में किया था। यॉकब्सन ने न केवल इस संकल्पना की पुष्टि और परिवर्द्धन किये, अपितु उसका संरचनावादी काव्यशास्त्र के आधारभूत सिद्धांत के रूप में प्रयोग किया। यॉकब्सन का कहना है कि भाषा का क्षैतिज पक्ष और ऊर्ध्वाघर पक्ष केवल वाक्य के स्तर पर ही प्रभावकर नहीं, अपितु यह अंतर भाषा की मूलभूत बनावट है और मनुष्य की समस्त मानवीय गतिविधियाँ उसकी ऋणी हैं। वह कहता है कि यह वही द्वित्व है, जो ‘लाँग’ और ‘पॉरोल’ की अवधारणा में भी देखा जा सकता है। भाषा का क्षैतिज पक्ष चूंकि कालगत पक्ष है और समय के सातत्य की अवधारणा रखता है, ‘लाँग’ के समान है। ऊर्ध्वाघर पक्ष चूकि समकालिक है, पॉरोल के समान है। यॉकब्सन कहता है कि यह द्विचर विरोध एक दीप्तिमान शक्ति के समान है, जो भाषा के प्रत्येक सार यानी ध्वनि, शब्द, वाक्य आदि के स्तरों पर मिलता है और भाषा भी समस्त क्रियाशीलता में आधारित भूमिका निभाता है।” यॉकब्सन की इस स्थापना से मानव जीवन में ‘भाषा’ उसके प्रयोग और उसके प्रभाव की जरूरत से पहली बार बौद्धिक समाज अवगत होता। साथ ही वह संकेतित करता है कि साहित्यिक रचनाएँ समकालिकता में ऊर्ध्वाघर पक्ष (पॉरोल) है, लेकिन क्षैतिज पक्ष के रूप में (लाँग) से अपना संबंध रखती है। इसी आधार पर रचनाओं के महत्व को ऐतिहासिकता में देखते हुए उनका स्तर निर्धारण किया जा सकता है। साथ ही यह भी ध्वनित होता है कि रचनाएँ रचयिता की संपति न होकर अपना संबंध भाषा के सातत्य की संपति मानी जाती है। इसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में छायावाद के कवियों की रचनाओं की लोकिप्रियता से जोड़कर देखा जा सकता है। छायावाद के समय में जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदनपंत एवं सुर्यकांत त्रिपाठी निराला के संदर्भ में अपने समय में इन चारों में पंत को अपार लोकप्रियता हासिल थी। परंतु समय की ऐतिहासिकता में निराला को अधिक गंभीर एंव चिंतनशील रचनाकारों में गिना जाने लगा।

“रोमन यॉकब्सन ने अपने शोध के माध्यम से भौतिक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर दिया कि मानवीय मस्तिष्क वस्तुत दो मूलगामी संबंधों की सहायता से कार्य करता है। यॉकब्सन ने वाचाघात का शिकार होने के पश्चात शब्दों के प्रयोग के दोनों पक्षों में से एक अक्षम हो जाता है। अर्थात जो व्यक्ति ‘संसक्ति-व्यतिक्रम’ (Contiguity Disorder) का शिकार हो जाता है, वह समानता-व्यतिक्रम (Similarity Disorder ) का शिकार नही होता। यह एक अत्यंत भौतिक शास्त्रीय खोज थी, संसक्ति व्यतिक्रम में रोगी समान शब्द बोल सकता है, मसलन ‘घर’ कहें तो वह ‘मकान’, ‘महल’, ‘कमरा’, ‘झोपड़ी’, तो कह सकेगा, किन्तु वाक्य पूरा नही कर सकेगा। इसके विपरीत समानता व्यतिक्रम में वह ‘घर’ के उपरांत जल गया’ दूर है, आदि तो कह सकेगा, किन्तु शब्द का विकल्प नहीं दे सकेगा। यॉकब्सन कहता है कि और तो और सामान्य वार्तालाप में भी भाषा के इस विशिष्ट कर्म का प्रभाव लक्षित होता है। अर्थात भाषा के प्रयोग का झुकाव या तो भाषा के क्षैतिज पक्ष की ओर होगा या ऊर्ध्वाधर पक्ष की ओर।”

अतः पाठ के निर्वचन हेतु संरचनावाद के संदर्भ में रोमन यॉकब्सन के कार्य का महत्व किसी भी पाठ को खोलने को लेकर है। यॉकब्सन ने वस्तुनिष्ठ तरीके से वैज्ञानिकता के आधार पर पाठ, शब्द अर्थ आदि को चरित्रगत अंतर पर स्थापित करने का कार्य किया है। इन साहित्यिक विश्लेषणों के अतिरिक्त इनका कार्य काफी बड़े पैमाने पर फैला है जिनमें- & phonology, acoustics morphology, child language, aphasia, and historical and synchronic studies of Slavic language आदि शामिल हैं।