प्यास के रिश्ते और रिश्तों की कसक / जयप्रकाश चौकसे

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प्यास के रिश्ते और रिश्तों की कसक
प्रकाशन तिथि : 17 अक्तूबर 2012


करीना कपूर और सैफ अली खान की शादी के इस मौके पर उनके सुखद भविष्य की कामना के साथ ही ध्यान जाता है सैफ की पहली पत्नी अमृता सिंह और करीना के पहले प्यार शाहिद कपूर की ओर। अमृता और सैफ के दोनों बच्चे शादी के जश्न में शामिल हैं। अत: अमृता सिंह तन्हा होंगी और क्या सोच रही होंगी? विवाह के अवसर पर पारंपरिक तौर पर शहनाई वादन होता है और मनुष्य के हृदय की तरह काम करने वाले इस साज में आनंद और दुख दोनों भावनाओं के अनुरूप ध्वनियां निकलती हैं। बांद्रा, मुंबई में संगीत की रात में जो शहनाई के स्वर थे, उसके विपरीत दुख प्रकट करने वाली ध्वनि अमृता के हृदय में गूंज रही होगी। शाहिद कपूर को शहनाई की समझ नहीं है, परंतु आज उन्हें दुख तो हो ही रहा होगा कि आज उनकी जगह सैफ दूल्हा बने हैं। क्या फ्लैशबैक में वे अपने प्रेम और उसके टूटने के दृश्यों की जुगाली कर रहे होंगे और इसी तर्ज पर अमृता को लग रहा होगा कि सैफ के संघर्षकाल में उन्होंने उनका साथ दिया, दो बच्चों को जन्म दिया, उनकी परवरिश की और सफल स्टार बनते ही उन्हें छोड़ दिया गया तथा इतालवी रोजा से सैफ का इश्क शुरू हुआ तथा उस अध्याय के समाप्त होते ही करीना से प्रेम शुरू हो गया। प्राय: कामयाब लोग अपने संघर्ष के दिनों के साथियों से अलग हो जाते हैं, तो क्या वे उन दिनों का स्मरण कराने वाली चीजों से भाग रहे हैं या ताजा खाते हुए बासे को भुला रहे हैं? यह भी संभव है कि अमृता विदेश चली गई हों। शहनाई के सुखद स्वरों का अभ्यस्त इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शादी के जश्न की ओर दीवानों की तरह भाग रहा है। किसी के पास यह समझ नहीं कि अमृता या शाहिद से मिलें, जैसे अमिताभ बच्चन के जन्मदिन पर वे रेखा के जन्मदिन को अनदेखा कर गए। शादियों में शिरकत करने वाले प्राय: जनाजों में शामिल नहीं होते और जिंदगी में भी दुख के समय आदमी तन्हा ही होता है। सुख के कपास को उठाने वाले बहुत आ जाते हैं, परंतु दुख के पहाड़ को तन्हा ही झेलना होता है।

क्या यह मुमकिन है कि अमृता सिंह भी शादी के जश्न में आ पहुंचें? तब सैफ-करीना का क्लोज-अप मिश्रित भावना या सुन्न पड़ जाने वाला हो सकता है? क्या शाहिद को निमंत्रण मिला है? उन्हें मलाल तो होगा, परंतु उनके पास संभवत: ऐसी संवेदना-शक्ति नहीं है कि वे गमजदा हो जाएं। जैसे हर दिल मोहब्बत के लिए नहीं बना होता, वैसे ही हर दिल दुख की गहराई भी नहीं समझ पाता।

सैफ-अमृता के दोनों बच्चे अपनी नई मां के स्वागत के लिए तैयार होते समय क्या अपनी जन्म देने वाली मां की तन्हाई को महसूस कर रहे होंगे या शादी के जश्न का वर्णन मोबाइल पर सुना रहे होंगे? वे अपने पिता के साथ हैं और भावी नवाबी का ख्वाब कहीं दिल में मचल रहा होगा। राजे-रजवाड़े कब से कानूनी तौर पर लद गए, परंतु सामंतवादी प्रवृत्तियां आज भी जीवित हैं। भारत महान में कभी कोई कुरीति नहीं मरती। स्वस्थ परंपराएं जल्दी ही काल-कवलित हो जाती हैं। बहरहाल, यह सारा दृष्टिकोण भावुकता से लबरेज है और इस वैवाहिक समारोह में भाग लेने वाले अत्यधिक आधुनिक लोग हैं और इन लिजलिजी बातों से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। वे तो मानते हैं कि 'जो रिश्ता बोझ बन जाए, उसे छोडऩा बेहतर।' स्वयं सैफ की फिल्म 'लव आज कल' का प्रारंभ ही एक रिश्ते के अंत पर जश्न मनाने से शुरू होता है।

यह सच है कि टूटे हुए रिश्तों को ढोते रहने से भीतरी जख्मों में पीप की मात्रा बढ़ती है और जिंदगी में आगे बढ़ते रहने के सिवा कोई रास्ता नहीं है, परंतु टूटे रिश्ते टूटी हड्डियों की तरह होते हैं, जिनके जुड़ जाने के बरसों बाद भी आकाश में बादलों के घिरते ही जाने कैसे अरसे पहले जुड़ी उन हड्डियों में कसक होने लगती है। सोचिए आकाश का बादलों से घिरना कैसे मनुष्य मन से जुड़ा है, जैसे धरती में जड़ों को जमाने वाले सावनी पौधे में बरसात के पहले फूल खिलते हैं। यह रिश्ता प्यास का है, हर रिश्ता एक प्यास है।