प्रतिक्रिया / आलोक कुमार सातपुते

Gadya Kosh से
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प्रतिक्रिया-1

रेल में बैठे उस इंसान ने अपनी सामने वाली सीट की ओर ध्यान दिया। वहाँ पर एक प्यारी सी बच्ची बैठी हुई थी। वह उस मासूम को देख-देखकर आनंदित हेाता रहा, और सोचता रहा कि, बच्चे वास्तव में भगवान का रूप होते हैं। उधर अपनी ओर देखते हुए उस इंसान की स्नेहभरी नज़र से बच्ची भी पुलकित होकर मुस्कुराती रही। इस तरह एक इंसान और भगवान आमने-सामने बैठे हुए थे।

इंसान और भगवान को साथ बैठा हुआ देखकर शैतान का ख़ून खौलने लगा, और वह उस इंसान में प्रविष्ट कर गया। अब वह इंसान, इंसान से पुरुष बन गया, और उसकी नज़र उस बच्ची के चेहरे से धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी। इंसान के इस बदले हुए रूप को देखकर भगवान की आखों में भय उतरने लगा, और वह लापरवाह बैठी बच्ची अपने कपड़े दुरूस्त करने लगी।

प्रतिक्रिया-2

कल मुझे उस पर भारी क्रोध आया और मैं उसे उलूल-जुलूल बकने लगा। वह शांत खड़ा मेरी आँखों में आँखें डालकर मुस्कुराता रहा। मेरा क्रोध और बढ़ गया ...मैंने झपटकर उसका कॉलर पकड़ लिया, वह वैसा ही खड़ा मुस्कुराता रहा।

आज फिर उससे मेरा सामना हो गया है। वह फिर मेरी आँखों में आँखें डालकर मुस्कुरा रहा है और मैं उसकी आँखों से बचता हुआ बग़लें झाँक रहा हूं।