प्रियकांत / भाग - 9 / प्रताप सहगल

Gadya Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

प्रियकांत प्रवचन करने में सिद्धहस्त हो चुका था। मज़बूती से पाँव जमाने की जगह उसे अभी भी नहीं मिल रही थी। प्रवचनों के बाद मिलने वाली दक्षिणा उसे अपना अपमान लगती थी। वह ख़ामोशी से सब सह जाता।

‘गुलशन सत्संग सभा’ में तरह-तरह के साधु-संत आ रहे थे। एक दिन फिर प्रियकांत को अवसर मिला। प्रियकांत के मन का कोई कोना कह रहा था कि ‘गुलशन सत्संग सभा’ ही वह स्थान है, जहाँ वह पाँव जमा सकता है। वहीं से अपना झंडा फहरा सकता है। ‘गुलशन सत्संग सभा’ के सत्संगियों पर वह गुलशन के प्रभाव को भी जानता था। गुलशन बाऊजी की इच्छा के बिना वहाँ पत्ता भी नहीं खड़कता।

इस बार प्रियकांत पहले से ही ज़्यादा तैयारी में था। उस दिन आर्यसमाज की विधि से हवन था। प्रियकांत को जब भी बुलाया जाता, इसी हवन के साथ जोड़कर। वह जानता था कि आर्यसमाज की खंडन-विधि यहाँ काम नहीं करेगी। अधिकतर सत्संगी सनातनधर्मी थे-और सनातन धर्म के पौराणिक पाखंड तथा मूर्ति-पूजा को आर्यसमाज स्वीकार नहीं करता था।

प्रियकांत ने इसीलिए अपने व्याख्यान की अलग रैस्पी तैयार कर ली थी। वह पौराणिक आख्यानों एवं चरित्रों को इस तरह पेश करता कि वे आम आदमी के जीवन से जुड़ सकें। उन चरित्रों एवं आख्यानों की आधुनिक व्याख्याएँ पेश करता। बीच-बीच में देशी-विदेशी पत्रिकाओं एवं लेखकों के हवालों से भारतीयता का समर्थन भी करता चलता। वह मूर्ति-पूजा के विरुद्ध शुरू से संस्कारबद्ध था। स्वामी विद्यानंद ने भी उसे यही पढ़ाया और सिखाया था, लेकिन आज वक़्त बदल रहा था। वक़्त के साथ ही प्रियकांत का टोन बदल रहा था और टैनर भी।

धर्म अब वैयक्तिक मामला न होकर पूरी तरह से सामूहिक मामला हो गया था। धर्म और अध्यात्म कई साधु-संत बेच रहे थे। प्रियकांत स्वयं को उन सबसे बेहतर, पढ़ा-लिखा और समझदार मानता था। तब वही सिद्धांतों की वेदी पर अपनी बलि क्यों दे ? वह पूरी चतुराई के साथ निर्गुण-सगुण का समन्वय करके चलता। हिंदुओं के विभिन्न मत-मतांतरों के विरोधी स्वरूप की बात न करके केवल वही बिंदु ढूँढ़ता, जहाँ सुख है, समरसता है। सुखी जीवन के सपनों का

वह धार्मिक व्यापारी हो गया था। परलोक के सुख की बात तो सभी साधु-संत कर रहे थे, प्रियकांत इहलोक से सुख की बात भी करता।

परलोक के साथ-साथ इहलोक का सुख। त्याग की जगह स्वीकार। निर्लिप्तता और संलिप्तता में समन्वय। वर्तमान और भविष्य का समन्वय। योग और भोग का समन्वय। कोई भी दो विरोधी तत्व हों, प्रियकांत उनका एक समन्वित रूप संभव करता।

समरसता और सुखी जीवन का स्वप्न। कौन नहीं करेगा इसे स्वीकार! प्रियकांत की प्रबल तर्कशक्ति और उसके मधुर कंठ से निकले उसी के नए-नए भजन-सब मिलकर लोगों को मंत्रमुग्ध करते।

प्रियकांत में एक बात और थी, जो औरों में नहीं थी। प्रवचन के बाद वह श्रोताओं से प्रश्न आमंत्रित करता। यह गुर उसने एक पुराने आर्यसमाजी उपदेशक रामचंद्र देहलवी से सीखा था। वह लोगों को उकसाता कि वे कुछ पूछें। इससे प्रियकांत को अपनी विद्वत्ता की धाक जमाने का और अवसर मिलता।

श्रोताओं में प्रायः व्यापारी, महिलाएँ या फिर रिटायर्ड कर्मचारी होते। उनके पास इतना अध्ययन कहाँ कि कोई भी प्रियकांत को चुनौती दे सके। चुनौती नहीं तो समर्पण।

शेखर भी प्रायः श्रोताओं में होता था। वह शुरू से ही प्रियकांत को सुन रहा था। उसकी व्यावसायिक बुद्धि प्रियकांत में अनेक संभावनाओं की तलाश करती रहती। प्रियकांत का प्रवचन ख़त्म होने के बाद शेखर हमेशा प्रियकांत के पाँव छूता। उसे अपने घर ले जाने का आग्रह करता। प्रियकांत ‘फिर कभी’ कहकर टाल जाता।

शेखर को प्रियकांत में संभावनाएँ दिख रही थीं, तो प्रियकांत को शेखर में अपना एक प्रबल समर्थक। दोनों में जैसे एक गुपचुप समझौते की तैयारी चल रही थी। दोनों अपनी-अपनी बिसात बिछाने में लगे हुए थे।

शेखर गुलशन से हमेशा कहता-”बाऊजी! प्रियकांत का प्रवचन कमाल का होता है। उन्हें फिर बुलाना चाहिए।” यह बात वह हमेशा तीन-चार लोगों के बीच कहता। शेष लोग भी शेखर का समर्थन करते और गुलशन कई बार न चाहते हुए भी प्रियकांत को बुला लेता। दरअसल गुलशन यह नहीं चाहता था कि ‘गुलशन सत्संग सभा’ पर किसी भी साधु-संत का प्रभाव इतना

बढ़ जाए कि वह उसे अपनी गद्दी समझने लगे। यह भी सत्य था कि सत्संगियों को प्रियकांत को सुनना हमेशा अच्छा लगता। उनमें से कई ऐसे थे, जो सत्संग चलाने के लिए हर महीने अच्छी-ख़ासी राशि भी दान देते थे। उनकी बात तो गुलशन को सुननी ही पड़ती।

धीरे-धीरे लोग अपनी व्यक्तिगत समस्याएँ लेकर भी प्रियकांत के पास जाने लगे और वह उनके व्यावहारिक समाधान भी देने लगा। उस पर लोगों का यह विश्वास जमता गया। विश्वास जमाने में शेखर का बहुत बड़ा हाथ तो था ही। शेखर ने अपनी रणनीति तय की हुई थी। बस, वह अपने पत्ते ही नहीं खोल रहा था। अपनी तय की हुई रणनीति के तहत वह अब प्रियकांत के साथ हर जगह जाने लगा। प्रवचन के बाद प्रियकांत को दंडवत् प्रणाम करता और ‘गुरु जी! गुरु जी!’ कहकर ही प्रियकांत को संबोधित करता। प्रियकांत अपनी रणनीति के अनुसार काम कर रहा था। धीरे-धीरे शेखर पूरी तरह प्रियकांत के प्रभाव में आकर अपनी रणनीति भूल गया। अब वह वही करता, जो प्रियकांत उसे करने को कहता।

शेखर यदा-कदा नीहार से भी मिलता रहता और प्रायः प्रियकांत के कसीदे पढ़ता। नीहार को इस सबमें कोई रुचि नहीं थी। शेखर नीहार का पुराना मित्र था, इसीलिए वह शेखर को बर्दाश्त कर लेता।

प्रियकांत की प्रसिद्धि बढ़ रही थी। अब लोग दूर-दूर से उसके प्रवचन सुनने आने लगे थे। उनमें से कई आदर या श्रद्धावश प्रियकांत के पाँव छूने जाते। प्रियकांत उन्हें हमेशा अपने पाँव छूने के लिए मना करता। इससे उसका सम्मान और भी बढ़ता गया।

जब बार-बार मना करने के बावजूद शेखर ने दंडवत् प्रणाम करना नहीं छोड़ा तो प्रियकांत ने मधुर मुस्कान के साथ उसे स्वीकार कर लिया। शेखर कई बार प्रियकांत को अपने घर में चरण डालने का आग्रह कर चुका था। प्रियकांत जब पूरी तरह से आश्वस्त हो गया कि शेखर के अंदर उसका एक प्रबल समर्थक कवच की तरह से तैयार हो चुका है तो उसने एक दिन शेखर का आग्रह स्वीकार कर ही लिया। संभवतः प्रियकांत आगे की कार्रवाई टालना नहीं चाहता था।

शेख्रर का कामधंधा भले ही अच्छा न चल रहा हो, पर अचल संपत्ति उसके पास बहुत थी। जिन दिनों शेखर का काम अच्छा चल रहा था, उन्हीं दिनों उसने अपने लिए एक आलीशान घर बनवा लिया था।

जीवन में आई असफलताएँ अक्सर व्यक्ति में वैराग्य पैदा कर देती हैं। यही शेखर के साथ भी हुआ था।

घर में प्रवेश करते ही सबसे पहले उसने प्रियकांत के पाँव धोए। फिर उसे अपनी पत्नी और बच्चों से मिलवाया। वे सभी जानते थे कि शेखर पागलपन की सीमा तक प्रियकांत का भक्त हो चुका है। उसने प्रियकांत को बिठाया, उसकी ख़ूब सेवा की। शेखर के चेहरे पर झलकती मायूसी को देखकर प्रियकांत बोला-”तुम पर लक्ष्मी की बड़ी कृपा है शेखर! फिर तुम इतना परेशान क्यों रहते हो ?”

“कृपा थी गुरु जी! जब कृपा थी तो यह सब बन गया। अब इसे सँभालना भी मुश्किल हो रहा है। मैं चाहता हूँ कि इसे भी बस आप ही सँभाल लें...मेरी मुक्ति हो।”

प्रियकांत ने इस बात को अनसुना-सा करते हुए पूछा-”बच्चे क्या करते हैं ?”

“पढ़ रहे हैं।”

“उनके सामने पूरा भविष्य है...तुम्हें तो जीवन में अभी बहुत कुछ करना है...प्रभु की कृपा कब हो जाए...कौन जाने...”

“जो भी हो गुरु जी! यह सब तो मैं आपके चरणों में अर्पित करता हूँ।”