बाबा उपद्रवीनाथ का चिट्ठा / भाग 20 / कमलेश पुण्यार्क

Gadya Kosh से
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आवाज बहुत ही धीमी थी, फिर भी थी बिलकुल स्पष्ट। स्वर पुरुष का था या नारी का- कह नहीं सकता। लगा दूर कहीं घाटियों से टकराकर आवाज कानों तक आयी हो। आँखें खुल गयी। कहीं कुछ दिखा नहीं- कोई स्रोत नहीं। गायत्री अभी आँखें मून्दे बैठी ही थी। मैं उसका इन्तजार करने लगा, और सोचने लगा- कि क्या इशारा है। क्लीं से तो बाबा ने परिचय करा दिया था, ये क्रीं क्या है, और ये संकेत देने वाला/वाली कौन है?

‘किस उधेड़बुन में जकड़े हो- वाला/वाली के? इतना समझाने के बाद भी वाला/वाली के जंजाल से निकलने का मन नहीं कर रहा है?’- अचानक वृद्धबाबा की आवाज कानों में पड़ी- ‘जो आदेश हुआ है, उसका पालन करो। संशयात्मा विनश्यति....।’

आँखें तो पहले ही खुल चुकी थी, उस सूक्ष्म ध्वनि से। इस नये आवाज पर पीछे मुड़कर देखा- आसपास कहीं कोई नहीं, किन्तु आवाज तो स्पष्ट रुप से मैंने सुनी, पहचान में भी संशय नहीं- वृद्धबाबा की ही आवाज थी, किन्तु....।

गायत्री का ध्यान पूरा हो चुका था। मुझे पीछे झांकते हुए देखकर उसने पूछा- ‘क्या बात है, ध्यान में मन नहीं लगा?’

अभी कुछ कहना ही चाहा था कि सभामंडप में खड़ा गोस्वामी नजर आया- ‘कहाँ हो दीदी! बाबालोग आपलोग को बुला रहे हैं।’

हमदोनों मन्दिर से बाहर निकलकर गोस्वामी के साथ हो लिए। ईंट की बनी पगडंडी, अहाते में पीछे की ओर चली गयी थी, जहाँ मौलश्री का एक बड़ा सा वृक्ष था, जिसके नीचे पन्द्रह-वीस हाँथ के घेरे के अन्दर एक छोटी सी खूबसूरत समाधि बनी हुयी थी। समाधि को चारों ओर से विविध प्रजातियों के जवाकुसुम के पौधे घेरे हुए थे, जिनमें अधिक संख्या लाल रंगों वाले बड़े आकार के फूलों की थी। ये फूल देवी को अतिशय प्रिय हैं। चारों कोनों पर बाँस की चचरी बनाकर, अपराजिता-पुष्प की तीनों प्रजातियों- ब्रह्मक्रान्ता, विष्णुक्रान्ता, शिवक्रान्ता को बड़े करीने से सजाया गया था। तन्त्रशास्त्र कहते हैं कि तन्त्र-साधकों के लिय जपा और अपराजिता यानी कि क्रान्तात्रय- ये दोनों पुष्प अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। अपराजिता को तन्त्र में योनिपुष्प कहा जाता है, क्यों कि इसकी आकृति योनि की आन्तरिक संरचना जैसी ही होती है। अतः देवी को यह पुष्प अति प्रिय है। अपराजितात्रय योनि है, तो कनेरपुष्प लिंग का प्रतीक है। योनि और लिंग ही तो सृष्टि का उपोद्घात है।

गोस्वामी ने बतलाया- ‘वृद्धबाबा के गुरु महाकापालिक बाबा की यही समाधि है। इसे रोज अपराजिता-पुष्प और जवा-कुसुम से सजाया जाता है, जैसा कि आप देख रहे हैं-इतनी बड़ी समाधि पटी पड़ी है-इन्हीं फूलों से। इसे सजाने का काम यहाँ के बाबा खुद अपने हाथों करते हैं। प्रातः गंगा-स्नान के बाद सीधे यहीं आ जाते हैं, और देर, दोपहर तक उनका समय यहीं गुजरता है। दिन के भोजन के समय ही यहाँ से उधर भोजनालय की ओर जाते हैं। अभी दोनों बाबालोग यहीं बैठे आपलोग का इन्तजार कर रहे हैं।’

समाधि के प्रवेशद्वार का स्पर्श करते हुए नमन किया, और परिसर में भीतर घुसा। संगमरमरी चट्टान पर आमने-सामने दोनों बाबा बिराज रहे थे- भव्य गुरु-मूर्ति के श्रीचरणों में। हम पर नजर पड़ते ही बोले- ‘बड़ी देर लगा दी तुमलोगों ने तैयार होने में। हम कब से प्रतीक्षा कर रहे हैं। विन्ध्यवासिनी का दर्शन करना है कि नहीं?’

गुरुमूर्ति को प्रणाम करने के पश्चात् दोनों बाबाओं का चरण-स्पर्श करते हुए मैंने कहा- ‘चलना क्यों नहीं है। इसी लिए तो आया हूं।’

‘तो चलो, क्यों कि वैसे ही देर बहुत हो गयी है। विन्ध्यवासिनी दर्शन के बाद त्रिकोण यात्रा भी तो करनी है। हालाँकि, लोग भोजन के बाद भी सुविधानुसार भ्रमण की तरह त्रिकोण करते हैं, किन्तु उचित यही है कि इसे पूर्वाह्न में ही किया जाय, तत्पश्चात् भोजन किया जाय।’

‘तो ऐसा करते हैं भैया कि विन्ध्यवासिनी दर्शन के बाद कुछ फल वगैरह ले लिया जाय, फिर इत्मिनान से त्रिकोण-यात्रा की जायेगी।’-बाबा की बात पर गायत्री ने कहा। मैंने भी गायत्री की बातों का समर्थन किया।

समाधि-परिसर से बाहर निकलते हुए, बाबा से पूछा- ‘ये त्रिकोण-यात्रा का क्या मतलब है, और वस्तुतः यह है क्या? क्या इसकी कोई खास विधि भी है, या कि यूँ ही तीनों स्थानों के एकत्र दर्शन को त्रिकोण कहते हैं? बहुत पहले मैं एक बार और आया था यहाँ। कुछ खास पता तो था नहीं। लोगों को देखा, और मैं भी साथ हो लिया। भगवती विन्ध्यवासिनी के मन्दिर से आगे सड़क पर निकलते ही तांगेवाले आवाज लगाते रहते हैं-त्रिकोणयात्रा के लिए। यात्रियों की एक टोली में मैं भी शामिल हो गया था।’

जल्दवाजी के लिए हमलोग सड़क की ओर न जाकर सीधे, गंगाकिनारे वाला खुश्की रास्ता ही पकड़े, जिससे पन्द्रह-बीस मिनट में ही मन्दिर पहुँच गये।

रास्ते में बाबा ने बतलाया- ‘विन्ध्यवासिनी के बारे में जानने से पहले इस विन्ध्यगिरि को ही जानो-समझो। तुम्हें यह सुन कर आश्चर्य होगा कि यह विन्ध्यगिरि पर्वतराज हिमालय का भी पितामह-प्रपितामह जैसा है। सृष्टि के आरम्भ में एक ऐसी स्थिति थी कि जब आज का यह बूढ़ा पर्वत अपनी युवावस्था में था। युवाओं का गौरव भी अहंकार का रुप ले बैठता है। विन्ध्य के साथ भी यही हुआ। उसे लगा कि सभी ग्रह-नक्षत्र सुमेरुपर्वत की परिक्रमा क्यों करते हैं, क्या मैं उनके समान नहीं हूँ? प्रसंग है कि विन्ध्य इतनी तेजी से बढ़ने लगा कि सूर्य का परिक्रमा-पथ वाधित होने लगा। त्रिलोक में हाहाकार मच गया। तब देवता लोग महर्षि अगस्त्य से याचना किये- इस समस्या के निदान हेतु। महर्षि अपनी पत्नी लोपामुद्रा के साथ विन्ध्य के पास गये। उस समय वह उन्हें प्रणाम करने हेतु चरणों में झुका। महर्षि ने आशीष देते हुए कहा कि हे वत्स! तुम तबतक इसी भांति झुके रहो जबतक मैं वापस न आऊँ। विन्ध्य ने वैसा ही किया- आज भी वह गुरु की प्रतीक्षा में ही नत है…। इसे ही भूगोल वाले कहते हैं कि पहाड़ अन्दर दब रहा है।”

बाबा की बात पर मुझे ध्यान आया- विज्ञान कहता है कि पृथ्वी पर सदा उलट-फेर होते रहता है। आज जो ऊँचा है, कल नीचा हो जायेगा। आज जो खाई है, कल पर्वत हो जा सकता है, और इसके विपरीत पर्वत खाई में बदल सकता है। पृथ्वी का सर्वाधिक गहरा प्रशान्त महासागर वही खाई है, जहाँ से विखण्डित होकर एक पिण्ड निकला, जिसे हम चन्द्रमा के नाम से जानते हैं। यानी इसे मानने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए कि किसी जमाने में विन्ध्य ऊँचा रहा होगा हिमालय से भी।

बाबा का कथन जारी था- “...इसी विन्ध्य को गौरवान्वित किया महामाया भगवती ने। श्री मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत श्रीदुर्गासप्तशति ग्यारहवें अध्याय (४१, ४२) में महामाया के वचन हैं- वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे। शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ। नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा। ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी॥ यहाँ महामाया कह रही हैं- ‘वैवस्वत मनु के शासन काल में अठाइसवें चतुर्युगी के द्वापर में नन्दगोप के घर में यशोदा के गर्भ से प्रकट होकर, मैं विन्ध्यगिरि पर वास करुँगी।’ इसी क्रम में आगे, यानी सप्तशती के मूल पाठ के पश्चात् जो मूर्तिरहस्य है, उसके प्रारम्भ में ही ऋषि कहते हैं- नन्दा भगवती नाम या भविष्यति नन्दजा। स्तुता सा पूजिता भक्त्या वशीकुर्याज्जगत्त्रयम्॥ अर्थात् नन्दा नाम की देवी, जो नन्दगृह में उत्पन्न(होंगी) हुयी हैं, उनकी भक्तिपूर्वक आराधना करने से त्रिलोकी को वशीभूत करने की क्षमता साधक में आ जाती है। इससे श्रेष्ठ वशीकरण का और कौन सा उपाय हो सकता है! यहाँ एक बात और ध्यान देने की है, कि देवी की अंगभूता छः देवियाँ हैं क्रमशः – नन्दा, रक्तदन्तिका, शाकम्भरी, दुर्गा, भीमा, और भ्रामरी। ये देवी के साक्षात् विग्रह हैं। इनके स्वरुप का प्रतिपादन होने के कारण ही इस प्रसंग को मूर्तिरहस्य के नाम से सम्बोधित किया गया है। ऋषि ने लोककल्याण की भावना से सारा रहस्य उढेल कर रख दिया है यहाँ, और रहस्य के अन्त में कहते हैं- सर्वरुपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत्। अतोऽहं विश्वरुपां तां नमामि परमेश्वरीम्॥ इस रहस्य को ठीक से हृदयंगम करो, ये जो सारा जगत-प्रपंच तुम देख रहे हो, वो और कुछ नहीं, एक और एक मात्र उस महामाया की विभूति या कहो विकृति ही है।’

‘विकृति’ शब्द पर मुझे जरा आपत्ति हुयी, अतः टोकना चाहा; किन्तु तब तक गायत्री ने ही मेरा काम कर दिया- ‘ये क्या कह रहे हो भैया? विकृति और विभूति दोनों एक कैसे हो सकता है?’

बाबा मुस्कुराये- ‘यही तो मुश्किल है, तुमलोगों के साथ- अंग्रेजी पैटर्न से पढ़ोगे तो ऐसे बेहूदे सवाल तो उठेंगे ही। विकृति का अर्थ यहाँ खराबी नहीं, विस्तार समझो, तो ज्यादा अच्छा होगा- प्रकृति और विकृति ये दो शब्द हैं। एक है मूल अवस्था और दूसरा है उसका विस्तार। ये सारा दृश्यमान जगत प्रकृति की विकृति ही तो है। अभी-अभी मैंने जो भगवति की छः विशेष विभूतियों का नाम लिया, उन्हीं में कुछ महत्त्वपूर्ण कही-मानी जाने वाली विकृतियां हैं ये। और एक बात जान लो कि पूर्ण का अंश भी पूर्ण ही हुआ करता है, सारी की सारी विभूतियां भी अपने आप में पूर्णत्त्व का ही बोधक है। इसमें जरा भी संशय न करो। बस इसी रहस्य को तो समझना है। अब इसे ज्ञानमार्ग से समझो, भक्ति मार्ग से समझो या कि कर्ममार्ग से।’