बित्ता भर सुख / शैलेश मटियानी

Gadya Kosh से
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अपने इस नए कार्यक्षेत्र में आने के बाद उसे यह पहला बच्चा जनवाना है। परसों जब वह यहाँ पहुँची, शाम काफी गहरी हो चुकी थी। जहाँ से वह आई है, शहर नितांत छोटा-सा, मगर शहर की अन्य सुविधाओं के साथ, बिजली की व्यवस्था भी वहाँ है। उस अभ्यस्तता में से एकाएक मोमबत्ती या दीये की मद्धिम रोशनी में आ पड़ना, उसे असुविधाजनक ही लग रहा है।

परसो वह काफी थकी हुई पहुँची थी। रात का बीतना किसना चपरासी की चाय से पता चला। शहर के पास गाँवों में पहले भी कई बार गई है, मगर इस तरह का रहना नहीं हुआ। रात की शुरुआत के साथ ही गाँव धीरे-धीरे गहरे सन्नाटे में डूबने लगता है। दो कमरों का यह छोटा-सा घर बिल्कुल बाएँ छोर पर, काफी एकांत में है। अनभ्यस्तता और उदासी में रात, घटने की जगह और अधिक लंबी होती हुई-सी प्रतीत होती है। आर-पार के गाँवों के बीचो-बीच बहती सरयू नदी की तरह, जो सिर्फ बहती हुई दिखती है।

किसना टार्च हाथ में ले चुका है। हालाँकि अभी दिन डूबने को भी नहीं हुआ है, मगर ज्यादा विलंब हो जाने पर रात का अँधेरा सँकरी और ऊबड़-खाबड़ गलियों में नदी की तरह बहता हुआ सारे गाँव में भर जाएगा।

किसना चपरासी सुमित्रा को बहुत अच्छा लगता है। चेहरा उसका आकर्षित कर लेने की हद तक तीखे नाक-नक्स का नहीं है, मगर विश्वसनीयता और निरापदता उसमें है। इस परिवार-कल्याण केंद्र के लिए भी उसे ही साथ लाने की जितनी कोशिशें सुमित्रा ने की थीं, अगर कहीं वह दिखने में इससे ज्यादा स्वस्थ और सुंदर होती, तो संदेह की गुंजाइश हो सकती थी। वैसे सुमित्रा कुछ दिनों से यह अनुभव करती आ रही है कि किसना के व्यवहार में किंचित परिवर्तन हो रहा है। आज सुबह वह जब नहाने तालाब की ओर निकल गया था, अपना पुराना बटुवा सुमित्रा के कमरे में ही भूल आया था। सुमित्रा ने यों ही कौतूहल में खोलने की कोशिश की ही थी कि पारदर्शी के पीछे लगी अपनी फोटो उसे दिख गई थी।

यह फोटो उसने पिछले 'समर फेस्टीवल' में खिंचवाई थी। एक क्षण को यह आशंका सुमित्रा के मस्तिष्क में कौध गई थी कि किसना जान-बूझ कर ही तो नहीं छोड़ गया होगा? अपनी रागात्मकता के प्रतीक के रूप में। सुमित्रा जानती है, किसना नितांत निरापद और आत्मभीरु है। सुमित्रा के सामने खुलकर कोई बात कहने का साहस वह जुटा नहीं सकता।

अब किसना दिखता है, एक अप्रत्यक्ष आनंद की अनुभूति होती है। जान-बूझकर ही उसने रखा होगा और अब प्रत्येक क्षण एक प्रतीक्षा में रहेगा। सोचते-सोचते सुमित्रा को हँसी आ गई।

किसना 'डिलीवरी' के लिए चलने की प्रतीक्षा में खड़ा था। सुमित्रा की हँसी से वह चौंक उठा। 'मेम साब, अब चलेंगी क्या?'

अनायास ही सुमित्रा की आँखें, अपने शरीर पर से किसना के चेहरे तक की यात्रा करती हुई, किंचित शरारती हो आईं... 'किसना...'

'जी, मेम साब!'

'लगता है, गाँव वाले हम लोगों के इंतजार में ही थे। क्यों?'

जी... बोलने की कोशिश में किसना की आवाज सिर्फ लड़खड़ा कर रह गई।

'खासतौर पर गाँव की औरतें तो मुर्गियों की तरह अंडे देती रहती हैं। अभी तीसरा दिन भी नहीं बीता है कि ओम गणेशाय नमः!' ...अपनी बात पूरी करते हुए, नाटकीय मुद्रा में हाथ जोड़ते हुए, सुमित्रा ने ठहाका लगाया, तो किसना भी जोर से खिलखिला उठा। अचानक उसे याद आ गया कि उसका बटुवा अभी तक सुमित्रा के कमरे में पड़ा होगा।

'किसना, आजकल तुम खूब जी खोलकर हँसने लगे हो?'

'जी... जी मेम साब...'

'और उतनी ही तुम्हारी याददाश्त कमजोर होती जा रही है। कब से तुम सिर्फ टॉर्च हाथ में लिए खड़े हो। बच्चा क्या टॉर्च से जनवाया जाता है? बेवकूफ कहीं का। मेरा बेग भी तो लेता चल।

सुमित्रा की आकस्मिक डाँट से खिसियाया हुआ-सा किसना पीछे वापस मुड़ गया। सुमित्रा के कमरे में पहुँचते हुए, इस बार उसे किसी तिलिस्म में प्रवेश करने की सी रोमांचकता की अनुभूति हुई मगर मेज तक पहुँचने पर वह यह देखकर हतप्रभ हो गया कि उसका बटुवा और सुमित्रा का बैग, दोनों मेज पर साथ-साथ रखे हुए हैं।

मंत्रबिद्ध सर्प की तरह पलट कर किसना ने बाहर की ओर देखा, मगर सुमित्रा शायद कुछ आगे बढ़ गई थी। दिख नहीं रही थी। किसना ने एक कोने में होते हुए, अत्यंत सतर्कतापूर्वक सुमित्रा के फोटो को चूम लिया और फिर उतावली में दरवाजा बंद करता हुआ, बाहर निकल आया। देखा, सुमित्रा गाँव और परिवार-कल्याण-केंद्र के बीच फैले हुए खेतों से आगे निकल चुकी है। वह काफी तेज-तेज कदमों से चलने लगा।

घरों की कतारें बिखरी हुई हैं। रामशरण अँगुली से जो घर दिखा गया था, काफी नीचे है। औसत गाँवों की तरह यह गाँव भी अपने परिवेश में पहाड़ीपन भरा हुआ और नागरिकता की चकाचौंध से मुक्त है। रामशरण का घर नदी के किनारे के खेतों में लगी हुई कतार में है। काफी उतर कर जाना होगा।

किसना की प्रतीक्षा करने की जगह, आगे बढ़ जाना ठीक लगता है। वैशाख-जेठ में श्रीहीन से हो जाने वाले चीड़वन के बावजूद, सरयू के किनारे होने से एक सनातन प्राकृतिक सौंदर्य की ही प्रतीति जरूर होती है। आजकल खेतों में गेहूँ की फसल खड़ी है। लगभग पक चुकी है और नदी के किनारे पानी में से बाहर निकल आई असंख्य अदृश्य मछलियों की फड़फड़ाहट की तरह बहती हवा में खेतों का अछोर लगता हुआ-सा खेतों का सिलसिला नदी की तरह ही कहीं किसी समुद्र की ओर बहता हुआ सा अनुभव होता है।

थोड़े-से खेतों को पार कर चुकने पर, सुमित्रा रुक गई। खेतों के किनारे-किनारे बहती नहर में से पानी लेकर, उसने अपनी आँखों पर पानी छपछपाया, तो मुँह पर के 'मेक-अप' के बह जाने के अहसास से वह थोड़ा-सा खिन्न हो गई। यहाँ तक उतरते में वैशाख की ढलती धूप से तपा हुआ चेहरा थोड़ा-सा गुलाबी हो आया होगा, इस बात से धीमा-सा संतोष पा लेने की कोशिश उसने की।

अपने परित्यक्त होने के आत्मदंश को वह अतीत की गहराइयों में धकेल चुकी है। छूट चुकने की सी निश्चिंतता के बाद, अपनी साज-सँवार के प्रति सुमित्रा का मोह और भी बढ़ता गया है। अपने शरीर और पहनावे के प्रति उदासीन गाँव वालों के बीच नोक-पलक सँवार कर पहुँचना, अपने भिन्न होने का अहसास कराता है और ग्रामीण औरतों के बीच अपनी इस भिन्नता की आत्मतुष्टि से भर उठना सुमित्रा को बिलकुल स्वाभाविक लगता रहा है।

मुँह धोते बिखर गए पानी से सफेद रूबिया का ब्लाउज काफी पारदर्शी हो आया है। सुमित्रा को थोड़ी देर यों ही बैठे रहना अच्छा लगा। तेज कदमों से उतरता हुआ किसना पास पहुँचकर, थोड़ा-सा ठिठक गया है। सुमित्रा उसकी ओर देखती, अकारण मुस्कराती रही। पारदर्शी हो आए ब्लाउज में सुमित्रा, किसना को, कैलेंडरों वाली औरतों की चमत्कारिता से लैस दिखने लगती है।

उसका एकटक देखना किसना से बर्दाश्त नहीं हो पाया। वह बातें करने की कोशिश करने लगा - 'यहाँ गाँव में तो आपका जी लगना मुश्किल ही होगा, मेम साब! शहर में तो जान-पहचान के लोग भी काफी हो गए थे। मन बहलाने के भी शहर में बहुत से साधन हो जाते हैं। जी.आई.सी. के संगीत मास्टर साहब तो रवाना होने के दिन तक यही पूछ रहे थे कि 'क्यों भई किसना, तुम्हारी डाक्टरनी साहिबा का तबादला क्या सचमुच हो गया है?' आपसे पहले वाली दाई के यहाँ इस तरह के पढ़े-लिखे और संगीत-प्रेमी लोग नहीं आया करते थे।'

पुरानी 'मिडवाइफ' को दाई और सुमित्रा को डॉक्टरनी कहने में किसना थोड़ा चापलूस हो आया-सा लगता है, मगर उसकी भाषा में उस छोटे से शहर के कुछ ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों से बनावट कम होती है।

'मगर तुम्हारी पुरानी वाली डाक्टरनी तो, शायद, कुछ बुढ़िया-सी भी थीं और बदसूरत भी?'

'जी मेम-साब...'

'म्यूजिक मास्टर कमला बाबू के यहाँ भी पहले-पहले हथेलियाँ लगाने को ही जाना हुआ था। फिर बच्चे की छठी पर उन्होंने बुलाया। तभी कुछ गीत भी सुनाए थे। मुझे उसकी आवाज में तो हल्की सी मिठास जरूर लगी, मगर अहंकार उसके मुँह से हमेशा लार की तरह चूता रहता है। लैंसडाउन-जैसे छोटे शहर में मुझ-जैसी 'मिडवाइफ' भी 'डाक्टरनी साहब' कहलाती है, वह भी संगीताचार्य बना हुआ है। अलबत्ता उसका चचेरा भाई जरूर बाँसुरी अच्छी बजाता था, मगर हमारे यहाँ तो वह कभी-कभी हो आता था। तुम्हें शायद, एक बात का पता नहीं, किसना!'

'जी, मेम-साब...'

'तुम्हारी ही तरह दूसरे भी कई जान-पहचान के लोगों को यह भ्रम हो गया था कि शायद, हम दोनों में कुछ आपसी लगाव बढ़ चुका है। किस्सा सिर्फ इतना-सा था कि मुझे अपने संगीत और चेहरे-मोहरे से प्रभावित समझकर, वह अक्सर आ जाया करता था। प्रकाश बाबू के लिहाज में मैं ज्यों-त्यों झूठी तारीफें करती रहती थी और वह अपनी गलतफहमी में कुप्पा होता रहता था। आखिर एक ही डाँट में उसके सारे आलाप बैठे गए और मुझको देखकर कुछ दूर से ही कन्नी काटने लगा। इस बीच तुम्हारी मुलाकात क्या प्रकाश बाबू से भी हुई थी?'

किसना कुछ जवाब देता कि इससे पहले ही सुमित्रा उठ खड़ी हुई - 'अच्छा, चलो, बातें तो फिर भी होती रहेंगी। 'डिलीवरी' का मामला है। मैं अपने तजुर्बे से जानती हूँ कि गाँव की औरतें ज्यादा लंबा वक्त नहीं लेती हैं और बच्चा हो चुकने के बाद कहीं पहुँची, तो जच्चा के रिश्तेदार कुछ ऐसी आँखों से देखने लगते हैं, जैसे कह रहे हों कि अब क्या लड्डू खाने को आई हो।'

सुमित्रा का हँसना किसना को बहुत अच्छा लगता है1 अपने हँसने में वह काफी आत्मीय-सी हो आती है। चपरासी होने की हीन भावना को वह सबसे कम सुमित्रा के साथ ही अनुभव करता है। शर्मा डॉक्टरनी साहब के साथ तो वह निरंतर अपने को अपमानित होता हुआ पाता था, इसीलिए उसे एक अमूर्त्त-सी प्रसन्नता अपने सारे शरीर में कौंधती हुई-सी महसूस हुई थी, जब पता चला कि सुमित्रा के साथ गंगाबाई नहीं जाएगी, बल्कि वह जाएगा।

शर्मा डॉक्टरनी के कमरे में जब सुमित्रा गई थी और कहा था कि 'गाँवों में रात को जंगलों से होते हुए भी जाना पड़ सकता है, तो शर्मा डॉक्टरनी के रूखे चेहरे पर एक निहायत क्रूर और व्यंग्यपूर्ण हँसी फैल गई थी। किसना अंदर-ही-अंदर सहम गया था कि मुँहफट मिस शर्मा कहीं यह न कह दें कि 'किसना को तो तुम अपने मतलब से...'

शायद, उस समय वह सह नहीं पाता और मिस शर्मा के आदेश देने के बावजूद सुमित्रा के साथ नहीं आता। पिछले कुछ अरसे में सुमित्रा के प्रति एक मोह-सा तो उसके भीतर भरता गया है, और अक्सर रिसने-सा लगता है, मगर अपने अंदर की उस रहस्यमयता के आकस्मिक विस्फोट को सहना उसके लिए शायद कठिन होता। आज सुमित्रा ने कहीं उसका बटुवा खोलकर न देख लिया हो? मगर देखती, तो जरूर कोई-न-कोई प्रक्रिया प्रगट करती।

बटुवे और उसमें लगाई गई सुमित्रा की फोटो के बारे में सोचते हुए, किसना को अपने साहसी और पराक्रमी होने का तो अहसास होने लगता है।

सुमित्रा आगे-आगे चल रही थी मगर बीच-बीच में पलटकर किसना की ओर देख लेती थी। किसना उसे बताना चाहता था कि शहर छोड़ने से दो दिन पहले प्रकाश बाबू से भेंट हुई थी, मगर सुमित्रा के तबादले को लेकर उसने अपनी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी। किसना यह भी बरताना चाहता था कि प्रकाश बाबू, शायद, उससे प्रेम वेम का नाटक किया करते थे। ...यह बताना, सचमुच, सुमित्रा में महसूस होती हुई-सी दीवार को फाँस जाने पर कोशिश करना होगा।

रामशरण का घर समीप आता जा रहा था। किसना को एकाएक महसूस हुआ कि सुमित्रा के बारे में सोचते हुए, वह उलटी दिशा में लौटता जा रहा है। उसे यही निश्चय कर लेना पड़ा कि कल कभी आपस में वार्तालाप होने लगेगा, तब बताएगा। प्रकाश बाबू के माध्यम से वह सुमित्रा की टोह लेना चाहता है।

खुद उसे यह कुछ असंगत-सी बात लगती है, कि वह शहर के परिवार-कल्याण केंद्र के कमरे में घटित होने वाले दृश्यों की कल्पनाएँ करे। और मानसिक रूप से उत्तेजित होते हुए, अपने भविष्य को टटोलता रहे। मगर अपने इस प्रयत्न में उसे किसी रहस्य को छूने की सी अनुभूति होती है कि सुमित्रा का एक हद से आगे किसी से भी ज्यादा संपर्क नहीं हो पाया है, इस बात की कल्पना करना उसे रोमांचक लगता है। इस प्रतीति के बावजूद रोमांचक कि सुमित्रा और उसके बीच की दूरी बाहर से जितनी कम है, अंदर उतनी ही गहरी।

'क्यों किसना...'

'जी मेम-साब...'

'जिस घर में हम लोगों को रहना है, वह इसी रामशरण ठेकेदार का तो है ना? कितने संयोग की बात है कि हमें पहला बच्चा उसी के यहाँ जनवाना है। वह जो दिखता है, अगला वाला तिमंजिला मकान उसी का तो है ना?'

'मेम-साब, जरा सँभलकर चलिए। आँगन और गलियारे में तमाम गोबर-कूड़ा बिखरा हुआ है। आपके कपड़े गंदे हो जाएँगे...'

'मैं तो बेवकूफ हूँ, जो साफ धुले कपड़े पहन कर चली आती हूँ। इस गलीच काम के लिए तो एक काला लबादा सिला लेना चाहिए। सच पूछो तो, किसना, हम लोगों का यह पेशा ही गंदा है। ऊँच-नीच सभी का खून छूना पड़ता है। शुरू-शुरू में तो मुझे कै हो जाया करती थी... छि-छि...'

बच्चे जनवाने का काम सिर्फ सुमित्रा ही करती है, किसना तो इस काम में उसका हाथ बँटाता नहीं। मगर सुमित्रा, इसके बावजूद भी, 'हम लोगों का पेशा' कहती है, तो उसे अच्छा लगता है।

कल रात उसने एक सपना देखा था। घुप्प ‍अँधेरी रात है। जोरों की बरसात हो रही है और बादल गरज रहे हैं, बिजलियाँ कड़क रही हैं। गाँव के एक छोर पर के उस छोटे-से घर में सुमित्रा यातना से कराह रही है। शर्म की बात तो है, मगर वह उसकी अत्यंत करुण तथा यंत्रणा-भरी प्रसववेदना की चीखों को चुपचाप सह नहीं सकता है।

जिसके हाथ सैकड़ों बच्चों को अस्तित्व में ला चुके हैं, वह असहाय होकर हाथ फैलाए तड़प रही है और चीख रही है। आखिर किसना 'जी मेम साहब' कहते हुए उठता है... और... अपने खुरदुरे, काँपती हुई-सी अँगुलियों में जकड़े हुए हाथों को सुमित्रा के पाँवों की ओर बढ़ाते हुए उसका संपूर्ण अमूर्त शरीर एक गहरी रहस्यमयता और रागात्मकता से झनझना जा रहा है। इस बच्चे का पिता भी तो वही है। ...मगर अपने अनाड़ीपन में से सुमित्रा के शरीर को टटोलता हुआ, जब वह बच्चे को जना चुकने की सी मुद्रा में अपने दोनों हाथों को फैलाता है, तो उसमें सिर्फ सुमित्रा का 'मैटरनिटी बैग' दिखाई देता है!

'जी मेम साब...'

'क्यों, तुम एकाएक यों चीखते हुए-से आवाज क्यों दे रहे हो?'

'जी... जी मेम साब, मैं आपको बतला रहा था कि बस, यही वाला मकान ठेकेदार रामशरण का है...' - किसना को अपनी आवाज काँपती हुई-सी लगी और उसने टार्च तथा सुमित्रा के बैग को कस कर पकड़ लिया।

रामशरण ठेकेदार किसना के आवाज देते ही बाहर चला आया था और उसे बाहर बैठने को कहकर, सुमित्रा को भीतर बुला ले गया। सत्रह-अठारह साल से दो साल के बच्चे तक, करीब आठ-नौ बच्चे सुमित्रा को दिखाई दिए - और सात-आठ औरतें। लंबी बैठक के एक कोने में सिमटी-सी बैठी हुई औरत को देखकर, अनुमान लगा लिया, जच्चा यहीं होगी। बोली - 'ठेकेदार साहब, आप भी जरा बाहर जाएँ और इन लड़के बच्चों को भी यहाँ से बाहर कर दें। कोई भी बात हो, गाँव-मोहल्लों के बच्चों के लिए एक तमाशा हो जाता है। जाओ, बच्चो, तुम सब लोग अपने-अपने घर जाओ। जब मिठाई बँटने का वक्त आएगा, तुम लोगों को बुला...'

'मगर डॉक्टरनी साहब, ये सभी बच्चे सिर्फ मेरे ही हैं। और ये जो औरतें बैठी हैं, इनमें भी दो मेरी घरवालियाँ हैं। दो से कोई औलाद हुई नहीं। सभी बच्चे इसी तीसरी के...' - कहते हुए रामशरण ठेकेदार ने कोने में सिमटी पड़ी अपनी पत्नी की ओर अँगुली उठाई, तो सुमित्रा अपनी हँसी रोक नहीं पाई। हँसी उसके शरीर में खून पसीने की तरह रहती है और जब बाहर फूटती है, तो उसे स्थान, काल और पात्र की उपस्थिति भूल जाती है।

रामशरण ठेकेदार और औरतें, सभी हतप्रभ उसकी मुक्त खिलखिलाहट को सुनते रह गए। आखिर सुमित्रा ने ही अपनी खिलखिलाहट में नीचे तक बिखर गई साड़ी और हँसी, दोनों को समेटा - 'माफ करना, ठेकेदार साहब, मुझसे अपनी हँसी रुकती नहीं है। दरअसल, मुझे पहले पता नहीं था कि आप शादियाँ भी ठेके में और बच्चे भी ठेके में ही पैदा करते हैं...'

इस बात सुमित्रा के साथ-साथ, तो सब लोग भी हँसने लगे, मगर तभी कोने में पड़ी उस औरत में कंपन-सा हुआ और वह कराहने लगी। सुमित्रा ने रामशरण ठेकेदार को संकेत किया कि बाहर जाएँ और खुद जच्चा की तरफ बढ़ गई।

लौटने तक सुचमुच अँधेरा हो आया था।

रामशरण ठेकेदार ने दो आदमी लालटेन देकर साथ कर दिए थे। रात के सन्नाटे में नदी के बहने का अनवरत और आँधी चलने का-सा विभ्रम उत्पन्न कर देता है। किसना को लगता रहा है, खेतों और जंगलों के बीच लालटेन की मद्धिम रोशनी में चलना कितना विचित्र है। जैसे यह सिर्फ चलना-भर नहीं, बल्कि एक यात्रा है। पैदल चलना तो इस पर्वतीय प्रदेश में जीने का एक अनवरत सिलसिला है, मगर मन के भीतर कामनाएँ न हों, कुहासे की तरह मँडराती हुई स्वप्नशीलता नहीं हो, तो अपने आस-पास किसी तरह की रहस्यमयता की प्रतीति ही नहीं होती है।

यह सचमुच कितना विलक्षण है कि आगे-आगे चलती हुई सुमित्रा और पीठ-पीछे छूटती हुई नदी, दोनों में उसे एक समानता-सी दिखती है। शायद, जिंदगी-भर वह इन दोनों के बीच यों ही नींद में चलने की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की तरह चलता रहेगा।

सुमित्रा रास्ते-भर उन दोनों के साथ बातें करती आई थी। नितांत औपचारिक किस्म की बातें कि गाँव की कुल आबादी कितनी है। फसलें कौन-कौन सी उगाई जाती हैं। बच्चों की पढ़ाई कहाँ तक हो पाती है। मेले कौन-कौन लगते हैं। यहाँ के लोग दो-दो, तीन-तीन पत्नियों को कैसे निभा लेते हैं। उन लोगों से बातें करते हुए भी सुमित्रा अक्सर हँसती रही थी।

सुमित्रा जब इस तरह की उत्फुल्लता में डूबी रहती है, किसना को किसी जंगली जानवर की तरह उचक पड़ने का मन होता है।

उन लोगों के वापस चले जाने पर, सुमित्रा किसना की तरफ मुड़ी - 'तुमको उन लोगों ने कुछ खिला-पिला दिया कि नहीं? मुझसे तो बहुत कह रहे थे, रात हो जाएगी पूरियाँ बनवा देते हैं; मगर ऐसे में तो मेरी भूख ही जाने क्यों खत्म हो जाती है। तुमने नहीं खाया हो, तो पराँठे सेंक लो। मेरे लिए सिर्फ एक प्याली चाय बना देना। मैं खुद बनाती मगर कुछ थक-सी गई हूँ। बड़ी उम्र की औरतें और ज्यादा परेशान करती हैं।'

किसना इस बीच कमरे का ताला खोल चुका था। टार्च जलाने लगा, तो पाया, रामशरण ठेकेदार का दिया हुआ दो रुपए का नोट अभी तक मुट्ठी में ही भिंचा हुआ था। यह सोचते हुए, उसे अपनी तुच्छता का अहसास हुआ कि सुमित्रा को, शायद, दस का नोट दिया गया होगा।

सुमित्रा के बिल्कुल पास खड़े होने का अनुमान लगाकर, वह कुछ उतावली में भीतर चला गया और मोमबत्ती ढूँढ़ता हुआ, निहायत अप्रासंगिक होता हुआ-सा बोला - 'लड़का ही हुआ है न?'

'क्यों सबेरे तुम शहर जाओगे। एक लालटेन लेते आना। मोमबत्तियों से काम चलना मुश्किल होगा। तुमने बताया नहीं खाना खाया कि नहीं?'

'जी मुझे तो भूख नहीं है। अभी चाय बनाता हूँ, गिलास भर कर पी लूँगा हम लोग इस्टोव लाना भी भूल गए। हर वक्त चूल्हा जलाने में परेशानी होगी।'

'तुम्हारे रहन-सहन, पहनावे और बातों का ढर्रा धीरे-धीरे काफी बदलता जा रहा है, किसना! तुममें तो अच्छा-खासा बाबूपना आता जा रहा है।'

हो सकता है, अपनी बात पूरी करके अपनी आदत के अनुसार सुमित्रा फिर हँसी हो या सिर्फ मुस्कराई हो? किसना को लगा, जैसे पीठ-पीछे के अँधेरे में किसी ने बर्फ जितनी ठंडी लोहे की सलाख उसकी नंगी पीठ से छुआ दी है।

वह तिलमिला गया। कमरे में तेज हवा के न होते हुए भी, जली हुई तीली धीमे से काँप कर, बुझ गई। हड़बड़ाहट में उसने दूसरी तीली जलाई, तो अँगुली झुकाए रहा। उसे लगता रहा, अँधेरे में उसका शरीर अदृश्य हो गया था और उनके भीतर जो कुछ है, सब नंगा हो आया होगा। पीछे मुड़े ही उसने अनुमान लगाया, सुमित्रा उसे बिल्ली की तरह घूर रही होगी।

बाहर निकलकर, वह दरबानुमा छोटे-से रसोईघर में घुसा, तो उसे फिर वहाँ मुर्गियों के रह चुकने की तीखी गंध महसूस हुई। शायद, उन लोगों के यहाँ पहुँचने से पहले मुर्गियों को यहाँ से हटा दिया गया होगा। आस-पास कभी भी अंडों के छिलके और पंखों के रोंयें दिख जाते हैं।

कल से अब वह सुमित्रा के प्रति घनिष्ठता दिखाने की मूर्खता से बचेगा। फोटो के लिए कोई जिक्र आया, तो कह देगा, झाड़ू लगाने में मिला था, यों ही सँभाल दिया था! यह तो सुमित्रा भी जानती है कि वह कभी किसी दूसरे की चीज को छूता नहीं है।

पत्नी को दिवंगत हुए अब सात-आठ वर्ष बीतने को आ गए हैं। एकमात्र बेटा अपनी ननिहाल में पल रहा है। इस वर्ष चौथे पर आ गया होगा। पाँचवें साल से प्राइमरी में भर्ती करवा देगा। दोनों मामियाँ उसकी अच्छी हैं। अपने बच्चों ही की तरह रखती हैं। थोड़ा सयाना हो जाएगा, तो अपने साथ रख लेगा। सात वर्ष औरतों के बिना गुजार दिए, यो अब इस सुमित्रा की कल्पना में पीड़ित रहने से क्या होगा! यह तो ओस में लोट-लोटकर नहाने की कोशिशें करना है।

चाय बना लेते तक, उसे लगा, अब वह काफी सन्तुलित हो आया है। पसलियों से लगी-लगी जो अदृश्य तरलता हर समय नम-सा बनाए रखती थी, वह लुप्त हो चुकी है। निश्यचयात्मकता की सी मुद्रा में वह उठा और, अपने लिए चाय लोटे में ही छोड़कर, एक काँच के गिलास में चाय लिए हुए, सुमित्रा को देने चल पड़ा।

सुमित्रा इस बीच कपड़े बदल चुकी थी और कोई किताब हाथों में लिए अपनी छोटी-सी चारपाई पर अधलेटी-सी पड़ी थी। उसको लगा, सुमित्रा की उम्र अधिक-से-अधिक तीस-इकतिस ही तो होगी। लेकिन अपनी इस भावुकता के प्रति वह तुरंत सावधान हो गया और नपी-तुली आवाज में बोला - 'मेम साब, चाय...'

न-जाने किताब में कुछ पढ़ा था, या उसे ही देखकर मुस्करा रही थी। छोटी-सी मेज पर चाय रखकर, वह पीछे मुड़ गया। 'मेमसाब' कह कर क्या पुकार देता है, यह औरत आखिरी सीढ़ी पर खड़ी होकर हँसती हुई-सी दिखाई देती है। मिस शर्मा का अहंकार उनके मुँह से फूटता हुआ-सा लगता था, इस औरत का घमंड इसके खून में घुला हुआ लगता है। अपने-आप ही शहद-सा चुआती है और फिर एकाएक डंक मारती है। चूल्हे की ओर जाते हुए किसना को लगा, जैसे वह सरपट भागा जा रहा है, मगर सुमित्रा के 'किसना, अपनी चाय भी यहीं लेते आ' कह लेने तक उसने पाया कि दरवाजा तक ठीक से पार नहीं कर पाया है।

रसोईघर तक आ जाने पर, एक बार तो उसका मन हुआ कि यहीं बैठा रहे। फिर उसे लगा कि किसी तरह का रूखापन या प्रतिरोध दिखाने की कोशिश करना अपने आप को कमजोर करना होगा। अपना आहत स्वाभिमान जताने की कोशिश में यह अपनी प्रताड़ित आसक्ति का प्रदर्शन कर डालना होगा।

निहायत अनमनेपन के साथ चाय उँडेलकर, किसना, सुमित्रा के कमरे में आ गया। एक क्षण में ही उसने सहसा यह निर्णय लिया कि शहर चला जाएगा और उसे अपने भीतर एक आंतरिक गरिमा का-सा अहसास हुआ। कल सुबह शहर जाएगा, तो मिस शर्मा से आग्रह करेगा कि अब वह अपने बच्चे को शहर लाकर स्कूल में भरती कराना चाहता है, इसलिए यहाँ सुमित्रा मेम साहब के पास गंगाबाई को ही भेज दो। हो सकता है, नौकरी छूट जाए मगर उस-जैसे मेहनती और ईमानदार आदमी के लिए दूसरी कोई नौकरी ढूँढ़ लेना कुछ ज्यादा कठिन नहीं होगा।

'ऐसे हारे हुए जुआरी की तरह जमीन पर क्यों बैठे रहे हो किसना? ठीक से तिपाई पर बैठ जाओ। इस बार तो भई तुम शहर से नई पैंट सिलाकर लाए हो। यहाँ की मिट्टी चिपकू किस्म की है!' एक बार तो झल्लाहट में कहने को हुआ कि 'तुम खुद यहाँ की लसदार मिट्टी से भी ज्यादा चिपकू किस्म की औरत हो? लेकिन अपने अंदर कितनी भी खीझ हो, क्रुद्धता हो, व्यवहार में फूहड़पन बरतना उसके स्वभाव में नहीं है। बस, सुमित्रा चाय पी ले, तो गिलास उठाकर चला जाएगा और दफ्तर वाला कमरा खोलकर, चुपचाप सो जाएगा। वार्तालाप की इच्छा ही जैसे सिरे से समाप्त हो चुकी है। वह सिर झुकाए हुए चुपचाप चाय पीता रहा।

'किसना, जरा इधर देख...'

'जी...'

'वह शीशे का गिलास देख रहा है? इसमें चाय कैसी साफ-साफ दिख रही है? तू भी इसी की तरह पारदर्शी है। तेरे भीतर जो-कुछ होता है, तू उसे बड़े जतन से छिपाए रहना चाहता हे, मगर तेरी आँखों और तेरे चेहरे पर इकट्ठा होते ही सब-कुछ साफ-साफ दिखने लग जाता है। मैं तेरी भावनाओं को बहुत गहराई से महसूस करती हूँ, मगर हम लोगों को जिंदगी में कई ऐसी दीवारें भी होती हैं, तो जिंदगी के बीतने के साथ-साथ सिर्फ ऊँची होती चली जाती है। जब तक हम उन पर छत डालने की सोचें, तब तक या तो हमारे हाथ छोटे पड़ जाते हैं और या ये दीवारें हाथों की पहुँच से दूर हो जाती हैं। अरे, मैं तुम्हें किताब पढ़कर नहीं सुना रही हूँ, तो तुम कथा सुनने वालों की तरह गुमसुम बैठे हुए हो...।'

वार्तालाप की इच्छा उसमें रह नहीं गई थी, मगर सुमित्रा के होंठों से निकलती हुई भाषा मिट्टी के अंदर दबे हुए अंकुरों पर पानी के छींटों की तरह पड़ती हुई महसूस होती है।

'तुमने शायद, मेरे मजाक का बुरा मान लिया है? दरअसल मैं एकाएक उदास होने लगी थी। तुम चपरासी जरूर हो मगर तुम्हारे-मेरे ओहदे में कोई ऐसा ज्यादा फर्क नहीं है। होता भी, तो मैं उसका अहसास तुम्हें होने नहीं देती। छल-प्रपंचों से भरी इस दुनिया में तुम्हारे जेसा निर्दोष आदमी मिलना बहुत कठिन है। अब यहाँ गाँव के सन्नाटे में चली आई हूँ, तो लग रहा है, शहर का वह दो-तीन वर्षों का रहना बाढ़ आई हुई नदी को पार करने जैसा था। और अब दूर तक बह आने के बाद की सी थकान दबोच रही है। अब तुमसे छिपाना क्या है, प्रकाश बाबू के लिए मेरे मन में जरूर काफी कमजोरी आ गई थी। अपने ही भीतर डूबे रहने वाले उस व्यक्ति को मैं सचमुच किसी तालाब में आ गिरे हुए घायल कबूतर की तरह हाथों में उठा लेना चाहती थी, मगर बहुत जल्दी ही मेरा भ्रम दूर हो गया। प्रकाश बाबू के भीतर पत्नी की तलाश खत्म हो चुकी है और मेरी ज्यों-ज्यों उम्र ढलने को हो रही है, लग रहा है, एक हद के बाद जिंदगी बितानी कठिन हो जाएगी। तुमने देखा नहीं होगा। रामशरण ठेकेदार की घरवाली की उम्र पचास साल से कम नहीं होगी। मुझे तो यही हैरत हो रही थी, उसके सलवटों से भरे हुए जिस्म को देखते हुए कि इसका पति अभी भी इसके साथ सोता है। ...तुम सोच रहे होगे, मेम साब दिन-पर-दिन बेशर्म होती जा रही है, मगर मैं आज के दिन को मरने-मरने तक नहीं भूल पाऊँगी।'

सुमित्रा जैसे कहीं खो चुकी थी। किसना को लगा, उसके शरीर पर से अभी तक चिपके हुए मुलायम रोंयें विलीन हो चुके हैं।

'मेम साब, आपकी चाय ठंडी हो रही है।'

'अरे, हाँ। पीती हूँ। तू पी चुका है क्या? अच्छा, मेरे कुछ कह बैठने का बुरा तो नहीं मान लोगे तुम? मैं तुमसे रामशरण ठेकेदार की बुढ़िया का जिक्र कर रही थी। आठ-नौ बच्चों की की माँ के भीतर बच्चे के लिए वैसी ललक नहीं रह जाती है। तकलीफ भी ज्यादा होती है। बर्दाश्त नहीं कर पाती थी, होठों में दाँत गड़ा लेती थी और तुम्हें क्या बताऊँ, इतनी बदसूरत और बेजान दिखने लगती थी... कि अगर मैं कहीं तुम्हारी तरह मर्द होती, तो मुझे उबकाई आ जाती' - कहते हुए, सुमित्रा ने उसकी तरफ देख, छोटी बच्ची की तरह मुँह बिचकाया, तो वह हवा में उड़ते हुए तिनके की तरह हलका हो आया।

'चेहरा तो उसका जैसे निचुड़ गया था और एक बुझी हुई ढिबरी की तरह बेजान दिखने लगा था। आँखें आँसुओं से भरी होने के बावजूद खोखली लग रही थीं। ...मगर जैसे ही बच्चा हुआ हलकी-सी बेहोशी में से लौटती हुई-सी वह बच्चे की तरफ झुकी और उसे देखा - ओह, किसना! मैं तुझे बता नहीं पाऊँगी कि एकाएक उसे बुझे हुए से चेहरे पर कैसी चमक दौड़ गई! दूसरे ही क्षण तो वह बुढ़िया तकलीफ और थकान से निढाल होकर तकिए से लग गई और उसका चेहरा फिर खोखला हो गया... मगर एक क्षण को वह जो बिजली-सी उसके बेजान चेहरे पर कौंधी थी... मुझे जाने क्यों लग रहा है, उस चमक के बिना कोई भी औरत औरत नहीं है। मैं, शायद, बेकार ही बहुत भावुक होती जा रही हूँ।

सुमित्रा रो नहीं रही थी, सिर्फ एक गहरी गंभीरता में डूब गई लग रही थी, मगर, किसना को लगा, अपने भीतर-ही-भीतर वह बह रही होगी। उसे महसूस हुआ वह फिर से विचलित हो रहा है और पश्चाताप उसके भीतर सुबह की ओस की तरह एकत्र हो रहा है।

सुमित्रा ने इस बीच कंबल ओढ़ लिया था। अब वह, शायद, सोने की तैयारी कर रही होगी। इतनी बातों के बावजूद वह ठीक-ठीक कुछ अनुमान नहीं लगा पाया। उसे अपने भीतर की प्रताड़ना और प्रतिरोध की उत्तेजना के राख की तरह ठंडी पड़ चुकने का सा अहसास हो रहा था। सारी निश्चयात्मकता का अंत इतनी जल्दी और एक अप्रत्याशित कारुणिकता में हो गया, उसे यह सब कुछ संभावनाओं के विरुद्ध लग रहा था। वार्तालाप कर पाने की चेष्टा करने पर, उसे सिर्फ अपने होठ फैलते और सिमटते हुए लग रहे थे। सारा असमंजस जैसे जीभ की नोक पर इकट्ठा हो आता है। उसे असुविधा होने लगी थी।

वह कहना चाहता था 'मेम साहब, मेरी जो कुछ भावनाएँ आपके प्रति हैं, मैंने घनी झाड़ी के भीतर दिए हुए किसी जंगली पक्षी के अंडों की तरह, अपने ही भीतर छिपाए रखा है और मैं भी जानता हूँ, धीरे-धीरे ये अपने-आप काले पड़ जाएँगे! मगर उसे सब-कुछ सिर्फ लार की तरह इकट्ठा होता हुआ और बहता-सा लगा और वह चुपचाप सामने दीवार की तरफ देखता रह गया।

कमरे में टँगा बहुत पुराने किस्म के कैलेंडर का अस्तित्व उसे अपनी उदासी और असमंजस का हिस्सा-सा प्रतीत हुआ। और नितांत निरर्थकता की सी मुद्रा में वह उसकी नीम अँधेरे में खोई हुई तारीखों को पढ़ने की कोशिश करने लगा।

सुमित्रा को अचानक बोझिल हो आया वातावरण, किसी चील की तरह अपने कंधों पर बैठता-सा अनुभव हुआ और वह किसना की तरफ देखते हुए, मुस्कराने की कोशिश करने लगी - 'तुमने मेरा फोटो अपने बटुवे में क्यों लगा रखा था? कहीं कोई दूसरा देख लेता, तो?'

'जी मेम, साब, वो तो यूँ ही झाड़ू लगाते में...'

'कल रात इसी किताब में मैंने रख दिया था, इसमें से नीचे गिर गया होगा। तुमको इस तरह हकलाने की कोई जरूरत नहीं है। मैं खुद इस बात को जानती हूँ किसी के प्रति अपनी छिपा कर रखी गई इस तरह की भावनाओं का एकाएक प्रगट होना बहुत विलक्षण होता है। मन पानी की तरह बहने को हो आता है। प्रकाश के प्रति अपनी कमजोरी प्रगट करते हुए मुझे भी ऐसा लगा था, जैसे मैं अपने ही भीतर लगातार लुढ़कती चली जा रही हूँ। और जब प्रकाश बाबू ने कह दिया कि शादी की झंझट के अलावा हर तरह का संबंध उन्हें मंजूर है, तो मुझे पहली बार ऐसा लगा कि जो मर्द औरतों से सिर्फ जिस्म के अलावा और कोई नाता-रिश्ता नहीं रखना चाहते उनसे संबंध रखने और वेश्या बन जाने में कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं हो सकता। खुद अपनी ही नजरों से गिर जाने की तकलीफ भी, किसना, दूसरों की नजर में गिर चुकने की फजीहत से कम नहीं होती। तुमने फोटो उठाकर अपने पास रख लिया, तो मुझे थोड़ा क्लेश हुआ कि शायद, तुम भी यही सोचते हो कि सुमित्रा मेम साहब तो शहर में जाने कितने लोगों से प्रेम करती थी। बहुत-सी सच्चाइयाँ ऐसी भी होती हैं, जिन्हें आदमी एक बार गढ़ लेता है, तो उसे उनमें रस मिलने लगता है। अलबत्ता मेरा स्वभाव जरूर वहम पैदा कर देता होगा। ...बात-बे-बात हँस पड़ती हूँ। मगर मेरा हँसना तो धतूरे का फूलना है। आखिर बहुत सोचने पर मैं इसी नतीजे पर पहुँची हूँ कि तुम्हें थोड़ा सावधान कर दूँ, क्योंकि अपने-आप पर से पकड़ छूट जाने पर सँभालना भी बेकार होता है। स्त्री-पुरुष का साथ होता है, तो मन में एक-दूसरे में आकर्षण बढ़ता ही है। आग-पानी के साथ में भी बीच में कोई ऐसी चीज जरूर होनी चाहिए, जो दोनों को अपनी-अपनी जगह बनाए रखे। अरे तू तो भाषण-जैसा सुनता जा रहा है? अब सोएगा नहीं? वहाँ अकेले में ऊब लगती हो तो यहीं सो जा।'

'जी नहीं, मेमसाब... जी नहीं मेमसाब' कहते हुए, किसना उठने ही लगा था कि सुमित्रा ने उसका हाथ पकड़ लिया - 'तुझे मैंने, शायद,पहले कभी बताया नहीं था कि मुझे छोड़ क्यों दिया गया था? दरअसल मैं बचपन से ही कुछ ज्यादा भावुक रही। समझ उतनी तब थी नहीं। शादी हुए कुछ ही महीने बीते थे कि पड़ोस में ही गलत कदम रख बैठी। उन्होंने खुद देख लिया। बर्दाश्त नहीं कर सके। ...उनके रहते तो अपने पर पहरा लगा नहीं पाई थी, मगर अब ज्यों-ज्यों उम्र बीतती जाती है, लगता है, अब जितनी अपने ऊपर नजर रखते हुए कट जाए, अच्छा ही है। तुझ-जैसा भला आदमी मुश्किल से ही मिलता है, जिसके साथ सच बोलते हुए डर नहीं लगे। नहीं तो मुझ-जैसी औरतों को जिंदगी का न जाने कितना बड़ा हिस्सा अपने-आपको छिपाए रखने में ही बीत जाता होगा। मैंने बहुत सोचा है, किसना! मैं फिर कहती हूँ ओहदे में तेरा छोटा होना मेरे लिए कोई मानी नहीं रखता, मगर अपने स्वभाव को मैं तो जानती हूँ। लंबा साथ निभ नहीं पाएगा। छोटा निभना और ज्यादा खोखला हो जाना होता है। ...यों, तेरे-मेरे बीच में फासला ही कितना है, ...कहते हुए, सुमित्रा फिर मुस्कराई और अपने दाएँ हाथ का बित्ता उसके और अपने बीच में फैला लिया।

वह निरंतर सिर्फ एक विचित्र-सी हतप्रभता और असुविधा अनुभव करता रहा। कंबल हटाकर, सुमित्रा एकाएक उसके सामने आ खड़ी हुई थी। निहायत झीनी साड़ी में उसका शरीर एक सुडौल प्रस्तरमूर्ति की सी गहरी रेखाओं में उभर आया था। वह मुस्करा रही थी और उसके ओंठ धीमे-धीमे काँप रहे थे। सुमित्रा के ओठों पर की मुस्कराहट देखते हुए उसे लगता रहा, उसकी खुद की मुस्करा सकने की शक्ति नष्ट हो चुकी है।

अपनी सारी खिन्नता और हतप्रभता के बावजूद, वह अपनी आपको प्रेमियों की सी विह्वलता से घिरा हुआ पा रहा था। उसे लगा, वह इस दृश्य को ज्यादा देर तक सह नहीं पाएगा। आखिर सुमित्रा को यों ही मुस्कराता हुआ छोड़कर, वह दफ्तर वाले कमरे में आ गया और काफी देर तक, अपने-आप ही खोया हुआ-सा बैठा रहा।