बुढ़वा मंगल / अनवर सुहैल

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1.

उसे होली के पर्व से बहुत डर लगता है। होली के रंग-गुलाल से घृणा का जो सबक बचपन में दिया गया था, शायद उसी कारण उसे होली से नफ़रत है। सुनते हैं कि यहां की होली बड़ी बदनाम होती है। आने वाले मंगल तक होली खेली जाती है, जिसे बुढ़वा मंगल कहा जाता है। टीवी, अखबार और पूरे वातावरण में फगुनाहट की मस्ती तारी है। लोग होली की तैयारियों में मशगूल हैं। इस दिन तमाम तरह की वर्जनाओं से मुक्ति मिलती है। शालीनता और हिपोक्रेसी का होली से कोई सम्बंध नहीं। साल में एक बार होली के दिन व्यक्ति अपने नग्न स्वरूप का आनंद उठाता है। गम्भीर से गम्भीर आदमी भी होली में कपड़े फाड़ कर सड़क पर रंग और कीचड़ का लुत्फ उठाता है। भांग और अन्य नशे का सेवन करता है। औरतें छुट कर होली खेलती हैं। उसे यह सब एकदम नापसंद है। दूसरी तरफ सहकर्मी मिश्रा साहब की धमकियां उसे डरा रही थीं--‘‘बच नहीं पाओगे मियां। पाताल मे छिपोगे तब भी ढूंढ निकाला जाएगा।’’ उसे मालूम है कि सुबह होगी और देश भर में होली की हुड़दंग शुरू हो जाएगी। सड़कों पर आॅटो-टैक्सी और बसें नहीं चलेंगी। रेलें चलेंगी किन्तु उनमें सफ़र करना ख़तरे से ख़ाली न होगा। होली के दिन की गई खतरनाक यात्रा को यादकर उसके रोंगटे खड़े हो गए...

2.

मुमानी के इलाज के लिए उसे भी मामू के साथ सेक्टर नाइन हाॅस्पीटल, भिलाई जाना पड़ गया था। ट्रेन में गिने-चुने यात्री थे। उनमें भी ज्यादा संख्या तो मियाओं की थी। एक बोगी जिसमें तबलीगी जमात के चंद लोग सफ़र कर रहे थे, उसी में वे लोग भी चढ़ गए। तबलीगी जमात के लोग सफ़र शुरू होते ही ज़िके्र खुदावन्दी में मसरूफ़ हो गए। अमीरे-जमात (जमात के मुखिया) एक बुज़ुर्ग थे। अपने घरों से एक-एक चिल्ला (चालीस दिन) काटने निकले मुसलमान...जिसमें वे अपनी दीनी मालूमात को तरोताज़ा करेंगे। इस्लामी आदर्शों और नियमों से बंधे-बंधाए होते हैं ये चालीस दिन। इस्लाम में चिल्ले का बहुत ही महत्व है। कहा जाता है कि मां के गर्भ में चालीसवें दिन बच्चे में अल्लाह जान डालता है। चिरमिरी से ट्रेन खुलती थी। मनेंद्रगढ़ और बिजुरी तक तो ठीक रहा, किन्तु जैसे ही कोतमा आया, स्टेशन उपद्रवी तत्वों से भर गया। होली की मस्ती में डूबे हुड़दंगियों का जमावड़ा। रंग-बिरंगे लोग। भांग और शराब के नशे मंें धुत लोग। अश्लील गीतों और भद्दी गालियों से प्लेटफार्म गंूज उठा। वे ट्रेन की बोगियों को अपनी मस्ती का निशाना बनाने लगे। कीचड़-मैला और रंगों के गुब्बारों की मार होने लगी। तमाम मुसाफिर अज्ञात आशंका से भयभीत हो उठे। कसरत से अल्लाह की याद की जाने लगी। मामू ने उससे कहा कि ‘आयतल-कुरसी’ का विर्द करो। मामू स्वयं ‘नादे-अली’ पढ़ने लगे। तबलीगी जमात के लोग दुआओं में मशगूल हो गए। मुमानी की अपेंडिक्स में इन्फेक्शन हो चुका था। चिरमिरी काॅलरी के डाॅक्टर ने सेक्टर नाइन हाॅस्पीटल भिलाई में केस रिफर किया था। भिलाई में उनका आपरेशन होगा। मुमानी को पेट में इतना दर्द उठता कि वह दर्द से कराहने लगतीं। पेट पकड़ कर दुहरी हो जातीं। दुआएं बेअसर हुईं, हुड़दंगियों ने उनकी बोगी पर हमला बोल दिया। मुमानी का दर्द बढ़ गया। वह पेट पकड़कर लोटने लगीं। अमीरे-जमात ने बुजुर्गों से सीट के नीचे छिप जाने और जवानों को ऊपर की बर्थ पर जाकर लेट जाने के लिए कहा। ताकि खिड़की की राह आने वाले हमलों से बचे रह सकें। उसने भी मामू के साथ तत्काल ऊपर की बर्थ पकड़ ली। मुमानी का दर्द के मारे जान निकली जा रही थी। तभी उनपर कीचड़-मैला और रंग के गुब्बारों से हमला हुआ। हल्ला होने लगा--‘‘कटुइन है....!’’ ग़नीमत हुई कि उसी समय ट्रेन चल पड़ी। शायद ट्रेन का इंजिन-चालक भी मुसलमान ही था, सो उसने ट्रेन की रफ्तार तत्काल बढ़ा दी। इस तरह कोतमा से जब ट्रेन आगे बढ़ी तब हुड़दंगी नीचे उतरे। उसने देखा कि मुमानी के शलवार-कुर्ते और दुपट्टे पर रंग और कीचड़ के घब्बे थे। मुमानी का रो-रोकर बुरा हाल था। वह मजबूर थीं। सारी जिन्दगी रंगों से बची रहीं और बीमारी की हालत में उनकी ये दुर्दशा हुई। वे ज़ार-ज़ार रोए जा रही थीं। मामू भी रोने लगे। तबलीगी जमात के अमीरे-जमात तब मदद के लिए आगे आए। पवित्र कुरआन-मजीद की एक आयत पढ़ी-‘‘ वतवासौ बिल हक़्के़ वतवासौ बिस्सब्र’’ यानी हक़ की राह पर चलो और सब्र का दामन थामे रहो। मामू और मुमानी पर उनकी बात का असर हुआ। उसके बाद जमात के सभी लोग दो रकअ़त ‘नमाज़े-हाजत’ (इच्छा-पूर्ति के लिए नमाज़) पढ़कर अल्लाह से मदद की दुआआंे मे मशगूल हो गए। जैसे-तैसे कटा था वो सफ़र।

3.

कल सुबह होली है। अल्लाह रहम करे। होली के नाम पर उसकी रूह कांप उठती है। एक बार उसके साथ एक घटना हुई थी, तब से वह होली के दिन अतिरिक्त सावधानी बरतने लगा। उसका दाखिला शहडोल डिग्री कालेज में हुआ था। मां-बाप के संरक्षण से दूर होली का दिन तो उसने निर्विध्न गुजार दिया। चूंकि वह हाॅस्टल में नहीं रहता था, इसलिए होस्टल वाली हुड़दंगियों से वह बच गया। नगर के बाहर बाई-पास रोड पर हाजी सुलेमान की किराए की चाल थी। वहां तालिब इल्म किराए के कमरे लेकर रहते थे। हाजी सुलेमान उसके वालिद साहब के दोस्त थे। सो उसे हाजी सुलेमान की चाल में एक कमरा मिल गया। घर के पास ही छोटी मस्जिद थी। हाजी साहब का दबाव रहता था, इसलिए वक्त मिलने पर दो-तीन टाईम की नमाज़ वह मस्जिद जाकर अदा करता था। मिट्टी तेल के स्टोव पर खाना वह स्वयं ही पकाता था। अब्बा होटल या मेस के खाना के सख्त खि़लाफ थे। हज्जन चच्ची उसे बहुत मानती थीं। उन्होंने ही उसे आगाह किया था कि बिटवा, इहां होली बुढ़वा मंगल तक खेली जाती है। वह नहीं जानता था कि ये बुढ़वा मंगल क्या बला है। उसके गृहनगर में तो रंग और कीचड़ वाली होली सिर्फ बारह-एक बजे तक मनाई जाती थी। दोपहर के बाद होली बहुत शालीन हो जाती थी। सो उस बुढ़वा मंगल वाली बात पर उसने तवज्जो नहीं दिया। होली शायद शनिवार को मनाई गई थी। उसके तीसरे दिन मंगलवार था। कालेज बंद थे। छुट्टियों में वह घर न जाकर वहीं रहकर अपनी अंग्रेजी ठीक कर हां, घर में आलू और प्याज खत्म हो गया था, इसलिए उसे बाजार जाना पड़ गया। पास ही चैराहे पर बाजार लगता था। बाजार के प्रवेश-द्वार पर ही बैंक था। बैंक के पास संकरे मार्ग पर नौजवानों की भीड़ जमा थी। वह थैला लिए अपनी धुन में आगे बढ़ने लगा। उसने महसूस किया कि कुछ नौजवान उसकी तरफ बढ़ रहे हैं। उनमें से एक लम्बे नौजवान ने पास आकर कहा--‘‘नया मुर्गा लगता है ?’’ दूसरे ने टुकड़ा जोड़ा--‘‘मुर्गा नहीं मुल्ला...!’’ ‘‘अच्छा ऐसा है...’’ वे सभी चहक कर चीख़ उठे। वे लोग उसे गोल घेरे में लेकर सड़क के किनारे, गंदी बदबूदार नाली के पास जा पहुंचे। वह समझ पाता इससे पूर्व कुछ ने उसे पीछे से जकड़ लिया। डांटने की गर्ज से उसने कड़क आवाज़ में डांटा--‘‘अरे....रे...ये क्या हो रहा है ?’’ दो लड़कों ने उसके हाथ पकड़ लिए और दो ने पैर। उसे झूला सा झुलाते हुए उन लोगों ने बड़े प्रेम से उसे नाली में डाल दिया। फिर ताली पीट-पीट कर हंसने-नाचने लगे। --‘‘नया मुल्ला है, अब जान जाएगा कि आज बुढ़वा मंगल है।’’ तब जाकर उसकी समझ में आया कि शहडोल में होली बुढ़वा-मंगल तक मनाई जाती है।

4.

फोन की घंटी घनघनाई। उसने रिसीवर उठाया। मिसेज़ विवेक खरे का फोन था। कह रही थीं--‘‘तब देवर जी, कल सुबह होली खेलने आ रहे हैं न ?’’ उसने क्या कहता--‘‘खरे भाई साहब कहां हैं ?’’ उधर से--‘‘अरे देवर जी, होली के दिन कहां भाई साहब को याद करने लगे। सिर्फ भाभी को याद कीजिए, तभी उद्धार हो सकता है। वरना यह जनम भी अकारथ जाएगा।’’ मिसेज़ विवेक खरे जानती हैं कि वह अविवाहित है। बेचारी बड़े अच्छे मिजाज़ की हैं। परदेश में वह भाभी भी हैं, बड़ी बहन भी हैं और कभी-कभी तो मां की तरह व्यवहार करती हैं। वह भाभी को न कैसे कहे--‘‘श्योर यार, ज़रूर आऊंगा।’’ मिसेज़ विवेक खरे हंसने लगीं--‘‘तब लो, खरे भाई साहब से बात करो। देखो आना ज़रूर, धोखा मत देना।’’ वह भी हंस पड़ा। खरे भाई साहब ने फोन पर सिर्फ इतना ही कहा--‘‘नहीं आना हो तो बता दो, मैं तुम्हारे हिस्से की मिठाई-नमकीन ड्राइवर से भिजवा दूंगा।’’ तभी फोन भाभी ने छीन लिया--‘‘नहीं देवर जी, आओगे तो पाओगे.... समझे...!’’ उसने तत्काल झूठ बोला--‘‘नहीं भाभी, आपके पास नहीं आऊंगा तो फिर कहां जाऊंगा।’’ कहने को तो कह दिया, लेकिन उसे होली के रंग-गुलाल से अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण नफ़रत सी थी। कितना डरता था वह होली के इस त्योहार से। उसे हिन्दुओं के तमाम त्योहार ठीक लगते सिवाए होली के। उसके अब्बा अल्लाह पाक-परवरदिगार से यही दुआएं करते कि होली और जुम्मा या कि कोई अन्य मुस्लिम पर्व एक ही दिन में न पड़ें, वरना देश भर में दंगे या बलवों की आशंका बनी रहती। कई बार दंगे हुए भी। होली के दिन जब एक बार जुमा की नमाज़ पढ़ने वह सफेद कुर्ता-पैजामा पहन कर मस्जिद जा रहा था तब स्कूल के सहपाठी डब्बू ने उस पर रंग डाला ही था। उस दिन उसे लौट आना पड़ा था। रंग से नापाक हुए कपड़ों में नमाज़ कहां अदा होती। कितना रोया था वह उस दिन। वाजिब बात है कि होली में हिन्दू रंग खेलेंगे और पाक-साफ मुसलमान नमाज़ें अदा करने मस्जिदों या ईदगाहों में जाएंगे ही। प्रशासन की कड़ाई या बड़े-बुज़ुर्गों की पहल से भले ही कुछ लोग मुसलमानों की मान्यताओं का एहतराम करें, किन्तु बच्चे और युवा रंग डालने से कहां परहेज़ करने वाले। इधर बाबरी प्रकरण, ग्यारह सितम्बर का आतंकवादी हमला, संसद और अक्षर-धाम मंदिर पर फिदायीन हमले और गोधरा-गुजरात के फसादात के बाद तो जैसे एक-दूसरे सम्प्रदायों पर छींटाकशी और छेड़-छाड़ की घटनाएं में भरपूर इज़ाफा हुआ है। अलगाव की ये आंधी जाने कहां पहुंचाएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। अमन-शांति की वकालत करने वाली ताकतों की आवाज़ें नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बन चुकी हैं।

5.

उसे याद है कि बचपन में होली के दिन घर में इमरजेंसी लगा दी जाती थी। अब्बा के डर से मित्र-मण्डली घर आने की हिमाकत नहीं करते थे। रंग खेलना गुनाह है। यही तो समझाया करते थे अब्बा, अम्मी-खाला, बड़े बुजुर्ग और हाफिज्जी भी। जामा मस्जिद के पेश-इमाम हाफिज्जी की तकरीरें दिल में ख़ौफ़ पैदा करतीं-- ‘‘बिरादराने इस्लाम! मेरे अजीज बुजुर्गों, दोस्तों और बच्चों, होली के रंग से बचो। मरने के बाद अल्लाह पाक की बारगाह में तुम्हें इसका जवाब देना होगा। दोज़ख़ में डाल दिए जाओगे तुम। वहां तेज़ नश्तरों और खंजरों से रंगों के दाग़ खुरचे जाएंगे। तुम चीखोगे, चिल्लाओगे। अल्लाह से रहम की भीख मांगोगे। तुम्हारी कोई नहीं सुनेगा। वहां बड़ी अफ़रा-तफ़री का आलम होगा। बिरादराने इस्लाम! तुम एक मुकम्मल दीन और पाक़ीज़ा मज़हब के मानने वाले हो। मुझे मालूम है कि हमारे कुछ मुसलमान भाई होली में शरीक होतेे हैं। इस्लाम में इसकी मुमानियत (निषेध) है। होली तो जहालत की निशानी है। काफ़िर लोग एक दूसरे पर कीचड़ और दूसरी नापाक चीज़ें फेंकते हैं। गंदी गालियां बकते हैं। औरतों से बद्तमीज़ी करते हंै। लोगों में पागलपन का दौरा सा पड़ जाता है। इस्लाम जाहिलियत से आज़ादी का पैग़ाम है। इस्लाम क़बीलाई रस्मोें और बेतुके -रिवाज़ों से आज़ादी का नाम है। बिरादराने इस्लाम, अल्लाह हम सबको इस्लाम में पूरा-पूरा दाखिल करा दे, आमीन! बिरादराने इस्लाम, अल्लाह हम सबको सीधी-सच्ची राह में चलने की तौफ़ीक़ अदा कर दे। आमीन....सुम्मा आमीन...’’ उसके वालिद मुहतरम एक मज़हबी शख़्स थे। हराम-हलाल, हक़-नाहक़, अच्छा-बुरा, नेकी-बदी, शरई-ग़ैर शरई आदि तमाम मज़हबी नुक़्तो पर विचार करने के बाद ही वह कोई काम करते थे। हाफिज्जी की बात को गिरह से बांध लेते। उसे याद है कि अब्बा होली के दिन घर से बाहर नहीं निकलते थे। एहतियातन घर के मुख्य द्वार पर ताला स्वयं लगा दिया करते, कि बच्चों के दोस्त कहीं ग़ल्ती से घर में घुस न आएं। होली के एक दिन पहले घर में ज़रूरत का राशन-पानी मंगवा लिया जाता। अब्बा गोश्त एक दिन पहले घर ले आते। तब घर में फ्रिज़ नहीं था इसलिए गोश्त को उबालकर अम्मी ठंडी जगह रख देतीं। होली के दिन बच्चे खाने को न तरसें, इसलिए पकौड़े तले जाते। रसोई में अम्मी दिल लगाकर बिरयानी, रायता और ज़र्दा पकाया करतीं। उसके गृह-नगर की ख़ासियत थी कि होली में हुड़दंग सिर्फ दुपहर तक चलता। उसके बाद लोग नहा-धो लेते और शाम को साफ-धुला या नया कुर्ता-पैजामा पहनते। फिर अबीर-गुलाल लगाकर, गले मिलकर एक दूसरे का सत्कार किया जाता। मिठाइयां खाई-खिलाई जातीं। उनके घर का ताला सूर्यास्त के समय खुलता जब अब्बा मग़रिब की नमाज़ पढ़ने मस्जिद जाते। इधर अब्बा मस्जिद निकलते, उधर बच्चे अपने दोस्तों से मुलाकात की जुगत भिड़ाने लगते। वह होली की शाम आयोजित हास्य-कवि सम्मेलन सुनने गांधी-चैक अवश्य जाया करता। होली के दिन वह दोस्तों के घर नहीं जाता था, क्योंकि उसे डर रहता था कि कहीं मुहब्बत महंगी न पड़ जाए। अबीर-गुलाल का टीका लगवाना भी तो गुनाह ही है। अब्बा की नज़र से तो छिपा जा सकता है किन्तु अल्लाह की निगाह से बचना नामुमकिन है। प्रशांत उसका लंगोटिया यार था, उसकी ज़िद पर वह एक बार उसके घर चला गया। उसने घर जाने से पहले तय करवा लिया था कि रंग-गुलाल एकदम नहीं चलेगा। प्रशांत ने शर्त मान ली थी। उसे डर था तो इतना कि कहीं प्रशांत के भाई-बहन उससे रंग न खेलने लगें। वैसे भी ‘बुरा न मानो होली है’ का लुकमा मशहूर है ही। वह जब प्रशांत के घर पहुंचा, तब वहां बैठक में काफी लोग होली मिलने आए हुए थे। गहमा-गहमी थी वहां। प्रशांत उसे अपने कमरे में लिवा ले गया। वह चुपचाप प्रशांत के कमरे में बैठा गया। वह कुछ समझता इससे पूर्व प्रशांत ने जेब से पुड़िया निकालकर चुटकी भर गुलाल उसके माथे और गाल पर लगा दिया। ऐसे समय में करना तो यह चाहिए था कि उसे भी थोड़ा सा गुलाल लेकर प्रशांत के गाल पर लगा देना था और फिर दोनों गले मिल लेते। लेकिन प्रशांत की वादा-खिलाफ़ी से उसका दिमाग खराब हो गया। गुलाल कुछ अधिक ही लग गया था सो छितराकर उसकी सफेद कमीज़ पर भी उसका दाग़ पड़ गया। उसने चाहा कि प्रशांत को खूब गरियाए। उसके क्रोध से तमतमाए चेहरे को देख प्रशांत सकपका गया-- ‘‘यार, गुलाल ही तो है।’’ तभी पीछे पीठ पर उसे गीलेपन का एहसास हुआ। उसने उंगलियो से टटोला। अरे, यह क्या! पीठ पर तो पिचकारी से रंग डाला गया था। ‘‘कब तक बचोगे भइया...!’’ प्रशांत के छोटे भाई मन्नू की आवाज़ गूँजी। उसका गुस्से का पारा सातवें आसमान तक चढ़ गया। वह तुरंत उठ खड़ा हुआ। होली की मिठाई एक तरफ, वह वहां से जान बचाकर भागा और फिर उसने प्रशांत से जीवन भर की ‘कट्टी’ ले ली।

प्रशांत ने कई बार उससे बात करने की कोशिश की। अन्य मित्रों से उससे दोस्ती के लिए सोर्स लगाया। किन्तु वह तनिक भी न पिघला। उसे तो यही पता था कि होली खेलने से अल्लाह-तआला नाराज़ होते हैं। गुनाह पड़ता है और उसकी खौफ़नाक सज़ा के बारे में हाफिज्जी तो बतलाते ही रहते हैं। उसका विश्वास था कि यदि दोजख के दिल दहला देने वाले बयानात इंसान दिल लगा कर सुन ले तो पक्का है कि संसार से अपराध मिट जाएं। ग़लत काम कोई न करे। वह धर्म-भीरू था। अपने पिता की प्रत्येक सीख को वह गिरह बांध कर रखता। मसलन घर में, मस्जिद में, रेल या बस में प्रवेश करते वक्त ‘बिस्मिल्लाह’ कहकर पहले दाहिना क़दम ही बढ़ाया जाए। पैंट-पैजामा या चप्पल-जूता पहनते समय दाहिना पैर पहले डाला जाए। अब्बा हुज़ूर का हुक्म बजाने की ऐसी आदत पड़ गई थी कि यदि ग़लती से उसका बांया पैर पहले चला जाता तो तत्काल वह अपना पैर वापस खींच लेता और फिर दाहिना पैर अंदर डाला करता। ऐसे ही मज़हबी-माहौल में उसकी परवरिश हुई थी।

6.

वह सोच रहा था, कि सुबह होगी और होली का तांडव चालू हो जाएगा। मिसेज़ विवेक खरे का बुलौव्वा और मिश्रा साहब की धमकियां उसका पीछा कर रही थीं। बचने की कोई सूरत नज़र न आ रही थी। ऐसे ही एक अवसर पर उसने चालबाजी की थी, जो बुरी तरह फ्लाॅप हो गई थी। जिसके कारण उसका प्यारा सा ब्लेक एण्ड व्हाइट पोर्टेबल टीवी सेट शहीद हो गया था। तब वह अमलाई पेपर मिल में जूनियर एक्ज़्यूक्यूटिव ट्रेनीज़ था। क्रिकेट के शौक़ के कारण उसने दो कमरे के अपने क्वाटर में एक ब्लेक एण्ड व्हाइट पोर्टेबल टीवी रख लिया था। बैचलर तो था ही, सो दोस्तों का अड्डा बन गया था उसका क्वाटर। होली के दिन उसने चालाकी की। पीछे के दरवाजे से निकल कर सामने के दरवाजे पर ताला लगा दिया था। किसी को शक भी न हो और काम भी बन जाए। बाहर होली की टोलियों की आवाज़ें, ढोल-मंजीरे की थाप, चीख-पुकार, क़हक़हे और भागते क़दमों की आवाज़ों के बीच प्लान के मुताबिक नाश्ता करके बिस्तर पर पड़ा वह ‘दि गाॅड आॅफ स्माल थिंग्स’ की पोयटिक अंग्रेज़ी का मज़ा ले रहा था। किन्तु दोस्त कहां मानने वाले। सुबह के ग्यारह बजे के आसपास उसके क्वाटर के बाहर होली की एक टोली रूकी। --‘‘कटुआ तो धोखा देकर भाग गया रे...’’ उसने आवाज़ से जाना कि ये श्रीवास्तव है। ‘‘स्साला....लाला..... ’’ वह बड़बड़ाया। श्रीवास्तव की आवाज़--‘‘ तब फिर....?’’ मुकेश का सुझाव--‘‘खिड़की का शीशा तोड़कर देखो, साला कहीं छुपकर बस स्टेंड वाली भिखारन के साथ ऐश तो नहीं कर रहा है।’’ तड़ाक... बेडरूम की खिड़की का शीशा टूटा। वह सहम कर पलंग के नीचे छिप गया। उसे लगा कि मुकेश अंदर झांककर जायज़ा ले रहा है। --‘‘कोई नहीं है बे...’’ मुकेश की आवाज़। तब तक खिड़की के रास्ते एक और पत्थर अंदर आया और सीधे पोर्टेबल टीवी के स्क्रीन पर पड़ा। टीवी का स्क्रीन छनाक से टूट गया। --‘अबे लाला.... टीवी फूट गया...’’ फिर मस्ती भरे ठहाके गूंज उठे--‘‘बुरा न मानो होली है।’’ वह क्या करे ? कहां जाए ? इससे अच्छा था कि चंद दिनों की छुट्टी लेकर घर घूम आया होता। इन्हीं सब चिन्ताओं में कब वह नींद के आगोश में चला गया उसे पता ही न चला।

7.

आख़िर उसने जान लिया कि जिस जगह उसे लाया गया है, वह दोज़ख ही है। दोज़ख यानी जहन्नुम यानी नर्क यानी कि हेल... तभी तो इस जगह के बारे में अंग्रेज़ कहते हैं--‘‘गो टू हेल..’’ उतनी ही बुरी जगह है यह, अब उसे यक़ीन हुआ। आसमानी किताबों में और मज़हबी तक़रीरों में दोजख के बारे में ऐसी ही अलामतें तो बताई गई हैं। धुंआ, आग, मांस जलने की दुर्गंध, चीख-पुकार और दिल दहलाने वाले अट्टहास। कुछ-कुछ रामसे ब्रदर्स की फिल्मों की तरह के लोकेशन्स..... दोज़ख में जो कारिंदे थे, उनकी शक्लें बड़ी डरावनी थीं। वे काले आबनूसी जिस्म, लाल-लाल आंख, पैने दांत और खून से तर लाल-लाल जीभ वाले दैत्य थे। जिनका सारा जिस्म काले-मोटे-घुंघराले बालों से पुर था। दुनिया में नेक काम करने वाले लोग जन्नत में जाते हैं, और गुनाह करने वालों का ठिकाना दोज़ख की आग और वहां के अज़ाबात हैं। यही तो बताया करते हैं हाफिज्जी और वे तमाम उपदेशक जिन्हें भटकी हुई क़ौम को गुमराही से बचाने के लिए नगर में बुलाया जाता है। एक गुनाह उससे भी हो ही गया है। उसने अपने कपड़ों और हाथ-पैर की त्वचा पर ग़ौर किया। वाक़ई होली के रंग का असर अभी तक वहां नुमायां है। उसने रंग के दाग़ को छुपाना चाहा लेकिन यह क्या! रंगों के दाग़ अंधेरे में चमकने लगे जैसे रंग न होकर वहां ‘फ्लोरोसंेट -पेंट’ का कमाल हो। उसने देखा कि उन ख़तरनाक दैत्यों में से एक उसकी तरफ आगे बढ़ा। उसके हाथ में तेज़ खं़ज़र है। उसने उस दैत्य के सामने हाथ जोड़े कि उसे माफ़ कर दिया जाए...कि यह उसके जीवन की पहली भूल है। माफ़ी की उम्मीदें, वह भी दोज़ख में दैत्यों से....उसने स्वयं को असहाय महसूस किया। उसे घेरे में लिए अन्य दैत्यों पर ख़तरनाक हंसी का दौरा पड़ा। वे सब जंगलियों की तरह उछल-कूद मचाने लगे और नाचने लगे। दैत्य ने जैसे ही उसके गालों पर लगे होली के रंग को खं़ज़र की तेज़ चमकदार धार से खुरचना चाहा, उसकी चीख़ निकल गई। वह चिल्लाने लगा। तौबा करने लगा। अल्लाह पाक-परवरदिगार से रहम की अपील करने लगा। अचानक उसकी नींद खुल गई। उसका बदन पसीने से तर हो चुका था। उसकी नींद के परखच्चे उड़ गए। फिर वह सो न सका। फ्रिज से निकालकर एक बोतल पानी वह गटगटाकर पी गया। दिमाग ठंडा हुआ तो उसने एक प्रतिज्ञा की। उसे सुकून हासिल हुआ। फिर इतमीनान से सो गया।

8.

मिश्रा साहब होली खेलने जब विवेक खरे भाई साहब के क्वाटर पहुंचे, तो उसे पहचान नहीं पाए। वह पुराने कपड़े पहने हुए था। कपड़े रंग से तरबतर थे। उसका सारा जिस्म रंग से नहाया हुआ था। विभिन्न प्रकार के रंगों का कोलाज़ बन चुका था वह। वह बेहद प्रसन्न था। जब मिश्रा साहब ने उसकी आवाज़ सुनी तब उन्हें ज्ञात हुआ कि ये तो अपना सादिक है। वह होली में शरीक हुआ था इससे सभी प्रसन्न थे। सुबह जब वह जागा तो रात के दुःस्वप्न ने डराना चाहा था, किन्तु वह तो इरादा कर ही चुका था। उठते की साथ फ्रेश होकर उसने पुराने कपड़े के ढेर से एक जोड़ी टी-शर्ट और पेंट निकाला। कपड़े पहनकर उसने विवेक खरे भाई साहब के घर की राह पकड़ी। रास्ते में बच्चों ने उसपर पिचकारी की फुहार मारी। वह उन्हें कहता जाता --‘‘थोड़ा पक्का रंग लेकर तेज़ धार मारो यार...’’ जब वह खरे भाई साहब के घर पहुंचा तो वे भी उसे पहचान नहीं पाए थे। वह बहुत खुश था।