भगवतीचरण वर्मा / परिचय

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पाप कुछ भी नहीं है, वह तो केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का ही दूसरा नाम है! भगवतीचरण वर्मा


30 अगस्त सन् 1903 में तत्कालीन यूनाइटेड प्राविन्स वर्तमान उत्तर प्रदेश के जनपद उन्नाव की तहसील सफीपुर में एक सम्भा्रन्त कायस्थ परिवार में भगवतीचरण वर्मा का जन्म हआ। इन्होंने कविता , उपन्यास, कहानी , निबंध और नाटक लिखकर साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है। इनके पिता श्री देवीचरण जी कानपुर में वकालत करते थे। बालक भगवती की प्रारंभिक शिक्षा सफीपुर में ही हुयी। उच्च शिक्षा हेतु भगवती बाबू को प्रयाग विश्वविद्यालय भेजा गया जहाँ से उन्होंने साहित्य और विधि में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

भगवती बाबू बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी के संरक्षण में पत्रकारिता के क्षेत्र में तत्समय प्रचलित मुख्य समाचार पत्र ‘प्रताप’ का संपादन भी किया । वे काफी समय तक एक रेडियो के प्रमुख कार्य संचालक भी रहे।

उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय कृति उपन्याय चित्रलेखा है। इनकी प्रमुख रचनाऐं निम्न प्रकार हैंः-

उपन्यास:- भूले बिसरे चित्र, सीधी-सच्ची बातें, प्रश्न और मरीचिका, सबहिं नचावत राम गोसाईं, सामर्थ्य और सीमा , रेखा, वह फिर नहीं आयी, युवराज चूण्डा, धुप्पल, चाणक्य, टेढ़े मेढ़े रास्ते, आखिरी दाँव,

कहानीः- प्रतिनिधि कहानियाँ, मेरी कहानियाँ, मोर्चाबन्दी, पतन, मधुकण, मानव, प्रेम-संगीत,

संस्मरणः- अतीत के गर्त से, ये सात और हम,

नाटकः- मेरे नाटक, रूपया तुम्हें खा गया, वसीयत,

आलोचनाः- साहित्य के सिद्धांत तथा रूप,

बाल-साहित्यः- मुगलों ने सल्तनत बख्श दी,

काव्य -नाटकः- त्रिपथगा,

कविताः- मेरी कविताऐं, सविनय और एक नाराज कविता,

भगवतीचरण वर्मा की साहित्यिक साधना के प्रतिफल के रूप में वर्ष 1961 में इन्हें साहित्य अकादमी पुरूस्कार से पुरूस्कृत किया गया। वर्ष 1969 में इन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से अलंकृत किया गया। आदरणीय वर्मा जी वर्ष 1978 में भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के लिये चुने गये। अपनी राज्य सभा की सदस्यता के दौरान ही 5 अक्टूबर सन् 1981 को आपने दिल्ली में अपने जीवन की अंतिम साँस ली।

भगवतीचरण वर्मा की रचनाऐं युगीन विसंगतियों पर मार्मिक प्रहार करते हुये नवयुग के सृजन की दिशा में बढ़ने के लिये प्रेरित करती हैं। उनकी कविता जनसामान्य की भाषा में लिखे गये प्रभावी वक्तब्य सी हैं। कविता-संग्रह मधुकण का निम्न अंश दर्शनीय हैः-

धीरे धीरे मलय पवन-

ओ मधुऋतु के मलय पवन!

कहो तुम्हारे झोंको में है

किस विस्मृति का आलिंगन?

सौरभ के पुलकित अधरों पर

किस मादकता का चुम्बन?

जीवनमय है यह कम्पन!

जीवन है छोटा सा क्षण-

क्षण भर का छोटा सा क्षण!

स्ूने उर का प्रेम बन गया

आज तुम्हारा आकर्षण,

मेरे मानस में भर जाओ

अपने मानस का मधुकण-

सागर सा प्र्रशान्त मधुकण!

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लिखा गया आपका सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास चित्रलेखा के बारे में सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन का कहना है कि इसके केंद्र में पाप और पुण्य का विषय है जिसमें एक संन्यासी सांसारिकता की ओर अग्रसर होना चाहता है। लेकिन नायिका चित्रलेखा उसे फटकारती है तथा उसकी खुद की रूचि संन्यास में हो जाती है। चित्रलेखा में महान योगी कुमारगिरि और भोग-विलास और वासना में लिप्त शासक बीजगुप्त के चरित्रों की पारस्परिक तुलना में अप्रत्याशित रूप से पाप और पुण्य की नयी परिभाषा गढ़ते हैं और अपने शिक्षक से अंतिम पाठ इस प्रकर सुनते हैंः-

‘संसार में पाप कुछ भी नहीं है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष प्रकार की मनःप्रवृति लेकर पैदा होता है । प्रत्येक व्यक्ति इस संसार के रंगमंच पर एक अभिनय करने आता है। अपनी मनःप्रवृति से प्रेरित होकर अपने पाठ को वह दोहराता है यही मनुष्य का जीवन है जो कुछ मनुष्य करता है वह उसके स्वभाव के अनुकूल होता है और स्वभाव प्राकृतिक होता है। मनुष्य अपना स्वामी नहीं है वह परिस्थितियों का दास है-विवश है। कर्ता नहीं है, वह केवल साधन मात्र हैं ।फिर पाप और पुण्य कैसा?

मनुष्य में ममत्व प्रधान होता है। प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है। केवल व्यक्तियों के सुख के केन्द्र भिन्न होते हैं । कुछ सुख को धन में देखते हैं , कुछ त्याग में देखते हैं -पर सुख प्रत्येक व्यक्ति चाहता है, कोई भी व्यक्ति संसार में अपनी इच्छानुसार वह काम न करेगा जिसमें दुःख मिले -यही मनुष्य की मनःप्रवृति है औ उसके दृष्टिकोण की विषमता हैं । संसार में इसीलिये पाप की परिभाषा नहीं हो सकी और न हो सकती है। हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।’

उनकी सभी रचनाऐं अतीत के गौरवगान की अपेक्षा वर्तमान की कुंठा और आक्रोश को मुखरित करती है। जैसे प्रेम संगीत संग्रह का यह गीतः-

किस तरह भुला दूँ, आज हाय,

कल की ही तो बात प्रिये!

जब श्वासों का सौरभ पीकर,

मदमाती साँसें लहर उठीं,

जब उर के स्पन्दन से पुलकित

उर की तनमयता सिरह उठी,

मैं दीवाना तो ढूँढ रहा

हूँ वह सपने की रात प्रिये!

किस तरह भुला दूँ आज हाय

कल की ही तो है बात प्रिये!

आधुनिक हिन्दी उपन्यासकारों में भगवती चरण वर्मा का एक खास मुकाम है क्योंकि उनकी कृतियों में रोचकता का तत्व सर्वोपरि रहता है तथा आज भी चित्रलेखा, रेखा और भूले-बिसरे चित्र जैसी उनकी रचनाएं काफी चाव से पढी जाती हैं।

आलोचकों के अनुसार वर्मा ने अपने दौर में ऐसे विषयों पर कलम चलाई जिन पर लिखना उस समय बेहद साहस का काम समझा जाता है। इस मामले में उनकी कृति चित्रलेखा और रेखा की मिसाल दी जाती है। वर्मा की एक अन्य विशेषता थी कि उनके उपन्यासों के कथाशिल्प के अनुसार उनकी वर्णनशैली भी बदलती रहती थी। उनकी कई रचनाएं हिंदी में सर्वाधिक पढी जाने जाने वाली पुस्तकों में शामिल हैं।

एक सहित्यिक पत्रिका के संपादक गौरीनाथ के अनुसार भगवती चरण वर्मा की कई रचनाओं में गजब की पठनीयता है और वे किशोर एवं युवाओं की मानसिकता के काफी करीब हैं। गौरीनाथ के अनुसार उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति चित्रलेखा, रेखा सहित कई उपन्यासों और कहानियों में ऐसे तत्व हैं जो पाठकों में भावावेश उत्पन्न करते हैं। ऐसे में पाठक किताबें बीच में छोड नहीं पाता। यही वजह है कि उनकी कई रचनाएं हिंदी में सर्वाधिक पढी जाने जाने वाली पुस्तकों की सूची में शामिल हैं।

गौरीनाथ का मानना है कि उनकी रचनाओं में भावुकता स्थाई भाव रहा है और वे करुणा और कोमल भाव जगाने में सफल रहे हैं। उनकी रचनाओं में विचार, रहन सहन के लिहाज से परंपरा पर अधिक जोर दिखता है। उनके पात्रों में तमाम उतार चढाव के बावजूद लीक से हटकर फैसला लेने का भाव नहीं दिखता और अंतत: वे पारंपरिक सोच तथा संस्कार के साथ ही चलते हैं।

निर्मला जैन के अनुसार भगवती चरण वर्मा ने संन्यास की कमियों और उसमें छिपी बुराइयों को बेहतरीन तरीके से स्पष्ट किया है तथा इसके लिए उन्होंने प्रेम को साधन बनाया है। दरअसल उन्होंने प्रेम के माध्यम से अपनी बात सामने रखी है। रेखा जैसी रचनाओं के बारे में निर्मला जैन ने कहा कि एक दौर में यह खूब पढी गई। ऐसा ही धर्मवीर भारती की कृति गुनाहों का देवता के साथ भी हुआ। लेकिन ऐसी रचनाओं में स्थाई भाव की कमी होती है। जब स्थाई भाव की बात आती है तो चित्रलेखा और धर्मवीर भारती की बहुचर्चित कृति सूरज का घोडा जैसी रचनाएं ही आएंगी।

गौरीनाथ के अनुसार भगवती चरण वर्मा को अपने व्यक्तिगत जीवन में कई तरह की बाधाओं का सामना करना पडा। पारिवारिक भार भी आया। कम उम्र में ही पिता की मृत्यु होने से समस्याएं और बढ गई। इसके बावजूद वह हार नहीं मानने वाले थे और उन्होंने अपने जीवन में कई तरह के काम किए। लेकिन बाद में उन्होंने स्वतंत्र लेखन किया। चित्रलेखा के अलावा उनकी प्रमुख रचनाओं में भूले बिसरे चित्र, सीधे सच्ची बातें, साम‌र्थ्य और सीमा, रेखा, वह फिर नहीं आई, सबहि नचावत राम गुसाई, प्रश्न और मरीचिका, युवराज चूंडा, धुप्पल आदि शामिल हैं। उनकी कृति चित्रलेखा पर दो बार 1941 एवं 1964 में फिल्में बनीं और दोनों बार उसे अच्छी लोकप्रियता हासिल हुई।

उल्लेखनीय है कि वर्मा कुछ समय तक फिल्मों व आकाशवाणी से भी जुडे रहे। उन्होंने कुछ समय तक फिल्म कार्पोरेशन कोलकाता में काम करने के अलावा मुंबई में फिल्म कथा लेखन भी किया। बाद में उन्होंने दैनिक नवजीवन का संपादन किया। उल्लेखनीय है कि 30 अगस्त 1903 को उन्नाव के शफीपुर गांव में जन्मे भगवती चरण वर्मा ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत कविता से की थी लेकिन उन्हें ख्याति बतौर उपन्यासकार मिली। साहित्य अकादमी सहित कई पुरस्कारों के अलावा उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया और उन्हें राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया गया। उनका पांच अक्तूबर 1981 को निधन हो गया।

आलेखः-अशोक कुमार शुक्ला