मां तुझे सलाम और वृद्धाश्रम में मां / जयप्रकाश चौकसे

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मां तुझे सलाम और वृद्धाश्रम में मां
प्रकाशन तिथि : 26 सितम्बर 2018


फिल्म प्रदर्शन के दशकों बाद भी कुछ संवाद अवाम की स्मृति में गूंजते रहते हैं। सलीम-जावेद की फिल्म 'दीवार' में तस्करी करने वाला बड़ा भाई अपनी विशाल सम्पत्ति का बखान करते हुए ईमानदार इंस्पेक्टर भाई से पूछता है कि उसके पास क्या सम्पत्ति है? उसका जवाब है 'मेरे पास मां है।' एआर रहमान ने भी एक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार ग्रहण करते समय कहा था कि उनके पास मां है और उनका गीत 'मां तुझे सलाम' अत्यंत लोकप्रिय हुआ। जब रहमान मात्र दस वर्ष के थे तब उनके पिता की हत्या कर दी गई थी। मां ने ही उन्हें अपने दम पर पाला-पोसा। ज्ञातव्य है कि उनके पिता संगीतकार इलैया राजा के वादक थे। राकेश रोशन की फिल्म 'करण-अर्जुन' में मां कहती थी कि उसके करण -अर्जुन आएंगे और उसका विश्वास फलीभूत होता है। उसके पुत्र पुन: जन्म लेकर आते हैं। पश्चिमी देशों में माने जाने वाले धर्म में पुर्नजन्म अवधारणा मौजूद नहीं है परन्तु इन्हीं देशों में इस अवधारणा से प्रेरित फिल्में बनी हैं। भारत में पुर्नजन्म विश्वास पर विमल रॉय की 'मधुमति' बनी है। इसके पूर्व कमाल अमरोही की फिल्म 'महल' में पुराने भवन का मालिक और उसकी बेटी पुर्नजन्म का भ्रम रचते हैं।

विमल रॉय काे 'परख' नामक फिल्म में घाटा हुआ था तथा उसके पूर्व बनाई 'देवदास' में आंशिक लाभ ही हुआ था। वे कुछ हताश थे और कलकत्ता लौटने पर विचार कर रहे थे। ऋत्विक घटक को उन्होंने अपनी दुविधा बताई। घटक ने उनके दफ्तर में ही बैठकर थोड़े ही समय में 'मधुमति' की कथा लिखी और उन्हें कहा कि यह फिल्म सफल रहेगी। बिमल राय के पूरे कॅरिअर में 'मधुमति' ही सबसे अधिक धन कमाने वाली फिल्म सिद्ध हुई।

श्रीराम ने पिता द्वारा दिए गए आदेश का पालन करते हुए वनवास जाना स्वीकार किया परंतु उन्होंने यह भी कहा कि भले ही आदेश पिता ने दिया हो परंतु माता ने ही पिता से आग्रह किया था। इस वनवास ने ही उन्हें अपना श्रेष्ठतम अभिव्यक्त करने का अवसर दिया गोयाकि माता द्वारा दिया गया दंड भी अंततोगत्वा सार्थकता ही देता है। जब भी दुर्घटना होती है या हम दर्द में छटपटाते हैं तब मुंह से 'मां' ही निकलता है, क्योंकि हम नौ माह मां के गर्भ में रहते हैं और पिता से सम्पर्क बाद में ही होता है। यूं भी पिता-पुत्र रिश्ता तीर-कमान की तरह होता है। पुत्र रूपी तीर पिता की कमान से निकलकर निशाने पर लगता है परंतु सही तनाव ही उसे गति देता है। इस तरह पिता दंड तो मां सुरक्षा बन जाती है। अम्बिलिकल कॉर्ड कट कर भी कटती नहीं है। सोते समय हम प्राय: उसी मुद्रा में होते हैं जो गर्भस्थ अवस्था में होती है। प्राय: देश को मां माना जाता है और मातृ भूमि कहा जाता है। जर्मनी इसका अपवाद है वहां देश को फादरलैंड कहा जाता है। आर्य ही जर्मनी और भारत आकर बसे हैं परंतु आज दोनों में कितना बड़ा अंतर आ गया है। जर्मन शोध और असली विकास पथ पर अग्रसर हैं और हम आपस में ही भिड़ते रहते हैं। हमंे हमेशा बांटकर ही शासित किया जाता है और यह बात हुक्मरान जानते हैं।

निदा फ़ाज़ली ने मां पर एक कविता लिखी है। उनकी रचना कुछ इस तरह है... 'बेसन की सौंधी रोटी पर चटनी जैसी मां, याद आती है चौका, बासन, चिमटा, फूंकनी जैसी मां, बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन, थोड़ी-थोड़ी सबमें, " बांट के अपना चेहरा, माथा, आंखें, " जाने कहां गई फटे पुराने इक अल्बम में चंचल लड़की जैसी मां।'"

फिल्मकार महबूब खान ने 'औरत' नामक फिल्म बनाई और दशकों बाद उसी कथा पर नरगिस अभिनीत रंगीन फिल्म 'मदर इंडिया' बनाई। यह नरगिस का ही सुझाव था कि वह औरत को 'मदर इंडिया' के नाम से बनाएं। इतिहास गवाह है कि औरत भुला दी गई है परंतु 'मदर इंडिया' एक कभी न भूल पाने वाली क्लासिक का दर्जा रखती है। अमेरिका मेंे रहने वालीं पर्ल एस. बक ने चीन के किसानों का दर्द अपने उपन्यास 'गुड अर्थ' में बयां किया है। सृजनधर्मी लोग सरहदों से बंधे नहीं होते।

संकीर्णता की कोई हद नहीं होती। प्राय: मध्यमवर्ग के परिजनों में मां सबको भोजन कराने के बाद स्वंय खाती है और उसके हिस्से में खुरचन आती है। मां जैसी सहनशक्ति किसी के पास नहीं होती। प्रसव वेदना सहकर भी बच्चों काे प्यार देती है। आज वृद्धाश्रमों में अनेक माताएं आप देख सकते हैं। उन बच्चों की माताएं भी वहां होती हैं, जिनके पास धन और साधन हैं। व्यवस्थाएं और बाजारों ने मिलकर संवेदनाहीन मनुष्यों की तादाद में बेइंतिहा इजाफा कर दिया है। हर शहर और कस्बे में अनगिनत मकानों के नाम 'मातृछाया' या 'मां का आशीर्वाद' इत्यादि लिखा होता है। पुरातन आख्यानों से आधुनिक संविधान तक में मां की महिमा का गान है। परन्तु यर्थाथ जीवन में मां वृद्धाश्रम में भेज दी जा रही है।