मीना कुमारी बायोपिक: क्षीण संभावना / जयप्रकाश चौकसे

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मीना कुमारी बायोपिक: क्षीण संभावना
प्रकाशन तिथि :29 जुलाई 2016


मीना कुमारी के बायोपिक की चर्चा मौसमी फलों की तरह समय-समय पर दो दशकों से हो रही है। सबसे पहले सावन कुमार टॉक ने यह घोषणा की थी। मीना कुमारी के पति कमाल अमरोही के पुत्र इस काम को रोकना चाहते हैं। कमालिस्तान स्टूडियो मीना कुमारी के धन से बनाया गया है और आज उस जमीन के दाम आसमान पर पहुंच गए हैं। हास्य कलाकार मेहमूद ने भी यह प्रयास किया था। गुरुदत्त की 'साहब, बीबी, गुलाम' की बीबी का पात्र मीना कुमारी के जीवन से कई समानताएं रखता है। जब 'साहब' अपनी 'बीबी' से कहते हैं कि तुम इस सामंतवादी परिवार की अन्य औरतों की तरह गहने तुड़वाओ, उन्हें फिर से बनवाओ और सुपारी काटती रहो तो वह कहती है कि परिवार की अन्य स्त्रियों के पास जो है, क्या आपने मुझे दिया है। उसका संकेत उसके बच्चे नहीं होने का कारण है, क्योंकि उसका अय्याश पति अब अपनी शक्ति ही खो चुका है। इसमें सामंतवाद के शक्तिहीन हो जाने का संकेत भी है।

यह भी एक संयोग है कि गुरुदत्त की 'साहब, बीबी, गुलाम' के प्रदर्शन के कुछ वर्ष पूर्व राजकपूर की 'जागते रहो' में भी मोतीलाल ने सामंतवादी रईस अय्याश व शराबी की भूमिका अभिनीत की थी। उसकी संस्कारवान पत्नी भी इसी नपुंसकता का अति सूक्ष्म संकेत गीत में करती है, 'ठंडी-ठंडी चले पवन की बयार, पिया खिड़की खुली मत छोड़ो, पपीहे ने बुझाई अपनी प्यास, मैं रही प्यासी, पिया खिड़की खुली मत छोड़ो।' मीना कुमारी मात्र 39 वर्ष ही जीवित रहीं और पूरे जीवन उनका शोषण हुआ। खिलौने से खेलने की उम्र में उसके पिता ने उन्हें बाल-कलाकार के रूप में काम करने पर मजबूर किया। जवानी की दहलीज पर पैर रखते ही उन्हें नायिका की भूमिका मिलने लगी। माता-पिता के लालच से मुक्त होने के लिए उन्होंने शादी की, परंतु वे एक पिंजड़े से दूसरे पिंजड़े में आ गईं। उनकी कमाई पर हक हमेशा दूसरों ने जताया। उनके साथ सबसे भयावह त्रासदी यह हुई कि फिल्म-दर-फिल्म निरंतर पीड़ित, दंडित महिला की भूमिकाएं करते रहने के कारण उदासी ने उनके अवचेतन पर इस कदर कब्जा कर लिया था कि रोने के दृश्य अभिनीत करने के लिए अन्य कलाकारों की तरह उन्हें आंखों में ग्लीसरीन नहीं डालना पड़ता था। इसकी हद तो यह थी कि कई बार एकांत में उनके आंसू बरबस बहने लगते थे। उन्होंने अपनी छवि बदलने के लिए 'मिस मैरी' नामक फिल्म अभिनीत की, परंतु वह असफल रही। दिलीप कुमार तो अपनी इस तरह की छवि से 'कोहिनूर' व 'राम और श्याम' जैसी फिल्में करके मुक्त हो गए, परंतु मीना कुमारी मुक्त नहीं हो पाईं। हमारे समाज में महिला को अपनी छवि से मुक्ति या अन्य प्रकार की कोई मुक्ति संभव ही नहीं है।

मीना कुमारी तनाव से मुक्त होने के लिए चोरी छुपे शराब का सेवन करती थीं। परंतु जब वे शराब छोड़ना भी चाहती थीं, तो शराब ने उन्हें नहीं छोड़ा और लालची रिश्तेदारों ने उन्हें विदेशी बोतलों में सस्ती शराब देना शुरू कर दिया। उन्होंने जानकर अनजान बने रहने का अभिनय किया और देशी शराब ही गुटक ली। क्या निरंतर शोषण किए जाने से शोषित व्यक्ति को भी उसकी आदत पड़ जाती है? हमारा अवाम आज भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हुआ है। निदा फाज़ली, 'आज़ाद न तू, आज़ाद न मैं, जंजीर बदलती रहती है, दीवार वही रहती है, तस्वीर बदलती रहती है।' शराबनोशी के कारण मीना कुमारी को लीवर की बीमारी हो गई और उस दशा में भी उन्हें जाने कैसे शराब उपलब्ध कराई गई और वे पीती रहीं गोयाकि वे स्वयं अपनी मृत्यु को बार-बार आमंत्रित कर रही थीं। टाइम्स की पत्रिका माधुरी के अंक में अशोक कुमार ने लिखा था कि जब वे अपनी अनेक फिल्मों की सह-कलाकार मीना कुमारी को होम्योपैथी की दवा देने गए, तब उन्होंने उन्हें जिस हाल में देखा, वे बिना दवा दिए उल्टे पैर अपने आंसुओं को पीते वापस आ गए। बेबसी व बीमारी के उन दिनों में उन्हें कुछ होश नहीं था और उनके सेवक तक उनके जिस्म से खिलवाड़ कर रहे थे। 'बीबी' मदहोश थी, 'गुलाम' रियासत लूट रहे थे, 'साहब' तमाशबीन थे। 'साहब' हमेशा ही तमाशबीन होते हैं। आज तो 'नट सम्राट' ही गद्‌दीनशीं हैं।

दिल्ली स्थित गरीबों की किसी रिहाइश में जन्मी महज़ी जाने कैसे मीना कुमारी हो गईं। उनकी माता की माता रवींद्रनाथ टैगोर परिवार की कन्या थीं, जिन्होंने एक हारमोनियम वादक से विवाह किया था। कोई आश्चर्य नहीं कि मीना कुमारी ने बंगाली में लिखी 'परिणीता' इत्यादि फिल्मों में अभिनय किया। तपन सिन्हा की 'अपन-जन' से प्रेरित 'मेरे अपने' उनकी जीवन यात्रा के अंतिम पड़ाव की फिल्म थी। मीना कुमारी शायरा भी थीं और उनका एक संकलन उनकी मृत्यु के बाद गुलज़ार ने प्रकाशित करवाया था। वे अपनी नज्मों के सारे अधिकार गुलज़ार के नाम कर गई थीं। उनकी शायरी का एक अंश- 'मुहब्बत कौसे-कुजह (इंद्रधनुष) की तरह कायनात के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पसरी है, इसके दोनों सिरे दर्द के अथाह समुंदर में डूबे हुए हैं।' आज मीना कुमारी के बायोपिक में केंद्रीय भूमिका कौन निभाएगा? संभवतः प्रियंका चोपड़ा!