मुर्दाघर / नज़्म सुभाष

Gadya Kosh से
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बच्चा भूख से व्याकुल था। उसे कई दिनों से दूध नहीं मिला है और सावित्री थी कि नरायन को कातर दृष्टि से देखते हुए बार-बार बच्चे को ताकती जा रही थी जिसका तात्पर्य यही था कि कैसे भी हो दूध और खाने-पीने का इंतजाम ज़रूरी है अन्यथा दिन पर दिन मुश्किलें बढ़ती ही जाएंगी।

नरायन ने एक उचटती नजर बच्चे पर डाली। पसलियाँ उभर आयी हैं। चेहरा निस्तेज होकर पीला पड़ चुका है। सावित्री से नजरें मिला पाने की क्षमता उसमें नहीं है महसूस होता है जैसे उसने कोई गुस्ताखी कर दी हो। वैसे अपने परिवार की बुनियादी ज़रूरतें पूरी न कर पाना किसी गुस्ताखी से कम भी तो नहीं मगर ऐसे हाल में वह करे भी तो क्या?

वह आहिस्ता से उठा और कमरे का दरवाजा खोलकर जरा-सा सर बाहर निकाल कर देखा। गली बियाबान जंगल की तरह मनुष्यविहीन थी। अभी मात्र साढे दस ही बजे थे। कोई घंटा-डेढ़ घंटा लगेगा पहुँचने में...उसने मन ही मन सोचा और जल्दी से चप्पलों में पैर डालकर बाहर निकला ही था कि ऊपर से आवाज आई-"नरायन! आज तो किराया मिल जाएगा न"

उसके पैर जहाँ के तहाँ थम गए। बड़ी मुश्किल से उसने ऊपर नजर उठाई जैसे चोरी करते हुए पकड़ा लिया गया हो। उसने सहमति में सिर हिला दिया।

"वैसे इस लॉकडाउन में जा कहाँ रहे हो?"

"मालिक को फोन किया था उम्मीद है कुछ पैसे मिल जाएंगे" उसने मरियल आवाज में कहा

"कुछ मतलब कितने?"

उन्होंने उसे गौर से देखा और आगे बोले-"पूरे तीन हजार तो मेरे किराए के ही हुए"

"ज्जी"

उसने बड़ी मुश्किल से थूक गटका। आगे कुछ और कहना चाहता था मगर क्या कहे अभी तक उसकी समझ में ही नहीं आया था लिहाजा हाथ जोड़कर आगे बढ़ चला।

उसे लगभग सात किलोमीटर चलना है। पूरे शहर में कर्फ्यू जैसा माहौल है ऐसे में टैक्सी, ई-रिक्शा कि उम्मीद ही बेमानी थी उसने अपनी बोझिल चाल को ज़रा तेज करने की कोशिश की मगर चंद कदमों के बाद टांगे कांपने लगीं। इक्कीस दिन के लॉकडाउन में बारह-तेरह दिन तो उसने जैसे-तैसे गुजार लिए थे मगर अब गुजारा मुश्किल हो चुका था। राशन खत्म है। बच्चे के दूध के लिए पैसे नहीं हैं। मालिक से हफ्ते भर पहले फोन पर अपनी व्यथा बताई तो उधर से जवाब आया कुछ दिन में व्यवस्था करता हूँ...और आज का वायदा किया था।

सरकार भले ही ऊंचे-ऊंचे दावे करे मगर हकीकत तो यही है कि उसके जैसे लाखों मजदूरों की ज़िन्दगी पर कोरोना का संकट तो जब आएगा तब आएगा मगर भूख का संकट सिर पर तलवार की तरह लटका है। खाए-पिए अघाये लोगों का क्या! उन्हें तो सबकुछ मयस्सर है तभी तो सभी लॉकडाउन की खबर होते ही बाजारों पर टूट पड़े थे। महीनों का राशन स्टोर हो चुका है मगर उसके जैसे रोज कुआँ खोदकर पानी पीने वाले क्या-क्या और कैसे स्टोर कर लें?

बिना किसी मोहलत के इस फैसले से उसके जैसे दिहाड़ी मजदूरों पर क्या गुजरेगी शायद ही किसी ने सोचा हो और अगर सोचा भी होगा तो किया क्या? उन्हें ऐसी कौन-सी सुविधा मिली जिसके ढिंढोरे लगातार न्यूज़ चैनल पीट रहे हैं।

वह दाने-दाने को मोहताज होकर रह गया है। हाँ! एकदिन ज़रूर एक स्वयंसेवी संगठन ने पूरी-सब्जी का पैकेट उपलब्ध कराया था लिहाजा वह कसम खाने की स्थिति में ज़रूर नहीं मगर एक दिन की सहायता से इक्कीस दिन तो जिया नहीं जा सकता।

काश! उसे भुखमरी के दिनों की खबर होती तो वह गाँव ही निकल जाता। पिताजी कमसकम रूखी-सूखी तो उपलब्ध ही करा देते। इस महामारी को भी कमबख्त इसी समय फैलना था। उसने सोचा, फिर स्वयं ही अपनी सोच पर खीझ उठा। किसी और समय में भी ये महामारी आती तो वह क्या कर लेता? क्या उसकी अंटी में इतना रुपया होता है कि तीन-चार महीने का राशन स्टोर कर ले। समय पर कमरे का किराया चुकता कर दे। बच्चे के दूध का प्रबंध कर ले। निराशा लगातार उसके जेहन को अपनी गिरफ्त में लेती जा रही थी। विदेशों से बीमारी लेकर आएँ अमीरजादे और उसकी भरपाई करें हमारे जैसे दिहाड़ी मजदूर... उसका मुंह कसैला हो गया। महसूस हुआ मुंह में कुनैन भर गई है लिहाजा उसने "आक् थू" करते हुए सड़क पर थूक दिया। वह कुछ आगे बढ़ा ही था कि एक पुलिस वाले ने उसे घूरते हुए डंडा लहराया-"साले! सड़क पर थूककर महामारी फैलाता है"

वह अपनी बेखयाली से निकलकर कोई जवाब दे पाता उससे पहले ही लहराता डंडा उसकी पीठ पर जा पड़ा तो उसके कदम लड़खड़ाए और मुंह से चीख निकल गई।

"साहब मुझे मत मारो, मुझे कोरोना नहीं है"

"क्यों बे! क्या तेरी शक्ल पर लिखा है?" वह दहाड़ा

इस बात का वह क्या जवाब देता। बस उजबक की तरह उसके डंडे को देखता रहा और पीठ सहलाता रहा।

"साले! पूरी सड़क पर तुझे कोई बंदा दिख रहा है जो इधर मटरगश्ती करने आ गया"

इस बार भी पुलिस वाले ने डंडा लहराया ज़रूर मगर जाने क्या सोचकर ठहर गया।

"साहब मेरे सारे पैसे खत्म हो चुके हैं। बच्चा दूध के लिए रोता है उसका रोना नहीं देखा जाता। राशन भी नहीं बचा है। मालिक को फोन किया था कुछ पैसों के लिए, वही लेने जा रहा हूँ" वह एक ही सांस में सबकुछ बोल गया।

सड़क पर निकलने वाला हर बंदा कोई न कोई बहाना बनाता ही है। ऐसे में कौन सही है कौन ग़लत वह कैसे तय करे? बावजूद इसके पुलिस वाले को उसकी आंखों में बेबसी नजर आई। यह बेबसी किसी बहाने की मोहताज न थी। वह भी इंसान है। मानवीय संवेदनाओं को इतना तो समझता ही है। बेकार में उसे मार दिया मगर वह भी क्या करे...ड्यूटी ही ऐसी लगी है। उसने सोचा तो खुद पर अफसोस हो आया। तबतक एक दोपहिया वाहन जिसपर तीन लोग सवार थे, फर्राटा भरते हुए उसकी ओर आते दिखा तो वह उसे टारगेट करके चिल्लाया-"साले! जब तक कूटे नहीं जाओगे सुधरोगे नहीं...तुम लोगों के चक्कर में ज़रूरतमंद भी पिट जाते हैं"

नरायन के लिए मौका था लिहाजा उसने अपने ठहरे कदमों को गति देते हुए चाल बढ़ा दी। एकबारगी तिरछी नजर से पुलिस वाले ने उसे देखा तो बुदबुदा उठा-"ठीक ही हुआ। मैं धर्म संकट से बच गया।"

अभी वह दो किलोमीटर ही आया था। अभी पांच किलोमीटर का सफ़र और है। न जाने कितनी जगह पुलिस वालों से सामना होगा और यूं ही लाठियों से स्वागत-सत्कार होता रहेगा। बिना किसी अपराध के भी उसे महसूस हो रहा था जैसे उसने किसी का कत्ल कर दिया हो और उस तक पहुँचने वाली हर नजर उसे हिकारत से देखते हुए कूट डालने की पक्षधर हो।

"ईश्वर कीड़ा मकोड़ा बना दे मगर मजलूम इंसान न बनाए" उसने मन ही मन सोचा और चाल बढ़ा दी।

विवशताओं का मकड़जाल उसके चेहरे पर पसरता जा रहा था। छत्तीस डिग्री तापमान में लू भले न चल रही हो मगर उसका बदन भट्टी की माफिक उबलने लगा था। उसे जोरों की प्यास लगी थी मगर दूर-दूर तक कहीं भी पानी का नामोनिशान न था। चेहरा गर्मी से लाल और पसीने से तरबतर था जिसे वह बीच-बीच में अपने अंगौछे से पोछता तो उसका चेहरा और सुर्ख हो उठता। अब उसके कदम जैसे मीलों का सफ़र तय करके थम जाना चाहते थे। मगर जैसे ही भूख से व्याकुल बच्चे का रोता बिलखता चेहरा उसकी आंखों में दृष्टिगोचर होता उसके थक चुके कदमों में जान आ जाती और वह दुगुनी रफ्तार से चलने लगता।

कुछ ही दूर आगे चौराहा था। उसने देखा बैरिकेड से सड़क को घेर रखा गया था। बस एक पतली-सी जगह थी जहाँ से दुपहिया वाहन ही गुजर सकते थे। एक बड़ी-सी रंगबिरंगी छतरी की छांव में दो पुलिस वाले बैठे चारों ओर का मुआयना कर रहे थे। उसकी जान सूख गई। लगता है दोबारा फिर से पिटना लिखा है। चंद पलों के लिए उसने कदम ठिठके मगर बच्चे की भूख ज़रा भी देर ठिठकने का अवसर देने के मूड में न थी। तीन दिनों से वह खुद भी भूखा है। भूख उसकी आंतों को अपनी मुट्ठी में भींचकर लगातार मरोड़े जा रही थी। उसने फिर से कदम बढ़ाए। वह चौराहे के करीब पहुँचा ही था कि आवाज आई-"तुमको आज भी चैन नहीं है नरायन"

उसने उधर की ओर नजरें डालीं अरे यह साब तो अक्सर उसकी दुकान पर आते हैं उन्हें देखते ही उसे याद आया तो उसने हाथ जोड़ दिए।

"महाराज! लॉक डाउन है... कुछ तो ख्याल करो"

"साहब बहुत मजबूरी थी इसी वजह से निकले हैं"

"जैन साहब के यहाँ जा रहे हो"

इस बार उन्होंने नरमी से कहा

"जी साहब"

"ठीक है जाओ। मगर इस समय न निकलो वही ठीक है हम तो तुमको पहचानते हैं इसलिए कुछ न कह रहे मगर सख्ती बहुत है"

"साहेब समझते हैं मगर ये पेट..."

उसकी आंखें पनीली हो गयीं लिहाजा बड़ी मुश्किल से वह आगे कह पाया "ये पेट नहीं समझता"


दो किलोमीटर रास्ता और बचा है वह भी बिना डंडा खाए कट जाता तो अच्छा रहता। यह तो अच्छा था यह साब दुकान पर आते रहते हैं, कई बार इनके पर्चे का सामान उसने ही निकाला है। वही मामूली-सी जान-पहचान आज काम आ गई अन्यथा..."

इस "अन्यथा" के आगे वह कुछ सोचता तो आंखों के आगे अँधेरा छा जाता महसूस होता वह किसी बियाबान जंगल में निपट तन्हा खड़ा है और हर तरफ से खूंखार जानवरों ने उसे घेर लिया है लेकिन अब उसने दृढ़ निश्चय कर लिया था जो भी होगा देखा जाएगा। इस बियाबान जंगल से वह निकलेगा ज़रूर... इस मुश्किल घड़ी में जब पेट की अंतड़ियाँ ऐंठी जा रही हों तो दो-चार डंडों की क्या बिसात ...और कोई रास्ता भी तो नहीं।

अब उसे दाहिने तरफ मुड़ते हुए करीब पांच सौ कदम जाकर एक गली में जाना था जोकि जैन साहब के घर की ओर जाती थी।

उनके घर के गेट के पास पहुँचकर जब उसने कॉलबेल बजाई तो करीब पांच मिनट बाद उनके घरेलू नौकर श्याम ने आकर दरवाज़ा खोला और सामने उसे देखकर बोला-"तुम यहीं रुको मैं साहब को बता आऊं"

बाहर धूप का साम्राज्य अपने समूचे लाव-लश्कर सहित डटा था। सर छुपाने की कहीं जगह न थी। बस छज्जे के कोने के पास जरा-सी ओट थी। ऐसे में राहत की मामूली गुंजाइश को देखते हुए वह उधर ही बढ़ गया।

थोड़ी देर बाद श्याम हाथ में एक पर्चा और पांच सौ का नोट लेकर उसके सामने हाजिर हुआ।

"इस पर्चे में जो-जो सामान लिखा है उसे ला दो"

उसे खीझ हुई। सात किलोमीटर से वह चलकर आया है। प्यास के मारे गला सूख रहा है। मानता हूँ मैं एक मामूली नौकर हूँ मगर उनसे यह तक न हुआ कि एक गिलास पानी ही भिजवा देते। भिजवाया भी तो सामान की लिस्ट। उसकी भौंवे तन गई।

"तुम भी तो जा सकते हो"

"हमको घर से निकलने की मनाही है"

"मगर घर की नौकरी तो तुम ही करते हो"

"ज़्यादा कानून न बताओ। जबसे महामारी की वजह से शहर लॉकडाउन हुआ है इस घर से बाहर कोई नहीं निकला। राशन-पानी की तो कोई कमी नहीं है इसलिए ज़रूरत भी नहीं पड़ती। बस सब्जी की ज़रूरत है तुम आ गये हो तो मालिक ने कहा है ला दोगे।"

"कोरोना गरीबों को नहीं पकड़ता बस जैन साहब बचे रहें" वह मन ही मन बुदबुदाया और नोट के साथ लिस्ट थाम ली।

करीब एक घंटे गली, मोहल्ला, सड़क छानने के बाद उसने लिस्ट का सारा सामान खरीदा और घर के करीब पहुँचकर कॉलबेल बजाई। श्याम एक बड़ी डलिया लेकर फिर से नुमाया हुआ। नरायन ने सारा सामान डलिया में रखा तो उसे उसने अंदर ले जाकर एक कोने में पलट दिया और एक दूसरी पर्ची उसकी ओर बढ़ा दी।

"यह क्या है?"

"गैस गोदाम तक चले जाओ एक सिलेंडर लाना है"

"सिलेंडर लाना है" उसके कानों में जैसे ये शब्द विस्फोट करने लगा था। जेहन में खदबदाता लावा उबल पड़ा-"हम यहाँ तुम्हारे काम निपटाने नहीं आए हैं। सात किलोमीटर पैदल चलकर आया था। एक गिलास पानी तक तो पूछा नहीं और आते ही लिस्ट थमा थी सो अलग। जब वह ला दिया तो अब सिलेंडर..."

"मतलब नहीं जाओगे"

"बिल्कुल नहीं जाएंगे" उसने इत्मीनान कहा।

"ठीक है हम मालिक से यही कह देंगे"

श्याम पैर पटकते हुए अंदर चला गया। उसके जाने के बाद उसने सोचा, बेकार में मना किया। अब तो जैन साहब से जो उम्मीद करके आया था वह उम्मीद भी जाती रही, मगर वह कोई उधार मांगने तो नहीं आया। उसका लगभग आठ हजार का हिसाब निकल रहा है। यही सोचकर उसने सिर को झटका और जैन साब के आने का इंतजार करने लगा।

करीब पांच मिनट बाद जैन साहब चर्बी चढ़े अपने थुलथुल पेट के ऊपर उटंग बनियान और तौलिया लपेटकर बड़बड़ाते हुए आते दिखे।

"कमबख्तों को ज़रा भी होश नहीं कि बाहर महामारी फैली है और नवाबजादों को पिज़्ज़ा खाना है। कोल्ड्रिंक पीनी है। अरे जब मोदीजी ने मना किया है तो मानना चाहिए। हफ्ते दो हफ्ते में कौन-सा कुछ बिगड़ जाएगा। बाहर न जाने की लक्ष्मणरेखा है तो है। आखिर हम भी तो पालन कर रहे हैं। अपनी ही राशन की दुकान है चाहूँ तो इस समय खोलकर तमाम वारे-न्यारे करूं मगर जान है तो जहान है। राशन महीने दो महीने में सड़ा नहीं जा रहा। फिर खोल लेंगे। फिर अभी तो सरकारी रेट की लिस्ट जारी हो चुकी है जरा-सा भी इधर-उधर हुआ तो सरकारी डंडा बजने लगेगा। थोड़ा टाइम हो जाए, प्रशासन का जोश ठंडा हो फिर मनमाने रेट में भी बेचा जा सकता है। इस समय तो कोई सुनवाई भी न होगी। वैसे भी लॉकडाउन में राशन की किल्लत तो बढ़नी ही है।"

अचानक नरायन पर नजर पड़ी तो बड़बड़ाना बंद कर उसे खा जाने वाली नजरों से देखते हुए बोले-"तुमसे एक जरा-सा काम नहीं हो सकता...चार दिन को दुकान क्या बंद हुई चर्बी चढ़ गयी"

"साहब तीन दिन से पेट में अन्न का एक दाना नहीं गया है और आप चर्बी की कह रहे। इतनी दूर पैदल चलने में ही हालत खराब हो गई है। अभी सब्जी लाने में एक घंटा लग गया अब मेरे पैरों में इतनी ताब नहीं कि सिलेंडर ला सकूं। अब तो मेरे लिए एक-एक कदम भी भारू है...आपसे हफ्ते भर पहले परेशानी बताई थी मगर..."

"तुम भी हद करते हो नरायन! एकाएक बाज़ार बंद हो गया कैसे व्यवस्था करते? आज जरा-सा घर का काम कह दिया तो इतनी बातें"

उन्होंने गुस्से से आंखें दिखाई फिर ज़रा दूर जाकर पीछे पलटे और संयत होकर बोले-"खैर, सिलेंडर ले आओ तब तक इंतजाम करते हैं"

"डिलीवरी तो होती होगी"

"जब सिलेंडर बुक ही नहीं है तो डिलीवरी कैसे होगी?" वह झझुंझलाये

"खाली सिलेंडर भी तो ले जाना पड़ेगा"

" अभी खाली सिलेंडर कहाँ है, तुम बस यह पर्ची दे देना सिलेंडर मिल जाएगा। एजेंसी वाले सक्सेना साहब हमारे मित्र हैं।

मरता क्या न करता उसने बोझिल मन से पर्ची ले ली और लड़खड़ाते हुए चल पड़ा।

सिलेंडर तो मिल गया था मगर भरा हुआ सिलेंडर उठाकर चल पाना इस वक्त उसके लिए बेहद मुश्किल था अन्यथा यही वह नरायन है जो आटा-चावल, दाल की पचास किलो वाली कट्टी यूं उठाकर ठेलिया पर लाद लेता था जैसे वह रुई का कट्टा हो। रिक्शे की उम्मीद न थी। उसे ध्यान आया, श्याम के पास साइकिल थी अगर वह कहता तो हो सकता है उसे मिल जाती कमसकम सिलेंडर लाने में आसानी तो होती फिर अपने इसी खयाल पर वह हंसा। श्याम ने बताया तो था कि लॉकडाउन के बाद से उनके घर से बाहर कोई न निकला है। हो सकता है वह साइकिल भी न देते कहीं वायरस उनकी साइकिल से घर तक न पहुँच जाये।

"साले फट्टू...वायरस जाना होगा तो क्या सब्जियों से न चला जाएगा" उसने मन ही मन उन्हें गाली दी फिर आंखों ही आंखों से सिलेंडर को तोलने लगा। अब उसके पास यही विकल्प था के सिलेंडर को पैरों से धकेलते हुए वह घर तक ले जाए।

सिलेंडर लेकर जब वह घर के सामने पहुँचा तो जैसे जैन साहब उसके ही इंतजार में बैठे थे उन्होंने जल्दी-जल्दी दो-तीन मग्गा पानी सिलेंडर पर डाला फिर उसकी और पांच सौ के चार नोट बढ़ा दिए।

उसने गिने। थूक गटका, फिर हैरानी से उनकी ओर देखते हुए बड़ी मुश्किल से कह पाया-"मुझे पांच हजार की ज़रूरत थी"

"अभी तो इतने का ही इंतजाम हो पाया है"

उसे महसूस हुआ जैसे जैन साहब उसके साथ एक भद्दा मजाक कर रहे हों। बेबसी और गुस्से से वह तिलमिला उठा-"घर का सारा राशन खत्म है। कमरे का किराया देना है। गैस भी खत्म होने वाली है। बच्चा दूध न मिलने की वजह से लगातार रोता है। ऐसे में इतने से क्या होगा?"

"फिलहाल इतने में ही काम चलाओ दोबारा फिर आकर ले लेना"

"एक हफ्ते से मकान मालिक किराए के लिए रोज झिकझिक करता है तीन हजार तो उसको ही देना है"

"तुम्हारा मकान मालिक एक नंबर का कमीना है। क्या उसे खबर नहीं कि सरकार ने खुद कहा है कि इस वक्त किरायेदारों को परेशान न करें।"

"आप सही कहते हैं मगर सरकार ने तो यह भी कहा है कि अपने कर्मचारियों का ख्याल रखें उनकी यथासंभव मदद करें"

उसके यह शब्द जैन साहब के कानों में पड़े तो उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने ग़लत ट्रैक पकड़ लिया है लिहाजा वह एक पल को खामोश रहे। सिर खुजाया फिर गर्दन झटक कर बोले-"सरकार को क्या! उसको तो बस जुबान चलानी रहती है। क्या उसे नहीं मालूम कि पूरा देश बंद है। व्यापार ठप है तो पैसा कहाँ से आएगा?"

"आपकी बात समझता हूँ मगर इतने में मेरा कुछ नहीं होगा"

"कह तो रहा हूँ दो-चार दिन बाद फिर ले लेना तब तक कोई न कोई इंतजाम हो जाएगा"

"बार-बार आ पाना संभव नहीं...पुलिस का डंडा खाकर आया हूँ वैसे भी मेरे हिसाब के ही आठ हजार से ऊपर निकल रहे हैं"

यूं तो उसने बेहद सावधानी से कहा था मगर जैन साब ने सुना तो दिमाग की सारी नसें चटक गई उन्हें लगा वह उनकी औकात बता रहा है लिहाजा वह चीख पड़े-"तो क्या तुम्हारा पैसा मारे ले रहा हूँ? यहाँ कोई रजिस्टर तो है नहीं जो अभी हिसाब जोड़ दूं। जो भी निकलेगा मिलेगा मगर इस वक्त हुज्जत मत करो"

"मगर इतने में कैसे होगा?" बेबसी और पीड़ा उसके शब्दों में उतर आयी थी।

"कहीं और से भी जुगाड़ कर लो... अगर मेरे यहाँ काम न करते होते तो भी तो जुगाड़ करते ही न"

"पांच साल आपके पास काम करके जब जुगाड़ न कर पाया तो और किससे उम्मीद करूं" आंखों की कोरें पसीज गयी थीं।

"तुम्हें यह रुपए लेने हों तो लो अन्यथा इससे ज़्यादा का जुगाड़ अभी न हो पाएगा। लोग तो बस ये समझ लेते हैं कि दुकान है तो घर में नोटों का अंबार लगा होगा... तुमने देखा नहीं सिलेंडर मैंने खुद उधार मंगाया है"

उन्होंने दो टूक कहा और गेट बंद करने लगे।

नरायन ने बड़ी उम्मीद के साथ मुट्ठी में बंद चार नोटों को निहारा फिर हाथ जोड़ दिए-"पैसे न सही कुछ राशन का ही इंतजाम कर दीजिए। इस वक्त बेहद मुश्किल में हूँ अन्यथा इतना न कहता।"

वह एक पल को कुछ सोचते रहे। उनके चेहरे पर कई भाव आए और गए फिर अचानक वह बोले-"राशन जो भी है गोदाम में है। अभी उसका पर्चे से मिलान नहीं किया गया है और तुमको तो पता है लबड़-सबड़ मुझे पसंद नहीं। हाँ, एक-दो किलो चावल चाहिए तो अभी भिजवा देता हूँ।"

वह कुछ देर हाथ जोड़े उम्मीद में खड़ा रहा शायद साहब पिघल जाएँ मगर साहब जो अंदर गए तो दोबारा न आए। अलबत्ता नौकर ने पॉलीथिन की एक पोटली उसकी ओर बढ़ा दी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि दो हजार में वह अपनी ज़िन्दगी को कबतक मौत के मुहाने से खींचने में सफल हो पाएगा।


उसकी बेबसी धीरे-धीरे कमरे में भी उतर आई थी। जी चाहता था जोर-जोर से रोये मगर गले में जैसे कोई धांस अटकी थी...वह चाहकर भी न रो सका फिर सावित्री क्या सोचेगी? अगर वह खुद ही टूट जाएगा तो फिर इन सबको कैसे संभालेगा? लॉकडाउन भर तो भूख का हमला सहना जैसे नियति हो चुकी थी। जैन साहब ने जो चावल दिए थे उनमें से ही थोड़ा चावल सावित्री ने पकाया जिसे दोनों ने नमक के साथ खाया था। इस वक्त की भूख मिट गई थी मगर अभी बाकी का लॉकडाउन उसके सन्मुख सुरसा कि तरह मुंह बाये खड़ा था और यह लॉकडाउन आगे भी बढ़ सकता है इस बात की भी प्रबल संभावना थी क्योंकि संक्रमित मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही थी। एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले देश में चंद लोगों द्वारा ही सही जो मूर्खता का परिचय दिया जा रहा था उससे कोरोना कि भयावहता बढ़ने की प्रबल संभावना थी। मगर इन अकल से पैदल लोगों को क्या कहा जाये। सोशल डिस्टेंसिंग की तमाम अपीलों को धता बताकर कोई झुंड में नमाज पढ़कर अल्लाह के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहा था तो कोई माननीय पीएम की अपील से भी दो कदम आगे जाकर शंख और घड़ियाल बजाते हुए रैली निकालकर लॉकडाउन की धज्जियाँ उड़ा रहा था। इस संकट की घड़ी में कोई भी अपनी मूर्खता में पीछे नहीं रहना चाहता। वह चाहे जमातियों की भीड़ हो या दीआ जलाने की अपील को लेकर वह सभी लोग जो झुंड में दीवाली के पटाखे जलाकर कोरोना को बता देना चाहते थे कि उसका इस देश में स्वागत करने के लिए लोग पलक पांवडे बिछाकर बैठे हैं। कोरोना भी कहीं बैठा सोचता होगा कि उसने कैसे उजबक देश में अपने पांव रखे हैं जहाँ उसे भगाने की कोशिशों को ही धता बता दिया गया है। यहाँ लॉकडाउन और फिजिकल डिस्टेंसिंग का कोई मतलब नहीं। यही वजह है तमाम मेडिकल स्टाफ और प्रशासन की सतर्कता के बावजूद कोरोना मरीजों का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। बस ये ज़रूर अच्छी बात है कि कोरोना से मरने वालों की अपेक्षा बचने वालों की तादाद अधिक है। बचने वालों की अधिकता ये उम्मीद जगाती है कि अभी ज़िन्दगी के पैरों में मृत्यु की बेड़ियों की पकड़ इतनी मजबूत नहीं हुई है कि सबकुछ धराशायी हो जाये।

मगर दूसरा पहलू ये भी है कि अभी पर्याप्त जांचे ही नहीं हो रही हैं। इसके साथ ही जगह-जगह से पुलिस और डाक्टरों से मारपीट करते लोगों की खबरें भी आ रही हैं जोकि बेहद ग़लत है। लोगों को समझना चाहिए कि प्रशासन उनके भले के लिए सख्ती किए है वह उनका दुश्मन नहीं। इन सबके बीच केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारें भी अपनी क्षमता भर बेहतर करने की कोशिशों में लगी हैं। मगर समस्या सिर्फ़ कोरोना हो तो संभल जाए। कोरोना कि वजह से अन्य समस्याएँ भी सर उठाने लगी हैं। जिनमें बेरोजगारी और भुखमरी सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर रही है। नौकरियाँ लगातार खत्म होती जा रही हैं और जिन लोगों की अभी बची है उनके ऊपर भी तलवार लटक रही है। फिलहाल कोरोना से ज़्यादा समस्याएँ अन्य वजहों से होने वाली हैं। अर्थव्यवस्था पहले ही धराशाई हो चुकी है। दिहाड़ी मजदूर और छोटी-मोटी नौकरी करके पेट पालने वाले भी तबाह हो चुके हैं। ऐसे में समस्या कोरोना से ज़्यादा भूख है कोरोना से तो इंसान बच भी जाए मगर भूख से कब तक बचा रहेगा?

वह तख्त पर बैठा यही सब सोच-सोचकर पागल हुआ जा रहा था। उसे महूसस हो रहा था जैसे जेहन पर कोई शिलापट लदा है जिसका लगातार बढ़ता वजन उसके वजूद को चकनाचूर करके उसे जमींदोज कर देने को आतुर है।

अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने दरवाजा खोला तो सामने मकान मालिक थे लिहाजा वह कमरे से बाहर निकलकर गैलरी में आ गया।

"लाओ भई! आज तो किराया दे ही दो"

"ज्जी" उसने सूख चुके होंठो पर जबान फेरी और कमरे में आया। हैंगर पर शर्ट टंगी थी उसकी जेब से चारों नोट निकाली और बाहर जाकर उनके हाथों पर रख दीं।

"ये क्या? यह तो दो हजार ही हैं।"

"इतने की ही व्यवस्था हो पायी है"

"बाकी" उन्होंने उसे प्रश्नवाचक नजरों से देखते हुए कहा।

"मेरे पास खाने को कुछ नहीं बचा है। राशन पानी सब खत्म है। अब मुझे कोई उम्मीद भी नजर नहीं आती"

"तुम गए तो थे मालिक के पास"

"वहाँ से इतने ही मिले हैं"

"क्या तुमने सारी बातें बताई नहीं?"

"बताई थीं"

"इसके बावजूद भी... साले! करोड़पति होकर भी अपने कर्मचारियों की मदद नहीं कर रहे।" वह तमतमाए।

अचानक बच्चा रोने लगा तो उसका रोना बढ़ता ही गया।

"ये इतना क्यों रो रहा है?"

"भूखा है ...सावित्री चीनी का घोल पिलाती है मगर नहीं पीता...दूध के पैसे भी तो नहीं हैं"

वह एकपल को सोचते रहे फिर आहिस्ता से बोले-"मुझे भी बस किराए का ही सहारा है। सरकारी नौकरी तो थी नहीं जो पेंशन मिलती। अब तो दवाइयाँ भी खत्म हो रही है मगर तुम ऐसा करो एक हजार रख लो। थोड़ा बहुत ही सही राशन आ ही जाएगा"

उसने एक नजर उन्हें आश्चर्य से देखा। डूबते को तिनके का सहारा ही बहुत था। उसकी आंखें छलछला आयीं।

कोरोना कि भयावहता लगातार बढ़ती जा रही थी। इकाई-दहाई से शुरू हुए आंकड़े सैकड़े से होते हुए हजार तक पहुँच चुके थे। न्यूज़ चैनल लगातार लॉकडाउन बढ़ने की अटकलें लगा रहे हैं उसका दिल बैठने लगा है। रात-रात भर नींद नहीं आती। बस करवटें बदलता रहता है। बिना किसी काम के ये ज़िन्दगी कब तक साथ निभाएगी? किसी सहायता कि कोई उम्मीद भी नजर नहीं आती। एक दो बार उसने हेल्पलाइन नम्बर भी मिलाया मगर कोई संतोषजनक उत्तर न पा सका।

सावित्री भूख से व्याकुल बच्चे के मुंह में अपनी छाती लगाती तो वह दो-चार बार 'चुभुर-चुभुर' करके पीने की कोशिश करता मगर छातियों में दूध हो तब न...थकहार कर वह रोने लगता और गुस्से में निप्पल चबा लेता।

एक हजार रुपयों में बेहद कम राशन लाने के बावजूद उसके पास कुछ न बचा था। ऊपर से राशन बीस से तीस परसेंट मंहगा भी हो चुका है। अब तो तीनों प्राणियों का रातभर जागने का नियम बन चुका था। इस तरह पूरी रात जागरण में निकल जाती।


अचानक दो-तीन दिन बाद उसे महसूस हुआ खांसी के बगूले रह-रहकर उसके गले से उभरने लगे हैं जिन्हें वह पूरी ताकत लगाकर रोकने की कोशिश करता फलस्वरुप उसका पूरा चेहरा लाल हो जाता। आंखें बाहर निकल आने को व्याकुल होतीं। कानों के लवे लाल हो जाते। 'कहीं वह भी तो संक्रमित नहीं हो गया' बार-बार उसके जेहन में यही खयाल धमाचौकड़ी मचाये रहता मगर वह किससे संक्रमित हुआ होगा यह बात जेहन पर बेहद जोर डाल कर भी उसकी समझ से बाहर थी। वैसे भी वायरस कोई दिखने वाली चीज तो है नहीं फिर उसे कैसे पता चलता कि यह किससे हुआ होगा? पिछले पंद्रह दिनों में कोई बीस-पच्चीस लोगों से तो वह सौदा-सुलुफ की वजह से मिल चुका है। ऐसे में यह संक्रमण कहाँ से आया होगा यह बता पाना बेहद मुश्किल था। कहीं कोई संक्रमित सब्जी तो न बेंच गया उसे...ऐसी खबरें भी तो लगातार सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं। कौन कहाँ से बेचने आया था वह जानता भी नहीं। काश! उसका अंदेशा ग़लत निकले।

सावित्री उसकी मनोदशा समझ रही थी और इस जानलेवा बीमारी से वह भी बेहद डरी हुई थी कि कहीं उसको और बच्चे को भी न हो जाए मगर मजबूरी थी कि एक ही कमरा था।

'अगर मकान मालिक को पता चल गया तो धक्के मार कर घर से निकाल देगा या पुलिस के हवाले कर देगा' यही सोचकर दोनों और ज़्यादा डरे थे फिर भी उसने नरायन से डाक्टर को दिखाने को बोला। भले ही दोनों डरे थे मगर खांसी भी कई तरह की होती हैं। कोरोना में तो सूखी खांसी की चर्चा है जबकि नरायन की खांसी महसूस होता है जैसे गले में खराश है सांस लेने में दिक्कत कर रही है। जोर लगाकर खांसने पर थोड़ा-बहुत बलगम भी निकल आता है।

ऐसे में थोड़े-बहुत पैसे बटोरकर वह डॉक्टर से मिला। तीन खुराक दवाई देते हुए डॉक्टर ने उसे यही बताया कि यह सामान्य खांसी है एक-दो दिन में ठीक हो जाएगी डरने जैसी कोई बात नहीं...कोरोना का कोई लक्षण फिलहाल तो नहीं दिखता। डॉक्टर के समझाने पर उसकी जान में जान आई और उसने समय पर दवाई भी ली मगर जाने क्यों दवाई खाने के बावजूद भी उसकी खांसी ठीक न हो रही थी।

अपनी खांसी को वह कब तक दबाए रहता कभी न कभी वह उभर ही आती थी। एकदिन अचानक खांसी उभरी तो वह बड़ी देर तक खांसता रहा। मकान मालिक जैसे उसकी खांसी पर ही कान लगाये था जैसे ही उसके खांसने की आवाज पहुँची उनके कान खड़े हो गए।

हो न हो अगर इस वक्त खांसी आ रही है तो कोरोना भी हो सकता है और ऐसे में उन सबकी जान को भी खतरा है उसने बिना देरी करते हुए दूर से ही नरायन को चेतावनी दे डाली-"तुम अभी के अभी मेरा कमरा खाली कर दो"

यह एकदम अप्रत्याशित था। उसके पांवों के नीचे से जमीन खिसक गयी। बड़ी मुश्किल से उसने पूछा-"मगर किसलिए?"

"इतने भोले मत बनो... खांसी आ रही है तब भी अंजान बनते हो" उन्होंने आंखें तरेरीं

"मगर डाक्टर का कहना है कि यह सामान्य खांसी है... आप मेरा भरोसा कीजिए" उसमें हाथ जोड़ दिए

' डाक्टर की ऐसी-तैसी। ये चालीस-पचास रुपये की दवाई देने वाले झोलाछाप डॉक्टरों का मुझे कोई भरोसा नहीं। जान है तो जहान है। राशन की बात थी तो हमदर्दी थी मगर इस बीमारी के साथ कोई हमदर्दी नहीं" वह तैश में दहाड़े।

"ऐसा मत कहिए अंकल! ऐसे माहौल में दो साल के बच्चे को लेकर कहाँ जाऊंगा?"

"ये मेरी समस्या नहीं है..."

उन्होंने झटके से कहा फिर कुछ सोचकर ज़रा आहिस्ते से बोले-"देखो! मेरी तरफ से अब तक का किराया माफ समझो मगर अब यहाँ रहने नहीं दूंगा... अभी के अभी सामान समेटो और निकलो"

"अंकल! ऐसा मत कीजिए मैं इस वक्त कहाँ जाऊंगा कुछ तो रहम करो" उसकी आंखें बरस पड़ी मगर यह बारिश सामने वाले के हृदय में संवेदना का उफान न ला सकी।

"तुम जाते हो या मैं पुलिस को बुलाऊँ मगर याद रखना पुलिस अभी तो सिर्फ़ तुम्हें ही पकड़ेगी ...बाकी तुम्हारे बीवी-बच्चे...सोच लो..."

वो कहते-कहते रुके फिर गर्दन उचकाई और समझाने के अंदाज में बोले-"वो दरबदर भटकें इससे बेहतर है तुम सब एक साथ ही चले जाओ"

"चार साल से आपके यहाँ रह रहा हूँ। हमेशा वक्त पर किराया दिया। कभी मांगने का मौका नहीं आया। उसका यह सिला मिल रहा है। इस लॉकडाउन की वजह से मजबूर हूँ और आप ज़रा भी मेरी सहायता नहीं कर रहे।"

"तुम्हें खांसी न होती तो मुझे कोई समस्या न थी"

"अंकल आप भी रात भर खांसते रहते हैं तो क्या आपको भी... खैर, जाने दीजिए। जब डाक्टर तक की बात आप सुनने को तैयार नहीं तो क्या कहूँ...अभी ये सब सामान ले जाने की क्षमता नहीं है आप चाहें तो इसको फिंकवा दें या फिर यहीं पड़ा रहने दें।" उसने भारी मन से कहा फिर गायत्री की ओर देखते हुए ज़रा ऊंची आवाज में बोला-"ज़रूरी सामान थैले में रखो...हम अभी निकलेंगे"

"मगर हम जाएंगे कहाँ?"

गायत्री ने उसे हैरानी से देखते हुए पूछा तो उसके पास इसका कोई सटीक जवाब न था। वह कमरे की छत को घूरते हुए बस इतना कह सका-"बाहर जाने पर पुलिस पीटती है और इस कमरे में अब रह नहीं सकते...ऐसे में अब नियति जहाँ ले जाए"


तीन दिन बाद टीवी पर न्यूज़ ऐंकर चीख रहा है-"पुलिस ने मुरादाबाद शहर से बाहर सड़क किनारे तीन लाशें बरामद की है। एक लाश तो मात्र डेढ़-दो साल के बच्चे की है। इन लाशों के पास एक थैला जिसमें कुछ कपड़े और एक-दो बर्तन मिले हैं। इसके साथ ही उनके पास एक पर्चा बरामद हुआ है जिसमें लिखा है"

उसके यह कहते ही स्क्रीन पर बोल्ड अक्षरों में उस पर्चे का मैटर शो होने लगा-

"यह मानव सभ्यता हम जैसे गरीबों के लिए नहीं है। हमने यहाँ ईंट-गारा ढोकर ऊंची-ऊंची इमारतें बनाई मगर इन इमारतों में हमारे लिए कोई जगह नहीं। हमने फसलें उगाईं जिनसे धन्ना सेठों के गोदाम भरे पड़े हैं मगर वक्त-ज़रूरत हमारे लिए राशन नहीं है। हमने हर वह काम किया जो इस सभ्यता को जिंदा रखने के लिए ज़रूरी था मगर इस शहर को साठ महीने अपने खून पसीने से सींचने के बावजूद बेहद मुश्किल दिनों में इसके पास हमें जिंदा रखने के लिए साठ दिन का भी वक्त नहीं। हम इस महामारी से भले ही बच जाएँ मगर जिस सभ्यता में लगातार मनुष्यता छीजती जा रही हो वहाँ हमारे जैसों का मर जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। कल को हो सकता है हमारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह साबित हो जाए कि हम दम घुटने से मरे हैं मगर हकीकत यह है कि हम कभी जिंदा थे ही नहीं।"

इसी खबर के साथ नीचे खबरों की एक पट्टी लगातार चल रही है-

"लॉकडाउन चौदह अप्रैल से बढ़कर तीन मई तक"

"सरकार गरीबों का पूरा ध्यान रखेगी। सरकार के पास पर्याप्त राशन और दवाओं का स्टॉक है। कोई भूखा नहीं रहेगा।"