रसोइया / रूपसिह चंदेल

Gadya Kosh से
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मैंने देखा उसका चेहरा मुर्झाया हुआ था। बाल रूखे थे, शायद हफ्तों से उनमें तेल नहीं पडा़ था । हल्के पीले रंग की मैली कमीज उसने पहन रखी थी। कमीज कई जगह से फटी हुई थी। टांगों को उसने एक फटे पायजामे से ढक रखा था। फटी जगह उसने मोटे धागे से सिलाई की हुई थी। उसने हाथ में गन्दा-सा झोला लटका रखा था। अपनी निस्तेज आंखों से एकटक देखते हुए निकट आकर उसने मुझे नमस्ते की। एक क्षण के लिए उसके कदम ठिठके, किन्तु न जाने क्या सोचकर वह आगे बढ़ गया . कुछ दूर जाकर उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा और फिर बाजार की ओर जाने वाली सड़क की ओर मुड़ गया .

मैं उसे जाता हुआ तब तक देखता रहा जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गया। उसके ओझल होते ही मैं हाथ में थामे उपन्यास को पढ़ने लगा था.

प्रतिदिन मैं फक्ट्री से लौटकर कमरे के बाहर कुर्सी डालकर कोई-न कोई पुस्तक पढ़ने बैठ जाता था। उस दिन के बाद अब पास से गुजरते हुए वह मुझे नमस्ते करने लगा था। नमस्ते का जवाब देते समय मैं एक क्षण के लिए पढ़ रही पुस्तक से दृष्टि हटाकर उसकी ओर देखने के लिए विवश हो जाता। जब तक बाजार की ओर जाने वाली सड़क पर वह मुड़ नहीं जाता, मैं बिना पढ़े उसके विषय में ही सोचता रहता। धीरे-धीरे मैं ऎसा अनुभव करने लगा था कि सोचने के लिए मेरे पास जितने भी विषय हैं उनमें एक विषय की बढ़ोत्तरी हो गयी है। रोजाना वह शाम के समय वही फटी कमीज और पायजामा पहने बाजार जाता और उस गन्दे झोले में ढेर-सी सब्जियां ठूंसे चुपचाप लौट आता। शायद यही उसकी दिनचर्या थी या इसके अतिरिक्त भी वह कुछ करता था, मुझे ज्ञात न था।

लगातार कई दिनों से मैं उसे देख रहा था, किन्तु एक दिन भी मैंने उसके चेहरे पर खुशी की झलक न देखी थी। मुझे वह चलती-फिरती जिन्दा लाश की तरह प्रतीत होता था।

एक दिन बाजार जाते समय वह मेरे पास आकर ठिठक गया और कुछ उदास स्वर में नमस्ते की। पुस्तक से दृष्टि हटाकर मैंने उसे देखा। वही रोजाना की हालत में वह सामने खड़ा था। मैं कुछ पूछता उससे पहले ही उसने पूछ लिया, "बाबूजी आप इहां नए आये हो ?"

"हां---- नया हूं।"

वह कुछ सोचने लगा। शायद पुनः प्रश्न करने का साहस जुटा रहा था या यह सोच रहा था कि अब क्या पूछा जाय। चुप्पी तोड़ते हुए मैंने पूछा, "यहां क्या करते हो?"

"मेस मा खाना बनाइत है बाबू।"

"---- क्या यहां मेस भी है?"

"हां---- वो सामने की बिल्डंग है न, ओही मा मेस है।"

"क्यामैं भी मेम्बर बन सकता हूं?" मैंने कुछ उत्सुकता से पूछा।

"हां---- हां जरूर, लेकिन मुनीशर दा से पूछे का पड़ी। वोही मेस के इन्चरज हैं।"

"ठीक है उनसे पूछकर बताना।"

मुझे लगा जैसे मेरे प्रस्ताव से वह प्रसन्न बुआ था।

"जरूर बताइब बाबू साब।"

मुझे विश्वास हो गया कि अब भोजन की समस्या सुलझ जायेगी। जब से यहां आया था, ठहरने की व्यवस्था तो फैक्ट्री द्वार बनाए गये ’एप्रेण्टिसेज होस्टल’ में हो गयी थी, किन्तु खाने की ठीक व्यवस्था न हो पायी थी। अच्छे होटल के अभाव में आधे पेट रह रहा था।

दूसरे दिन शाम को बाजार जाते समय वह मेरे पास आया। पूछने पर उसने बताया कि मुनीशर दा ने मेम्ब्र बनाना स्वीकार कर लिया है। रात में वह मेरी मुलाकात उनसे करवा देगा।

मैं स्टेशन रॊड पर स्थित एक चलता किस्म के होटल में भोजन करने जाया करता था। कहना यों चाहिए कि पेट भरने जाता था। उस दिन जल्दी लौट आया और उसके आने की प्रतीक्षा करने लगा। रात दस बजे के लगभग वह आया और मुझे मेस में ले गया। मेस में एक लम्बे-चौड़े बड़ी-बड़ी आंखों वाले सज्जन भोजन कर रहे थे। उसने कहा, "यही हैं मुनीशर दा।"

मुनीशर दा को नमस्कार कर मैं पास की बेंच पर बैठ गया। बातों का सिलसिला उन्होंने ही शुरू किया। वह भोजन के साथ-साथ मुझसे बात भी करते जा रहे थे। उनका पूरा नाम ’मुनीश्वर वन्दोपाध्याय’ था. फैक्ट्री में सहायक प्रबन्धक थे. एक बार पेरिस भी घूम आए थे. बयालीस-तैंतीलीस वर्ष के लग रहे थे, लेकिन उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि वह अभी तक ’बैचलर’ हैं । हंसते हुए मुझे भी सलाह दी, "अभी शादी-वादी के चक्कर में मत पड़ना। दुनिया का मजा लो मजा।"

हम लोग काफी देर तक बातें करते रहे थे।

♦♦ • ♦♦

दूसरे दिन से मैं मेस में भोजन करने लगा। उसी दिन मुझे पता चला कि उसका नाम सियाराम था। मुझे जोड़्कर अब मेस में भोजन करने वालों की संख्या अठारह हो गयी थी। दोपहर लंच के समय वहां अच्छा खासा शोरकुल हो जाता था। सियाराम उस समय निकर और बनियाइन में दैड़-दौड़कर खाना परोस रहा होता था. कभी वह प्लेट में चपाती लिए किसी की ओर लपकता दिखाई देता तो क्षणभर बाद ही उसके हाथ में चावल, सब्जी या दाल दिखाई देती. कुछ लोग ऎसे थे, जिन्हें अण्डे की सब्जी या मछली विशेष पसन्द थी. जिस दिन ये चीजें न होती, वे हंगामा खड़ा कर देते, "क्यों बे उल्लू का पट्ठा , तुमी आज मछली क्यूं नई पकाया ---- स्साला कितना दफा बोला, मेरे वास्ते अन्डा जरुर होना मांगता पर ये ससुरा आलवेज अपने मन का करता है---- अरे बाबा पैसे की कमी है तो बोलता क्यूं नईं." लेकिन सियाराम बिना कुछ बोले इधर से उधर दौड़ता दिखाई पड़्ता.

मुनीशर दा का सभी सदस्यों पर काफी रोब-दाब था। सियाराम तो उनकी कठपुतली-सा था। वह जो भी कहते, उसे करना पड़ता। लंच के समय मुनीशर दा कुछ देर आराम किया करते और सियाराम उनके पैर दबाया करता । दरअसल वह एक ’कोआपरेटिव’ मेस था, जिसके संचालक मुनीश्वर दा थे। वही सियाराम को वहां लाये थे। सियाराम को उन्होंने लगभग अपना व्यक्तिगत नौकर-सा बना रखा था, इसीलिए अपने सारे काम उससे करवाया करते थे। सियाराम के प्रति मुनीश्वर दा और मेस मे अन्य सदस्यों की कुछ बातें मुझे पसन्द न थीं, इसलिए मैं यन्त्रवत मेस में जाता और भोजन करके चला आया करता।

एक दिन एकान्त पाकर मैंने सियाराम से पूछा, "यहां क्यों फ़ंसे हुए हो सियाराम---- कोई छोटा-मोटा धन्धा क्यों नहीं कर लेते?" इस पर उदास होता हुआ वह बोला, "कहां जाई बाबू? धन्धा के लिए तो पैसा चाही. बहुत भटके हैं, लेकिन कोई नौकरी भी नाहीं मिलत."

बात ठीक भी थी।बिना पैसे के छोटा-से छोटा धन्धा भी नहीं किया जा सकता. नौकरी की समस्या और भी गंभीर है. मैंने पिर पूछा, "खाने-पीने के अलावा जो पैसा तुम्हें मिलता है उसको जोड़्ते क्यों नही?"

"पैसा मिलतै कहां हैं बाबू।"

"क्यों?"

"हमने एक बार हजार रुपिया मुनीशर दा से लेकर गांव भेजा रही, सो तब से एको पैसा तनखा नहीं मिली. डेढ़ साल से ऊपर हुई गवा."

मैं चुप हो गया था.

♦♦ • ♦♦

उस दिन सोने की तैयारी कर रहा था कि अचानक सियाराम घबड़ाया हुआ कमरे में आया. उसने अपने हाथ में अन्तर्देशीय पत्र थाम रखा था. मैंने पूछा, "क्या बात है सियाराम, कुछ घबड़ाए हुए दिखाई दे रहे हो?’ बिना कुछ बोले उसने अन्तर्देशीय मेरी ओर बढ़ा दिया.पत्र लेकर मैने पुनः पूछा, "बात क्या है?"

"का बताई बाबू चारों तरफ से आफत-ही आफत आ रही है. ई खत मा बड़े भाई ने लिखा है कि एक हजार रुपिया भेज दो नहीं तो अपनी मेहरारू लिवा ले जाओ । बताओ बाबू का करी ?" रुआंसे स्वर में वह बोला। पता नहीं कैसे वह मुझे अपना आत्मीय समझने लगा था।

"क्या तुम्हारी शादी भी हो गयी है?" मैंने साश्चर्य पूछा।

मेरे इस प्रश्न से वह कुछ शरमा गया।

’मुनीशर दा से पूछा था? क्या कह रहे थे?" मैंने बात बदल दी।

"उनको कल बंगला मिल गया है। आज उसमें चले गये हैं।---- कह रहे थे लिवा लाओ---- बगले में कुछ सफाई-वफाई का काम कर दिया कारेगी।"

"लेकिन---- खर्च कैसे चलाओगे?

"मुनीशर दा कह रहे थे कि बबनी भी मेस मा खाना खा लिया कारेगी---- और अब तनखा भी मिला करेगी ---- साइद पैसा अब अदा हुइ गया है।"

"ठीक है लिवा लाओ। तुम्हें भी आराम हो जायेगा।"शायद वह भी यही चाहता था,क्योंकि लौटते समय वह कुछ प्रसन्न था.

दूसरे दिन ही वह पत्नी को लेने चला गया. पांच दिन तक मुझे फिर स्टेशन रोड पर खाने जाना पड़ा. पांचवें दिन वह पत्नी को लिवा लाया और मेस के पास बने ’सर्वेंट क्वार्टर’ में रहने लगा. पत्नी के आने के बाद उसकी हालत भी सुधरने लगी. अब उसके बालों में तेल पड़ने लगा था. फटी कमीज का स्थान नई कमीज ने ले लिया था.पायजामा की जगह अब वह पुराना पैण्ट पहनने लगा था.

एक दिन मुनीश्वर दा लंच करने नहीं आए. उस दिन भोजन करके मैं मेस में पड़ी चारपाई पर कुछ क्षण के लिए आराम करने लगा.मेस के अन्य सदस्य जा चुके थे. सियाराम चारपाई के पास जमीन पर आकर बैठ गया. अब वह प्रयः खुश ही नजर आता था. सभी से हंस-हंसकर बातें करता था.

"आजकल कैसा चल रहा है सियाराम?" मैंने पूछा.

"बस ठीक -ठाक चल रहा है बाबू." गदोली पर तम्बाकू मलते हुए वह बोला .

"अब तो तनखा मिलने लगी है न!"

"हां बाबू."

कुछ देर तक हम दोनों ही चुप रहे. वह पूर्ण मनोयोग से तम्बाकू मल रहा था. तम्बाकू को मसूढ़ों के पास दबाकर कुछ दबी-सी जुबान से उसी ने कहना शुरू किया, "बाबू जी, मुझे जो सौ रुपिया मिलते हैं उससे तो खर्च पूरा होता नहीं. बबनी(पत्नी) शाम को मुनीशर दा के बंगले की सफाई कर आती है,जिससे उसे भी पचास रुपिया महीना उन्होंने बांध दिया है. मुनीशर दा ने उसे एक साड़ी और मुझे एक पैण्ट का कपड़ा भी दिया है."

"यह सब तो ठीक है---- अब कुछ पैसे जोड़कर तुम धन्धा---- सब्जी-वब्जी की दुकान या कुछ और---- शुरू करो. कब तक ऎसे काम चलेगा. आज दो हो कल को तीन----."

वह कुछ शरमा-सा गया। कुछ देर बाद बोला, "सो तो हमहूं सोचित है बाबू. लेकिन पैसा अभी बच नहीं पावत. " उसका चेहरा क्षण भर के लिए उदास हो गया था.

♦♦ • ♦♦

महीने का आखिरी दिन था। वेतन मिला था। वेतन के दिन मैं मेस का हिसाब मुनीश्वर दा को चुकता कर दिया करता था। उस दिन शाम को मेस का हिसाब करने के लिए मैं उनके बंगले की ओर गया। दूर से ही वहां का दृश्य देखकर मैं स्तब्ध रह गया। मुनीश्वर दा और सियाराम एक-दूसरे में गुंथे हुए थे।मुनीश्वर दा के लम्बे-चौड़े और भारी-भरकम शरीर के सामने नाटे कद का सियाराम नन्हा-सा दिखाई पड़ रहा था। किन्तु आज उसमें बला की स्फूर्ति आ गयी थी। यदि चार हाथ मुनीश्वर दा उसे मारते तो अपने को बचाता हुआ एक-आध हाथ वह भी उनके मारता जा रहा था।

अजीब दृश्य था वह। जिस सियाराम को मैंने मुनीश्वर दा के सामने भीगी बिल्ली की तरह देखा था उसे इस प्रकार उनके ही साथ मारपीट करता देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। ऎसी कौन सी बात थी जिससे उसने मुनीश्वर दा पर हाथ चला दिया । मैंने तो अभी तक उसे एक ऎसा व्यक्ति समझ रखा था, जिसकी अपनी कोई वाणी नहीं होती. जो पारिस्थितियों की झंझावातों में पड़कर अपने अस्तित्व तक को भूल जाते हैं। घटना की वास्तविकता जानने के लिए मैंने जल्दी-जल्दी साइकिल के पैडल चलाने शुरू कर दिये.

बंगले के निकट पहुंचकर मेरी दृष्टि सियाराम की पत्नी पर पड़ी. वह एक कोने में खड़ी कांप रही थी. उसकी धोती कई जगह फट रही थी और शरीर में खरोंच के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. उसके नेत्रों से अविरल आंसू बह रहे हे. मुनीश्वर दा ने सियाराम को गेट से बाहर निकल जाने के लिए धक्का दिया । वह गेट के पास जाकर रुक गया और बोला, "दादा, मैं गरीब जरूर हूं, लेकिन इज्जतवाला हूं। मुझे नहीं मालूम था कि आप इतने गिरे हुए----।"

उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही मुनीश्वर दा ने चीखते हुए कहा, "चोप्प स्साला, मुझ पर झूठा इल्जाम लगाता है। निकल जा यहां से। खबरदार, जो मेस में कदम रखा।" वह क्रोध से कांप रहे थे।

"इल्जाम--- देखो बाबू, बड़ा दूध का धुला बन रहा है आपके सामने।" मेरी ओर मुखातिब होकर सियाराम बोला, "बाबू मुझे नहीं मालूम था इसके मन में पाप है---- वह तो मैं आज बबनी को लेने जरा जल्दी आ गया---- उसकी चीखें सुनकर अन्दर पहुंचा तो देखा यह रक्षस उसे नोंचने की कोशिश कर रहा था।"

"चोप्प बदमाश---- निकल जा यहां से नहीं तो अभी सिर फोड़ दूंगा।" मुनीश्वर दा फिर गरज पड़े थे। मैंने देखा उनके हाथ में लोहे का तीन-चार फुट लम्बा रॉड था।

"सिर आप क्या---- पहले मैं ही फोड़ दूंगा।" सियाराम ने पैरों के पास पड़ी सरिया उठा ली। वह मुनीश्वर दा की ओर बढ़ा । मुनीश्वर दा अपने स्थान पर खड़े थे। कहीं दोनों एक दूसरे पर प्रहार न कर दें सोचकर मैं जल्दी से साइकिल से उतरा और उधर बढा़। अभी मैं गेट के पास पहुंचा ही था कि देखा मुनीश्वर दा पीछे हटने लगे थे और सियाराम आगे बढ़ता जा रहा था। क्षण भर बाद ही मैंने देखा मुनीश्वर दा भाग खड़े हुए थे। पिछले गेट से वह कहां चले गये, पता नहीं चला।

सियाराम ने सरिया वहीं फेंक दी। मेरी ओर मुड़कर बोला, "बाबू, मुझसे गलती हुई हो कभी तो माफ करना...." इसके आगे वह कुछ बोल नहीं सका । उसका स्वर भीगा हुआ था। उसने पत्नी को आवाज दी और उसे लेकर तेजी से वहां से चला गया। मैं हत्प्रभ उसे जाता हुआ देखता रहा। उसके बाद वह मुझे कभी दिखाई नहीं पड़ा।