राष्ट्र निर्माण: भाषा कि भूमिका / प्रताप सहगल

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राष्ट्र निर्माण में भाषा कि भूमिका क्या है? यह प्रश्न कुछ वैसा ही है जैसा कि यह पूछा जाए 'पेड़ के निर्माण में जड़ों की भूमिका क्या है?' या किसी से यह सवाल किया जाए कि तरह-तरह के प्रदूषण के बीच जीवन के लिए आक्सीजन की भूमिका क्या है? एक नज़र से देखने से यह प्रस्तावना बड़ी आसान-सी लगती है, लेकिन ज्यों-ज्यों इस पर चिंतन किया जाए, उलझाव बढ़ता जाता है?

मसलन पहले यह तय करना ज़रूरी हो जाता है कि राष्ट्र क्या है? क्या राष्ट्र और राज्य में कोई फ़र्क है कि नहीं? क्या राष्ट्र-राज्य में भी भाषा कि भूमिका वही होगी, जो कि एक ऐसे राज्य में जिसमें तरह-तरह के राष्ट्र समाहित हो गए हों। यानी नेशन और 'सब-नेशन' में फ़र्क करके चलें या कि एक नेशन को हम स्टेट भी मान लें। यहीं से भाषा कि भूमिका पेचीदा हो जाती है।

हम सब जानते हैं कि आज़ादी की लड़ाई तथा जागरण-काल में सभी वर्गों या कहें कि सभी जातियों (सब-नेशन्स) ने हिन्दी या हिंदुस्तानी को अपने संघर्ष का माध्यम माना और इसी बल पर एक बड़ा राष्ट्रीय जन-आंदोलन खड़ा हुआ। आज़ादी के बाद की कहानी कुछ और है। संघर्ष के निशाने बदल जाने के साथ-साथ हिन्दी भाषा कि भूमिका को भी उत्तर एवं मध्य भारत में रहने वाले लोगों का वचर्स्‍व स्थापित हो जाने के रूप में देखा जाने लगा। उस समय हालाँकि अंग्रेज़ी जानने वालों की संख्या मुश्किल से 0.5 प्रतिशत थी, लेकिन राजनीतिक एवं प्रशासनिक हलकों में वर्चस्व उन्हीं का था, इसलिए राज्य की भाषा अलग और जन की भाषा अलग हो गई। एक वर्ग वह जो हर तरह से अंग्रेज़ी के माध्यम से प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता था और दूसरा बड़ा वर्ग वह जिसे अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान ही नहीं था। यह भी हम जानते हैं कि जिस वर्ग के हाथ में सत्ता होती है, उसी वर्ग की भाषा का सिक्का भी चलता है। ऐसा हम मुग़ल-काल और ब्रिटिशकाल में देख चुके थे, लेकिन ताज्जुब इस बात का होता है कि अंग्रेज़ों के चलने जाने के बाद भी यहाँ के प्रशासकों ने अपनी जातीय पहचान को रेखांकित करना ज़रूरी नहीं समझा और इस तरह से राष्ट्र-निर्माण भी दो तरह से होने लगा। एक ओर वे लोग जिनके हाथ में सत्ता और ज़बान पर अंग्रेज़ी थी और दूसरी ओर वे लोग, जिनके पास न सत्ता थी, न अंग्रेज़ी। विभिन्न भारतीय भाषाएँ बोलने वाले इन लोगों की संख्या बड़ी थी, लेकिन यह वंचितों का एक बड़ा समाज था। भाषा के आधार पर ही राज्यों को पुनर्गठित किया गया और दक्षिण भारत में हिन्दी के लिए यह हव्वा खड़ा किया गया कि अब उत्तर-भारत के लोग दक्षिण भारत के लोगों की अपेक्षा जल्दी तरक्क़ी करेंगे। सत्ता उनके हाथ में होगी और दक्षिण भारत के लोग पिछड़ जाएँगे। तो कहें कि एक तरह से भारतीय राष्ट्र उत्तरी राष्ट्र और दक्षिणी राष्ट्र के रूप में विभाजित हो गया या राजनीतिक स्तर पर उसे विभाजित कर दिया गया। जो लड़ाई भारतीय भाषाओं बनाम अंग्रेज़ी होनी चाहिए थी, उसे मात्र हिन्दी बनाम अंग्रेज़ी बना दिया गया। इस षड्यंत्र के शिकार दोनों ओर के लोग हुए। बजाए इसके कि तमाम भारतीय भाषाओं की बात की जाती, बात सिर्फ़ हिन्दी की जाने लगी। तब हिन्दी को जिस तरह के विरोध का सामना करना पड़ा, उससे हम सभी परिचित हैं। ऐसे में राष्ट्र का निर्माण किस दिशा में होता? हिन्दी के विरोध में तरह-तरह के तर्क दिए जाने लगे कि इसमें वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली नहीं है। पहले वह बनाओ। आयोग बने। शब्द भी बने और उन शब्दों का क्या हश्र हुआ, यह हम सब जानते हें। घोड़े के आगे गाड़ी लगाने से गाड़ी नहीं चलती। शब्दावली भले ही गढ़ ली, भाषा गढ़ी नहीं जाती। भाषा विकसित होती है और विकास के लिए उसे प्रयोग में लाना ज़रूरी है।

अचरज की बात है कि हम वैज्ञानिक जानकारी ले सकते हैं, तकनीक उधार ले सकते हैं, लेकिन शब्द लेते हुए हम रुक जाते हैं। कहीं इसके पीछे हमारा कोई राष्ट्रीय या जातीय दंभ तो नहीं याकि एक तरह का इनफिरियारिटी काम्पलैक्स। आज भी हिन्दी और संभवतः अन्य भारतीय भाषाओं के लोग भी दो खेमों में बंटे हुए हैं। एक वर्ग अपनी भाषा कि शुचिता को मूल रूप से अक्षुण्ण रखना चाहता है, जबकि दूसरा वर्ग व्यावहारिक दृष्टि से समय, विषय एवं विचार की ज़रूरत के मुताबिक भाषा को ज़्यादा से ज़्यादा लचीला बननाना चाहता है। (मैं स्वयं को इसी उदार-वर्ग में रखना चाहता हूँ) वस्तुतः भाषा कि पहचान उसके व्याकरण और लिपि से होती है। किसी भी दूसरी भाषा का शब्द जब हिन्दी के व्याकरण एवं लिपि के अनुरूप ढल जाता है तो उसे हम हिन्दी का ही मानेंगे। राष्ट्र कोई शून्य में टिकी अवधारणा नहीं है, न ही यह कोई यूटोपिया है, बल्कि राष्ट्र एक सांस्कृतिक, सामाजिक एवं सामुदायिक इकाई है। इस रूप में एक राष्ट्र राज्य की सीमाओं के अंदर भी होता है और सीमाओं से बाहर भी। हम राज्य की सीमाओं में स्थित राष्ट्र की ही बात कर सकते हैं। हिंदू, मुस्लिम, सिख अथवा क्रिस्तानी तथा अन्य सभी कौमों को मिलाकर ही भारतीय राष्ट्र का निर्माण होता है। भारतीय राष्ट्र के दायरे में भी पंथ अथवा भाषाई आधार पर ठहरी हुई जातीयता कि पहचान की जा सकती है। धार्मिक आधारों की अपेक्षा अगर हम सांस्कृतिक आधारों की बात करें तो भाषा कि भूमिका ज़्यादा कारगर हो सकती है। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ऐतिहासिक साक्ष्यों के विपरीत यहाँ हिन्दी को हिंदुओं की, उर्दू को मुसलमानों की तथा पंजाबी की सिक्खों की भाषा के रूप में स्थापित किया गया। इसमें सीधी-सीधी बंदर-बांट राजनीति काम कर रही है। इस तरह से राष्ट्र निर्माण में भाषाई आधार पर कौमों की पहचान होने लगी है, जिससे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया मंद हुई और भाषाई वैमनस्य पैदा हुआ है वस्तुतः भारतीय भाषाओं की अस्मिता कि रक्षा के लिए जो समवेत आंदोलन लेखकों एवं कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा सालों से चलाया जा रहा है, उसे और तेज़ करने की ज़रूरत है और इस तरह के अंतर-भाषाई सम्मेलन अपनी कारगर भूमिका निभाते ही हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है।

पंजाबी भाषी होने के बावजूद मैं यह मानता हूँ कि पूरे भारतीय राष्ट्र को पहचान देने के लिए, जन-संपर्क सुविधाजनक बनाने के लिए एक भाषा ज़रूरी है। सभी भारतीय भाषाओं की भूमिका असंदिग्ध और महत्‍तवपूर्ण है। इस तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता। लेकिन अंग्रेज़ी के वर्चस्व के मुकाबले अपनी भाषा को वरीयता देना ज़रूरी है। जन का दबाव कहें या कि एक राजनीतिक ज़रूरत, यह काम हिन्दी ने किया है। राज्यतंत्र की तमाम उपेक्षाओं एवं राजनीतिक विरोधों के बावजूद हिन्दी एक जन-संपर्क भाषा के रूप में विकसित हुई है। हिन्दी का अन्य भारतीय भाषाओं से कोई विरोध न है, न हो सकता है। यह बात इस तथ्य से प्रमाणित होती है कि-जैसे-जैसे हिन्दी का विकास हुआ ठीक उसी के अनुरूप सभी भारतीय भाषाएँ विकसित हुई हैं। तमिलनाडु के राजनेता जब तमिल बोलते हैं या बंगाल के बंगला तो हर्ष होता है। पर जब वे जन संपर्क में भी अंग्रेज़ी बोलने लगते हैं तो एक तरह की मानसिक दासता ही झलकती है।

हम यह भी देखते हैं कि साहित्य के क्षेत्र में भी हिन्दी एक केंद्रीय भाषा के रूप में विकसित हुई है। आज सभी भारतीय भाषाओं का सबसे ज़्यादा साहित्य हिन्दी में ही उपलब्ध है और हिन्दी में अनुवाद होते ही उस रचना का प्रचार-प्रसार हिन्दी के अतिरिक्त दूसरी भाषाओं में बढ़ जाता है। इसमें अहिंदी भाषियों की भूमिका प्रशंसनीय ही नहीं, अनुकरणीय भी है।

मित्रो! इस समय इस लड़ाई से भी एक बड़ा ख़तरा और है और वह है बाज़ारवाद। हम देख रहे हैं कि जिस देश के पास जितना बड़ा बाज़ार है, वहाँ की भाषा भी उतनी तेज़ी से विकसित हो रही है। औपनिवेशिक दृष्टिकोण समाप्त हो रहा है। सांस्कृतिक उपनिवेशता कि चर्चा जिस तरह से चलाई जाती है, वह सही नहीं है। अन्य देशों खासतौर पर पश्चिम देशों की संस्कृति के प्रभाव की हम आलोचना करते नहीं थकते, लेकिन जब भारतीय संस्कृति का असर हम पश्चिमी या अमेरिकी संस्कृति पर पाते हैं, तो हमारे हर्ष की कोई सीमा नहीं रहती। यह एक तरह का सांस्कृतिक दोगलापन है। सांस्कृतिक सीमाएँ टूटी हैं, टूट रही हैं-इसमें संगीत एवं अन्य कलाओं की भूमिकाओं को मानते हुए भी भाषा कि भूमिका को नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं है।

आज भारत एक बड़ा बाज़ार है। हम अपनी शर्तों पर बहुत कुछ स्वीकार या अस्वीकार करने की स्थिति में आ रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी अपना सामान बेचने के लिए भारतीय भाषाओं को ही माध्यम बना रही हैं। इस अवसर को भी चूकना नहीं चाहिए और अपनी भाषा को बाज़ार की अनिवार्य भाषा के रूप में विकसित होने देना चाहिए।

एक समय था जब 16वीं सदी में ब्रिटेन में जातीय बाज़ार विकसित हुआ तो उसी वज़ह से लंदन में बोली जाने वाली बोली साहित्य एवं बोलचाल की भाषा के रूप में विकसित हुई। यह अंग्रेज़ी थी। यहाँ यह भी संकेत कर दूँ कि अंग्रेज़ी के विकास से पूर्व ज्ञान-विज्ञान की भाषा लैटिन थी और लोगों के लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि ज्ञान-विज्ञान का माध्यम अंग्रेज़ी भाषा भी हो सकती है। यानी भाषा के इस्तेमाल ने उसे नए-नए आयाम दिए। आज कमोबेश यही सोच हिन्दी तथा अन्य तमाम भारतीय भाषाओं को लेकर है। हम यह भी जानते हैं कि ज्यों-ज्यों लंदन बाज़ार का प्रभुत्व दूसरी जगहों पर बढ़ता गया, त्यों-त्यों अंग्रेज़ी भाषा का वर्चस्व भी। उपनिवेशों की स्थापना और वहाँ कामकाज चलाने के लिए अंग्रेज़ी को जिस तरह लादा गया, उसे हम सब जानते हैं। यहीं से राष्ट्र दो फाड़ों में दिखने लगता है। एक छोटा-सा फाड़ अंग्रेज़ी दां लोगों का जिनके हाथ में सत्ता केंद्रित थी। व्यापार भी संचालित करने की क्षमता थी और दूसरा बड़ा फाड़ जनता का था। ऐसे में जिस तरह के राष्ट्र का निर्माण हुआ, वह हमारे सामने हैं।

आज जिस राष्ट्र की कल्पना हम करते हैं, उसमें भी दो फाड़ साफ़ हैं। एक ओर सत्ता, नौकरशाह और बड़ा व्यापारी वर्ग है और दूसरी ओर आम जनता तथा छोटे-मोटे दुकानदारों का वर्ग।

भाषा के आधार पर जिस जातीय अस्मिता कि पहचान और उस पर जो गौरव अनुभव होना चाहिए, वह अब भी उन लोगों में नहीं है, जिनके हाथों में राष्ट्रनिर्माण के सूत्र हैं। आज भी सत्ता और जन के बीच में खाई है। इस खाई को राजनीतिक एवं आर्थिक आधारों पर ही पाटा जा सकता है। आज जब हमारे प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र संघ या विदेशों की यात्रा पर हिन्दी बोलते दिखते हैं, तो राष्ट्रीय-अस्मिता के प्रति मन में एक गौरव का भाव जगता है। राजनीतिक स्तर पर इस प्रक्रिया को और तेज़ करने की ज़रूरत है।

दूसरी बात जो उभरकर सामने आई है, वह है उन लोगों के हाथों में बढ़ती हुई क्रय-शक्ति जो रोज़मर्रा के कामों में अपनी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी अपना बाल बेचने के लिए जन-भाषा में ही लोगों तक पहुँचने के लिए बाध्य हैं।

सभी भारतीय भाषाओं में छपने वाले समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं की संख्या, उनके प्रचार-प्रसार में जो वृद्धि हुई है, वह भी इस दिशा कि ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि हम अंग्रेज़ी को एक भाषा के रूप में भले ही स्वीकार कर लें, यह भाषा हमारी रगों में दौड़ते ख़ून का हिस्सा नहीं हो सकती।

यहाँ मैं एक बात और भी संकेत करना चाहता हूँ कि हम राष्ट्र-निर्माण के संदर्भ में भाषा के विकास की बात तो करते हैं लेकिन विचार के विकास एवं उसके द्वंद्वात्मक रिश्तों की बात नहीं करते। प्रायः हम विचार आयात कर लेते हैं और उसके साथ ही आ जाती हैं उससे जुड़ी अवधारणाएँ और शब्द-संपदा। विचारों का अनुवाद तो नहीं होता, लेकिन शब्दों के अनुवाद में जुटकर विचार को विकसित होने से रोक देते हैं। सिद्धांतों का निर्माण सामाजिक एवं राजनीतिक उथल-पुथल से होता है। राष्ट्र का निर्माण इन्हीं उथल-पुथलों का नतीजा होता है। भूमंडलीकरण के चक्कर में जब अवधारणाएँ फ्रांस, अमेरिका या ब्रिटेन से लाकर यहाँ रोप दी जाती हैं तो उसका फल कुछ बेढंगा ही होता है। अवधारणाओं की क़लम लगा कर उस पर अपनी चश्म चढ़ाना हम प्रायः भूल जाते हैं।

आज हम यह भी देखते हैं कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में दलित, आदिवासी तथा नारी आंदोलन का बड़ा हिस्सा अपनी-अपनी भाषा में ही बात कर रहा है। यह एक बेहतर प्रक्रिया है। संभवतः इसी संघर्ष से हम अपनी भाषाओं की शक्ति को पहचानें और उसे इस्तेमाल करके राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया के साथ अर्थपूर्ण तरीक़े से जोड़ें।